रिपोर्ट (डेस्क): वेनेजुएला पर सैन्य कार्रवाई के बाद अमेरिका की विदेश और व्यापार नीति एक बार फिर आक्रामक रुख में दिखाई दे रही है। ताजा घटनाक्रम में दावा किया जा रहा है कि पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व वाले प्रशासन ने भारत और चीन पर 500 प्रतिशत टैरिफ लगाने से जुड़े एक अहम बिल को मंजूरी दे दी है। इस फैसले के बाद वैश्विक व्यापार जगत में चिंता और अनिश्चितता का माहौल बन गया है। क्या है 500% टैरिफ वाला बिल? रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस प्रस्तावित कानून के तहत भारत और चीन से अमेरिका को होने वाले निर्यात पर बेहद भारी आयात शुल्क लगाया जाएगा। 500 प्रतिशत तक का टैरिफ किसी भी देश के लिए असाधारण माना जाता है और इसका सीधा असर व्यापार, कीमतों और आपूर्ति श्रृंखला पर पड़ सकता है। इस बिल का उद्देश्य अमेरिका के घरेलू उद्योगों को संरक्षण देना और उन देशों पर दबाव बनाना बताया जा रहा है, जिन पर अमेरिका लंबे समय से “अनुचित व्यापार व्यवहार” के आरोप लगाता रहा है। भारत और चीन क्यों निशाने पर? चीन के साथ अमेरिका का व्यापार युद्ध कोई नया मुद्दा नहीं है। टेक्नोलॉजी, सेमीकंडक्टर, स्टील और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में दोनों देशों के बीच लंबे समय से तनातनी चल रही है। वहीं भारत के मामले में, फार्मा, आईटी सर्विसेज, स्टील और टेक्सटाइल जैसे क्षेत्रों में बढ़ते निर्यात को लेकर अमेरिका में असंतोष की बात कही जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम रणनीतिक और राजनीतिक दबाव बनाने की नीति का हिस्सा भी हो सकता है। वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर की आशंका अगर 500 प्रतिशत टैरिफ वास्तव में लागू होता है, तो इसका असर सिर्फ भारत और चीन तक सीमित नहीं रहेगा। * अमेरिकी बाजार में महंगाई बढ़ सकती है * वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती है * निवेशकों का भरोसा कमजोर पड़ सकता है अंतरराष्ट्रीय व्यापार विशेषज्ञ इसे “अत्यधिक कठोर कदम” बता रहे हैं। भारत की संभावित प्रतिक्रिया फिलहाल भारत सरकार की ओर से इस मुद्दे पर कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। हालांकि, कूटनीतिक हलकों में चर्चा है कि अगर ऐसा कोई कदम लागू किया गया, तो भारत विश्व व्यापार संगठन (WTO) समेत अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इसका विरोध कर सकता है। राजनीतिक संकेत भी अहम विश्लेषकों के अनुसार, ट्रंप का यह रुख आगामी अमेरिकी राजनीतिक परिदृश्य और “अमेरिका फर्स्ट” नीति को दोबारा धार देने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है। वेनेजुएला के बाद भारत और चीन को लेकर सामने आ रही यह खबर वैश्विक राजनीति और व्यापार संतुलन के लिए अहम मानी जा रही है। हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि बिल को व्यावहारिक रूप से कब और किस रूप में लागू किया जाएगा, लेकिन इतना तय है कि इस कदम ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हलचल जरूर पैदा कर दी है।
भारत पर आतंकी साजिश का संकेत? पाकिस्तान में हमास–लश्कर कमांडरों की सीक्रेट मीटिंग से बढ़ी चिंता
