डिजिटल डेस्क। मौत सदियों से मानवता के लिए एक गूढ़ रहस्य रही है। जीवन की अंतिम सांस के बाद क्या होता है—क्या चेतना तुरंत समाप्त हो जाती है या कुछ क्षणों तक बनी रहती है—इस प्रश्न पर विज्ञान, दर्शन और धर्म सभी अपने-अपने दृष्टिकोण प्रस्तुत करते रहे हैं। अब एक नई वैज्ञानिक स्टडी ने इस बहस को फिर से जीवंत कर दिया है।

हाल ही में प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल Resuscitation में प्रकाशित एक शोध ने चौंकाने वाला दावा किया है। अध्ययन के अनुसार, दिल की धड़कन रुक जाने के बाद भी कुछ समय तक इंसानी दिमाग सक्रिय रह सकता है। इतना ही नहीं, कुछ मामलों में मरीज अपने आसपास हो रही बातचीत—यहां तक कि डॉक्टरों द्वारा अपनी मृत्यु की घोषणा—तक सुन पाने की स्थिति में हो सकते हैं।

क्या कहती है स्टडी?

इस शोध से जुड़े चिकित्सकों का कहना है कि ‘क्लीनिकल डेथ’ यानी जब दिल की धड़कन और सांस रुक जाती है, वह अंतिम बिंदु नहीं हो सकता। अध्ययन के दौरान ऐसे मरीजों के अनुभव दर्ज किए गए जिन्हें कार्डियक अरेस्ट के बाद पुनर्जीवित किया गया था। कई मरीजों ने बताया कि वे अपने आसपास हो रही गतिविधियों, डॉक्टरों की आवाज़ और इलाज की प्रक्रिया को “महसूस” या “सुन” पा रहे थे।

शोध में यह संकेत मिला कि हृदय रुकने के बाद भी कुछ मिनटों तक मस्तिष्क में विद्युत गतिविधि (ब्रेन वेव्स) दर्ज की जा सकती है। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह गतिविधि चेतना से जुड़ी हो सकती है, हालांकि इस पर अभी और गहन अध्ययन की आवश्यकता है।

मौत की परिभाषा पर पुनर्विचार?

न्यूयॉर्क के एक डॉक्टर द्वारा साझा किए गए निष्कर्षों ने मेडिकल जगत में नई बहस छेड़ दी है। परंपरागत रूप से, दिल की धड़कन रुकने को मृत्यु का संकेत माना जाता रहा है। लेकिन यदि दिमाग कुछ समय तक सक्रिय रहता है, तो यह सवाल उठता है कि वास्तविक मृत्यु का क्षण कौन-सा है—हृदय का रुकना या मस्तिष्क की अंतिम गतिविधि का समाप्त होना?

विशेषज्ञों का मानना है कि यह शोध ‘नियर-डेथ एक्सपीरियंस’ (मृत्यु-समीप अनुभव) को समझने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कड़ी हो सकता है। वर्षों से कई लोग सुरंग जैसी रोशनी देखने, अतीत की झलकियां दिखने या किसी अलौकिक शांति का अनुभव करने की बात करते रहे हैं। अब वैज्ञानिक इन अनुभवों को मस्तिष्क की जैविक प्रक्रियाओं से जोड़कर समझने का प्रयास कर रहे हैं।

नैतिक और चिकित्सकीय प्रभाव

यदि यह साबित होता है कि मृत्यु के बाद कुछ समय तक चेतना बनी रह सकती है, तो अस्पतालों में इलाज और पुनर्जीवन (CPR) की प्रक्रियाओं को लेकर नए मानक तय करने पड़ सकते हैं। साथ ही, जीवन के अंतिम क्षणों में मरीज के साथ व्यवहार, संवाद और वातावरण को लेकर भी संवेदनशीलता और बढ़ानी होगी।

यह अध्ययन न केवल विज्ञान की सीमाओं को चुनौती देता है, बल्कि जीवन और मृत्यु की हमारी पारंपरिक समझ को भी पुनर्परिभाषित करने की ओर इशारा करता है। हालांकि शोधकर्ता स्वयं मानते हैं कि यह अंतिम निष्कर्ष नहीं है, बल्कि एक नए विमर्श की शुरुआत है।

Rajnish Pandey
A media professional with experience in print and digital journalism, handling news editing and content management with a focus on accuracy and responsible reporting.

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