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रिलायंस का बड़ा माइलस्टोन: क्विक कॉमर्स और FMCG बिजनेस पहली बार मुनाफे में, अंबानी के रिटेल साम्राज्य को नई रफ्तार

नई दिल्ली : देश की सबसे बड़ी निजी कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (RIL) ने अपने कंज्यूमर बिजनेस में एक अहम उपलब्धि हासिल कर ली है। कंपनी ने बताया है कि उसके दो सबसे बड़े उपभोक्ता कारोबार—क्विक कॉमर्स और फास्ट-मूविंग कंज्यूमर गुड्स (FMCG) अब कमाई करने लगे हैं। यह उपलब्धि बड़े पैमाने पर सोर्सिंग, ऑपरेशनल एफिशिएंसी और हाई-मार्जिन प्रोडक्ट कैटेगरी पर फोकस का नतीजा मानी जा रही है। क्विक कॉमर्स: लॉन्च के एक साल के भीतर ब्रेक-ईवन अक्टूबर 2024 में लॉन्च किया गया रिलायंस का क्विक कॉमर्स बिजनेस अब लगभग हर ऑर्डर पर मुनाफा कमा रहा है। कंपनी के अनुसार, इस सेगमेंट का कंट्रीब्यूशन मार्जिन पॉजिटिव हो चुका है, जो किसी भी नए डिजिटल रिटेल मॉडल के लिए बड़ी उपलब्धि मानी जाती है। विशेषज्ञों के मुताबिक, रिलायंस ने इस सेगमेंट में: * अपने विशाल सप्लाई चेन नेटवर्क * लोकल स्टोर इंटीग्रेशन * डेटा-ड्रिवन इन्वेंट्री मैनेजमेंट का बेहतर इस्तेमाल किया, जिससे डिलीवरी लागत घटी और प्रति ऑर्डर मार्जिन सुधरा। FMCG बिजनेस: EBITDA से पहले कमाई में पॉजिटिव रिलायंस ने करीब तीन साल पहले FMCG सेक्टर में कदम रखा था, जहां शुरुआत में भारी निवेश और ब्रांड बिल्डिंग पर जोर रहा। अब कंपनी ने बताया है कि यह कारोबार EBITDA (ब्याज, टैक्स, डेप्रिसिएशन और अमॉर्टाइजेशन से पहले) स्तर पर पॉजिटिव हो गया है। इस सफलता के पीछे प्रमुख कारण बताए जा रहे हैं: * बड़े पैमाने पर कच्चे माल की सोर्सिंग * अपने रिटेल नेटवर्क के जरिए सीधे उपभोक्ताओं तक पहुंच * प्राइवेट लेबल और हाई-मार्जिन प्रोडक्ट्स पर फोकस रिटेल सेक्टर में रिलायंस की मजबूत पकड़ चेयरमैन मुकेश अंबानी, जो एशिया के सबसे अमीर व्यक्ति हैं, लंबे समय से रिटेल और कंज्यूमर बिजनेस को रिलायंस के भविष्य का अहम स्तंभ बताते रहे हैं। क्विक कॉमर्स और FMCG में मुनाफे की शुरुआत इस रणनीति की सफलता का संकेत है।

45 की उम्र में BJP की कमान: नितिन नवीन बने निर्विरोध राष्ट्रीय अध्यक्ष, संगठन में नई पीढ़ी का उदय

नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी (BJP) के संगठनात्मक इतिहास में एक अहम पड़ाव जुड़ गया है। नितिन नवीन को पार्टी का निर्विरोध राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया है। रिटर्निंग ऑफिसर के. लक्ष्मण ने औपचारिक घोषणा करते हुए बताया कि नितिन नवीन के समर्थन में 37 सेट नॉमिनेशन पेपर दाखिल किए गए थे, जिसके बाद उनका निर्विरोध निर्वाचन तय हो गया। संगठन में पीढ़ीगत बदलाव का संकेत महज 45 वर्ष की उम्र में देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी की कमान संभालना, नितिन नवीन के लिए ही नहीं बल्कि भाजपा संगठन के लिए भी एक मजबूत संदेश माना जा रहा है। यह फैसला पार्टी में युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाने और संगठनात्मक ढांचे में नई ऊर्जा भरने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। निर्विरोध चयन, व्यापक सहमति का प्रमाण 37 सेट नॉमिनेशन का दाखिल होना इस बात का संकेत है कि नितिन नवीन के नाम पर पार्टी के भीतर व्यापक सहमति थी। किसी अन्य उम्मीदवार के सामने न आने से यह साफ हुआ कि शीर्ष नेतृत्व से लेकर संगठन के विभिन्न स्तरों तक उनके नेतृत्व पर भरोसा जताया गया है। प्राथमिकताएं और चुनौतियां नए राष्ट्रीय अध्यक्ष के सामने आने वाले समय में कई अहम जिम्मेदारियां होंगी— * संगठन को चुनावी रूप से और मजबूत करना * बूथ स्तर तक कैडर को सक्रिय रखना * युवा, महिला और नए मतदाताओं से जुड़ाव बढ़ाना * आगामी चुनावों के लिए रणनीतिक दिशातय करना राजनीतिक हलकों में प्रतिक्रियाएं नितिन नवीन के निर्विरोध अध्यक्ष चुने जाने के बाद पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थकों में उत्साह देखा गया। कई नेताओं ने इसे स्थिरता और निरंतरता के साथ-साथ नवाचार का संतुलित कदम बताया है। नितिन नवीन का अध्यक्ष बनना भाजपा के लिए केवल एक नेतृत्व परिवर्तन नहीं, बल्कि भविष्य की राजनीति की तैयारी के तौर पर देखा जा रहा है। संगठन को एकजुट रखते हुए चुनावी चुनौतियों का सामना करना अब उनकी प्राथमिक जिम्मेदारी होगी।

नोएडा में सिस्टम की लापरवाही ने ली एक इंजीनियर की जान: बेसमेंट में डूबा युवराज, सवालों के घेरे में प्रशासन और बिल्डर

नोएडा। उत्तर प्रदेश के नोएडा सेक्टर-150 से सामने आई यह घटना केवल एक हादसा नहीं, बल्कि शहरी व्यवस्था की गंभीर नाकामी की दर्दनाक मिसाल बन गई है। जल निकासी के पुख्ता इंतजाम न होने के कारण पानी से भरे बेसमेंट में डूबकर सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज की मौत हो गई। इस घटना के बाद इलाके में लोगों का गुस्सा फूट पड़ा है और प्रशासन, बिल्डर व सोसाइटी प्रबंधन पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। क्या है पूरा मामला? बताया जा रहा है कि हालिया बारिश के बाद सेक्टर-150 स्थित एक रिहायशी/कमर्शियल परिसर के बेसमेंट में भारी मात्रा में पानी भर गया था। इसी दौरान सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज किसी काम से बेसमेंट में गया, जहां अचानक पानी के तेज बहाव और जलभराव के कारण वह बाहर नहीं निकल सका। समय रहते रेस्क्यू न होने से युवराज की डूबकर मौत हो गई। सामने आया हैरान करने वाला सच जांच में जो तथ्य सामने आए हैं, वे और भी चौंकाने वाले हैं * बेसमेंट में ड्रेनेज सिस्टम काम नहीं कर रहा था या पूरी तरह बंद था। * पानी निकासी के लिए लगाए गए पंप खराब पड़े थे। * बेसमेंट में जलभराव के बावजूद कोई चेतावनी बोर्ड या बैरिकेडिंग नहीं थी। * सोसाइटी प्रबंधन को पहले भी जलभराव की शिकायतें मिल चुकी थीं, लेकिन ठोस कार्रवाई नहीं की गई। इस हादसे ने कई स्तरों पर जिम्मेदारी तय करने की मांग तेज कर दी है— * बिल्डर: निर्माण के समय मानकों की अनदेखी और अपर्याप्त ड्रेनेज। * सोसाइटी मैनेजमेंट: रखरखाव में लापरवाही, पंपों की खराब हालत। * प्रशासन/प्राधिकरण: समय-समय पर निरीक्षण न होना और मानसून से पहले तैयारियों की कमी। लोगों का फूटा गुस्सा घटना के बाद स्थानीय निवासियों और परिजनों ने विरोध प्रदर्शन किया। लोगों का कहना है कि नोएडा जैसे आधुनिक शहर में इस तरह की मौतें ‘प्राकृतिक’ नहीं, बल्कि ‘प्रशासनिक’ हादसे हैं। सोशल मीडिया पर भी युवराज को न्याय दिलाने की मांग तेज हो गई है। प्रशासन की प्रतिक्रिया प्रशासन ने मामले की जांच के आदेश देने और दोषियों पर कार्रवाई का आश्वासन दिया है। साथ ही, सेक्टर-150 सहित अन्य इलाकों में बेसमेंट और जल निकासी व्यवस्था की तत्काल जांच की बात कही गई है। हालांकि, लोगों का कहना है कि आश्वासन नहीं, जवाबदेही और सख्त कार्रवाई चाहिए।

