नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में बढ़ते सैन्य तनाव का असर अब सीधे वैश्विक ऊर्जा बाजार पर दिख रहा है। United States और Israel द्वारा Iran पर हमलों के बाद कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया गया है। सोमवार को बाजार खुलते ही अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड 13% उछलकर 82 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया, जो जनवरी 2025 के बाद का उच्चतम स्तर है। वहीं अमेरिकी सूचकांक WTI भी 72 डॉलर के करीब कारोबार करता दिखा। होर्मुज स्ट्रेट: दुनिया की एनर्जी लाइफलाइन पर ब्रेक तनाव की जड़ है Strait of Hormuz — एक संकीर्ण समुद्री मार्ग, जहां से दुनिया का लगभग 20% कच्चा तेल गुजरता है। इस मार्ग के आसपास बढ़े खतरे के कारण कई शिपिंग कंपनियों ने अपने टैंकरों की आवाजाही अस्थायी रूप से रोक दी है। आशंका है कि अगर यह मार्ग लंबे समय तक बाधित रहा, तो रोजाना 80 से 100 लाख बैरल तक की सप्लाई प्रभावित हो सकती है। ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी बड़ी कमी की भरपाई अल्पावधि में संभव नहीं है। इस समुद्री रास्ते से केवल कच्चा तेल ही नहीं, बल्कि बड़ी मात्रा में एलएनजी (LNG) की सप्लाई भी होती है, जिससे एशियाई देशों की ऊर्जा सुरक्षा पर सीधा असर पड़ सकता है। 90-100 डॉलर की ओर बढ़ता तेल? बाजार विश्लेषकों के अनुसार, यदि तनाव और गहराता है तो ब्रेंट क्रूड 90 से 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक पहुंच सकता है। इसका सीधा असर वैश्विक महंगाई पर पड़ेगा। पेट्रोल-डीजल की कीमतों में वृद्धि के साथ परिवहन और उत्पादन लागत बढ़ेगी, जिससे रोजमर्रा की वस्तुओं के दाम भी ऊपर जा सकते हैं। भारत पर क्या असर? India अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उछाल से देश का आयात बिल बढ़ना तय है। हालांकि सरकार के पास फिलहाल पर्याप्त रणनीतिक भंडार (Strategic Reserves) मौजूद हैं, जिससे तत्काल संकट की संभावना कम है। OPEC+ देशों ने उत्पादन बढ़ाने का संकेत दिया है, लेकिन यदि समुद्री मार्ग ही बाधित रहा तो अतिरिक्त उत्पादन भी बाजार तक नहीं पहुंच पाएगा। इससे भारत, चीन और जापान जैसे बड़े आयातकों के सामने सप्लाई अनिश्चितता बनी रह सकती है।