वाराणसी, 9 फरवरी 2026 : उत्तर प्रदेश में चल रहे 40 दिवसीय ‘उप्र राज्यमाता अभियान’ के 11वें दिन परमाराध्य उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामिश्रीः अविमुक्तेश्वरानन्दः सरस्वती ‘1008’ ने प्रदेश सरकार की नीतियों को लेकर कड़ा प्रतिवाद दर्ज कराया। श्री विद्यामठ, काशी में आयोजित पत्रकारवार्ता में शंकराचार्य जी ने गौ-वंश वध, बढ़ते मांस उत्पादन, राजकीय संरक्षण में संचालित वधशालाओं और सत्ता-धर्म के अंतर्विरोधों को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए। शंकराचार्य जी ने कहा कि वर्तमान सरकार स्वयं को “गौ-भक्त” बताती है, लेकिन सरकारी आंकड़े इस दावे की पोल खोलते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि शासन की प्राथमिकता धर्म-रक्षा नहीं, बल्कि मांस-उद्योग को बढ़ावा देना बन गई है। इस दौरान उन्होंने आगामी 1 मार्च 2026 को काशी में ‘वेतन और वैराग्य’ विषय पर अखिल भारतीय स्तर के शास्त्रार्थ की घोषणा भी की, जिसे उन्होंने “शास्त्रीय मर्यादा की शुद्धि की दिशा में ऐतिहासिक कदम” बताया। सरकारी दावों पर सवाल, आंकड़ों के साथ घेरा पत्रकारवार्ता में शंकराचार्य जी ने कहा कि प्रदेश के पशुपालन मंत्री के माध्यम से यह स्वीकारोक्ति कराई गई कि सरकार गाय नहीं, बल्कि भैंस, बकरा और सुअर का वध कराती है। उन्होंने इसे हिन्दू समाज और गुरु गोरखनाथ की परंपरा के विपरीत बताया। उन्होंने दावा किया कि वर्ष **2017 में प्रदेश में मांस उत्पादन जहां लगभग 7.5 लाख टन था, वहीं वर्तमान में यह बढ़कर 13 लाख टन से अधिक हो गया है। उनके अनुसार, कागजों पर वधशालाओं की संख्या भले घटी हो, लेकिन पशु-वध की गति और मात्रा में लगभग 60 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। शंकराचार्य जी ने यह भी कहा कि जिन गतिविधियों को पहले अपराध माना जाता था, आज उन्हें “उद्योग” का दर्जा देकर 35 प्रतिशत तक की सब्सिडी (5 करोड़ रुपये तक) दी जा रही है। उनका अनुमान है कि बीते नौ वर्षों में प्रदेश में 16 करोड़ से अधिक निरपराध जीवों, जिनमें लगभग 4 करोड़ भैंस-वंश शामिल हैं, का वध हुआ है। केन्द्रीय बजट और चुनावी चंदे पर भी निशाना उन्होंने केन्द्रीय बजट 2026 का उल्लेख करते हुए कहा कि मांस निर्यातकों को दी गई 3 प्रतिशत अतिरिक्त ड्यूटी-फ्री छूट यह दर्शाती है कि शासन की दिशा किस ओर है। साथ ही, उन्होंने बड़े मांस निर्यात समूहों से मिलने वाले चुनावी चंदे और उन्हें मिल रहे राजकीय संरक्षण पर भी सवाल उठाए। ‘वेतन बनाम वैराग्य’ का शास्त्रीय विमर्श शंकराचार्य जी ने शास्त्रीय संदर्भ देते हुए कहा कि सिद्ध सिद्धांत पद्धति के अनुसार संन्यासी के लिए ‘भृति’ (वेतन) विष तुल्य है। उन्होंने तर्क दिया कि जो व्यक्ति एक ओर संन्यासी-महंत की परंपरा से जुड़ा है और दूसरी ओर उसी राजकोष से वेतन व सुविधाएं ले रहा है, जो हिंसक राजस्व से भरा है—उसके लिए धर्म-रक्षा का दावा कैसे संभव है? इसी शास्त्रीय द्वंद्व के समाधान हेतु उन्होंने तीन चरणों के कार्यक्रम की घोषणा की— 19 फरवरी 2026: देशभर में स्वतंत्र विमर्श 1 मार्च 2026: काशी में अखिल भारतीय संत-विद्वद्गोष्ठी और ‘वेतन बनाम वैराग्य’ पर शास्त्रार्थ 11 मार्च 2026: लखनऊ में अभियान का अंतिम निष्कर्ष और आगामी “धर्म-शासनादेश” गोमाता को ‘राज्यमाता’ घोषित करने की मांग पत्रकारवार्ता के अंत में शंकराचार्य जी ने आशा जताई कि शेष दिनों में सरकार आत्म-चिंतन करेगी और गोमाता को ‘राज्यमाता’ घोषित कर पशु-वध और मांस-उद्योग से जुड़े इस “क्रूर कारोबार” पर रोक लगाएगी। धर्म, शासन और समाज के इस टकराव ने एक बार फिर उत्तर प्रदेश की राजनीति और नीतियों पर व्यापक बहस को जन्म दे दिया है, जिसकी गूंज आने वाले दिनों में और तेज होने की संभावना है।