गाजा शांति पहल में भारत की भूमिका बढ़ी: ट्रंप ने पीएम मोदी को ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में शामिल होने का दिया न्योता

वॉशिंगटन/नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गाजा के लिए गठित अंतरराष्ट्रीय संगठन बोर्ड ऑफ पीस’ में शामिल होने का औपचारिक न्योता दिया है। यह कदम गाजा में जारी संघर्ष को समाप्त कर स्थायी शांति, मानवीय सहायता और पुनर्निर्माण की दिशा में एक अहम पहल के रूप में देखा जा रहा है। ट्रंप प्रशासन का मानना है कि भारत की वैश्विक साख, संतुलित विदेश नीति और मानवीय दृष्टिकोण इस बोर्ड को मजबूती प्रदान करेगा। क्या है ‘बोर्ड ऑफ पीस’? ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की घोषणा 15 जनवरी को राष्ट्रपति ट्रंप की 20 बिंदुओं वाली शांति योजना के दूसरे चरण के तहत की गई थी। इस अंतरराष्ट्रीय बोर्ड का मुख्य उद्देश्य गाजा में हथियारों के खात्मे की निगरानी, आम नागरिकों तक मानवीय सहायता की निर्बाध आपूर्ति, युद्ध से तबाह बुनियादी ढांचे के पुनर्निर्माण और एक नई, स्थिर शासन व्यवस्था की रूपरेखा तैयार करना है। भारत की भूमिका क्यों अहम? भारत लंबे समय से मध्य-पूर्व में शांति और संवाद का पक्षधर रहा है। गाजा संकट के दौरान भी भारत ने मानवीय सहायता भेजी है और संघर्षविराम की अपील की है। ऐसे में पीएम मोदी को बोर्ड में शामिल होने का न्योता भारत की बढ़ती वैश्विक कूटनीतिक भूमिका को दर्शाता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत की भागीदारी से बोर्ड को एक संतुलित और विश्वसनीय नेतृत्व मिल सकता है। शांति योजना का दूसरा चरण ट्रंप की 20 बिंदुओं वाली योजना के दूसरे चरण में संघर्षविराम के बाद दीर्घकालिक शांति पर जोर दिया गया है। इसमें हथियारों के पूर्ण निष्क्रियकरण, राहत एजेंसियों के लिए सुरक्षित गलियारे, स्कूल-अस्पतालों का पुनर्निर्माण और स्थानीय प्रशासन को सशक्त करने जैसे मुद्दे शामिल हैं। ‘बोर्ड ऑफ पीस’ इन्हीं लक्ष्यों की निगरानी करेगा। सूत्रों के अनुसार, भारत इस न्योते पर विचार कर रहा है और अंतिम फैसला कूटनीतिक स्तर पर विमर्श के बाद लिया जाएगा। यदि पीएम मोदी इस बोर्ड में शामिल होते हैं, तो यह न केवल गाजा में शांति प्रयासों को नई दिशा देगा, बल्कि भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी को भी और मजबूत करेगा। कुल मिलाकर, गाजा संकट के समाधान की दिशा में यह पहल अंतरराष्ट्रीय सहयोग का नया अध्याय खोल सकती है, जिसमें भारत की संभावित भागीदारी वैश्विक शांति प्रयासों के लिए निर्णायक साबित हो सकती है।

