दिल्ली में महिलाओं को दी जा रही मुफ्त बस यात्रा योजना में बड़ा बदलाव होने जा रहा है। दिल्ली परिवहन निगम (DTC) और क्लस्टर बसों में अब पिंक टिकट की जगह 2026 से ‘पिंक सहेली स्मार्ट कार्ड’ लागू किया जाएगा। सरकार का दावा है कि इस नई डिजिटल व्यवस्था से न केवल यात्रा व्यवस्था अधिक पारदर्शी होगी, बल्कि फ्री यात्रा के नाम पर हो रहे दुरुपयोग पर भी रोक लगेगी। क्या है पिंक सहेली स्मार्ट कार्ड पिंक सहेली स्मार्ट कार्ड एक डिजिटल कार्ड होगा, जिसके जरिए महिलाएं DTC और क्लस्टर बसों में मुफ्त यात्रा कर सकेंगी। अभी महिलाओं को कंडक्टर से पिंक टिकट लेकर सफर करना होता है, लेकिन नई व्यवस्था में कार्ड को बस में लगे इलेक्ट्रॉनिक मशीन पर टैप करना होगा। आधार कार्ड होगा जरूरी इस स्मार्ट कार्ड को बनवाने के लिए दिल्ली का आधार कार्ड अनिवार्य होगा। सरकार का कहना है कि आधार से लिंक होने के कारण यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि योजना का लाभ केवल दिल्ली की पात्र महिलाओं को ही मिले। इससे बाहरी लोगों द्वारा योजना के गलत इस्तेमाल को रोका जा सकेगा। 2026 में लॉन्च होंगे तीन नए स्मार्ट कार्ड परिवहन विभाग के अनुसार, 2026 में कुल तीन नए स्मार्ट कार्ड लॉन्च किए जाएंगे— * महिलाओं के लिए पिंक सहेली स्मार्ट कार्ड * छात्रों के लिए अलग स्मार्ट कार्ड * आम यात्रियों के लिए जनरल स्मार्ट कार्ड इन सभी कार्डों को एक ही डिजिटल प्लेटफॉर्म से जोड़ा जाएगा, जिससे बस यात्रा को पूरी तरह कैशलेस और स्मार्ट बनाया जा सके। महिलाओं को मिलेगी खास सुविधा नई व्यवस्था के तहत महिलाओं को बार-बार टिकट लेने की जरूरत नहीं होगी। कार्ड के जरिए यात्रा का पूरा रिकॉर्ड डिजिटल रूप से सुरक्षित रहेगा। इससे बस में चढ़ने के दौरान समय की बचत होगी और भीड़भाड़ के समय कंडक्टर से टिकट लेने की झंझट खत्म हो जाएगी। सरकार का क्या कहना है सरकारी अधिकारियों का कहना है कि यह कदम महिला सशक्तिकरण और डिजिटल इंडिया की दिशा में बड़ा प्रयास है। स्मार्ट कार्ड से यह भी पता चल सकेगा कि कितनी महिलाएं रोजाना योजना का लाभ ले रही हैं, जिससे भविष्य की परिवहन नीतियों को बेहतर बनाया जा सकेगा। कब से होगा लागू फिलहाल यह योजना तैयारी के चरण में है। सरकार का लक्ष्य है कि 2026 से पिंक सहेली स्मार्ट कार्ड पूरी तरह लागू कर दिया जाए और धीरे-धीरे पिंक टिकट प्रणाली को बंद कर दिया जाए। कुल मिलाकर, दिल्ली की महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा अब और भी आसान, सुरक्षित और पारदर्शी होने जा रही है, लेकिन इसके लिए आधार से जुड़ी डिजिटल पहचान जरूरी होगी।
अरावली पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: नई परिभाषा पर स्वतः संज्ञान, CJI की अगुवाई में 3 जजों की पीठ आज करेगी सुनवाई
नई दिल्ली। देश की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक अरावली रेंज को लेकर जारी विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए एक बार फिर मामले की सुनवाई करने का फैसला किया है। मुख्य न्यायाधीश (CJI) की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ सोमवार को इस अहम मुद्दे पर सुनवाई करेगी। अदालत की यह पहल ऐसे समय में आई है, जब पर्यावरणविद और सामाजिक संगठन अरावली की प्रस्तावित नई परिभाषा को लेकर गंभीर चिंता जता रहे हैं। दरअसल, विवाद अरावली रेंज की उस नई परिभाषा को लेकर है, जिसमें 100 मीटर की ऊंचाई के मानदंड को आधार बनाया गया है। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इस मानक को लागू किया गया, तो अरावली के बड़े हिस्से को ‘पर्वतीय क्षेत्र’ की श्रेणी से बाहर कर दिया जाएगा। इससे उन इलाकों में खनन, निर्माण और औद्योगिक गतिविधियों का रास्ता साफ हो सकता है, जो अब तक संरक्षित माने जाते रहे हैं। पर्यावरणविदों की चिंता पर्यावरण कार्यकर्ताओं का तर्क है कि अरावली सिर्फ पहाड़ियों का समूह नहीं, बल्कि उत्तर भारत की पर्यावरणीय रीढ़ है। यह दिल्ली-एनसीआर और आसपास के क्षेत्रों में भूजल संरक्षण, प्रदूषण नियंत्रण और मरुस्थलीकरण रोकने में अहम भूमिका निभाती है। नई परिभाषा लागू होने से न केवल जैव विविधता को नुकसान पहुंचेगा, बल्कि भविष्य में जल संकट और प्रदूषण की समस्या भी गंभीर हो सकती है। पहले भी हो चुकी है सुनवाई अरावली से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट पहले भी सख्त रुख अपनाता रहा है। अदालत पूर्व में अवैध खनन और पर्यावरणीय नुकसान पर कड़ी टिप्पणियां कर चुकी है। ऐसे में मौजूदा स्वतः संज्ञान को विशेषज्ञ पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक अहम कदम मान रहे हैं। आज की सुनवाई पर टिकी निगाहें सोमवार को होने वाली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट यह तय कर सकता है कि * नई परिभाषा पर्यावरणीय दृष्टि से कितनी उचित है, * क्या 100 मीटर ऊंचाई का मानदंड वैज्ञानिक आधार पर सही है, * और क्या इससे अरावली के संरक्षण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। देशभर की नजरें अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिकी हैं, क्योंकि यह फैसला न सिर्फ अरावली रेंज, बल्कि भविष्य की पर्यावरण नीति के लिए भी दिशा तय कर सकता है।
जमुई में बड़ा रेल हादसा: बरुआ नदी पुल से गिरी सीमेंट लदी मालगाड़ी, झाझा–जसीडीह रूट पूरी तरह ठप
जमुई। बिहार के जमुई जिले में रविवार को एक भीषण रेल हादसा हो गया। झाझा–जसीडीह रेलखंड पर टेलवा हॉल्ट के पास बरुआ नदी पुल पर सीमेंट से लदी एक मालगाड़ी के 19 डिब्बे पटरी से उतर गए। इनमें से 10 डिब्बे सीधे पुल से नीचे नदी किनारे जा गिरे, जिससे इलाके में अफरा-तफरी मच गई। हादसे के बाद अप और डाउन दोनों लाइनें पूरी तरह बंद कर दी गई हैं। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, मालगाड़ी तेज आवाज के साथ अचानक बेपटरी हुई और कुछ ही सेकंड में कई डिब्बे पुल से नीचे गिर गए। डिब्बों के गिरने से पटरियां बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गईं, जिससे इस महत्वपूर्ण रेल रूट पर ट्रेनों की आवाजाही पूरी तरह ठप हो गई है। हादसे का असर यात्री ट्रेनों पर भी साफ दिख रहा है। इस रूट से गुजरने वाली कई एक्सप्रेस और पैसेंजर ट्रेनों को अलग-अलग स्टेशनों पर रोक दिया गया है, जबकि कुछ ट्रेनों को वैकल्पिक मार्गों से चलाने की तैयारी की जा रही है। यात्रियों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। घटना की सूचना मिलते ही रेलवे के वरिष्ठ अधिकारी, इंजीनियरिंग टीम और राहत व बचाव दल मौके पर पहुंच गए। क्रेन और अन्य भारी मशीनों की मदद से डिब्बों को हटाने और ट्रैक की मरम्मत का काम शुरू कर दिया गया है। रेलवे प्रशासन का कहना है कि पहले प्राथमिकता अप और डाउन लाइन को जल्द से जल्द बहाल करने की है, हालांकि इसमें कई घंटे से लेकर एक-दो दिन तक का समय लग सकता है। फिलहाल हादसे में किसी के हताहत होने की सूचना नहीं है, जो राहत की बात है। रेलवे ने घटना की जांच के आदेश दे दिए हैं। प्रारंभिक तौर पर तकनीकी खराबी या ट्रैक में समस्या को हादसे की वजह माना जा रहा है, लेकिन जांच के बाद ही असली कारण स्पष्ट हो पाएगा। रेलवे प्रशासन ने यात्रियों से अपील की है कि यात्रा से पहले ट्रेन की स्थिति की जानकारी जरूर लें और अनावश्यक यात्रा से फिलहाल बचें।
