प्रयागराज। देश के प्रमुख धार्मिक संतों में गिने जाने वाले शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती इन दिनों गंभीर आरोपों के चलते विवादों में घिर गए हैं। बटुकों द्वारा लगाए गए यौन शोषण के आरोपों के बाद प्रयागराज में उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है। मामले ने धार्मिक और सामाजिक हलकों में व्यापक चर्चा को जन्म दे दिया है। आरोप और कानूनी कार्रवाई बताया जा रहा है कि कुछ बटुकों ने स्वामी पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत के आधार पर केस दर्ज किया गया और मेडिकल परीक्षण भी कराया गया। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, शिकायतकर्ताओं ने अशोभनीय स्पर्श का आरोप लगाया था। हालांकि, स्वामी के पक्ष की ओर से दावा किया गया है कि मेडिकल रिपोर्ट में आरोपों की पुष्टि नहीं हुई है। बचाव पक्ष का कहना है कि घटना के कथित समय के लगभग सवा महीने बाद कराए गए मेडिकल परीक्षण में किसी प्रकार की पुष्टि नहीं मिली। हाईकोर्ट में याचिका, गिरफ्तारी पर रोक गिरफ्तारी की आशंका के बीच स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और उनके शिष्य मुकुंदानंद ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख किया। दोनों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता पी.एन. मिश्रा ने अदालत में पक्ष रखा। सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी दलीलें पेश कीं। बचाव पक्ष ने अदालत को बताया कि मामला झूठा और सुनियोजित तरीके से बनाया गया है। वहीं अभियोजन पक्ष ने आरोपों को गंभीर बताते हुए जांच की आवश्यकता पर जोर दिया। सुनवाई के बाद अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। साथ ही, आदेश आने तक गिरफ्तारी की कार्रवाई पर अंतरिम रोक लगा दी है। इस निर्णय से स्वामी को फिलहाल लगभग तीन सप्ताह की राहत मिल गई है। मामले की अगली सुनवाई 15 मार्च को निर्धारित की गई है। स्वामी और वकील का बयान स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने अपने समर्थकों को संबोधित करते हुए कहा कि उनके वकील ने अदालत में उनका पक्ष मजबूती से रखा। उन्होंने दावा किया कि न्यायालय को उनकी दलीलों में बल दिखाई दिया, तभी गिरफ्तारी पर रोक लगाई गई। स्वामी ने यह भी कहा कि आश्रम और गुरुकुल में बटुकों के शोषण की जो बातें प्रचारित की जा रही हैं, वे निराधार हैं। उनके अनुसार, संबंधित पक्ष के सरकारी अधिवक्ता (एजी) ने भी अदालत में कहा कि आश्रम में वे बटुक रहे ही नहीं, जिनके नाम से आरोप लगाए जा रहे हैं। वहीं बचाव पक्ष के वकील ने स्पष्ट किया कि अदालत ने फिलहाल केवल फैसला सुरक्षित रखा है और गिरफ्तारी पर अस्थायी रोक दी है। अंतिम निर्णय आने के बाद ही आगे की स्थिति स्पष्ट होगी। मामला अब न्यायालय के अंतिम आदेश पर निर्भर है। 15 मार्च को होने वाली अगली सुनवाई में अदालत का रुख स्पष्ट हो सकता है। तब तक गिरफ्तारी पर रोक बनी रहेगी। धार्मिक प्रतिष्ठा, गंभीर आरोप और कानूनी प्रक्रिया—इन तीनों के बीच यह मामला अब न्यायिक कसौटी पर है। अदालत के अंतिम निर्णय से ही यह तय होगा कि आरोपों में कितनी सच्चाई है और आगे की कार्रवाई किस दिशा में जाएगी।