रिपोर्ट (डेस्क): पाकिस्तान की धरती से भारत की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। हालिया सामने आए एक वीडियो और खुफिया संकेतों ने आशंका बढ़ा दी है कि पाकिस्तान में सक्रिय आतंकी संगठनों के बीच नए सिरे से तालमेल बन रहा है। बताया जा रहा है कि हमास और लश्कर-ए-तैयबा के शीर्ष कमांडरों के बीच एक गुप्त मुलाकात हुई है, जिसे सुरक्षा एजेंसियां बेहद संवेदनशील मान रही हैं। सूत्रों के अनुसार, वायरल हो रहे एक वीडियो में हमास का एक कमांडर और लश्कर-ए-तैयबा का कुख्यात कमांडर राशिद अली संधू पाकिस्तान के गुजरांवाला में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान साथ दिखाई दे रहे हैं। यह वीडियो सामने आने के बाद सुरक्षा एजेंसियों की चिंता और सतर्कता दोनों बढ़ गई हैं। क्या है पूरा मामला? वीडियो फुटेज में दोनों कमांडरों की मौजूदगी को केवल औपचारिक मुलाकात मानने से इनकार किया जा रहा है। खुफिया एजेंसियों का आकलन है कि यह मुलाकात आतंकी नेटवर्क के विस्तार, संसाधनों की साझेदारी और संभावित ऑपरेशनल सहयोग से जुड़ी हो सकती है। खास तौर पर भारत के खिलाफ किसी बड़ी साजिश की आशंका से इनकार नहीं किया जा रहा। पाकिस्तान की भूमिका पर सवाल भारत लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह मुद्दा उठाता रहा है कि पाकिस्तान आतंकवाद को संरक्षण देता है। गुजरांवाला जैसे शहर में खुले तौर पर ऐसे तत्वों का एक मंच पर दिखना, पाकिस्तान की आतंकी ढांचे पर कार्रवाई को लेकर उसकी नीयत पर सवाल खड़े करता है। भारत की सुरक्षा एजेंसियां अलर्ट सूत्रों का कहना है कि इस घटनाक्रम के बाद भारत की खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों ने हाई अलर्ट जारी कर दिया है। सीमा क्षेत्रों के साथ-साथ संवेदनशील शहरों में निगरानी बढ़ाई गई है। एजेंसियां वीडियो की प्रामाणिकता, समय-सीमा और मीटिंग के वास्तविक उद्देश्य की गहन जांच कर रही हैं। अंतरराष्ट्रीय चिंता भी बढ़ी हमास और लश्कर-ए-तैयबा—दोनों ही संगठन कई देशों द्वारा प्रतिबंधित आतंकी संगठनों की सूची में शामिल हैं। ऐसे में इनके बीच कथित संपर्क की खबरें न केवल भारत, बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए भी गंभीर चिंता का विषय मानी जा रही हैं। हालांकि अभी तक किसी ठोस आतंकी हमले की पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन सामने आए संकेतों ने खतरे की घंटी जरूर बजा दी है। आने वाले दिनों में जांच के निष्कर्ष और आधिकारिक प्रतिक्रियाएं यह तय करेंगी कि यह मुलाकात महज एक कार्यक्रम तक सीमित थी या इसके पीछे भारत विरोधी किसी बड़ी साजिश की नींव रखी जा चुकी है।
ट्रंप की सख्ती से मचा भूचाल: उत्तरी सागर में अमेरिकी सेना ने रूसी तेल टैंकर किया जब्त, बढ़ा वैश्विक तनाव
न्यूज रिपोर्ट (डेस्क): अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की आक्रामक विदेश नीति एक बार फिर दुनिया के सामने है। वेनेजुएला पर सैन्य और आर्थिक दबाव बढ़ाने के बाद अब अमेरिका ने रूस को सीधे तौर पर निशाने पर लेते हुए उत्तरी सागर में रूसी ध्वज वाले एक तेल टैंकर को जब्त कर लिया है। इस जोखिम भरे अभियान को अमेरिकी सेना ने अंजाम दिया, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तनाव और गहराने की आशंका जताई जा रही है। सूत्रों के मुताबिक, जिस तेल टैंकर को जब्त किया गया है, वह रूस से जुड़ा हुआ बताया जा रहा है और उस पर रूसी झंडा लगा हुआ था। जैसे ही इस कार्रवाई की जानकारी मॉस्को को मिली, रूस ने टैंकर की सुरक्षा के लिए नौसेना तैनात करने की कोशिश की। हालांकि, तमाम कूटनीतिक और सैन्य प्रयासों के बावजूद अमेरिका ने अपने अभियान को पूरा करते हुए टैंकर को अपने कब्जे में ले लिया। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कार्रवाई केवल एक तेल टैंकर की जब्ती तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे अमेरिका का व्यापक रणनीतिक संदेश छिपा है। ट्रंप प्रशासन पहले ही रूस पर कई तरह के आर्थिक प्रतिबंध लगा चुका है और अब इस तरह की सैन्य कार्रवाई से दोनों देशों के रिश्तों में और कड़वाहट आने की आशंका है। रूस की ओर से इस घटना को अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन बताया जा सकता है, वहीं अमेरिका इसे अपनी सुरक्षा और वैश्विक हितों से जोड़कर सही ठहराने की कोशिश करेगा। जानकारों के अनुसार, अगर इस मामले पर दोनों देशों के बीच टकराव और बढ़ा तो इसका असर वैश्विक तेल बाजार, समुद्री व्यापार और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ सकता है। फिलहाल पूरी दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि रूस इस कार्रवाई का जवाब किस तरह देता है और क्या यह घटना अमेरिका-रूस संबंधों को एक नए टकराव की ओर ले जाएगी।
महाराष्ट्र निकाय चुनाव: बीजेपी की ‘लोकल स्ट्रैटेजी’ से सियासी भूचाल, कांग्रेस और AIMIM से गठबंधन पर उठे सवाल; फडणवीस की नाराजगी के संकेत
मुंबई। महाराष्ट्र में आगामी नगर निकाय चुनावों से पहले राजनीति में बड़ा उलटफेर देखने को मिल रहा है। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने स्थानीय स्तर पर अलग-अलग दलों के साथ गठबंधन कर सभी को चौंका दिया है। ठाणे जिले के अंबरनाथ में कांग्रेस के साथ तालमेल और विदर्भ के अकोला जिले के आकोट में AIMIM के साथ समझौते ने सियासी गलियारों में हलचल तेज कर दी है। इन फैसलों से पार्टी के भीतर भी असहजता दिख रही है और उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की नाराजगी की चर्चाएं सामने आ रही हैं। स्थानीय मजबूरी या राजनीतिक प्रयोग? सूत्रों के मुताबिक, बीजेपी ने यह गठबंधन पूरी तरह ‘स्थानीय परिस्थितियों’ को ध्यान में रखकर किए हैं। अंबरनाथ में जहां कांग्रेस के साथ साझा उम्मीदवार उतारे गए हैं, वहीं आकोट में AIMIM से समझौता कर मुकाबले को त्रिकोणीय होने से रोका गया है। पार्टी नेताओं का तर्क है कि निकाय चुनावों में विचारधारा से ज्यादा स्थानीय समीकरण, जातीय संतुलन और जीत की संभावना अहम होती है। विपक्ष का हमला, समर्थकों में असमंजस बीजेपी के इन कदमों पर विपक्ष ने तीखा हमला बोला है। कांग्रेस और शिवसेना (उद्धव गुट) ने सवाल उठाया है कि जो पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस और AIMIM की नीतियों का विरोध करती रही है, वही अब स्थानीय चुनावों में उनके साथ हाथ मिला रही है। वहीं बीजेपी के कुछ समर्थकों और कार्यकर्ताओं में भी असमंजस की स्थिति है, जो इसे ‘सिद्धांतों से समझौता’ बता रहे हैं। फडणवीस की भूमिका पर अटकलें राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि देवेंद्र फडणवीस इन गठबंधनों से पूरी तरह सहमत नहीं हैं। हालांकि पार्टी की ओर से आधिकारिक बयान में इसे ‘स्थानीय इकाइयों का निर्णय’ बताया गया है, लेकिन संकेत मिल रहे हैं कि शीर्ष नेतृत्व इस प्रयोग के नतीजों पर करीबी नजर रखे हुए है। क्या बदलेगा महाराष्ट्र का सियासी गणित? विश्लेषकों का मानना है कि अगर ये गठबंधन सफल रहते हैं, तो बीजेपी भविष्य में भी निकाय स्तर पर लचीली रणनीति अपना सकती है। वहीं असफलता की स्थिति में पार्टी के भीतर नेतृत्व और रणनीति को लेकर बहस तेज हो सकती है। कुल मिलाकर, महाराष्ट्र के निकाय चुनाव इस बार सिर्फ स्थानीय सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि राज्य की राजनीति की दिशा तय करने वाले साबित हो सकते हैं।