नए साल से पहले थमेगा यूक्रेन युद्ध? ट्रंप–जेलेंस्की की अहम मुलाकात आज, 20 सूत्रीय शांति योजना पर मंथन
वॉशिंगटन/फ्लोरिडा। रूस-यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने की दिशा में आज एक अहम कूटनीतिक पहल देखने को मिल सकती है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की के बीच आज फ्लोरिडा में उच्चस्तरीय मुलाकात होने जा रही है। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य लगभग तीन साल से जारी युद्ध को खत्म करने के लिए ठोस रणनीति तैयार करना है। दोनों नेताओं के बीच 20 सूत्रीय शांति योजना पर विस्तार से चर्चा होने की संभावना है। क्या नए साल से पहले रुक पाएगा युद्ध? दुनियाभर की नजरें इस मुलाकात पर टिकी हैं। अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि अगर अमेरिका और यूक्रेन किसी साझा रोडमैप पर सहमत होते हैं, तो नए साल से पहले युद्धविराम की दिशा में ठोस कदम उठाए जा सकते हैं। हालांकि, रूस की सहमति और उसकी शर्तें इस पूरी प्रक्रिया में निर्णायक भूमिका निभाएंगी। 20 सूत्रीय शांति योजना में क्या हो सकता है शामिल? सूत्रों के मुताबिक, प्रस्तावित शांति योजना में कई अहम बिंदु शामिल हो सकते हैं, जिनमें— * तत्काल युद्धविराम और संघर्षविराम की समय-सीमा * विवादित क्षेत्रों में सैन्य गतिविधियों पर रोक * यूक्रेन की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता की गारंटी * रूस पर लगे प्रतिबंधों में चरणबद्ध ढील या समीक्षा * अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों की तैनाती * युद्ध से प्रभावित इलाकों के पुनर्निर्माण में आर्थिक सहायता किन मुद्दों पर होगी ट्रंप–जेलेंस्की में बात? बैठक में अमेरिका द्वारा यूक्रेन को दी जा रही सैन्य और आर्थिक मदद, नाटो की भूमिका, यूरोपीय देशों का समर्थन और रूस के साथ संभावित बातचीत के रास्तों पर भी चर्चा होने की उम्मीद है। इसके अलावा, ट्रंप की यह रणनीति भी अहम मानी जा रही है कि वह किस तरह रूस को बातचीत की मेज पर लाने की कोशिश करेंगे। वैश्विक राजनीति पर पड़ेगा असर यदि इस बैठक से कोई ठोस नतीजा निकलता है, तो इसका असर सिर्फ रूस और यूक्रेन तक सीमित नहीं रहेगा। यूरोप की सुरक्षा व्यवस्था, वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय राजनीति की दिशा भी इससे प्रभावित हो सकती है। उम्मीद और संशय दोनों बरकरार हालांकि शांति की कोशिशें तेज हुई हैं, लेकिन जमीनी हकीकत और रूस-यूक्रेन के बीच गहरे मतभेदों को देखते हुए रास्ता आसान नहीं माना जा रहा। फिर भी, ट्रंप और जेलेंस्की की यह मुलाकात युद्ध समाप्ति की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है। अब देखना यह होगा कि क्या यह कूटनीतिक पहल नए साल से पहले युद्ध पर विराम लगाने में सफल हो पाती है या नहीं।
बांग्लादेश में जेम्स के शो में हिंसा, पथराव के बाद फरीदपुर कॉन्सर्ट रद्द; कई दर्शक घायल
