बसंत पंचमी 2026: ज्ञान, विद्या और कला की अधिष्ठात्री देवी माँ सरस्वती की आराधना का महापर्व

भारत की सनातन संस्कृति में सरस्वती पूजा का विशेष स्थान है। यह पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि ज्ञान, विवेक, सृजन और संस्कार का उत्सव है। माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व बसंत पंचमी के नाम से भी प्रसिद्ध है। वर्ष 2026 में यह पावन पर्व शुक्रवार, 23 जनवरी को श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाएगा। बसंत पंचमी: ऋतु परिवर्तन का प्रतीक बसंत पंचमी से ही प्रकृति में बदलाव स्पष्ट दिखाई देने लगता है। खेतों में सरसों पीले फूलों से लहलहाने लगती है, पेड़ों पर नई कोपलें फूट पड़ती हैं और वातावरण में एक नई ऊर्जा का संचार होता है। यही कारण है कि इस दिन पीले रंग को विशेष महत्व दिया गया है, जो उत्साह, ज्ञान और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। सरस्वती पूजा 2026: तिथि और समय * पर्व की तिथि: शुक्रवार, 23 जनवरी 2026 * पंचमी तिथि प्रारंभ: 23 जनवरी 2026, तड़के लगभग 02:28 बजे * पंचमी तिथि समाप्त: 24 जनवरी 2026, रात लगभग 01:46 बजे शुभ पूजा मुहूर्त प्रातः 07:13 बजे से दोपहर 12:33 बजे तक यह समय सरस्वती पूजा के लिए सर्वाधिक शुभ और फलदायी माना गया है। पौराणिक और धार्मिक महत्व शास्त्रों के अनुसार, ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना के समय जब चारों ओर नीरवता और अज्ञान देखा, तब उन्होंने अपने कमंडल से जल छिड़का, जिससे माँ सरस्वती का प्राकट्य हुआ। माँ सरस्वती ने वीणा के मधुर स्वर से सृष्टि में ज्ञान, वाणी और चेतना का संचार किया। माँ सरस्वती को— * विद्या की देवी * वाणी और संगीत की अधिष्ठात्री * बुद्धि, विवेक और स्मरण शक्ति की प्रतीक माना जाता है। इसलिए यह दिन विशेष रूप से विद्यार्थियों, शिक्षकों, लेखकों, कलाकारों, संगीतकारों और शोधकर्ताओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। सरस्वती पूजा की संपूर्ण विधि (विस्तार से) 1. प्रातः स्नान और संकल्प पूजा के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें। स्वच्छ पीले या सफेद वस्त्र धारण कर पूजा का संकल्प लें। 2.पूजा स्थल की तैयारी घर या विद्यालय में साफ-सुथरी जगह पर पीले कपड़े का आसन बिछाएं। माँ सरस्वती की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। 3. मूर्ति स्थापना और आवाहन दीप प्रज्वलित कर माँ सरस्वती का ध्यान करें और उन्हें आसन पर विराजमान होने का आवाहन करें। 4. पूजन सामग्री अर्पण * पीले फूल * अक्षत (चावल) * चंदन, हल्दी, कुमकुम * फल, मिठाई, विशेषकर केसर युक्त या पीले रंग की मिठाई 5. पुस्तक और वाद्य यंत्र पूजन किताबें, कॉपियाँ, कलम, पेंसिल, वाद्य यंत्र (वीणा, हारमोनियम आदि) माँ के चरणों में रखे जाते हैं। मान्यता है कि इस दिन पढ़ाई नहीं की जाती, बल्कि ज्ञान के साधनों की पूजा की जाती है। 6. मंत्र जाप और स्तुति “ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः” मंत्र का 108 बार जाप करें। सरस्वती वंदना, स्तोत्र और भजन का पाठ करें।  7. आरती और प्रसाद अंत में आरती कर प्रसाद वितरित करें। प्रसाद में खीर, बूंदी या पीले चावल का विशेष महत्व होता है। बसंत पंचमी के दिन छोटे बच्चों को पहली बार अक्षर ज्ञान कराया जाता है, जिसे विद्यारंभ संस्कार कहा जाता है। बच्चे से “ॐ”, “अ”, “क” जैसे अक्षर लिखवाए जाते हैं। यह परंपरा आज भी कई परिवारों में श्रद्धा से निभाई जाती है। विद्यालयों और समाज में उत्सव देश के कई हिस्सों, विशेषकर पूर्वी भारत (बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा) में सरस्वती पूजा बड़े धूमधाम से मनाई जाती है। विद्यालयों और कॉलेजों में— * भव्य पंडाल * सांस्कृतिक कार्यक्रम * गीत, संगीत और नृत्य   का आयोजन होता है। 23 जनवरी 2026 को मनाई जाने वाली सरस्वती पूजा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि ज्ञान, संस्कृति और चेतना का उत्सव है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि सच्ची प्रगति का मार्ग शिक्षा, विवेक और सद्बुद्धि से होकर ही जाता है। माँ सरस्वती की कृपा से जीवन में अज्ञान का अंधकार दूर हो और ज्ञान का प्रकाश फैले—इसी कामना के साथ यह पर्व मनाया जाता है।