T20 World Cup 2026: सुरक्षा पर ICC का भरोसा बरकरार, भारत से बाहर मैच कराने की BCB की मांग नामंजूर
डिजिटल डेस्क | खेल: टी20 विश्व कप 2026 को लेकर बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड (BCB) की भारत से बाहर मैच शिफ्ट कराने की मांग को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (ICC) ने खारिज कर दिया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, आईसीसी ने स्पष्ट किया है कि भारत में टूर्नामेंट के आयोजन को लेकर सुरक्षा का कोई ‘रेड फ्लैग’ नहीं है और मौजूदा हालात में वेन्यू बदलने की जरूरत नहीं पड़ती। सूत्रों के अनुसार, BCB ने हालिया घटनाक्रम और खिलाड़ियों की सुरक्षा को लेकर चिंताओं का हवाला देते हुए यह अनुरोध किया था कि बांग्लादेश के मुकाबले किसी तटस्थ देश में कराए जाएं। हालांकि, आईसीसी की आंतरिक समीक्षा और सुरक्षा आकलन के बाद यह निष्कर्ष निकाला गया कि भारत में टी20 विश्व कप के लिए सभी आवश्यक सुरक्षा मानक पूरे किए जा रहे हैं। ICC का रुख: सुरक्षा व्यवस्था पर्याप्त आईसीसी के करीबी सूत्रों का कहना है कि टूर्नामेंट से पहले और दौरान केंद्र व राज्य सरकारों के साथ समन्वय, सुरक्षा एजेंसियों की तैनाती, और वेन्यू-स्तरीय प्रोटोकॉल पहले से तय हैं। इसी आधार पर आईसीसी ने BCB की मांग को अस्वीकार करते हुए शेड्यूल और वेन्यू यथावत रखने का फैसला लिया। BCB की चिंता क्या थी? बताया जा रहा है कि BCB ने खिलाड़ियों की आवाजाही, अभ्यास सत्रों और मैच डे सुरक्षा को लेकर आशंका जताई थी। साथ ही, हाल के महीनों में क्षेत्रीय तनाव और कुछ विवादों को देखते हुए बोर्ड अतिरिक्त सावधानी बरतना चाहता था। लेकिन आईसीसी ने इन आशंकाओं को पर्याप्त ठोस आधार के बिना माना। BCCI की तैयारियां भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) पहले ही टी20 विश्व कप 2026 की मेजबानी को लेकर व्यापक तैयारियों में जुटा है। प्रमुख शहरों में वेन्यू अपग्रेड, भीड़ प्रबंधन, ट्रैवल लॉजिस्टिक्स और टीम सुरक्षा के लिए अलग-अलग नोडल एजेंसियों की नियुक्ति की जा चुकी है। आगे क्या? आईसीसी के फैसले के बाद यह लगभग तय माना जा रहा है कि बांग्लादेश के मुकाबले निर्धारित भारतीय वेन्यू पर ही खेले जाएंगे। हालांकि, आईसीसी ने यह भी संकेत दिया है कि टूर्नामेंट से पहले सुरक्षा स्थिति की निरंतर समीक्षा जारी रहेगी और किसी असाधारण परिस्थिति में ही बदलाव पर विचार होगा। कुल मिलाकर, आईसीसी के इस फैसले से यह संदेश साफ है कि टी20 विश्व कप 2026 के आयोजन को लेकर भारत पर भरोसा कायम है और सुरक्षा के मोर्चे पर किसी तरह का ‘रेड फ्लैग’ नहीं देखा गया है।
आधी रात चला बुलडोजर, तुर्कमान गेट पर हाई कोर्ट के आदेश से अवैध निर्माण ध्वस्त; पथराव में 5 पुलिसकर्मी घायल