फरीदपुर (बांग्लादेश)। बांग्लादेश के मशहूर रॉक सिंगर जेम्स का फरीदपुर में प्रस्तावित कॉन्सर्ट उस समय रद्द करना पड़ा, जब कार्यक्रम स्थल पर अचानक हिंसा भड़क उठी। एक स्कूल की वर्षगांठ के मौके पर आयोजित इस कार्यक्रम में बेकाबू भीड़ ने ईंट-पत्थर फेंकने शुरू कर दिए, जिससे कई दर्शक और आयोजन से जुड़े लोग घायल हो गए। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, कार्यक्रम शुरू होने से पहले ही भीड़ का दबाव बढ़ता जा रहा था। किसी बात को लेकर हुई कहासुनी देखते ही देखते झड़प में बदल गई और माहौल तनावपूर्ण हो गया। पथराव के कारण मंच के आसपास मौजूद लोगों में अफरा-तफरी मच गई और लोग सुरक्षित स्थानों की ओर भागने लगे। हालात बिगड़ते देख आयोजकों ने तुरंत कॉन्सर्ट रद्द करने का फैसला लिया। सूचना मिलने पर पुलिस और प्रशासन की टीम मौके पर पहुंची और स्थिति को नियंत्रित किया। घायलों को इलाज के लिए नजदीकी अस्पतालों में भर्ती कराया गया है। पुलिस ने बताया कि घटना की जांच की जा रही है और उपद्रवियों की पहचान कर कानूनी कार्रवाई की जाएगी। कॉन्सर्ट रद्द होने से जेम्स के प्रशंसकों में निराशा का माहौल है। वहीं प्रशासन ने भविष्य में ऐसे बड़े कार्यक्रमों के दौरान सुरक्षा और भीड़ नियंत्रण को लेकर सख्त इंतजाम करने की बात कही है।
यूपी में वोटर लिस्ट का अब तक का सबसे बड़ा शुद्धिकरण अभियान: 2.89 करोड़ नाम कटने की आशंका
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची को त्रुटिरहित और पारदर्शी बनाने के लिए चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। प्रारंभिक रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश में करीब 2.89 करोड़ मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाए जाने की प्रक्रिया में हैं। यह कदम आगामी चुनावों को देखते हुए चुनाव आयोग की ओर से उठाया गया है, ताकि मतदान सूची में केवल पात्र और जीवित मतदाताओं के नाम ही दर्ज रहें। कैसे सामने आए ये आंकड़े? चुनाव आयोग के निर्देश पर राज्यभर में बूथ लेवल ऑफिसरों (BLO) द्वारा घर-घर सर्वे कराया गया। इस दौरान मतदाताओं की भौतिक सत्यापन प्रक्रिया की गई, आधार, मृत्यु प्रमाण पत्र, स्थानांतरण और फार्म जमा करने की स्थिति का मिलान किया गया। इसी सर्वे के आधार पर लाखों नाम संदिग्ध या अपात्र की श्रेणी में पाए गए। अलग-अलग कारणों से कटने वाले नामों का विवरण सर्वे और दस्तावेजी जांच के बाद सामने आए आंकड़ों के अनुसार— * 46 लाख मतदाताओं की मृत्यु हो चुकी है, लेकिन उनके नाम अब भी सूची में दर्ज थे। * 1.26 करोड़ मतदाता रोजगार, शिक्षा या अन्य कारणों से स्थायी रूप से दूसरी जगह स्थानांतरित हो चुके हैं। * 23.70 लाख नाम डुप्लीकेट पाए गए, यानी एक ही व्यक्ति का नाम एक से अधिक जगह दर्ज था। * 83.73 लाख मतदाता सर्वे के दौरान घर पर मौजूद नहीं मिले, जिससे उनका सत्यापन नहीं हो सका। * 9.57 लाख मतदाताओं ने निर्धारित समय में आवश्यक फार्म जमा नहीं किए, जिसके कारण उनकी स्थिति स्पष्ट नहीं हो पाई। इन सभी श्रेणियों को मिलाकर कुल संख्या करीब 2.89 करोड़ तक पहुंच रही है। आगे क्या होगी प्रक्रिया? चुनाव आयोग के अधिकारियों के मुताबिक, इन सभी नामों को तुरंत नहीं हटाया जाएगा। पहले संबंधित मतदाताओं को आपत्ति दर्ज कराने और दस्तावेज प्रस्तुत करने का मौका दिया जाएगा। अंतिम सूची प्रकाशित होने से पहले— * दावे और आपत्तियों की सुनवाई होगी, * ऑनलाइन और ऑफलाइन सुधार का अवसर दिया जाएगा, * और उसके बाद ही नाम हटाने या बरकरार रखने का अंतिम फैसला होगा। मतदाताओं के लिए जरूरी