बिहार में सामाजिक न्याय की बड़ी पहल: SC-ST छात्रों की प्री-मैट्रिक छात्रवृत्ति दोगुनी, 33 लाख बच्चों को मिलेगा सीधा लाभ

पटना। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अध्यक्षता में गुरुवार को हुई राज्य मंत्रिपरिषद की अहम बैठक में कुल 31 महत्वपूर्ण प्रस्तावों पर मुहर लगी। इन फैसलों में सबसे ज्यादा चर्चा का विषय रहा अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) कल्याण विभाग का वह निर्णय, जिसके तहत प्री-मैट्रिक छात्रवृत्ति की दरों में ऐतिहासिक बढ़ोतरी की गई है। यह संशोधित दरें वित्तीय वर्ष 2025-26 से लागू होंगी और इसका सीधा लाभ राज्य के लाखों वंचित छात्र-छात्राओं को मिलेगा। 2011 की दरों से राहत, अब महंगाई के अनुरूप सहायता सरकार ने 2011 से चली आ रही पुरानी छात्रवृत्ति दरों को मौजूदा महंगाई और शैक्षणिक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए लगभग दोगुना कर दिया है। नई व्यवस्था के तहत: कक्षा 1 से 5: ₹1200 वार्षिक कक्षा 6 से 8: ₹2400 वार्षिक कक्षा 9 से 10: ₹3600 वार्षिक छात्रावास में रहने वाले कक्षा 1 से 10 तक के छात्र: ₹6000 वार्षिक इस योजना का लाभ सरकारी स्कूलों और मान्यता प्राप्त/स्वीकृत संस्थानों में पढ़ने वाले SC-ST छात्र-छात्राओं को मिलेगा। 519.64 करोड़ रुपये का सालाना निवेश राज्य सरकार ने इस योजना के लिए 519.64 करोड़ रुपये के वार्षिक व्यय को स्वीकृति दी है। अनुमान है कि इससे करीब 27 से 33 लाख छात्र-छात्राएं सीधे तौर पर लाभान्वित होंगे। यह राशि बच्चों को किताबें, यूनिफॉर्म, स्टेशनरी जैसी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में मदद करेगी। सरकारी अधिकारियों का कहना है कि इस फैसले का मुख्य उद्देश्य ड्रॉपआउट दर को कम करना और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों को शिक्षा से जोड़े रखना है। पिछड़ा और अति पिछड़ा वर्ग छात्रावास अनुदान भी दोगुना कैबिनेट बैठक में पिछड़ा वर्ग और अत्यंत पिछड़ा वर्ग छात्रावास अनुदान योजना में भी बड़ी राहत दी गई। अब तक मिलने वाले ₹1000 मासिक अनुदान को बढ़ाकर ₹2000 प्रति माह कर दिया गया है। लाभार्थी: करीब 8150 छात्र-छात्राएं वार्षिक वित्तीय भार: 19.56 करोड़ रुपये लागू होने की तिथि: 1 जनवरी 2026 शिक्षा के जरिए सामाजिक न्याय की मजबूत नींव कैबिनेट ने छात्रवृत्ति संशोधन को तत्काल प्रभावी बनाने के निर्देश दिए हैं। जानकारों का मानना है कि यह फैसला न केवल शिक्षा में समान अवसर सुनिश्चित करेगा, बल्कि सामाजिक न्याय और समावेशी विकास की दिशा में बिहार सरकार का एक मजबूत संदेश भी है। बैठक में इसके अलावा विकास योजनाओं, प्रशासनिक सुधारों और जनकल्याणकारी कार्यक्रमों से जुड़े अन्य प्रस्तावों पर भी विस्तार से चर्चा हुई।

कांग्रेस में एकजुटता का संकेत: राहुल–खड़गे–थरूर की बंद कमरे में अहम बैठक, सियासी संदेश साफ