Fastag New Rule: 1 अप्रैल से टोल टैक्स में बड़ा बदलाव, कैश पूरी तरह बंद; MLFF सिस्टम से होगी बिना रुके वसूली

नई दिल्ली। देशभर में हाईवे पर सफर करने वालों के लिए 1 अप्रैल 2026 से टोल टैक्स व्यवस्था पूरी तरह बदलने जा रही है। केंद्र सरकार मल्टी लेन फ्री फ्लो (MLFF) टोल सिस्टम लागू करने की तैयारी में है, जिसके तहत अब टोल प्लाजा पर कैश से भुगतान पूरी तरह बंद कर दिया जाएगा। यानी वाहन चालकों को हर हाल में FASTag या डिजिटल माध्यम से ही टोल देना होगा। सरकार का दावा है कि इस बदलाव से टोल प्लाजा पर लगने वाली लंबी कतारों, समय की बर्बादी और ईंधन की खपत में बड़ी कमी आएगी। साथ ही टोल कलेक्शन और ज्यादा पारदर्शी और तकनीक आधारित हो जाएगा। क्या है MLFF टोल सिस्टम? MLFF यानी Multi Lane Free Flow एक एडवांस्ड टोल वसूली प्रणाली है। इसमें टोल प्लाजा पर वाहन को रुकने की जरूरत नहीं होगी। * हाईवे पर लगे ANPR कैमरे (Automatic Number Plate Recognition) * और FASTag रीडर वाहन की पहचान कर सीधे बैंक अकाउंट या FASTag वॉलेट से टोल काट लेंगे। कैश लेन-देन क्यों हो रहा है बंद? सरकार के मुताबिक— * कैश लेन-देन से टोल प्लाजा पर जाम लगता है * मानव त्रुटि और टैक्स चोरी की आशंका रहती है * डिजिटल भुगतान से कलेक्शन तेज और रिकॉर्ड साफ रहता है इसी वजह से 1 अप्रैल 2026 से कैश लेन पूरी तरह खत्म की जा रही है। FASTag न होने पर क्या होगा? अगर किसी वाहन में FASTag नहीं है या वह काम नहीं कर रहा— * तो उस वाहन पर भारी जुर्माना लगाया जा सकता है * भविष्य में सीधे ई-चालान या वाहन मालिक के रजिस्टर्ड अकाउंट से टोल वसूली की व्यवस्था भी लागू हो सकती है आम लोगों को क्या फायदा? * टोल प्लाजा पर रुकना नहीं पड़ेगा * सफर होगा तेज और स्मूथ * ईंधन की बचत और प्रदूषण में कमी * टोल भुगतान में पारदर्शिता सरकार की तैयारी केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के अनुसार— * पहले चरण में चुनिंदा नेशनल हाईवे पर MLFF लागू होगा * इसके बाद पूरे देश में इसे चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाएगा क्या करना चाहिए वाहन चालकों को? * समय रहते FASTag जरूर लगवाएं * FASTag को बैंक अकाउंट से लिंक रखें * वॉलेट में पर्याप्त बैलेंस बनाए रखें 1 अप्रैल 2026 से टोल टैक्स सिस्टम पूरी तरह डिजिटल और हाईटेक होने जा रहा है। कैश भुगतान का दौर खत्म होगा और FASTag/MLFF देश के हाईवे सफर को नया रूप देगा। ऐसे में वाहन चालकों के लिए अभी से तैयारी करना जरूरी है।

23 साल की उम्र में दिलीप कुमार से ए.आर. रहमान बनने की कहानी: आस्था, संघर्ष और संगीत के सफ़र का अनसुना अध्याय