दिल्ली :दिल्ली हाई कोर्ट के सख्त निर्देशों के बाद राजधानी के तुर्कमान गेट इलाके में आधी रात को बड़ी प्रशासनिक कार्रवाई की गई। नगर निगम दिल्ली (MCD) ने फैज-ए-इलाही मस्जिद के पास किए गए अवैध निर्माण को ध्वस्त कर दिया। यह कार्रवाई रामलीला मैदान के नजदीक की गई, जहां पहले से ही अतिक्रमण को लेकर विवाद चल रहा था। कार्रवाई के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए दिल्ली पुलिस और अर्धसैनिक बलों की भारी तैनाती की गई थी। बावजूद इसके, देर रात कुछ असामाजिक तत्वों ने पुलिस और निगम की टीम पर पथराव शुरू कर दिया। इस घटना में पांच पुलिसकर्मी घायल हो गए, जिन्हें तुरंत नजदीकी अस्पताल में भर्ती कराया गया। घायलों की हालत फिलहाल स्थिर बताई जा रही है। हाई कोर्ट के आदेश पर हुई कार्रवाई सूत्रों के अनुसार, दिल्ली हाई कोर्ट ने इलाके में लंबे समय से बने अवैध ढांचों को हटाने के निर्देश दिए थे। कोर्ट ने स्पष्ट कहा था कि सार्वजनिक भूमि पर किसी भी तरह का अतिक्रमण बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इसी आदेश के अनुपालन में MCD ने पुलिस प्रशासन के सहयोग से यह अभियान चलाया। तनावपूर्ण रहा माहौल बुलडोजर कार्रवाई के दौरान इलाके में तनाव का माहौल बना रहा। पथराव के बाद कुछ देर के लिए अफरा-तफरी की स्थिति पैदा हो गई, हालांकि पुलिस ने हालात को काबू में लेते हुए अतिरिक्त बल बुलाया और कार्रवाई को पूरा किया। सुरक्षा के मद्देनज़र पूरे इलाके में बैरिकेडिंग कर दी गई और आने-जाने पर अस्थायी रोक लगाई गई। प्रशासन का बयान दिल्ली पुलिस अधिकारियों ने बताया कि स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में है और कानून-व्यवस्था भंग करने वालों की पहचान की जा रही है। CCTV फुटेज और वीडियो के आधार पर पथराव करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। वहीं, MCD अधिकारियों ने कहा कि आगे भी कोर्ट के आदेशों के तहत अतिक्रमण हटाने का अभियान जारी रहेगा। इलाके में बढ़ाई गई सुरक्षा घटना के बाद तुर्कमान गेट और आसपास के संवेदनशील इलाकों में पुलिस गश्त बढ़ा दी गई है। प्रशासन ने लोगों से शांति बनाए रखने और अफवाहों पर ध्यान न देने की अपील की है। यह कार्रवाई एक बार फिर राजधानी में अवैध निर्माण और अतिक्रमण को लेकर सख्त रुख का संकेत मानी जा रही है।
मुस्तफिजुर विवाद का असर: BCB का बड़ा फैसला, भारत में टी20 विश्व कप मैच नहीं खेलेगा बांग्लादेश!
डिजिटल डेस्क: मुस्तफिजुर रहमान को लेकर उठे विवाद के बीच बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड (BCB) ने एक बड़ा और चौंकाने वाला फैसला लिया है। BCB ने पुष्टि की है कि बांग्लादेश की टीम 2026 टी20 विश्व कप के तहत भारत में अपने मैच खेलने नहीं जाएगी। यह निर्णय ऐसे समय में सामने आया है, जब इंडियन प्रीमियर लीग (IPL) 2026 से पहले मुस्तफिजुर रहमान को कोलकाता नाइट राइडर्स (KKR) की टीम से बाहर किए जाने पर दोनों क्रिकेट बोर्डों के बीच तनाव की स्थिति बन गई है। क्या है पूरा मामला मुस्तफिजुर रहमान लंबे समय से आईपीएल में बांग्लादेश के प्रमुख खिलाड़ियों में गिने जाते रहे हैं। लेकिन आईपीएल 2026 से पहले BCCI की ओर से विदेशी खिलाड़ियों की उपलब्धता और राष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं को लेकर जारी दिशानिर्देशों के बाद KKR ने मुस्तफिजुर को टीम से रिलीज कर दिया। इस फैसले को लेकर बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड ने नाराजगी जताई और इसे अपने खिलाड़ी के साथ “अनुचित व्यवहार” करार दिया। BCB का कहना है कि