नई दिल्ली। कांग्रेस के भीतर अंदरूनी मतभेदों की चर्चाओं के बीच वरिष्ठ नेता शशि थरूर की राहुल गांधी और पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से संसद परिसर में बंद कमरे में मुलाकात ने राजनीतिक हलकों में हलचल तेज कर दी है। करीब आधे घंटे तक चली इस पॉवर मीटिंग को बजट सत्र और केरल विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी में एकजुटता के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक, बैठक में मौजूदा संसदीय रणनीति, विपक्ष की भूमिका को धार देने और संगठनात्मक समन्वय पर चर्चा हुई। खासतौर पर ऐसे समय में जब कांग्रेस के भीतर विचारों और नेतृत्व शैली को लेकर अलग-अलग स्वर सुनाई दे रहे हैं, यह मुलाकात पार्टी नेतृत्व की एकजुट छवि पेश करने की कोशिश मानी जा रही है। बजट सत्र और चुनावी तैयारी पर फोकस बैठक का समय भी अहम माना जा रहा है। संसद का बजट सत्र अपने निर्णायक मोड़ पर है और केरल चुनाव कांग्रेस के लिए प्रतिष्ठा की लड़ाई बने हुए हैं। ऐसे में राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे और शशि थरूर का एक साथ बैठना यह संकेत देता है कि पार्टी रणनीतिक स्तर पर मतभेदों को पीछे छोड़कर साझा एजेंडे पर आगे बढ़ना चाहती है। संदेश साफ—एकजुट कांग्रेस राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बैठक सिर्फ औपचारिक संवाद नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर और बाहर यह संदेश देने की कोशिश है कि कांग्रेस नेतृत्व एकजुट है और आने वाली चुनौतियों के लिए तैयार है। शशि थरूर जैसे अनुभवी नेता की सक्रिय भूमिका को संगठनात्मक संतुलन और चुनावी रणनीति के लिहाज से भी अहम माना जा रहा है। हालांकि बैठक की आधिकारिक जानकारी साझा नहीं की गई, लेकिन इसके संकेत स्पष्ट हैं—कांग्रेस नेतृत्व मतभेदों पर विराम लगाकर संसद और चुनावी मैदान, दोनों में मजबूती से उतरने की तैयारी कर रहा है। आने वाले दिनों में यह एकजुटता कितनी असरदार साबित होती है, इस पर सबकी नजरें टिकी हैं।

आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 का संकेत: अमेरिका से व्यापार समझौता बन सकता है भारत की ग्रोथ का गेमचेंजर