सलाह चुनाव आयोग ने आम मतदाताओं से अपील की है कि वे— * NVSP पोर्टल या वोटर हेल्पलाइन ऐप पर जाकर अपना नाम जरूर जांचें, * किसी गलती की स्थिति में समय रहते फार्म-6 (नया नाम जोड़ने), फार्म-7 (नाम हटाने), फार्म-8 (संशोधन) भरें, * और अपने क्षेत्र के BLO से संपर्क करें। राजनीतिक प्रतिक्रिया और महत्व इतनी बड़ी संख्या में संभावित नाम कटने को लेकर राजनीतिक दलों में भी चर्चाएं तेज हैं। कुछ दल इसे मतदाता अधिकारों से जोड़कर देख रहे हैं, जबकि चुनाव आयोग का कहना है कि यह प्रक्रिया पूरी तरह नियमबद्ध, निष्पक्ष और पारदर्शी है। लोकतंत्र के लिए अहम कदम विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह अभियान सही तरीके से पूरा हुआ तो * फर्जी मतदान पर रोक लगेगी, * मतदान प्रतिशत की वास्तविक तस्वीर सामने आएगी, * और चुनाव परिणामों की विश्वसनीयता बढ़ेगी। कुल मिलाकर, यूपी में चल रहा यह SIR अभियान न सिर्फ राज्य बल्कि देश के सबसे बड़े लोकतांत्रिक अभ्यास से जुड़ा एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, जिसमें मतदाताओं की सक्रिय भागीदारी बेहद जरूरी है।
तारिक रहमान की घर वापसी से बदलेगा सियासी संतुलन? भारत-बांग्लादेश रिश्तों पर दिख सकता है नया असर
ढाका/नई दिल्ली: बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के वरिष्ठ नेता और पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के पुत्र तारिक रहमान की संभावित वतन वापसी को देश की राजनीति में एक बड़े सियासी घटनाक्रम के रूप में देखा जा रहा है। लंबे समय से विदेश में रह रहे तारिक रहमान की वापसी न केवल बांग्लादेश के आंतरिक राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित कर सकती है, बल्कि इसका सीधा असर भारत-बांग्लादेश के द्विपक्षीय संबंधों पर भी पड़ने की संभावना जताई जा रही है। विपक्ष को मिल सकती है नई धार राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, तारिक रहमान की सक्रिय राजनीति में वापसी से BNP को नई मजबूती मिल सकती है। वर्तमान राजनीतिक माहौल में विपक्ष बिखरा हुआ नजर आता है, ऐसे में तारिक रहमान की मौजूदगी पार्टी को संगठित कर सकती है और सरकार के खिलाफ आंदोलन को नई दिशा दे सकती है। इससे आने वाले चुनावों में सत्तारूढ़ अवामी लीग के लिए चुनौती बढ़ सकती है। भारत की चिंता और कूटनीतिक संतुलन भारत के लिए तारिक रहमान की वापसी अहम है, क्योंकि BNP के शासनकाल में दोनों देशों के रिश्तों में कई बार तनाव देखा गया था। सीमा सुरक्षा, आतंकवाद और उत्तर-पूर्व भारत में उग्रवादी गतिविधियों को लेकर नई दिल्ली की चिंताएं बढ़ी थीं। हालांकि मौजूदा अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में यह भी माना जा रहा है कि सत्ता में आने की स्थिति में BNP भारत के साथ व्यावहारिक और संतुलित संबंध बनाए रखने की कोशिश कर सकती है। क्षेत्रीय राजनीति पर भी नजर दक्षिण एशिया में चीन के बढ़ते प्रभाव और अमेरिका की सक्रियता के बीच बांग्लादेश की राजनीति में कोई भी बड़ा बदलाव क्षेत्रीय संतुलन को प्रभावित करता है। तारिक रहमान की वापसी से बांग्लादेश की विदेश नीति की प्राथमिकताओं में बदलाव संभव है, जिसका असर भारत सहित पूरे क्षेत्र पर पड़ सकता है। आगे क्या? कुल मिलाकर, तारिक रहमान की वतन वापसी बांग्लादेश की राजनीति में नया मोड़ ला सकती है। यह देखना दिलचस्प होगा कि उनकी वापसी राजनीतिक स्थिरता को मजबूत करती है या फिर भारत-बांग्लादेश संबंधों समेत क्षेत्रीय राजनीति में नई चुनौतियां खड़ी करती है।