मेनोपॉज नहीं, पहचान का मोड़ है यह दौर — 40 के बाद महिलाओं में क्यों बदलने लगता है स्वभाव और सोच?

अक्सर महिलाएं मेनोपॉज को केवल पीरियड्स के बंद हो जाने तक सीमित समझ लेती हैं। लेकिन हकीकत इससे कहीं गहरी और असरदार है। मेनोपॉज महिलाओं के जीवन का वह चरण है, जहां शरीर ही नहीं, मन, सोच और व्यवहार तक बदलाव के दौर से गुजरते हैं। यही वजह है कि कई महिलाएं खुद से सवाल करने लगती हैं — “क्या मैं बदल रही हूं?” मेनोपॉज क्या सिर्फ शारीरिक बदलाव है? नहीं। मेनोपॉज हार्मोनल बदलावों की एक जटिल प्रक्रिया है। इस दौरान एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन हार्मोन तेजी से घटते हैं, जिसका सीधा असर दिमाग, भावनाओं और ऊर्जा स्तर पर पड़ता है। क्यों बदलने लगती है पर्सनैलिटी? मेनोपॉज के समय दिखने वाले कुछ आम लेकिन अनदेखे बदलाव— * मूड स्विंग्स: छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा या अचानक उदासी * थकान और सुस्ती: बिना ज्यादा काम किए भी थक जाना * नींद की समस्या: रात को नींद न आना या बार-बार टूटना * चिंता और चिड़चिड़ापन: हर बात पर बेचैनी महसूस होना * आत्मविश्वास में कमी: खुद को पहले जैसा न महसूस करना ये लक्षण धीरे-धीरे महिला के व्यवहार और फैसलों को प्रभावित करने लगते हैं, जिससे उन्हें लगता है कि उनकी पर्सनैलिटी बदल रही है। वजन बढ़ना और शरीर से नाराज़गी मेनोपॉज के बाद मेटाबॉलिज़्म धीमा हो जाता है। पेट और कमर के आसपास वजन बढ़ना आम बात है। इससे महिलाएं अपने शरीर को लेकर असहज महसूस करने लगती हैं, जिसका असर आत्मसम्मान पर पड़ता है। रिश्तों पर भी पड़ता है असर भावनात्मक असंतुलन का असर पारिवारिक और सामाजिक रिश्तों पर भी दिखता है। कई महिलाएं खुद को कम समझी जाने वाली या अकेली महसूस करने लगती हैं। चुप रहना समाधान नहीं सबसे बड़ी गलती यही होती है कि महिलाएं इन बदलावों को “उम्र का असर” मानकर सहती रहती हैं। जबकि मेनोपॉज के लक्षणों पर खुलकर बात करना, डॉक्टर से सलाह लेना और सही जीवनशैली अपनाना बेहद जरूरी है। * संतुलित आहार और कैल्शियम युक्त भोजन * नियमित वॉक, योग या हल्की एक्सरसाइज * पर्याप्त नींद और तनाव कम करने की कोशिश * जरूरत हो तो काउंसलिंग या मेडिकल सलाह मेनोपॉज कोई बीमारी नहीं, बल्कि जीवन का नया अध्याय है। यह दौर आपकी कमजोरी नहीं, बल्कि खुद को नए सिरे से समझने और अपनाने का मौका है। जरूरी है कि महिलाएं इसे नजरअंदाज न करें, क्योंकि सही जानकारी और देखभाल से यह सफर आसान और सशक्त बन सकता है।