नई दिल्ली। संसद में पेश आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 ने साफ शब्दों में संकेत दिया है कि चालू वित्त वर्ष में भारत की अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ा सकारात्मक कारक अमेरिका के साथ प्रस्तावित व्यापार समझौते का पूरा होना हो सकता है। ऐसे समय में जब वैश्विक अर्थव्यवस्था व्यापार युद्धों, ऊंचे टैरिफ और अनिश्चित नीतियों से जूझ रही है, भारत-अमेरिका के बीच संभावित समझौता देश के लिए रणनीतिक और आर्थिक दोनों दृष्टि से बेहद अहम माना जा रहा है। वैश्विक अनिश्चितता में भारत को राहत की उम्मीद सर्वेक्षण के अनुसार, भारत और अमेरिका के बीच चल रही व्यापार वार्ताएं इसी वर्ष निष्कर्ष तक पहुंच सकती हैं। इससे वैश्विक व्यापार में व्याप्त अनिश्चितता कुछ हद तक कम होगी और भारतीय निर्यात, निवेश तथा कारोबारी भरोसे को मजबूती मिलेगी। सर्वेक्षण मानता है कि यह समझौता ऐसे दौर में भारत के लिए ढाल का काम करेगा, जब दुनिया के कई बड़े देश संरक्षणवादी नीतियों की ओर बढ़ रहे हैं। एफटीए की दिशा में तेज कदम आर्थिक सर्वेक्षण में यह भी रेखांकित किया गया है कि भारत ने हाल के वर्षों में मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) की दिशा में सक्रियता बढ़ाई है। न्यूजीलैंड और यूरोपीय संघ के साथ हुए समझौते इसी रणनीति का हिस्सा हैं। सरकार का मानना है कि इन समझौतों से भारतीय उद्योगों को नए बाजार मिलेंगे और वैश्विक सप्लाई चेन में भारत की भूमिका मजबूत होगी। ‘समायोजन का वर्ष’ होगा अगला वित्त वर्ष सर्वेक्षण ने अगले वित्त वर्ष को “समायोजन का वर्ष” बताया है। इसका अर्थ है कि अब तक लागू किए गए नियमों और सुधारों का असर जमीन पर दिखने लगेगा। कंपनियां और उपभोक्ता नई नीतियों के अनुरूप खुद को ढालेंगे, जिससे घरेलू मांग और निवेश पर सकारात्मक प्रभाव पड़ने की उम्मीद है। सर्वेक्षण यह भी संकेत देता है कि सरकार सुधारों को लागू करने की रफ्तार बनाए रखने के मूड में है। महंगाई और सीपीआई पर सतर्क नजर आर्थिक सर्वेक्षण में मूल्य सूचकांक (सीपीआई) के नए आधार वर्ष का भी जिक्र किया गया है। इसके चलते महंगाई के आकलन में कुछ बदलाव आ सकते हैं, जिस पर सतर्क नजर रखने की जरूरत बताई गई है। सरकार और नीति-निर्माताओं के लिए यह संकेत है कि आंकड़ों की व्याख्या करते समय अतिरिक्त सावधानी जरूरी होगी। 7% के करीब पहुंची विकास क्षमता सर्वेक्षण का आकलन है कि बीते वर्षों में किए गए संरचनात्मक और नीतिगत सुधारों के संयुक्त प्रभाव से भारत की मध्यम अवधि की विकास क्षमता लगभग 7 प्रतिशत तक पहुंच गई है। मजबूत घरेलू मांग, निवेश में स्थिरता और आंतरिक अर्थव्यवस्था की मजबूती विकास को लेकर सकारात्मक माहौल बनाए हुए हैं। इन्हीं आधारों पर वित्त वर्ष 2027 में वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर 6.8 से 7.2 प्रतिशत के बीच रहने का अनुमान जताया गया है। आत्मविश्वास के साथ सतर्कता का संदेश कुल मिलाकर आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 यह संदेश देता है कि भारत को अपनी आर्थिक दिशा को लेकर आत्मविश्वास रखना चाहिए, लेकिन वैश्विक जोखिमों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। सुधारों की निरंतरता, घरेलू मजबूती और अमेरिका जैसे प्रमुख साझेदार के साथ संभावित व्यापार समझौते के सहारे भारतीय अर्थव्यवस्था स्थिर, संतुलित और टिकाऊ विकास की राह पर आगे बढ़ती दिखाई दे रही है।

UGC के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त

सुनवाई के दौरान केंद्र को कमेटी बनाने का आदेश, नियमों पर अस्थायी रोक नई दिल्ली। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा हाल ही में लागू किए गए नए नियमों को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत में अहम सुनवाई शुरू हो गई है। इन नियमों के खिलाफ दाखिल याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को कमेटी गठित करने का निर्देश दिया है और साथ ही कहा है कि “हम इस पर रोक लगा रहे हैं।” सुप्रीम कोर्ट का यह रुख उन लाखों छात्रों, शिक्षकों और शिक्षण संस्थानों के लिए राहत के रूप में देखा जा रहा है, जो UGC के नए नियमों को लेकर आशंकित और नाराज़ थे। क्या है मामला? UGC के नए नियमों को लेकर आरोप है कि वे **शिक्षा व्यवस्था की स्वायत्तता, छात्रों के अधिकारों और विश्वविद्यालयों की कार्यप्रणाली पर प्रतिकूल असर डाल सकते हैं। कई शैक्षणिक संगठनों और याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इन नियमों को लागू करने से पहले न तो पर्याप्त परामर्श किया गया और न ही सभी पक्षों की राय ली गई। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से स्पष्ट शब्दों में कहा कि इतने संवेदनशील विषय पर एकतरफा फैसला स्वीकार्य नहीं है। अदालत ने निर्देश दिया कि केंद्र सरकार एक स्वतंत्र और संतुलित कमेटी का गठन करे कमेटी सभी हितधारकों—छात्रों, शिक्षकों और विश्वविद्यालयों—की राय सुने तब तक इन नियमों को लागू नहीं किया जाएगा। अदालत ने कहा कि शिक्षा से जुड़े फैसलों में पारदर्शिता और सहमति बेहद ज़रूरी है। छात्रों और शिक्षकों में राहत सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद देशभर के छात्र संगठनों और शिक्षक संघों ने राहत की सांस ली है। उनका कहना है कि अदालत का हस्तक्षेप यह सुनिश्चित करेगा कि शिक्षा नीति मनमाने ढंग से नहीं बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत तय हो। अब सबकी नजर केंद्र सरकार द्वारा बनाई जाने वाली कमेटी पर है। यह कमेटी अपनी रिपोर्ट सौंपेगी, जिसके आधार पर आगे का फैसला लिया जाएगा। तब तक UGC के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट की रोक जारी रहेगी।

