अक्सर महिलाएं मेनोपॉज को केवल पीरियड्स के बंद हो जाने तक सीमित समझ लेती हैं। लेकिन हकीकत इससे कहीं गहरी और असरदार है। मेनोपॉज महिलाओं के जीवन का वह चरण है, जहां शरीर ही नहीं, मन, सोच और व्यवहार तक बदलाव के दौर से गुजरते हैं। यही वजह है कि कई महिलाएं खुद से सवाल करने लगती हैं — “क्या मैं बदल रही हूं?”
मेनोपॉज क्या सिर्फ शारीरिक बदलाव है?
नहीं। मेनोपॉज हार्मोनल बदलावों की एक जटिल प्रक्रिया है। इस दौरान एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन हार्मोन तेजी से घटते हैं, जिसका सीधा असर दिमाग, भावनाओं और ऊर्जा स्तर पर पड़ता है।
क्यों बदलने लगती है पर्सनैलिटी?
मेनोपॉज के समय दिखने वाले कुछ आम लेकिन अनदेखे बदलाव—
* मूड स्विंग्स: छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा या अचानक उदासी
* थकान और सुस्ती: बिना ज्यादा काम किए भी थक जाना
* नींद की समस्या: रात को नींद न आना या बार-बार टूटना
* चिंता और चिड़चिड़ापन: हर बात पर बेचैनी महसूस होना
* आत्मविश्वास में कमी: खुद को पहले जैसा न महसूस करना
ये लक्षण धीरे-धीरे महिला के व्यवहार और फैसलों को प्रभावित करने लगते हैं, जिससे उन्हें लगता है कि उनकी पर्सनैलिटी बदल रही है।
वजन बढ़ना और शरीर से नाराज़गी
मेनोपॉज के बाद मेटाबॉलिज़्म धीमा हो जाता है। पेट और कमर के आसपास वजन बढ़ना आम बात है। इससे महिलाएं अपने शरीर को लेकर असहज महसूस करने लगती हैं, जिसका असर आत्मसम्मान पर पड़ता है।
रिश्तों पर भी पड़ता है असर
भावनात्मक असंतुलन का असर पारिवारिक और सामाजिक रिश्तों पर भी दिखता है। कई महिलाएं खुद को कम समझी जाने वाली या अकेली महसूस करने लगती हैं।
चुप रहना समाधान नहीं
सबसे बड़ी गलती यही होती है कि महिलाएं इन बदलावों को “उम्र का असर” मानकर सहती रहती हैं। जबकि मेनोपॉज के लक्षणों पर खुलकर बात करना, डॉक्टर से सलाह लेना और सही जीवनशैली अपनाना बेहद जरूरी है।
* संतुलित आहार और कैल्शियम युक्त भोजन
* नियमित वॉक, योग या हल्की एक्सरसाइज
* पर्याप्त नींद और तनाव कम करने की कोशिश
* जरूरत हो तो काउंसलिंग या मेडिकल सलाह
मेनोपॉज कोई बीमारी नहीं, बल्कि जीवन का नया अध्याय है। यह दौर आपकी कमजोरी नहीं, बल्कि खुद को नए सिरे से समझने और अपनाने का मौका है। जरूरी है कि महिलाएं इसे नजरअंदाज न करें, क्योंकि सही जानकारी और देखभाल से यह सफर आसान और सशक्त बन सकता है।