स्पोर्ट्स डेस्क: टी20 वर्ल्ड कप 2026 को लेकर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (ICC) ने बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड (BCB) को बड़ा और सख्त संदेश दिया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, यदि बांग्लादेश की टीम भारत में आकर टूर्नामेंट खेलने से इनकार करती है, तो उसे टी20 वर्ल्ड कप 2026 से बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है। ICC ने इस मामले में बांग्लादेश को 24 घंटे की अंतिम मोहलत दी है। टी20 वर्ल्ड कप 2026 की मेज़बानी भारत सहित संयुक्त आयोजन ढांचे के तहत तय है। बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड ने कथित तौर पर भारत में खेलने को लेकर आपत्तियां जताई थीं और वैकल्पिक व्यवस्थाओं की मांग की थी। हालांकि, ICC ने इन मांगों को मानने से साफ इनकार कर दिया है। ICC का स्पष्ट रुख है कि टूर्नामेंट तय शेड्यूल और मेज़बानी व्यवस्था के अनुसार ही खेला जाएगा। ICC अधिकारियों के अनुसार, किसी भी सदस्य बोर्ड को सुरक्षा या लॉजिस्टिक्स के नाम पर एकतरफा शर्तें थोपने की अनुमति नहीं दी जा सकती। यदि बांग्लादेश टीम निर्धारित स्थल पर खेलने से इनकार करती है, तो इसे ICC नियमों का उल्लंघन माना जाएगा, जिसके तहत टीम को टूर्नामेंट से बाहर किया जा सकता है। इस फैसले के बाद बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड पर भारी दबाव बन गया है। एक ओर टीम और खिलाड़ियों का भविष्य दांव पर है, तो दूसरी ओर वैश्विक मंच पर क्रिकेट की साख का सवाल। सूत्रों का कहना है कि BCB के भीतर आपात बैठकें चल रही हैं और सरकार व सुरक्षा एजेंसियों से भी विचार-विमर्श किया जा रहा है। ICC के इस कड़े रुख से क्रिकेट जगत में हलचल मच गई है। कई पूर्व क्रिकेटरों और विशेषज्ञों का मानना है कि अगर बांग्लादेश बाहर होता है, तो यह न सिर्फ टीम के लिए बल्कि टूर्नामेंट की प्रतिस्पर्धात्मकता के लिए भी बड़ा झटका होगा। फिलहाल, सबकी निगाहें अगले 24 घंटे पर टिकी हैं। क्या बांग्लादेश ICC की शर्तें मानकर भारत में खेलने को तैयार होगा, या फिर टी20 वर्ल्ड कप 2026 उसके बिना ही खेला जाएगा—इसका फैसला जल्द सामने आने वाला है।

प्रयागराज में ट्रेनिंग फ्लाइट हादसे का शिकार, जलकुंभी में गिरा दो-सीटर विमान

प्रयागराज में बुधवार को उस समय हड़कंप मच गया, जब प्रशिक्षण उड़ान पर निकला एक दो-सीटर निजी विमान अचानक दुर्घटनाग्रस्त हो गया। यह हादसा केपी कॉलेज मैदान के पीछे स्थित इलाके में हुआ, जहां विमान पास के जलाशय में उगी घनी जलकुंभी के बीच जा गिरा। राहत की बात यह रही कि विमान में सवार दोनों पायलट पूरी तरह सुरक्षित हैं और किसी तरह की जानमाल की हानि नहीं हुई। प्राप्त जानकारी के अनुसार, यह विमान नियमित ट्रेनिंग सेशन के तहत उड़ान भर रहा था। उड़ान के दौरान अचानक तकनीकी खराबी या संतुलन बिगड़ने की आशंका जताई जा रही है, जिसके चलते पायलट को आपात स्थिति में लैंडिंग का प्रयास करना पड़ा। इसी दौरान विमान नियंत्रण खो बैठा और पास के जलाशय में गिर गया। जलकुंभी और कीचड़ की वजह से विमान की गति काफी हद तक कम हो गई, जिससे बड़ा हादसा होने से बच गया। हादसे की सूचना मिलते ही स्थानीय प्रशासन, पुलिस और राहत दल मौके पर पहुंच गए। दोनों पायलटों को सुरक्षित बाहर निकाला गया और प्राथमिक चिकित्सकीय जांच के बाद उन्हें पूरी तरह स्वस्थ बताया गया। आसपास मौजूद लोगों ने भी राहत की सांस ली, क्योंकि दुर्घटनास्थल के पास रिहायशी इलाका और खेल का मैदान मौजूद है। प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि दुर्घटना के कारणों की जांच की जा रही है। विमान के तकनीकी रिकॉर्ड, मौसम की स्थिति और प्रशिक्षण प्रक्रिया की भी समीक्षा की जाएगी। नागरिक उड्डयन से जुड़े अधिकारी भी मामले की विस्तृत जांच में जुट गए हैं, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोका जा सके। इस घटना ने एक बार फिर प्रशिक्षण उड़ानों के दौरान सुरक्षा मानकों और तकनीकी जांच की अहमियत को रेखांकित कर दिया है। हालांकि, समय पर पायलट की सूझबूझ और परिस्थितियों के अनुकूल स्थान पर विमान गिरने से एक बड़ी त्रासदी टल गई।

पहाड़ों में पलती साज़िश: 12,000 फीट पर आतंकियों का राशन, मददगार कौन?