भारत का UPI: अब सिर्फ एक ऐप नहीं, बल्कि ग्लोबल डिजिटल पावर

जिस डिजिटल क्रांति ने भारत की गलियों, ठेलों और छोटे दुकानों को कैशलेस बना दिया, वही यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) अब अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की तकनीकी ताकत का प्रतीक बनता जा रहा है। हाल ही में जापान में UPI के ट्रायल की शुरुआत ने यह साफ कर दिया है कि भारत का डिजिटल पेमेंट सिस्टम अब केवल घरेलू जरूरत नहीं, बल्कि वैश्विक समाधान के रूप में देखा जा रहा है। दुकान से दुनिया तक का सफ़र कुछ साल पहले तक भारत में डिजिटल पेमेंट को लेकर संदेह था—इंटरनेट, स्मार्टफोन और सुरक्षा को लेकर सवाल उठते थे। लेकिन UPI ने इन तमाम आशंकाओं को पीछे छोड़ दिया। आज सब्ज़ी वाले से लेकर बड़े मॉल, टैक्सी ड्राइवर से लेकर ऑनलाइन शॉपिंग तक—एक QR कोड और मोबाइल फोन ने लेन-देन की पूरी तस्वीर बदल दी है। UPI की सबसे बड़ी ताकत उसकी सरलता, रफ्तार और भरोसा है। बिना कार्ड, बिना वॉलेट और बिना लंबी प्रक्रिया—सीधे बैंक से बैंक ट्रांजैक्शन। यही मॉडल अब दुनिया को आकर्षित कर रहा है। जापान में ट्रायल: भारत की टेक्नोलॉजी को वैश्विक मान्यता जापान जैसे तकनीकी रूप से उन्नत देश में UPI का ट्रायल शुरू होना अपने आप में बड़ी बात है। यह संकेत है कि भारत का डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर अब केवल “यूज़र बेस” के कारण नहीं, बल्कि टेक्नोलॉजिकल क्वालिटी और स्केलेबिलिटी के कारण अपनाया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह ट्रायल सफल रहता है, तो भविष्य में भारतीय पर्यटक जापान में भी उसी तरह UPI से भुगतान कर सकेंगे, जैसे वे भारत में करते हैं—बिना करेंसी एक्सचेंज की झंझट के। डिजिटल डिप्लोमेसी का नया चेहरा UPI अब सिर्फ एक पेमेंट सिस्टम नहीं रहा। यह भारत की डिजिटल डिप्लोमेसी का अहम हिस्सा बन चुका है। पहले जहां भारत सॉफ्टवेयर सर्विसेज के लिए जाना जाता था, अब वह डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) के लिए पहचाना जा रहा है। आज कई देश भारत के UPI मॉडल को अपनाने या उससे सीखने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। यह भारत के लिए आर्थिक ही नहीं, रणनीतिक बढ़त भी है।

न झगड़ा, न कोर्ट-कचहरी… क्या है ‘क्वाइट डिवोर्स’, जिसे लोग चुपचाप अपना रहे हैं?