बिना बोर्ड से औपचारिक चर्चा के इस तरह का कदम उठाना खेल भावना और द्विपक्षीय रिश्तों के खिलाफ है। इसी नाराजगी के बीच अब यह बड़ा फैसला लिया गया है कि बांग्लादेश भारत में होने वाले 2026 टी20 विश्व कप के मैचों के लिए यात्रा नहीं करेगा। BCB की आधिकारिक प्रतिक्रिया BCB के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “हम अपने खिलाड़ियों के सम्मान और अधिकारों से कोई समझौता नहीं कर सकते। मुस्तफिजुर का मामला सिर्फ एक खिलाड़ी का नहीं, बल्कि पूरे बांग्लादेश क्रिकेट का है। मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए भारत में मैच खेलने को लेकर पुनर्विचार किया गया है।” हालांकि BCB ने यह भी स्पष्ट किया है कि वह ICC के संपर्क में है और विश्व कप में बांग्लादेश की भागीदारी को लेकर वैकल्पिक व्यवस्थाओं पर चर्चा चल रही है। ICC और BCCI की भूमिका इस फैसले के बाद अब अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (ICC) की भूमिका अहम हो गई है। ICC को मेजबान देश, शेड्यूल और टीमों की भागीदारी को लेकर समाधान निकालना होगा। वहीं, BCCI की ओर से अभी तक इस मुद्दे पर कोई औपचारिक बयान सामने नहीं आया है। क्रिकेट जगत में हलचल BCB के इस फैसले से क्रिकेट जगत में हलचल मच गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह विवाद लंबा खिंचता है, तो इसका असर न सिर्फ टी20 विश्व कप बल्कि भारत-बांग्लादेश के क्रिकेट संबंधों पर भी पड़ सकता है। फिलहाल सभी की निगाहें ICC की अगली बैठक और इस पूरे विवाद पर आने वाले आधिकारिक फैसले पर टिकी हुई हैं।
मनरेगा पर कांग्रेस का बड़ा आंदोलन: बिहार में 47 दिन तक ‘मनरेगा बचाओ संग्राम’, विधानसभा घेराव से केंद्र को घेरने की तैयारी
बिहार: केंद्र सरकार द्वारा मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम) में किए जा रहे कथित बदलावों के खिलाफ कांग्रेस ने बिहार में व्यापक आंदोलन का ऐलान किया है। पार्टी ने इसे ग्रामीण गरीबों, मजदूरों और किसानों के अधिकारों पर सीधा हमला बताते हुए 10 जनवरी से 25 फरवरी तक 47 दिनों के ‘मनरेगा बचाओ संग्राम’ की घोषणा की है। कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि केंद्र सरकार मनरेगा की मूल भावना को कमजोर कर रही है। बजट में कटौती, काम के दिनों में कमी, भुगतान में देरी और नियमों को जटिल बनाकर गरीबों को रोजगार से वंचित किया जा रहा है। पार्टी का कहना है कि इससे गांवों में बेरोजगारी और पलायन की समस्या और गंभीर होगी। आंदोलन की रूपरेखा कांग्रेस द्वारा घोषित कार्यक्रम के तहत आंदोलन को चरणबद्ध और व्यापक बनाया जाएगा। इसमें राज्य से लेकर पंचायत स्तर तक गतिविधियां होंगी। * जिला स्तर पर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सरकार की नीतियों को उजागर किया जाएगा। * उपवास और धरना-प्रदर्शन के जरिए विरोध दर्ज कराया जाएगा। * पंचायत स्तर पर जनसंपर्क अभियान, चौपालें और नुक्कड़ सभाएं आयोजित होंगी। * ग्रामीण इलाकों में कार्यकर्ताओं द्वारा घर-घर संपर्क कर मनरेगा के महत्व और सरकार की नीतियों से होने वाले नुकसान की जानकारी दी जाएगी। * आंदोलन के अंतिम चरण में विधानसभा घेराव और अखिल भारतीय रैलियों का आयोजन किया जाएगा। कांग्रेस का आरोप कांग्रेस नेताओं ने कहा कि मनरेगा करोड़ों ग्रामीण परिवारों के लिए जीवनरेखा है। यह न सिर्फ रोजगार देता