किश्तवाड़ | विशेष रिपोर्ट: किश्तवाड़ के दुर्गम जंगलों में सुरक्षा बलों को मिला आतंकी बंकर केवल एक ठिकाना नहीं, बल्कि एक सुनियोजित आतंकी नेटवर्क की परतें खोलने वाला सबूत है। समुद्र तल से लगभग 12,000 फीट की ऊँचाई, चारों ओर बर्फ़ीली हवाएं और महीनों तक दुर्गम रहने वाला इलाका—इन हालातों में आतंकियों का टिके रहना अपने आप में एक बड़ा सवाल है। बंकर से जो सामान मिला है, उसमें शामिल हैं: * मैगी और इंस्टेंट फूड * बासमती चावल, दालें, मसाले * गैस सिलेंडर, बर्तन * थर्मल कपड़े, कंबल और सर्दियों का सामान विशेषज्ञों के अनुसार, यह राशन कुछ दिनों का नहीं, बल्कि महीनों तक चलने वाला है। इससे साफ है कि आतंकी किसी अस्थायी मिशन पर नहीं, बल्कि लंबे समय के लिए इलाके में जमे रहने की रणनीति पर काम कर रहे थे। सप्लाई लाइन बिना मदद के नामुमकिन इतनी ऊँचाई पर न तो दुकान है, न सड़क और न ही आम लोगों की आवाजाही। ऐसे में सवाल उठता है— यह राशन आखिर पहुंचा कैसे? सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि इसके पीछे: * स्थानीय ओवरग्राउंड वर्कर्स (OGW) * जंगल और पहाड़ी रास्तों की जानकारी रखने वाले मददगार * सीमापार बैठे हैंडलरों के निर्देश हो सकते हैं। जांच एजेंसियों को शक है कि राशन किश्तवाड़ के निचले इलाकों से चरणबद्ध तरीके से ऊपर पहुंचाया गया। बंकर में सर्दियों के पूरे इंतज़ाम यह संकेत देते हैं कि आतंकी बर्फबारी के दौरान भी ऑपरेशन जारी रखने की योजना बना रहे थे। आमतौर पर इस मौसम में आतंकी गतिविधियां धीमी पड़ जाती हैं, लेकिन इस बंकर ने उस धारणा को चुनौती दी है। जंगल भले ही शांत दिखते हों, लेकिन सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक: “यह बंकर बताता है कि आतंकी अब ऊँचाई वाले इलाकों में लंबे समय तक छिपकर रहने की रणनीति अपना रहे हैं।” ड्रोन सर्विलांस, मोबाइल डेटा एनालिसिस और स्थानीय पूछताछ के जरिए अब मददगारों की पहचान की जा रही है। इस ऑपरेशन के बाद फोकस सिर्फ आतंकियों पर नहीं, बल्कि: * राशन पहुंचाने वाले * सूचना देने वाले * शरण देने वाले पूरे नेटवर्क को तोड़ने पर है। एजेंसियों का मानना है कि जब तक सप्लाई लाइन खत्म नहीं होगी, तब तक आतंकी ठिकाने दोबारा बनते रहेंगे।

13 राज्यों से 50 स्टेट तक: अमेरिका का विस्तारवादी सफ़र और ‘ऑपरेशन ग्रीनलैंड’ की अंदरूनी कहानी