नन्हे कंधों पर बड़ी जिम्मेदारी: ऑपरेशन सिंदूर में सैनिकों की प्यास बुझाने वाले 10 वर्षीय श्रवण को मिला राष्ट्रपति का बाल पुरस्कार
नई दिल्ली/फिरोजपुर: देशभक्ति उम्र की मोहताज नहीं होतीइस कहावत को पंजाब के फिरोजपुर जिले के दस वर्षीय श्रवण (शवन) सिंह ने सच कर दिखाया है। सीमावर्ती इलाके में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सेना के जवानों के लिए पानी, दूध, चाय और लस्सी पहुंचाकर उसने असाधारण साहस और संवेदनशीलता का परिचय दिया। उसके इसी जज़्बे को सलाम करते हुए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने श्रवण सिंह को प्रधानमंत्री राष्ट्रीय बाल पुरस्कार से सम्मानित किया। सीमा पर सेवा का संकल्प ऑपरेशन सिंदूर के दौरान जब सीमा पर तनावपूर्ण हालात थे और सैनिक दिन-रात डटे हुए थे, तब श्रवण ने अपनी छोटी-सी उम्र के बावजूद बड़ा फैसला लिया। वह रोज़ाना सैनिकों तक ठंडा पानी, दूध और लस्सी पहुंचाता रहा। भीषण गर्मी और जोखिम भरे माहौल में उसका यह प्रयास जवानों के लिए राहत और मनोबल बढ़ाने वाला साबित हुआ। जोखिम के बीच इंसानियत सीमावर्ती क्षेत्र होने के कारण हालात आसान नहीं थे, लेकिन श्रवण ने किसी डर को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। स्थानीय लोगों के सहयोग से वह जरूरत का सामान जुटाता और सीमा पर तैनात जवानों तक पहुंचाता रहा। सैनिकों ने भी उसकी हिम्मत और सेवा भावना की खुले दिल से सराहना की। राष्ट्रपति ने किया सम्मानित नई दिल्ली में आयोजित सम्मान समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने श्रवण सिंह को प्रधानमंत्री राष्ट्रीय बाल पुरस्कार प्रदान किया। राष्ट्रपति ने कहा कि श्रवण जैसे बच्चे देश के लिए प्रेरणा हैं और उनका साहस, करुणा व नागरिक कर्तव्यबोध आने वाली पीढ़ियों को मार्ग दिखाता है। परिवार और गांव में खुशी पुरस्कार मिलने की खबर से श्रवण के परिवार और गांव में खुशी की लहर दौड़ गई। परिजनों ने कहा कि उन्होंने बेटे को हमेशा दूसरों की मदद करना सिखाया है, लेकिन इस तरह का राष्ट्रीय सम्मान मिलना पूरे क्षेत्र के लिए गर्व की बात है।
RJD के सभी 25 विधायक BJP में होंगे शामिल! बिहार के मंत्री रामकृपाल यादव का बड़ा दावा, तेजस्वी यादव पर साधा निशाना
पटना: बिहार की राजनीति में एक बार फिर बयानबाजी तेज हो गई है। राज्य के मंत्री रामकृपाल यादव ने राष्ट्रीय जनता दल (RJD) को लेकर बड़ा दावा करते हुए कहा है कि पार्टी के सभी 25 विधायक जल्द ही भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल होंगे। उनके इस बयान के बाद सियासी गलियारों में हलचल मच गई है और विपक्ष ने इसे राजनीतिक दबाव की रणनीति करार दिया है। रामकृपाल यादव ने मीडिया से बातचीत में कहा कि RJD के विधायक पार्टी की आंतरिक कलह और नेतृत्व से असंतुष्ट हैं। उन्होंने दावा किया कि आने वाले समय में RJD में टूट देखने को मिलेगी और उसके सभी विधायक BJP का दामन थामेंगे। मंत्री के इस बयान को आगामी राजनीतिक समीकरणों से जोड़कर देखा जा रहा है। तेजस्वी यादव पर तंज मंत्री रामकृपाल यादव ने RJD नेता तेजस्वी यादव पर भी तीखा तंज कसा। उन्होंने कहा कि तेजस्वी सिर्फ बयानबाजी की राजनीति करते हैं, जबकि जमीनी स्तर पर उनका संगठन कमजोर हो चुका है। रामकृपाल यादव के मुताबिक, तेजस्वी यादव अपने विधायकों को साथ रखने में नाकाम रहे