नई दिल्ली। ऑस्कर, ग्रैमी और गोल्डन ग्लोब जैसे अंतरराष्ट्रीय सम्मान हासिल कर चुके ए.आर. रहमान आज दुनिया के सबसे प्रभावशाली संगीतकारों में गिने जाते हैं। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस वैश्विक पहचान से पहले उनका नाम दिलीप कुमार हुआ करता था। 1980 के दशक में, महज़ 23 साल की उम्र में, उन्होंने न सिर्फ़ इस्लाम धर्म अपनाया बल्कि अपना नाम बदलकर अल्लाह रक्खा रहमान रख लिया, जिसे बाद में ए.आर. रहमान के नाम से जाना गया। आखिर ऐसा क्या हुआ जिसने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी? बचपन से संघर्षों में घिरा जीवन ए.आर. रहमान का जन्म 6 जनवरी 1967 को तमिलनाडु के मद्रास (अब चेन्नई) में हुआ। उनके पिता आर.के. शेखर दक्षिण भारतीय फिल्मों में संगीतकार थे। लेकिन जब रहमान महज़ 9 साल के थे, तब पिता का अचानक निधन हो गया। परिवार पर आर्थिक संकट आ गया और कम उम्र में ही रहमान को काम करना पड़ा। संगीत उनके लिए सिर्फ़ कला नहीं, बल्कि परिवार को संभालने का ज़रिया बन गया। बीमारी, सवाल और आस्था की तलाश किशोरावस्था और युवावस्था के शुरुआती दौर में रहमान का परिवार लगातार कठिनाइयों से जूझता रहा। इसी दौरान उनकी बहन गंभीर रूप से बीमार पड़ीं। कई इलाजों के बावजूद स्थिति में सुधार नहीं हुआ। इसी समय परिवार का संपर्क क़ादिरी इस्लामी सूफ़ी संत शेख क़ादिर से हुआ। सूफ़ी परंपरा की आध्यात्मिक शिक्षाओं और प्रार्थनाओं का परिवार पर गहरा असर पड़ा। रहमान की बहन की तबीयत में धीरे-धीरे सुधार आने लगा, जिसने पूरे परिवार को भीतर तक झकझोर दिया। 23 साल में लिया बड़ा फैसला इन घटनाओं ने दिलीप कुमार को जीवन, ईश्वर और आस्था पर नए सिरे से सोचने पर मजबूर किया। लंबे आत्ममंथन और अध्ययन के बाद, 1989 में 23 साल की उम्र में उन्होंने अपनी मां और बहनों के साथ इस्लाम धर्म अपनाया। इसके साथ ही उनका नाम बदला गया— * दिलीप कुमार → अल्लाह रक्खा रहमान बाद में यही नाम संक्षेप में ए.आर. रहमान के रूप में दुनिया भर में मशहूर हुआ। नाम बदला, सोच बदली, संगीत को मिला नया आयाम धर्म परिवर्तन के बाद रहमान के संगीत में एक गहराई, शांति और आध्यात्मिकता साफ़ झलकने लगी। सूफ़ी संगीत, इंसानियत, प्रेम और ईश्वर से जुड़ाव उनके सुरों का अहम हिस्सा बन गया। उन्होंने खुद कई बार कहा है कि इस्लाम और सूफ़ी विचारधारा ने उन्हें अनुशासन, धैर्य और विनम्रता सिखाई, जो उनके रचनात्मक जीवन की नींव बनी। ऑस्कर तक पहुंचा सफ़र 1992 में रोज़ा फ़िल्म के संगीत से धमाकेदार एंट्री करने वाले रहमान ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। दिल से, ताल, लगान, रंग दे बसंती से लेकर स्लमडॉग मिलियनेयर तक— 2009 में ऑस्कर अवॉर्ड जीतकर उन्होंने भारतीय संगीत को वैश्विक पहचान दिलाई। निजी आस्था, सार्वजनिक प्रेरणा ए.आर. रहमान आज भी अपनी निजी आस्था को बेहद सादगी से जीते हैं। वे मानते हैं कि धर्म उनके लिए दिखावे का नहीं, बल्कि आत्मिक संतुलन का माध्यम है। उनकी कहानी बताती है कि आस्था, संघर्ष और कला जब एक साथ चलते हैं, तो साधारण इंसान भी असाधारण बन सकता है।