विशेष रिपोर्ट :डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड को लेकर दिए गए बयानों ने एक बार फिर अमेरिका के विस्तारवादी इतिहास को वैश्विक बहस के केंद्र में ला दिया है। यह कोई नई सोच नहीं है—अमेरिका का इतिहास ही विस्तार, खरीद, युद्ध और कूटनीति के ज़रिये सीमाएँ बढ़ाने की कहानी है। आज का अमेरिका, जो 50 राज्यों का संघ है, कभी केवल 13 उपनिवेशों तक सीमित था। सवाल यह है कि यह परिवर्तन कैसे और किन ऐतिहासिक मोड़ों से होकर गुज़रा? शुरुआत: 13 उपनिवेशों से एक राष्ट्र तक (1776) 1776 में ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता प्राप्त करने के समय अमेरिका केवल अटलांटिक तट के किनारे बसे 13 उपनिवेशों का समूह था। ये राज्य थे—न्यू हैम्पशायर, मैसाचुसेट्स, रोड आइलैंड, कनेक्टिकट, न्यूयॉर्क, न्यू जर्सी, पेनसिल्वेनिया, डेलावेयर, मैरीलैंड, वर्जीनिया, नॉर्थ कैरोलाइना, साउथ कैरोलाइना और जॉर्जिया। स्वतंत्रता के तुरंत बाद ही अमेरिका में यह धारणा मज़बूत होने लगी कि उसे पूरे महाद्वीप में फैलना चाहिए—इसे बाद में “मैनिफेस्ट डेस्टिनी” कहा गया। लुइसियाना खरीद: एक सौदे ने बदला नक्शा (1803) अमेरिकी विस्तार की सबसे निर्णायक घटना थी लुइसियाना परचेज़। 1803 में अमेरिका ने फ्रांस से लगभग 8 लाख वर्ग मील क्षेत्र मात्र 15 मिलियन डॉलर में खरीद लिया। * इससे अमेरिका का क्षेत्रफल लगभग दोगुना हो गया * मिसिसिपी नदी पर नियंत्रण मिला * पश्चिम की ओर विस्तार का रास्ता खुल गया यह सौदा आज भी इतिहास के सबसे सस्ते और प्रभावशाली भू-राजनीतिक सौदों में गिना जाता है। फ्लोरिडा से लेकर टेक्सास तक: दबाव और कूटनीति * 1819 में स्पेन से फ्लोरिडा हासिल किया गया * 1845 में टेक्सास को अमेरिका में शामिल किया गया, जो पहले मैक्सिको का हिस्सा था टेक्सास के विलय ने सीधे तौर पर अगले बड़े संघर्ष की नींव रखी। मेक्सिको-अमेरिका युद्ध: ताक़त से सीमाओं का विस्तार (1846–1848)इस युद्ध के बाद अमेरिका ने मैक्सिको से विशाल क्षेत्र हासिल किए: * कैलिफ़ोर्निया * नेवादा * यूटा * एरिज़ोना * न्यू मैक्सिको * कोलोराडो का बड़ा हिस्सा इसके बाद अमेरिका प्रशांत महासागर तक पहुँच गया और एक महाद्वीपीय शक्ति बन गया। 1867 में अमेरिका ने रूस से अलास्का को 7.2 मिलियन डॉलर में खरीदा। उस समय इसे “सीवर्ड्स फॉली” (सीवर्ड की मूर्खता) कहा गया, लेकिन बाद में: * सोना * तेल * प्राकृतिक गैस * सामरिक स्थिति ने इसे अमेरिका की रणनीतिक संपत्ति बना दिया। 1898 में अमेरिका ने हवाई को अपने नियंत्रण में लिया। यही वह दौर था जब अमेरिका ने खुद को केवल महाद्वीपीय नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति के रूप में देखना शुरू किया। 50वां राज्य: विस्तार की अंतिम कड़ी (1959) * अलास्का – जनवरी 1959 * हवाई – अगस्त 1959 इनके साथ अमेरिका आधिकारिक रूप से 50 राज्यों का देश बना। ट्रंप और ‘ऑपरेशन ग्रीनलैंड’: इतिहास की गूंज डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड को “खरीदने” का विचार पहली बार 2019 में सामने आया। भले ही यह प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ा, लेकिन: * यह अमेरिका की ऐतिहासिक विस्तारवादी सोच की याद दिलाता है * आर्कटिक क्षेत्र में संसाधनों और रणनीतिक बढ़त की दौड़ को दर्शाता है * चीन और रूस की बढ़ती मौजूदगी के संदर्भ में इसे देखा गया ग्रीनलैंड आज भी डेनमार्क का हिस्सा है, लेकिन ट्रंप का बयान यह दिखाता है कि अमेरिकी राजनीति में भू-रणनीतिक विस्तार की सोच अब भी जीवित है। 13 राज्यों से 50 राज्यों तक का अमेरिका का सफ़र केवल नक्शे का विस्तार नहीं था—यह शक्ति, संसाधन, युद्ध और कूटनीति का मिश्रण रहा है। ट्रंप का ग्रीनलैंड बयान उसी लंबी ऐतिहासिक परंपरा की एक आधुनिक झलक है। अमेरिका का इतिहास बताता है—उसकी सीमाएँ हमेशा सिर्फ़ ज़मीन से नहीं, बल्कि महत्वाकांक्षाओं से तय हुई हैं।

प्रयागराज माघ मेले में शंकराचार्य पद को लेकर टकराव, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने प्रशासन को दिया कड़ा जवाब

