भारत–यूएई की मेगा डील ने दक्षिण एशियाई भू-राजनीति का संतुलन बदला
नई दिल्ली / अबू धाबी :प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान के बीच हुई महज़ डेढ़ घंटे की मुलाकात ने वैश्विक आर्थिक और रणनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। दोनों देशों ने वर्ष 2032 तक द्विपक्षीय व्यापार को 200 अरब डॉलर तक पहुँचाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है।
यह समझौता केवल आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि भारत की तेजी से बढ़ती वैश्विक आर्थिक हैसियत और खाड़ी देशों के साथ उसकी मजबूत होती रणनीतिक साझेदारी का स्पष्ट संकेत है।
एक मुलाकात, कई संदेश
भारत और यूएई के नेताओं की इस बैठक को कूटनीतिक जानकार “फास्ट-ट्रैक डिप्लोमेसी” का बेहतरीन उदाहरण मान रहे हैं। जिस समझौते को अंतिम रूप देने में कई देशों को वर्षों लग जाते हैं, उसे भारत और यूएई ने बेहद कम समय में ठोस दिशा दे दी।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह डील उस तथाकथित “ऐतिहासिक”सऊदी समझौते से दस गुना बड़ी है, जिसे लेकर पाकिस्तान लंबे समय से अपनी उपलब्धि के रूप में प्रचार करता रहा है।
किन क्षेत्रों में होगा सबसे बड़ा असर
इस 200 अरब डॉलर के लक्ष्य को पाने के लिए दोनों देश कई प्रमुख क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर सहमत हुए हैं:
* ऊर्जा और नवीकरणीय संसाधन
* डिजिटल ट्रेड और फिनटेक
* रक्षा और एयरोस्पेस सहयोग
* इंफ्रास्ट्रक्चर और लॉजिस्टिक्स
* फूड सिक्योरिटी और एग्री-टेक
यूएई पहले से ही भारत के शीर्ष व्यापारिक साझेदारों में शामिल है, और यह नया लक्ष्य इस रिश्ते को पूरी तरह रणनीतिक साझेदारी में बदल देता है।
पाकिस्तान के लिए असहज संकेत
क्षेत्रीय राजनीति पर नज़र रखने वालों का मानना है कि यह डील अप्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तान के लिए भी एक सख़्त संदेश है। जहां पाकिस्तान अभी भी निवेश के वादों और एमओयू के स्तर पर अटका हुआ है, वहीं भारत ठोस परिणामों और दीर्घकालिक लक्ष्यों के साथ आगे बढ़ रहा है।
भारत की बदलती वैश्विक छवि
यह समझौता इस बात का प्रमाण है कि भारत अब केवल एक उभरती अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में प्रभावशाली भूमिका निभाने वाला देश बन चुका है।
मोदी सरकार की आर्थिक कूटनीति—ट्रेड + टेक्नोलॉजी + ट्रस्ट—का यह सबसे मजबूत उदाहरण माना जा रहा है।
डेढ़ घंटे की इस मुलाकात ने साफ कर दिया है कि आज की वैश्विक राजनीति में गंभीर नेतृत्व, स्पष्ट दृष्टि और भरोसेमंद साझेदारी ही असली पूंजी है।
भारत–यूएई की यह 200 अरब डॉलर की छलांग न सिर्फ आर्थिक इतिहास रचेगी, बल्कि आने वाले दशक में एशिया और खाड़ी क्षेत्र की शक्ति-संतुलन को भी नए सिरे से परिभाषित करेगी।