जया एकादशी 2026 — जाने तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और धार्मिक महत्व

सनातन धर्म में एकादशी व्रत को अत्यंत पवित्र और पुण्यदायक माना जाता है। विशेषकर जया एकादशी व्रत को भगवान विष्णु की भक्ति से जोड़कर मान्यता दी जाती है कि इससे जीवन के सारे दुख नष्ट होते हैं, मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं और आत्मा को शांति एवं मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग सरल होता है। जया एकादशी कब है? (तिथि एवं समय) * जया एकादशी व्रत का दिन:गुरुवार, 29 जनवरी 2026 * **एकादशी तिथि आरंभ: 28 जनवरी 2026 शाम लगभग 4:35 बजे * एकादशी तिथि समाप्त: 29 जनवरी 2026 दोपहर लगभग 1:55 बजे * परान (व्रत तोड़ने का शुभ समय):30 जनवरी 2026 सुबह 7:10 — 9:20 बजे के बीच   यह व्रत माघ मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी तिथि पर रखा जाता है, जो भगवान विष्णु को समर्पित है। शुभ मुहूर्त — पूजा के उत्तम समय पंचांग के अनुसार जया एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा के लिए विशेष शुभ मुहूर्त इस प्रकार हैं: * सुबह पूजा का अच्छा समय:7:11 बजे से 8:32 बजे तक * दोपहर तक दूसरा शुभ समय:*11:14 बजे से 1:55 बजे तक इन समयों में भक्त विधि-विधान से पूजा-अर्चना और मंत्र जाप कर सकते हैं। पूजा विधि — कैसे करें जया एकादशी पूजा 1. प्रातः जल्दी उठकर स्नान करें और साफ वस्त्र धारण करें। 2. पूजा स्थान पर भगवान विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। 3. घी का दीपक जलाएँ, इत्र-अक्षत, तिल, दही, फूल आदि अर्पित करें। 4. भगवान विष्णु को तुलसी के पत्ते, पंचामृत और फल अर्पित करें। 5. “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” या विष्णु सहस्रनाम आदि मंत्रों का उच्चारण ध्यानपूर्वक करें। 6. दिनभर निर्जला व्रत या फलाहार व्रत रखें तथा मन को शुद्ध रखें। 7. परान (व्रत तोड़ने) के समय सुबह स्नान के बाद ही दान या ब्राह्मण भोजन अर्पित करना शुभ है। धार्मिक महत्व जया एकादशी व्रत को संपूर्ण कर लेने से मान्यता है कि: * जीवन के सारे दुख, विघ्न और पापों का नाश होता है। * भक्त की मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं और धार्मिक प्रगति संभव होती है। * पवित्र व्रत से आत्मा का शुद्धिकरण और मोक्ष की प्राप्ति में सहायता मिलती है। * एकादशी व्रत से न केवल भौतिक शुभ फल बल्कि आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है। समापन संदेश जया एकादशी का व्रत सनातन परंपरा में न केवल एक धार्मिक परंपरा है बल्कि जीवन को शांति, समृद्धि और आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करने वाला एक सशक्त साधन भी माना जाता है। इस पावन अवसर पर श्रद्धा और विधिपूर्वक उपासना करने से जीवन में सकारात्मकता और दैवी कृपा का प्रवेश होता है। अगर आप चाहें, तो मैं जया एकादशी की कथा/व्रत कथा भी सुना सकता हूँ — क्या आप उसके बारे में भी जानना चाहते हैं?