प्रयागराज। प्रयागराज माघ मेले के दौरान ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और मेला प्रशासन के बीच चल रहा विवाद लगातार गहराता जा रहा है। मामला अब सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की व्याख्या और शंकराचार्य पद की मान्यता तक पहुंच गया है। मेला प्रशासन द्वारा सुप्रीम कोर्ट का हवाला देते हुए जारी नोटिस और स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के जवाब के बाद यह विवाद सार्वजनिक चर्चा का विषय बन गया है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने मेला प्रशासन पर सवाल उठाते हुए कहा कि जिस सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला दिया जा रहा है, उसमें कहीं भी यह नहीं लिखा है कि उनके नाम के आगे ‘शंकराचार्य’ न लगाया जाए। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, “हम कोई पट्टा अभिषेक या जमीन का विवाद माघ मेले में नहीं कर रहे हैं। अगर ऐसा कोई स्पष्ट आदेश है, तो प्रशासन उसे शब्दशः दिखाए।” उन्होंने यह भी कहा कि जब केंद्र सरकार स्वयं कोर्ट में एक पक्ष के रूप में खड़ी होती है, तब उनके नाम के आगे ‘शंकराचार्य’ लिखा जाता है। ऐसे में मेला प्रशासन द्वारा अलग मानदंड अपनाना समझ से परे है। माघ मेला प्राधिकरण ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को नोटिस जारी कर 24 घंटे के भीतर जवाब देने को कहा है। नोटिस में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का हवाला देते हुए यह स्पष्ट किया गया है कि मेला प्रशासन उन्हें ज्योतिष पीठ का शंकराचार्य नहीं मानता। इसी मुद्दे पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का तीखा प्रतिवाद सामने आया है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने शंकराचार्य पद की परंपरागत व्यवस्था का उल्लेख करते हुए कहा कि शंकराचार्य वही होता है, जिसे देश की अन्य तीन पीठों—श्रृंगेरी, द्वारका और पुरी—के शंकराचार्य मान्यता देते हैं। उन्होंने दावा किया कि उन्हें अन्य पीठों के शंकराचार्यों की स्वीकृति प्राप्त है और यही सनातन परंपरा का आधार है। इस पूरे विवाद ने संत समाज और प्रशासन को आमने-सामने खड़ा कर दिया है। एक ओर मेला प्रशासन कानूनी आदेशों का हवाला देकर अपनी स्थिति स्पष्ट कर रहा है, वहीं दूसरी ओर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद इसे धार्मिक परंपराओं और मान्यताओं से जोड़कर देख रहे हैं। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि 24 घंटे की समय-सीमा में दिए जाने वाले जवाब के बाद प्रशासन अगला कदम क्या उठाता है और क्या यह मामला दोबारा अदालत के दरवाजे तक पहुंचेगा। माघ मेले के शांत वातावरण में यह विवाद एक नई बहस को जन्म दे चुका है, जिसका असर आने वाले दिनों में और गहरा सकता है।

