मिशन 2027 से पहले भाजपा में मंथन या महाभारत?

संगठन–सरकार की खींचतान से सड़क तक पहुंचा सत्ता का तनाव लखनऊ। उत्तर प्रदेश की सत्ता में लगातार दूसरी बार काबिज भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सामने 2027 का विधानसभा चुनाव जितना नज़दीक आ रहा है, उतनी ही तेज़ी से पार्टी के भीतर अंतर्विरोध उभरकर सामने आने लगे हैं। बंद कमरों में सुलग रहा असंतोष अब खुले मंचों, मीडिया बयानों और यहां तक कि सड़कों तक पहुंच गया है। जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के बीच टकराव, सरकार और संगठन के बीच समन्वय की कमी और लोकसभा चुनाव 2024 के बाद उठे सवालों ने पार्टी नेतृत्व की चिंता बढ़ा दी है। जनप्रतिनिधि बनाम अधिकारी: सत्ता के गलियारों में टकराव बीते कुछ महीनों में कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां भाजपा विधायक और सांसद सीधे तौर पर प्रशासनिक अधिकारियों से भिड़ते नजर आए। महोबा का मामला इसका ताज़ा उदाहरण है, जहां एक भाजपा विधायक ने खुलेआम अधिकारियों पर भ्रष्टाचार और अनदेखी के आरोप लगाए। यह पहला मौका नहीं है जब सत्ता पक्ष के जनप्रतिनिधि अपनी ही सरकार के सिस्टम पर सवाल उठा रहे हों। इससे यह संकेत मिल रहा है कि ज़मीनी स्तर पर संवाद और विश्वास की कमी गहराती जा रही है। दिनेश खटीक का इस्तीफा और उसके मायने जलशक्ति राज्य मंत्री दिनेश खटीक का इस्तीफा पार्टी के लिए बड़ा राजनीतिक झटका माना गया। उन्होंने अधिकारियों पर दलित जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा का आरोप लगाते हुए पद छोड़ दिया था। हालांकि बाद में मामला संभाल लिया गया, लेकिन यह घटना भाजपा के उस सामाजिक संतुलन पर सवाल खड़े कर गई, जिसे पार्टी अपनी सबसे बड़ी ताकत मानती रही है। अंदरखाने चर्चा है कि कई अन्य विधायक और नेता भी इसी तरह की नाराज़गी महसूस कर रहे हैं। लोकसभा चुनाव के बाद बढ़ी तल्खी लोकसभा चुनाव 2024 में उत्तर प्रदेश में अपेक्षा से कमजोर प्रदर्शन ने पार्टी के भीतर आत्ममंथन की बजाय आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू कर दिया। संगठन के कुछ नेताओं ने सरकार की नीतियों और कार्यशैली को जिम्मेदार ठहराया, तो वहीं सरकार समर्थक खेमे ने संगठन पर ज़मीनी फीडबैक में कमी का आरोप लगाया। यह खींचतान अब साफ तौर पर “सरकार बनाम संगठन” के रूप में दिखने लगी है। संगठन–सरकार समन्वय पर सवाल भाजपा की पहचान हमेशा मजबूत संगठन और अनुशासित कार्यशैली रही है, लेकिन मौजूदा हालात में यही मॉडल दबाव में नजर आ रहा है। कई जिलों में संगठन पदाधिकारी खुद को हाशिये पर महसूस कर रहे हैं, जबकि जनप्रतिनिधियों का आरोप है कि उनकी बात शासन स्तर पर नहीं सुनी जा रही। इस असंतुलन का सीधा असर कार्यकर्ताओं के मनोबल पर पड़ रहा है। 2027 की राह आसान नहीं राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि भाजपा ने समय रहते इन अंदरूनी मतभेदों को नहीं सुलझाया, तो विपक्ष इसे बड़ा मुद्दा बना सकता है। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस पहले से ही “भाजपा की अंदरूनी कलह” को जनता के बीच ले जाने की तैयारी में हैं। नेतृत्व के सामने बड़ी चुनौती अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व—चाहे वह दिल्ली हो या लखनऊ—इस बढ़ते आक्रोश को कैसे नियंत्रित करता है। क्या यह असंतोष केवल चुनावी दबाव का नतीजा है या फिर सत्ता के लंबे समय तक रहने से पैदा हुई स्वाभाविक थकान? जवाब आने वाले महीनों में मिलेगा, लेकिन इतना तय है कि मिशन 2027 से पहले भाजपा के लिए सबसे बड़ी लड़ाई विपक्ष से नहीं, बल्कि अपने भीतर से ही है।