है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूत करता है। पार्टी का दावा है कि केंद्र सरकार निजीकरण और खर्च में कटौती की नीति के चलते इस योजना को धीरे-धीरे खत्म करने की दिशा में बढ़ रही है। राजनीतिक संदेश इस आंदोलन के जरिए कांग्रेस बिहार में ग्रामीण मुद्दों को केंद्र में लाकर सरकार पर दबाव बनाने की रणनीति पर काम कर रही है। पार्टी का मानना है कि मनरेगा जैसे मुद्दे पर जनआंदोलन खड़ा कर वह ग्रामीण मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत कर सकती है। कुल मिलाकर, ‘मनरेगा बचाओ संग्राम’ के जरिए कांग्रेस ने केंद्र सरकार को सीधे चुनौती दी है। आने वाले 47 दिन बिहार की राजनीति में हलचल बढ़ाने वाले माने जा रहे हैं।
कौन हैं डेल्सी रोड्रिग्ज? सत्ता के केंद्र में पहुंचीं मादुरो की करीबी, वेनेजुएला में सियासी भूचाल
काराकस।अमेरिका की ओर से वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी की गिरफ्तारी के दावे के बाद देश में अभूतपूर्व राजनीतिक उथल-पुथल मच गई है। हालात की गंभीरता को देखते हुए शीर्ष अदालत ने उपराष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिग्ज को अंतरिम राष्ट्रपति नियुक्त करने का फैसला किया है। इस घटनाक्रम के साथ ही वेनेजुएला की सत्ता का केंद्र अचानक बदल गया है और पूरी दुनिया की निगाहें अब डेल्सी रोड्रिग्ज पर टिक गई हैं। कौन हैं डेल्सी रोड्रिग्ज डेल्सी एलोइना रोड्रिग्ज गोमेज वेनेजुएला की सबसे प्रभावशाली और अनुभवी राजनेताओं में शुमार की जाती हैं। वे लंबे समय से राष्ट्रपति मादुरो की भरोसेमंद सहयोगी रही हैं और सरकार के कई अहम फैसलों में उनकी निर्णायक भूमिका रही है। * डेल्सी रोड्रिग्ज इससे पहले विदेश मंत्री और बाद में उपराष्ट्रपति के पद पर रह चुकी हैं। * अंतरराष्ट्रीय मंचों पर वे वेनेजुएला का मुखर पक्ष रखने के लिए जानी जाती हैं, खासकर अमेरिका और पश्चिमी देशों की नीतियों के खिलाफ उनके सख्त बयानों ने उन्हें पहचान दिलाई। * वे देश के दिवंगत नेता जॉर्ज रोड्रिग्ज की बेटी और नेशनल असेंबली के अध्यक्ष जॉर्ज रोड्रिग्ज की बहन हैं, जिससे उनका राजनीतिक प्रभाव और भी मजबूत माना जाता है। अंतरिम राष्ट्रपति बनने का रास्ता मादुरो की गिरफ्तारी के दावे के बाद शासन व्यवस्था में उत्पन्न संवैधानिक शून्य को भरने के लिए शीर्ष अदालत ने आपात बैठक बुलाई। इसके बाद डेल्सी रोड्रिग्ज को अंतरिम राष्ट्रपति नियुक्त करने की घोषणा की गई। अदालत का तर्क है कि मौजूदा हालात में प्रशासनिक स्थिरता बनाए रखना जरूरी है। ट्रंप का समर्थन और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया इस पूरे घटनाक्रम में पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का नाम भी सामने आ रहा है। ट्रंप खेमे से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, डेल्सी रोड्रिग्ज के नेतृत्व में सत्ता परिवर्तन को अमेरिका का “सशर्त समर्थन” बताया जा रहा है। हालांकि, वेनेजुएला के विपक्षी दल और कुछ लैटिन अमेरिकी देश इस फैसले पर सवाल उठा रहे हैं और इसे बाहरी हस्तक्षेप से जोड़कर देख रहे हैं। देश में हालात तनावपूर्ण काराकस समेत कई बड़े शहरों में सुरक्षा बढ़ा दी गई है। समर्थक और विरोधी गुटों के बीच टकराव की आशंका को देखते हुए सेना और पुलिस को अलर्ट पर रखा गया है। आर्थिक संकट, महंगाई और प्रतिबंधों से पहले ही जूझ रहे वेनेजुएला के लिए यह सत्ता परिवर्तन एक नया मोड़ साबित हो सकता है। आगे क्या? डेल्सी रोड्रिग्ज ने अंतरिम राष्ट्रपति के तौर पर पहला संदेश जारी करते हुए “संवैधानिक व्यवस्था, शांति और राष्ट्रीय संप्रभुता” बनाए रखने की बात कही है। अब सबकी नजर इस पर है कि वे अंतरिम दौर में चुनाव की घोषणा करती हैं या मौजूदा सत्ता संरचना को आगे बढ़ाती हैं। वेनेजुएला के इतिहास में यह अध्याय कितना लंबा और निर्णायक होगा, इसका जवाब आने वाले दिनों में सामने आएगा।