काजीरंगा से सियासी संदेश: विकास परियोजनाओं के बीच पीएम मोदी का कांग्रेस पर तीखा प्रहार

कालियाबोर (असम) | प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को असम के कालियाबोर में करीब 6,957 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाले काजीरंगा एलिवेटेड कॉरिडोर का शिलान्यास किया और साथ ही दो अमृत भारत ट्रेनों को हरी झंडी दिखाकर राज्य को बड़ी विकास सौगात दी। इस अवसर पर उन्होंने जहां बुनियादी ढांचे और कनेक्टिविटी के विस्तार पर जोर दिया, वहीं कांग्रेस पर तीखा हमला बोलते हुए घुसपैठ, सुरक्षा और असम की सांस्कृतिक पहचान का मुद्दा प्रमुखता से उठाया। प्रधानमंत्री ने कहा कि कांग्रेस ने देश का भरोसा खो दिया है और असम की मिट्टी व संस्कृति के प्रति उसका रवैया उदासीन रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस शासन के दौरान घुसपैठ लगातार बढ़ी, जिससे राज्य की जनसंख्या संरचना असंतुलित हुई। पीएम मोदी के अनुसार, यह स्थिति न केवल असम बल्कि पूरे देश की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा है। पीएम मोदी ने असम सरकार की सराहना करते हुए कहा कि जिस प्रकार राज्य सरकार घुसपैठ से सख्ती से निपट रही है, उसकी देशभर में प्रशंसा हो रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने अतीत में घुसपैठियों को संरक्षण दिया, जिससे तस्करी और अन्य अपराध बढ़े और असम की पहचान पर संकट आया। अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने कांग्रेस पर सीधा राजनीतिक वार करते हुए कहा, “घुसपैठियों को बचाओ और उनकी मदद से सत्ता पाओ**—कांग्रेस और उसके सहयोगी पूरे देश में यही राजनीति कर रहे हैं।” उन्होंने बिहार का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां घुसपैठियों के समर्थन में रैलियां निकाली गईं, लेकिन जनता ने उन्हें करारा जवाब दिया। पीएम मोदी ने विश्वास जताया कि असम की धरती से भी कांग्रेस को ऐसा ही जवाब मिलेगा। विकास परियोजनाओं की बात करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि काजीरंगा एलिवेटेड कॉरिडोर से न केवल यातायात सुगम होगा, बल्कि वन्यजीव संरक्षण और पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा। वहीं अमृत भारत ट्रेनें आधुनिक सुविधाओं के साथ क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को मजबूत करेंगी और आम लोगों की यात्रा को आसान बनाएंगी। समग्र रूप से देखें तो कालियाबोर का यह कार्यक्रम विकास और राजनीति—दोनों का संगम रहा। एक ओर बड़ी परियोजनाओं से असम के भविष्य की रूपरेखा पेश की गई, तो दूसरी ओर घुसपैठ और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर कांग्रेस को कठघरे में खड़ा कर राजनीतिक संदेश भी स्पष्ट कर दिया गया।

टैरिफ टकराव की आग: अमेरिकी दालों पर भारत का 30% शुल्क, ट्रंप के फैसले पर कड़ा जवाब

अमेरिका और भारत के बीच व्यापारिक रिश्तों में एक बार फिर तनाव की लकीरें गहरी हो गई हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारतीय उत्पादों पर 50 फीसदी टैरिफ लगाए जाने के बाद भारत ने भी जवाबी कदम उठाते हुए अमेरिकी दालों के आयात पर 30 फीसदी शुल्क लागू कर दिया है। यह फैसला पिछले साल अक्टूबर से प्रभावी है, लेकिन अब इसके राजनीतिक और आर्थिक असर खुलकर सामने आने लगे हैं। भारत का यह कदम सिर्फ एक आर्थिक निर्णय नहीं, बल्कि रणनीतिक संदेश भी माना जा रहा है। लंबे समय से भारत और अमेरिका के बीच एक व्यापक व्यापार समझौते को लेकर बातचीत चल रही थी, लेकिन इस टैरिफ वॉर ने उन वार्ताओं को और जटिल बना दिया है। नई दिल्ली का साफ संकेत है कि वह एकतरफा दबाव की नीति को स्वीकार नहीं करेगा। अमेरिकी राजनीति में हलचल भारत के इस फैसले से अमेरिकी राजनीति में भी बेचैनी देखी जा रही है। कई अमेरिकी सांसदों ने ट्रंप प्रशासन से भारत के साथ बातचीत का रास्ता अपनाने की अपील की है। उनका कहना है कि भारतीय बाजार अमेरिकी कृषि उत्पादों, खासकर दालों के लिए बेहद अहम है और ऊंचे टैरिफ से अमेरिकी किसानों को सीधा नुकसान होगा। भारतीय किसानों को संदेश दूसरी ओर, भारत में इस निर्णय को घरेलू किसानों के हित में उठाया गया कदम बताया जा रहा है। अमेरिकी दालों पर शुल्क बढ़ने से आयात महंगा होगा, जिससे देश के दाल उत्पादक किसानों को राहत मिल सकती है। सरकार इसे “हितों की रक्षा” और “संतुलित व्यापार” की दिशा में जरूरी कदम बता रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर दोनों देश जल्द किसी समझौते पर नहीं पहुंचे, तो यह टैरिफ टकराव और गहरा सकता है। इसका असर सिर्फ दालों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आईटी, फार्मा और ऑटो सेक्टर जैसे अन्य क्षेत्रों में भी तनाव बढ़ सकता है। फिलहाल, भारत ने साफ कर दिया है कि वह बराबरी के आधार पर व्यापार चाहता है। अब नजर इस बात पर है कि वॉशिंगटन इस कड़े संदेश को कैसे पढ़ता है—टकराव के तौर पर या बातचीत के न्योते के रूप में।