राष्ट्रगान पर टकराव: तमिलनाडु विधानसभा में संवैधानिक मर्यादा बनाम परंपरा की बहस

चेन्नई। तमिलनाडु विधानसभा के सत्र के दौरान उस समय अप्रत्याशित राजनीतिक और संवैधानिक तनाव देखने को मिला, जब राज्यपाल आर.एन. रवि राष्ट्रगान को लेकर हुए विवाद के बाद सदन से बाहर निकल गए। राज्यपाल ने तमिल एंथम के तुरंत बाद राष्ट्रगान बजाने की मांग की थी, जिसे विधानसभा अध्यक्ष एम. अप्पावु ने अस्वीकार कर दिया। इसके बाद राज्यपाल ने इसे राष्ट्रगान के सम्मान से जुड़ा विषय बताते हुए सदन छोड़ दिया। विधानसभा सत्र की शुरुआत पारंपरिक रूप से तमिल एंथम के साथ हुई। इसके बाद राज्यपाल आर.एन. रवि ने अपेक्षा जताई कि राष्ट्रगान भी बजाया जाए। उनका तर्क था कि राष्ट्रगान को समुचित सम्मान मिलना चाहिए और यह संवैधानिक भावनाओं के अनुरूप है। हालांकि, स्पीकर अप्पावु ने स्पष्ट किया कि तमिलनाडु विधानसभा की एक स्थापित परंपरा है, जिसके तहत सत्र की शुरुआत तमिल एंथम से होती है और अंत में राष्ट्रगान बजाया जाता है। इसी परंपरा का पालन किया जा रहा है। स्पीकर के इस निर्णय से असंतुष्ट होकर राज्यपाल सदन से बाहर चले गए। राज्यपाल आर.एन. रवि ने इसे केवल प्रक्रिया का नहीं, बल्कि सम्मान और संवैधानिक संकेतों का प्रश्न बताया। उनका मानना है कि राष्ट्रगान को उचित स्थान और सम्मान मिलना चाहिए, खासकर ऐसे मंच पर जो लोकतांत्रिक व्यवस्था का प्रतीक है। सदन से बाहर निकलते समय राज्यपाल का यह कदम राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया और इसे राज्य सरकार तथा राजभवन के बीच चल रहे तनाव की एक और कड़ी के रूप में देखा जा रहा है। स्पीकर अप्पावु और सत्तारूढ़ डीएमके सरकार ने दो टूक कहा कि यह मुद्दा किसी तरह के अपमान से जुड़ा नहीं है। उनके अनुसार, तमिल एंथम और राष्ट्रगान—दोनों का ही सम्मान है और सदन की परंपराओं के अनुसार दोनों का नियत स्थान और समय तय है। सरकार का कहना है कि राज्य की सांस्कृतिक पहचान और संवैधानिक मूल्यों के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है, और इसी भावना के तहत वर्षों से चली आ रही परंपरा का पालन किया जा रहा है। यह घटना केवल एक औपचारिक विवाद नहीं, बल्कि संघीय ढांचे, राज्य की स्वायत्तता और संवैधानिक मर्यादाओं पर चल रही व्यापक बहस को भी उजागर करती है। एक ओर राष्ट्रगान का सम्मान राष्ट्रीय भावना से जुड़ा मुद्दा है, तो दूसरी ओर राज्यों की अपनी परंपराएं और सांस्कृतिक पहचान भी संवैधानिक रूप से मान्य हैं।

सिर्फ 7 मिनट का फॉर्मूला: लंबी उम्र और स्वस्थ जीवन का नया विज्ञान

नई दिल्ली। लंबी उम्र जीना हर किसी की चाह होती है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि सिर्फ ज्यादा साल जीना नहीं, बल्कि उन सालों को स्वस्थ तरीके से जीना असली सफलता है। भारत जैसे देश में, जहां डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और हृदय रोग तेजी से बढ़ रहे हैं, औसतन लोग अपने जीवन के करीब 8–10 साल किसी न किसी गंभीर बीमारी से जूझते हुए बिताते हैं। लेकिन अब राहत की खबर है। अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल द लांसेट में प्रकाशित एक हालिया स्टडी के मुताबिक, रोज़मर्रा की जिंदगी में किए गए बहुत छोटे बदलाव भी आपकी सेहत और उम्र दोनों पर बड़ा असर डाल सकते हैं। नींद के सिर्फ 5 मिनट, सेहत के लिए बड़ा बदलाव स्टडी में बताया गया है कि अगर कोई व्यक्ति रोज़ अपनी नींद में सिर्फ 5 मिनट का इज़ाफा करता है, तो इससे शरीर पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। पर्याप्त नींद: * हार्मोन बैलेंस सुधारती है * इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाती है * तनाव और डिप्रेशन को कम करती है * डायबिटीज और हाई बीपी के खतरे को घटाती है विशेषज्ञों का कहना है कि नींद को “समय की बर्बादी” समझने की सोच बदलनी होगी, क्योंकि यही शरीर की असली मरम्मत का समय होता है। इतना ही नहीं, स्टडी में यह भी सामने आया कि दिन में सिर्फ 2 मिनट की अतिरिक्त वॉक करने से भी स्वास्थ्य पर चौंकाने वाला असर पड़ता है। यह छोटी सी आदत: * ब्लड सर्कुलेशन बेहतर करती है * दिल की बीमारियों का जोखिम घटाती है * मोटापे को कंट्रोल में रखती है * मानसिक थकान कम करती है विशेषज्ञ बताते हैं कि यह जरूरी नहीं कि आप रोज़ घंटों जिम जाएं। निरंतरता और छोटी आदतें ज्यादा असरदार होती हैं। क्यों खास है यह स्टडी भारतीयों के लिए? भारत में तेजी से बदलती जीवनशैली, बैठकर काम करने की आदत और अनियमित दिनचर्या के कारण लोग कम उम्र में ही बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। ऐसे में यह रिसर्च खास इसलिए है क्योंकि इसमें महंगे इलाज या कठिन नियमों की नहीं, बल्कि व्यावहारिक और आसान बदलावों की बात की गई है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर कोई व्यक्ति: * रोज़ 5 मिनट ज्यादा सोए * 2 मिनट ज्यादा चले * मोबाइल और स्क्रीन टाइम थोड़ा कम करे * नियमित दिनचर्या अपनाए तो वह न सिर्फ लंबी उम्र जी सकता है, बल्कि बीमारियों से दूर रहकर एक बेहतर जीवन भी जी सकता है। लंबी और स्वस्थ जिंदगी का राज किसी चमत्कारी दवा में नहीं, बल्कि रोज़ के छोटे फैसलों*में छिपा है। आज लिया गया एक छोटा सा कदम, आने वाले सालों को दर्द और दवाइयों से मुक्त कर सकता है। क्यों न आज से ही शुरुआत की जाए — सिर्फ 7 मिनट से।