हैं और यही वजह है कि पार्टी में असंतोष बढ़ता जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि RJD अब सिर्फ परिवारवाद और खोखले वादों की पार्टी बनकर रह गई है, जिससे विधायक और कार्यकर्ता दोनों ही निराश हैं। राजनीतिक हलकों में तेज प्रतिक्रिया रामकृपाल यादव के इस बयान के बाद RJD की ओर से कड़ी प्रतिक्रिया आने की संभावना है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान बिहार की राजनीति में दबाव बनाने और विपक्ष को घेरने की रणनीति का हिस्सा हो सकता है। वहीं RJD समर्थकों का कहना है कि यह दावा पूरी तरह बेबुनियाद और भ्रामक है। फिलहाल रामकृपाल यादव के इस बड़े दावे ने बिहार की सियासत को गरमा दिया है और अब सबकी निगाहें RJD की आधिकारिक प्रतिक्रिया और आने वाले राजनीतिक घटनाक्रम पर टिकी हुई हैं।
‘आदमी से जीत सकता हूं, मशीन से नहीं’—चुनाव हारने के बाद खेसारी लाल यादव का बड़ा बयान, फिर गरमाई सियासत
बिहार/ सारण: छपरा विधानसभा सीट से चुनाव हारने के बाद भोजपुरी सुपरस्टार और प्रत्याशी खेसारी लाल यादव का एक बयान एक बार फिर राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है। हार के बाद मीडिया से बातचीत में खेसारी ने कहा, “मैं आदमी से जीत सकता हूं, लेकिन मशीन से नहीं।” उनके इस बयान को लेकर सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक मंचों तक बहस तेज हो गई है। खेसारी लाल यादव ने स्पष्ट किया कि उनका राजनीति में आने का कोई पूर्व नियोजित इरादा नहीं था। उन्होंने कहा कि परिस्थितियां ऐसी बनीं कि उन्हें चुनावी मैदान में उतरना पड़ा। इस दौरान उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि चुनाव ने उन्हें बहुत कुछ सिखाया—खासकर यह कि कौन अपना है और कौन पराया। ‘चुनाव ने पहचान करा दी’ खेसारी ने कहा कि चुनाव के दौरान उन्हें कई तरह के अनुभव हुए। कुछ लोग जो शुरुआत में साथ नजर आ रहे थे, वे वक्त आने पर पीछे हट गए, जबकि कुछ ऐसे लोग भी सामने आए जिन्होंने बिना किसी स्वार्थ के उनका साथ दिया। उन्होंने कहा, “यह चुनाव मेरे लिए सिर्फ हार-जीत का सवाल नहीं था, बल्कि रिश्तों और भरोसे की परीक्षा भी थी।” ईवीएम पर इशारों में सवाल अपने बयान में खेसारी ने भले ही सीधे तौर पर ईवीएम पर आरोप न लगाया हो, लेकिन ‘मशीन से नहीं जीत सकता’ कहकर उन्होंने चुनावी प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए। उनके समर्थकों का कहना है कि खेसारी को जनता का समर्थन मिला, लेकिन परिणाम उनके पक्ष में नहीं गया। वहीं, विपक्षी दल इस बयान को हार की हताशा बता रहे हैं। राजनीति को लेकर आगे क्या? भविष्य की राजनीति को लेकर पूछे गए सवाल पर खेसारी लाल यादव ने फिलहाल कोई ठोस ऐलान नहीं किया। उन्होंने कहा कि वह जनता के बीच रहेंगे और अपने काम के जरिए लोगों से जुड़े रहेंगे। “राजनीति में रहना है या नहीं, यह वक्त बताएगा। अभी मैं अपनी जनता और अपने काम पर ध्यान दूंगा,” उन्होंने कहा। सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं खेसारी का यह बयान सामने आते ही सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। समर्थक जहां इसे सिस्टम पर सवाल उठाने वाला साहसिक बयान बता रहे हैं, वहीं आलोचक इसे चुनावी हार का बहाना करार दे रहे हैं। कुल मिलाकर, चुनाव हारने के बाद खेसारी लाल यादव का यह बयान न सिर्फ चर्चा में है, बल्कि आने वाले दिनों में बिहार की राजनीति में नई बहस को भी जन्म दे सकता है।