‘कई दिनों की गुप्त योजना के बाद कार्रवाई’, ट्रंप का दावा—अमेरिकी सेना ने मादुरो को पकड़ा; तेल समझौतों पर भी बड़ा बयान
वॉशिंगटन/काराकस।अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक बयान ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल मचा दी है। शनिवार को मीडिया से बातचीत के दौरान ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिकी सेना ने एक सुनियोजित और गुप्त अभियान के तहत वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को “दबोच” लिया है। ट्रंप ने इस कथित कार्रवाई की पूरी टाइमलाइन साझा करते हुए इसे अमेरिका की रणनीतिक और सैन्य क्षमता का उदाहरण बताया। हालांकि, वेनेजुएला सरकार की ओर से इस दावे को लेकर तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है और आधिकारिक पुष्टि अब तक नहीं हुई है। कई दिनों से चल रही थी तैयारी ट्रंप के अनुसार, इस ऑपरेशन की योजना कई दिनों पहले बनाई गई थी। पहला चरण: अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने वेनेजुएला की राजनीतिक और सुरक्षा स्थिति पर बारीकी से निगरानी शुरू की। दूसरा चरण: क्षेत्र में मौजूद सहयोगी देशों और एजेंसियों के साथ समन्वय स्थापित किया गया। तीसरा चरण: सीमित और सटीक सैन्य कार्रवाई के जरिए ऑपरेशन को अंजाम दिया गया, ताकि किसी तरह का व्यापक टकराव न हो। ट्रंप ने कहा कि यह पूरी कार्रवाई “बिना शोर-शराबे के” की गई और इसका उद्देश्य क्षेत्र में अमेरिकी हितों की सुरक्षा था। तेल उद्योग पर ट्रंप का बड़ा बयान मीडिया बातचीत के दौरान ट्रंप ने वेनेजुएला के तेल उद्योग को लेकर भी बड़ा दावा किया। उन्होंने कहा कि भविष्य में अमेरिकी ऊर्जा कंपनियां वेनेजुएला के तेल क्षेत्रों में अहम भूमिका निभाएंगी। ट्रंप के शब्दों में, “अमेरिका की तेल कंपनियां दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे बेहतरीन हैं। अगर उन्हें मौका मिलता है, तो वेनेजुएला के तेल उद्योग को नई दिशा दे सकती हैं।” वेनेजुएला की प्रतिक्रिया ट्रंप के इस बयान के बाद वेनेजुएला में राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। सरकार समर्थक नेताओं ने इसे “झूठा और भड़काऊ दावा” बताया है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से तथ्यों की पुष्टि करने की अपील की है। वहीं विपक्षी खेमे में इस बयान को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हलचल ट्रंप के दावे के बाद अमेरिका–वेनेजुएला संबंधों में और तनाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान कूटनीतिक दबाव बनाने की रणनीति भी हो सकता है, खासकर तेल और ऊर्जा संसाधनों को लेकर। फिलहाल, ट्रंप के दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो पाई है। लेकिन इतना तय है कि इस बयान ने वैश्विक राजनीति और ऊर्जा बाजारों में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है।