नई दिल्ली। डिजिटल दौर में इंटरनेट ने जहां बच्चों के लिए ज्ञान और मनोरंजन के अनगिनत दरवाजे खोले हैं, वहीं इसके बढ़ते दुष्प्रभाव अब अभिभावकों के लिए चिंता का कारण बनते जा रहे हैं। हाल ही में लोकल सर्कल्स द्वारा किए गए एक सर्वे में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि देश के 300 से अधिक शहरों में हर दूसरा अभिभावक मानता है कि उनके बच्चों ने इंटरनेट पर या तो अनुचित कंटेंट देखा है या वे साइबर बुलिंग का शिकार हुए हैं। यह स्थिति न केवल सामाजिक बल्कि मानसिक स्वास्थ्य के लिहाज से भी गंभीर संकेत दे रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इंटरनेट पर अनियंत्रित और असुरक्षित एक्सपोजर बच्चों के व्यक्तित्व और व्यवहार पर गहरा असर डाल सकता है। कम उम्र में गलत कंटेंट का असर बच्चों का दिमाग अत्यंत संवेदनशील होता है। जब वे अपनी उम्र से पहले हिंसक, अश्लील या अनुचित सामग्री देखते हैं, तो उनका मानसिक विकास प्रभावित हो सकता है। कई बार वे वास्तविक और काल्पनिक दुनिया के बीच अंतर नहीं कर पाते, जिससे उनके सोचने और समझने की क्षमता पर असर पड़ता है। विशेषज्ञ बताते हैं कि हिंसक वीडियो गेम्स और कंटेंट बच्चों में संवेदनहीनता बढ़ा सकते हैं। बार-बार ऐसे दृश्य देखने से उनके भीतर हिंसा को सामान्य मानने की प्रवृत्ति विकसित हो सकती है। व्यवहार में बढ़ती आक्रामकता सर्वे में यह भी सामने आया है कि कई अभिभावकों ने बच्चों के व्यवहार में पहले की तुलना में अधिक गुस्सा और चिड़चिड़ापन देखा है। इंटरनेट पर मौजूद हिंसक गेम्स और वीडियो बच्चों के मस्तिष्क पर ऐसा प्रभाव डाल सकते हैं कि वे छोटी-छोटी बातों पर प्रतिक्रिया देने लगते हैं। बात-बात पर गुस्सा करना माता-पिता की बात न मानना स्कूल में अनुशासनहीन व्यवहार भावनाओं पर नियंत्रण में कमी ये संकेत बताते हैं कि डिजिटल एक्सपोजर का असर वास्तविक जीवन में दिखाई देने लगा है। साइबर बुलिंग: अदृश्य लेकिन गहरा घाव साइबर बुलिंग आज के समय की सबसे गंभीर समस्याओं में से एक बन चुकी है। सोशल मीडिया, गेमिंग प्लेटफॉर्म या मैसेजिंग ऐप्स के जरिए बच्चों को अपमानित करना, धमकाना या उनका मजाक उड़ाना आम होता जा रहा है। ऐसी स्थिति में बच्चे अक्सर खुद को दोषी मानने लगते हैं। वे डरते हैं कि अगर उन्होंने किसी को बताया तो स्थिति और बिगड़ जाएगी। परिणामस्वरूप वे चुपचाप मानसिक पीड़ा सहते रहते हैं। सामाजिक अलगाव और आत्मविश्वास में गिरावट ऑनलाइन ट्रोलिंग या बुलिंग का शिकार होने वाले बच्चे धीरे-धीरे सामाजिक गतिविधियों से दूर होने लगते हैं। दोस्तों से मिलना-जुलना कम कर देना परिवार से दूरी बनाना कमरे में अकेले समय बिताना स्कूल जाने से बचना हीन भावना और आत्मविश्वास की कमी उनके व्यक्तित्व विकास को प्रभावित करती है। लंबे समय में यह सामाजिक अलगाव गंभीर मानसिक समस्याओं का रूप ले सकता है। मानसिक तनाव, एंग्जायटी और डिप्रेशन का खतरा ऑनलाइन धमकी या गलत कंटेंट के निरंतर संपर्क में रहने से बच्चों में मानसिक तनाव बढ़ सकता है। इसके लक्षणों में शामिल हैं— नींद न आना भूख में कमी पढ़ाई में ध्यान न लगना अचानक मूड बदलना अत्यधिक चुप्पी या रोना यदि समय रहते इन संकेतों को नहीं पहचाना गया तो बच्चे एंग्जायटी या डिप्रेशन की ओर बढ़ सकते हैं। अभिभावकों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण विशेषज्ञों का मानना है कि इस चुनौती से निपटने के लिए केवल तकनीकी उपाय पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि संवाद और समझ भी जरूरी है। बच्चों के साथ खुलकर बातचीत करें उनके ऑनलाइन गतिविधियों पर नजर रखें पैरेंटल कंट्रोल और सुरक्षित ब्राउजिंग टूल्स का इस्तेमाल करें बच्चों को डिजिटल एटीकेट और ऑनलाइन सुरक्षा के बारे में जागरूक करें किसी भी असामान्य व्यवहार पर तुरंत ध्यान दें इंटरनेट आधुनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुका है, लेकिन बच्चों के लिए सुरक्षित डिजिटल माहौल सुनिश्चित करना समय की मांग है। सर्वे के आंकड़े यह स्पष्ट संकेत देते हैं कि यदि अभी ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में बच्चों का मानसिक और सामाजिक स्वास्थ्य गंभीर रूप से प्रभावित हो सकता है। अभिभावकों, शिक्षकों और समाज को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि तकनीक बच्चों के विकास का साधन बने, बाधा नहीं।