By Dharmendra rastogi, Holi 2026: रंगों, उमंगों और सामाजिक समरसता का प्रतीक होली का पर्व एक बार फिर अपने पारंपरिक स्वरूप में जनमानस के बीच उपस्थित है। होलिका दहन की प्राचीन परंपरा, जिसमें गोबर के उपलों और लकड़ियों को एकत्र कर अग्नि प्रज्वलित की जाती है, केवल एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक है। यह दहन उस अहंकार और अन्याय का प्रतीकात्मक अंत है, जिसका उल्लेख पौराणिक कथा में मिलता है, जबकि भक्त प्रह्लाद की जीवंतता और अडिग आस्था भारतीय संस्कृति में संस्कारों की स्थायित्व का संदेश देती है। सदियों से मनाया जा रहा यह पर्व विभिन्न समाजों और समुदायों में अपनी-अपनी परंपराओं और रीति-रिवाजों के साथ जीवित है। होली न केवल रंगों का उत्सव है, बल्कि यह परिवारों के पुनर्मिलन का अवसर भी बनती है। प्रदेश से लेकर देश के विभिन्न कोनों में बसे लोग इस अवसर पर अपने घर-परिवार की ओर रुख करते हैं। बाजारों में सजे रंग, पिचकारियां और बच्चों की अटखेलियां वातावरण को उल्लासमय बना देती हैं। छोटे-छोटे हाथों में रंगीन पिचकारियां थामे बच्चों की उत्सुकता पूरे बाजार को मानो रंगों की रंगोली में बदल देती है। पकवानों की सुगंध और भंग की ठंडाई की परंपरा इस पर्व को और भी विशेष बना देती है। गुजिया, मालपुआ और अन्य पारंपरिक व्यंजन घर-घर में तैयार किए जाते हैं, जिनकी खुशबू वातावरण में एक अलग ही मिठास घोल देती है। परदेश में बसे लोग भी इस आकर्षण से स्वयं को दूर नहीं रख पाते और अपनों से मिलने की चाह में घर लौट आते हैं। देश के विभिन्न हिस्सों में होली के अनूठे स्वरूप देखने को मिलते हैं। विशेष रूप से मथुरा और वृंदावन की ब्रज होली विश्वविख्यात है, जहां एक महीने पूर्व से ही उत्सव प्रारंभ हो जाता है। लट्ठमार होली, लड्डुओं की होली और फूलों की होली जैसे विविध रूप आज भी परंपरा की जीवंतता को बनाए हुए हैं और देश-विदेश के पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। होली का वास्तविक संदेश प्रेम, भाईचारा और सामाजिक एकता को सुदृढ़ करना है। यह पर्व हमें अपनी जड़ों से जुड़े रहने और सांस्कृतिक मूल्यों को संजोए रखने की प्रेरणा देता है। किंतु वर्तमान समय में कुछ सामाजिक अराजकताएं इस सतरंगी पर्व के स्वरूप को प्रभावित करती दिखाई दे रही हैं। भंग की परंपरा को नशे की प्रवृत्ति से जोड़कर देखा जाने लगा है और रंगों की आड़ में होने वाली असामाजिक घटनाएं चिंता का विषय बन रही हैं। प्रश्न यह उठता है कि क्या हमारी परंपराएं हमें ऐसा आचरण सिखाती हैं? क्या हम वास्तव में उस भावना के साथ होली मना रहे हैं, जिसके लिए यह पर्व स्थापित हुआ था? होली केवल रंग खेलने का अवसर नहीं, बल्कि आत्ममंथन का भी समय है—यह सोचने का कि हम इसे कितने सौहार्दपूर्ण और मर्यादित वातावरण में मना रहे हैं। आवश्यक है कि हम इस पर्व को उसके मूल स्वरूप में जीवित रखें—जहां रंगों में प्रेम घुला हो, उल्लास में संयम हो और परंपरा में संस्कारों की सुगंध हो। तभी होली का वास्तविक अर्थ और उसकी गरिमा सुरक्षित रह सकेगी।