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By Dharmendra rastogi, Holi-2026:  फाल्गुन पूर्णिमा के अवसर पर इस वर्ष होली का पर्व विशेष धार्मिक और ज्योतिषीय संयोगों के कारण अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। शहर से लेकर गांव तक रंग, गुलाल, अबीर और पिचकारियों की दुकानों से बाजार सज चुके हैं। बाहर रहकर नौकरी या पढ़ाई करने वाले लोग भी घर लौटने की तैयारी में हैं, जिससे पूरे जिले में उत्सव का माहौल दिखाई दे रहा है।

इस वर्ष होलिका दहन, सुतक काल और खंडग्रस्त चंद्रग्रहण का एक ही तिथि पर पड़ना इसे धार्मिक दृष्टि से और भी विशिष्ट बना रहा है।

प्रदोष काल में 2 मार्च को होगा होलिका दहन

संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, काशी के शोधार्थी एवं ज्योतिषाचार्य राकेश कुमार मिश्रा ने बताया कि फाल्गुन मास शुक्ल पक्ष चतुर्दशी तिथि 2 मार्च, सोमवार को सायं 5:57 बजे समाप्त हो रही है। इसके बाद पूर्णिमा तिथि प्रदोष काल में प्रवेश कर रही है।

ऐसे में 2 मार्च को सायं 6:39 बजे से रात्रि 9:00 बजे तक प्रदोष काल में होलिका दहन करना श्रेष्ठ रहेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि 3 मार्च को पूर्णिमा तिथि प्रदोष काल से पूर्व ही समाप्त हो जाएगी और उसी दिन चंद्रग्रहण भी है, इसलिए उस दिन होलिका दहन शुभ नहीं माना गया है।

3 मार्च को पूर्णिमा और ग्रहण का प्रभाव

3 मार्च, मंगलवार को पूर्णिमा तिथि अपराह्न 4:26 बजे तक रहेगी। प्रातः 10 बजे तक पूर्णिमा से जुड़े धार्मिक कृत्य संपन्न कर लेना उचित बताया गया है।

सायं 5:55 बजे से 6:46 बजे तक खंडग्रस्त चंद्रग्रहण रहेगा, जिसका मोक्ष 6:48 बजे बताया गया है। यद्यपि ग्रहण भारत में प्रत्यक्ष रूप से दिखाई नहीं देगा क्योंकि उस समय दिन रहेगा, किंतु ग्रहणयुक्त चंद्र का उदय होगा।

ग्रहण का सुतक आठ घंटे पूर्व, प्रातः 9:50 बजे से प्रभावी हो जाएगा। इस अवधि में मंदिरों के पट बंद रहेंगे तथा शुभ कार्य वर्जित माने जाएंगे।

धुरखेल से रंगोत्सव तक परंपराओं का निर्वहन

होलिका दहन के अगले दिन प्रातः होलिका की भस्म धारण करने की परंपरा है, जिसे ‘धुरखेल’ कहा जाता है। इसके बाद सचैल स्नान कर लोग रंग-गुलाल से होली खेलते हैं।

इसी दिन सप्तडोरक बंधन अथवा डोरा पर्व भी मनाया जाता है, जो रक्षा, सुख-समृद्धि और मंगलकामना का प्रतीक है।

हृषिकेश, महावीर, मिथिला एवं वैदिक पंचांगों के अनुसार रंगोत्सव 4 मार्च, बुधवार को मनाया जाएगा।

पौराणिक कथा और आध्यात्मिक संदेश

धार्मिक मान्यता के अनुसार फाल्गुन पूर्णिमा के बाद चैत्र मास का आरंभ होता है, जिसे भारतीय नववर्ष का संकेत माना जाता है।

पौराणिक कथा के अनुसार, हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को अग्नि से न जलने का वरदान प्राप्त था। उसने भगवान विष्णु के परम भक्त प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में प्रवेश किया, किंतु दैवी कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित रहे और होलिका दहन हो गई। यह घटना अधर्म पर धर्म और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है।

होलिका दहन के समय रखें इन बातों का ध्यान

  • होलिका दहन सदैव शुभ मुहूर्त एवं प्रदोष काल में करें।
  • दहन स्थल पर स्वच्छता और सुरक्षा का विशेष ध्यान रखें।
  • सूखी लकड़ी और गोबर के उपलों का ही उपयोग करें।
  • प्लास्टिक या रबर जैसी हानिकारक वस्तुएं अग्नि में न डालें।
  • दहन के बाद अग्नि की पूर्ण शांति सुनिश्चित करें।

आस्था और सामाजिक समरसता का पर्व

इस वर्ष की होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि आस्था, ज्योतिषीय गणना और परंपराओं के अद्भुत संगम का प्रतीक बनकर आई है। होलिका की अग्नि में अहंकार और नकारात्मकता की आहुति देकर तथा भस्म से आत्मशुद्धि कर जब रंगों की फुहार उठेगी, तो वह जीवन में नई ऊर्जा, उत्साह और सामाजिक समरसता का संदेश देगी।

धुरखेल से लेकर रंगोत्सव तक यह पर्व भारतीय संस्कृति की जीवंतता और लोकपरंपराओं की निरंतरता का परिचायक है।

Rajnish Pandey
A media professional with experience in print and digital journalism, handling news editing and content management with a focus on accuracy and responsible reporting.

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