डिजिटल डेस्क | लाइफस्टाइल : आजकल रिश्तों में एक नया शब्द सुनने को मिल रहा है—‘क्वाइट डिवोर्स’। इसमें न तलाक होता है, न कानूनी लड़ाई, लेकिन पति-पत्नी भावनात्मक रूप से एक-दूसरे से अलग हो जाते हैं। आसान शब्दों में कहें तो शादी कागज़ों में बनी रहती है, पर रिश्ता दिल से खत्म हो जाता है। क्या होता है क्वाइट डिवोर्स? क्वाइट डिवोर्स में पति-पत्नी कानूनी रूप से साथ रहते हैं, लेकिन उनके बीच पति-पत्नी जैसा रिश्ता नहीं रहता। वे साथ रह सकते हैं या अलग, पर भावनात्मक जुड़ाव खत्म हो जाता है। इसे लोग “चुपचाप अलग होना” भी कहते हैं। लोग इसे क्यों चुन रहे हैं? इसके पीछे कई वजहें हैं— तलाक की झंझट से बचने के लिए बच्चों पर असर न पड़े, इसलिए पैसों और प्रॉपर्टी की परेशानी से बचाव समाज और रिश्तेदारों के सवालों से दूरी * रोज़-रोज़ के झगड़ों से शांति पाने के लिए एक्सपर्ट क्या कहते हैं? रिलेशनशिप एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह तरीका कुछ लोगों के लिए आसान लग सकता है, लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं है। अगर बातचीत और समझ खत्म हो जाए, तो यह स्थिति आगे चलकर अकेलापन और तनाव बढ़ा सकती है। इसके फायदे घर में झगड़े कम होते हैं बच्चों की पढ़ाई और दिनचर्या पर कम असर कोर्ट और वकील के खर्च से राहत नुकसान भी हैं रिश्ते में अपनापन खत्म हो जाता है मानसिक तनाव बढ़ सकता है बच्चे रिश्तों को लेकर उलझन में पड़ सकते हैं क्वाइट डिवोर्स उन लोगों का रास्ता बन रहा है, जो खुला तलाक नहीं चाहते। लेकिन एक्सपर्ट मानते हैं कि खुलकर बात करना और सही सलाह लेना आज भी रिश्ते को समझने और संभालने का सबसे बेहतर तरीका है।

‘देश हित में नहीं नए UGC नियम’ — बृजभूषण शरण सिंह का तीखा हमला

नई दिल्ली: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों को लेकर सियासत तेज होती जा रही है। पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह ने इन नियमों पर बड़ा बयान देते हुए कहा है कि यह न तो देश हित में हैं और न ही शिक्षा व्यवस्था के लिए उचित। उन्होंने आरोप लगाया कि नए UGC नियम समाज में भेदभाव को बढ़ावा देने वाले हैं और इन्हें तत्काल वापस लिया जाना चाहिए। बृजभूषण शरण सिंह ने साफ शब्दों में कहा कि यदि सरकार ने इन नियमों पर पुनर्विचार नहीं किया, तो इसके खिलाफ जन आंदोलन किया जाएगा। उन्होंने चेतावनी दी कि शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में बिना व्यापक संवाद के नियम लागू करना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। “समाज को बांटने का काम कर रहे हैं ये नियम” — बृजभूषण सिंह पूर्व सांसद ने कहा, “UGC के नए नियम शिक्षा में सुधार के नाम पर समाज को वर्गों में बांटने का काम कर रहे हैं। इससे न तो छात्रों का भला होगा और न ही शिक्षकों का। यह नीति जमीन से कटी हुई है।” उन्होंने यह भी कहा कि ग्रामीण, पिछड़े और कमजोर वर्गों के छात्रों पर इन नियमों का नकारात्मक असर पड़ेगा और उच्च शिक्षा और अधिक कठिन व महंगी बन सकती है। सांसद करन भूषण सिंह का ‘क्लियर’ स्टैंड विवाद बढ़ने के बीच सांसद करन भूषण सिंह ने भी अपनी स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि “UGC के इन नए नियमों के निर्माण या ड्राफ्टिंग में मेरी कोई भूमिका नहीं रही है। इसे लेकर जो भी भ्रम फैलाया जा रहा है, वह पूरी तरह गलत है।” करन भूषण सिंह ने यह भी कहा कि वे शिक्षा व्यवस्था में सुधार के पक्षधर हैं, लेकिन किसी भी नीति को लागू करने से पहले सभी पक्षों से संवाद बेहद जरूरी है। राजनीतिक और शैक्षणिक हलकों में बढ़ी हलचल UGC के नए नियमों को लेकर पहले ही देशभर में शिक्षाविदों, छात्र संगठनों और सामाजिक समूहों में असंतोष देखने को मिल रहा है। अब जब इस मुद्दे पर बड़े राजनीतिक चेहरों के बयान सामने आ रहे हैं, तो यह विवाद और तेज होने के संकेत दे रहा है। सरकार की ओर से अब तक इस पूरे विवाद पर कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। लेकिन जिस तरह आंदोलन की चेतावनी दी जा रही है, उससे साफ है कि UGC Act और नए नियम आने वाले दिनों में सियासी बहस का बड़ा मुद्दा बनने वाले हैं।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के अभिभाषण से बजट सत्र 2026 का आगाज़, 1 फरवरी को पेश होगा आम बजट