टी20 वर्ल्ड कप विवाद में पाकिस्तान ने खींचे कदम, बांग्लादेश को नहीं मिला खुला समर्थन

आईसीसी के फैसले पर नहीं पड़ेगा असर, पीसीबी ने बहिष्कार की अटकलों को बताया बेबुनियाद नई दिल्ली। आगामी टी20 वर्ल्ड कप को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (PCB) ने बांग्लादेश से जुड़ी खबरों पर बड़ा और स्पष्ट संकेत दे दिया है। हाल के दिनों में ऐसी अटकलें तेज़ थीं कि अगर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (ICC) बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड (BCB) की मांगों को नहीं मानती है, तो पाकिस्तान भी टूर्नामेंट से दूरी बना सकता है। हालांकि अब इस पूरे मामले पर पाकिस्तान की स्थिति लगभग साफ हो चुकी है, जिससे भारतीय क्रिकेट फैंस को राहत की खबर मिली है। खेल वेबसाइट RevSportz की रिपोर्ट के मुताबिक, भले ही आईसीसी बांग्लादेश के अनुरोध को खारिज कर दे, लेकिन पाकिस्तान के टी20 वर्ल्ड कप से बहिष्कार करने की संभावना बेहद कम है। पीसीबी से जुड़े एक करीबी सूत्र ने साफ शब्दों में कहा है कि इस पूरे विवाद पर पाकिस्तान ने अब तक कोई आधिकारिक रुख नहीं अपनाया है और न ही उसके पास टूर्नामेंट से हटने का कोई ठोस कारण है। सूत्र के अनुसार, “यह पीसीबी का रुख नहीं है। पाकिस्तान के पास बहिष्कार का कोई आधार नहीं है, क्योंकि आईसीसी पहले ही पाकिस्तान के सभी मुकाबले श्रीलंका में आयोजित करा रही है। कुछ लोग बेवजह इस मुद्दे को तूल देने की कोशिश कर रहे हैं।” दरअसल, इससे पहले खबरें सामने आई थीं कि बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड ने अपने मौजूदा विवाद में समर्थन जुटाने के लिए पाकिस्तान से संपर्क किया था। कहा जा रहा था कि पीसीबी की ओर से उन्हें सकारात्मक प्रतिक्रिया भी मिली, जिसके बाद यह माना जाने लगा कि दोनों देश मिलकर आईसीसी पर दबाव बना सकते हैं। इसी कड़ी में पाकिस्तान के संभावित बहिष्कार की खबरों ने ज़ोर पकड़ लिया था और वर्ल्ड क्रिकेट में हलचल मच गई थी। लेकिन अब ताज़ा जानकारी के बाद यह लगभग स्पष्ट हो गया है कि पाकिस्तान इस मामले में कोई बड़ा कदम उठाने के मूड में नहीं है। आईसीसी द्वारा पहले से तय किए गए कार्यक्रम और पाकिस्तान के मैचों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था (श्रीलंका में आयोजन) के चलते पीसीबी को किसी तरह की आपत्ति नहीं है। इस पूरे घटनाक्रम का असर यह हुआ है कि टी20 वर्ल्ड कप को लेकर अनिश्चितता का माहौल काफी हद तक कम हो गया है। खास तौर पर भारतीय फैंस के लिए यह खबर सुकून देने वाली है, क्योंकि टूर्नामेंट के बहिष्कार जैसी किसी भी स्थिति से प्रतियोगिता की रोमांचक तस्वीर प्रभावित हो सकती थी। फिलहाल, नज़रें अब आईसीसी के अंतिम फैसले पर टिकी हैं, लेकिन इतना तय माना जा रहा है कि पाकिस्तान मैदान से बाहर किसी बड़े विवाद का हिस्सा बनने के बजाय क्रिकेट पर ही फोकस करना चाहता नोट दिखाई दे रहा है।