“पारिवारिक विवादों पर दिल्ली हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: हर मामले में ससुराल पक्ष दोषी नहीं, कानून के दुरुपयोग पर भी जताई चिंता”

नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने पारिवारिक विवादों और दहेज उत्पीड़न से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान एक अहम और दूरगामी टिप्पणी की है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि हर मामले में ससुराल पक्ष को ही दोषी ठहराना न्यायसंगत नहीं है और यह भी स्वीकार करना होगा कि कुछ मामलों में महिलाएं कानून का दुरुपयोग करती हैं। अदालत की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब दहेज उत्पीड़न कानूनों के दुरुपयोग को लेकर लंबे समय से बहस होती रही है। हाईकोर्ट ने कहा कि दहेज निषेध और महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानून समाज में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, लेकिन इनका उद्देश्य निर्दोष लोगों को परेशान करना नहीं है। अदालत ने चिंता जताई कि कई मामलों में पति के पूरे परिवार को बिना ठोस सबूतों के आरोपी बना दिया जाता है, जिससे न केवल कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग होता है, बल्कि सामाजिक और पारिवारिक संबंध भी गंभीर रूप से प्रभावित होते हैं। कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि वैवाहिक विवाद अक्सर निजी और संवेदनशील होते हैं, जिन्हें आपसी समझ, मध्यस्थता और संतुलित दृष्टिकोण से सुलझाने की कोशिश की जानी चाहिए। हर विवाद को आपराधिक रंग देना न तो परिवार के हित में है और न ही समाज के। न्यायालय ने निचली अदालतों और जांच एजेंसियों को भी सतर्कता बरतने की सलाह दी, ताकि किसी निर्दोष व्यक्ति को अनावश्यक रूप से कानूनी कार्रवाई का सामना न करना पड़े। हालांकि, हाईकोर्ट ने यह भी साफ किया कि जहां महिलाओं के साथ वास्तव में उत्पीड़न और अन्याय होता है, वहां कानून पूरी मजबूती से उनके साथ खड़ा रहेगा। अदालत ने कहा कि कानून का उद्देश्य पीड़ित को न्याय दिलाना है, न कि उसे व्यक्तिगत बदले या दबाव बनाने का साधन बनाना। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि दिल्ली हाईकोर्ट की यह टिप्पणी संतुलन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे एक ओर जहां दहेज और घरेलू हिंसा के वास्तविक पीड़ितों को न्याय मिलने की प्रक्रिया मजबूत होगी, वहीं दूसरी ओर कानून के दुरुपयोग पर भी लगाम लग सकेगी। यह टिप्पणी आने वाले समय में पारिवारिक विवादों से जुड़े मामलों की सुनवाई और जांच प्रक्रिया को अधिक जिम्मेदार और न्यायसंगत बनाने में अहम भूमिका निभा सकती है।