नई दिल्ली। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित करते हुए बजट सत्र 2026 का औपचारिक बिगुल फूंक दिया। अपने अभिभाषण में राष्ट्रपति ने सरकार की उपलब्धियों, भविष्य की प्राथमिकताओं और विकास के रोडमैप को रेखांकित किया। इसके साथ ही संसद का वह सत्र शुरू हो गया है, जिस पर पूरे देश की निगाहें टिकी रहती हैं। राष्ट्रपति के अभिभाषण के बाद अब सबकी नजरें 1 फरवरी की सुबह 11 बजे पर टिकी हैं, जब वित्त मंत्री देश का आम बजट 2026 लोकसभा में पेश करेंगी। माना जा रहा है कि यह बजट आम आदमी, मध्यम वर्ग, किसानों और युवाओं के लिए कई बड़े ऐलान लेकर आ सकता है। राष्ट्रपति का अभिभाषण: विकास और समावेशन पर जोर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अपने संबोधन में कहा कि सरकार का फोकस समावेशी विकास, आत्मनिर्भर भारत, रोजगार सृजन और सामाजिक न्याय पर है। उन्होंने बुनियादी ढांचे के विस्तार, डिजिटल इंडिया, महिला सशक्तिकरण और गरीब कल्याण योजनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि बीते वर्षों में देश ने कई अहम क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की है। राष्ट्रपति ने यह भी संकेत दिए कि आने वाला बजट भारत की अर्थव्यवस्था को नई गति देने वाला हो सकता है, खासकर ऐसे समय में जब वैश्विक आर्थिक चुनौतियां बनी हुई हैं। 1 फरवरी को पेश होगा बजट, कई बड़े ऐलानों की उम्मीद वित्त मंत्री द्वारा पेश किए जाने वाले आम बजट 2026 से लोगों को कई उम्मीदें हैं। आयकर में राहत: मध्यम वर्ग को टैक्स स्लैब में बदलाव या छूट की उम्मीद महंगाई पर नियंत्रण: आम जनता के लिए राहत उपाय किसान और ग्रामीण अर्थव्यवस्था: कृषि और ग्रामीण विकास पर फोकस युवा और रोजगार: स्टार्टअप, स्किल डेवलपमेंट और नौकरियों से जुड़े प्रावधान इन्फ्रास्ट्रक्चर और कैपेक्स: सड़क, रेल और डिजिटल ढांचे में निवेश अहम विधेयकों पर भी रहेगी नजर बजट सत्र के दौरान सरकार की ओर से कई अहम विधेयक संसद में लाए जाने की संभावना है। इनमें आर्थिक सुधारों, प्रशासनिक बदलावों और सामाजिक कल्याण से जुड़े बिल शामिल हो सकते हैं। विपक्ष भी इन मुद्दों पर सरकार को घेरने की रणनीति बना रहा है, जिससे सत्र के हंगामेदार रहने के संकेत मिल रहे हैं। देश की दिशा तय करेगा बजट सत्र कुल मिलाकर, बजट सत्र 2026 न सिर्फ सरकार की आर्थिक नीतियों की झलक देगा, बल्कि आने वाले वर्षों में देश की विकास दिशा भी तय करेगा। राष्ट्रपति के अभिभाषण के साथ शुरू हुआ यह सत्र राजनीतिक और आर्थिक दोनों ही नजरिए से बेहद अहम माना जा रहा है।

बारामती में लैंडिंग बनी आख़िरी उड़ान: विमान हादसे में NCP प्रमुख अजित पवार समेत पाँच की मौत

बारामती (पुणे): 28 जनवरी 2026 — बुधवार सुबह महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री और एनसीपी (राष्ट्रीयist Congress Party) के वरिष्ठ नेता अजित अनंतराव पवार का निजी विमान बारामती एयरपोर्ट के पास लैंडिंग के दौरान भयानक दुर्घटना का शिकार हो गया, जिसमें वे समेत 5 लोगों की दर्दनाक मौत हो गई। यह खबर न सिर्फ महाराष्ट्र बल्कि पूरे देश के राजनीतिक व नागरिक परिदृश्य को झकझोर देने वाली है। दुर्घटना की दर्दनाक सुबह सुबह करीब 08:45 बजे, मुंबई से बारामती के लिए जा रहा लीजरजेट 45 विमान रनवे के करीब पहुँचते ही अचानक नियंत्रण खो बैठा और भारी तूफ़ान की तरह रनवे से ठीक पहले ज़मीन पर जा टकराया। विमान जोरदार विस्फोट के साथ आग की लपटों में झुलस गया, जिससे कोई भी यात्री जीवित नहीं बच सका। DGCA के प्रारंभिक बयानों के अनुसार रनवे पर दृश्यता बेहद कम थी और एयर ट्रैफिक कंट्रोल टॉवर की अनुपस्थिति व मौसम की ख़राबी के बीच जहाज़ ने सुरक्षित लैंडिंग नहीं कर पाया। दुर्घटनास्थल पर मौजूद अधिकारियों ने बताया कि विमान में कुल पाँच लोग सवार थे —  उपमुख्यमंत्री अजित पवार दो पायलट (कप्तान और सह-पायलट) एक सुरक्षा अधिकारी  एक सहायक/कर्मचारी और कोई भी इससे सुरक्षित नहीं बचा। मौत की पुष्टि और प्रतिक्रिया घटना के तुरंत बाद Maharashtra सरकार ने तीन दिनों का राजकीय शोक घोषित कर दिया है और पूरे राज्य में सरकारी कार्यों में रूकावट की घोषणा की गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शरद पवार से फोन पर संवेदना व्यक्त की और अजित पवार की कर्मठता, प्रशासनिक कौशल और जनसेवा को ऊँचा सम्मान दिया। बारामती में उनके आवास और दफ़्तरों के बाहर समर्थकों की भीड़ इकट्ठी हो गई है; कार्यकर्ता, ग्रामीण और नागरिक भावुक मुद्रा में झंडे-झंडियाँ लेकर संगठित रूप से शोक मना रहे हैं। अजित पवार — राजनीतिक जीवन की विस्तृत झलक प्रारंभिक जीवन और पृष्ठभूमि अजित अनंतराव पवार का जन्म 22 जुलाई 1959 को अहमदनगर जिले के देओली प्रवरा में हुआ था। वे महाराष्ट्र के राजनीतिक पटल पर एक प्रतिष्ठित नाम के रूप में उभरे, जिनकी पहचान अपने प्रबल नेतृत्व, प्रशासनिक कुशलता और जनता के साथ मजबूत जुड़ाव के कारण बनी। राजनीतिक पदार्पण और उभरता करियर उनकी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत 1982 में सहकारी आंदोलन से हुई — जहां उन्होंने स्थानीय शुगर फैक्ट्री के बोर्ड में स्थान बनाकर किसानों के हित में काम किया, और जल्द ही पुणे जिला केंद्रीय सहकारी बैंक के 16 वर्षों तक अध्यक्ष के रूप में कार्य किया। निर्वाचन और विधानसभा सफ़र 1991 में उन्होंने बैरामती से विधानसभा सदस्य के रूप में पहला चुनाव जीता और इसके बाद लगातार छह बार इसी सीट से जीत हासिल की। उन्होंने महाराष्ट्र में कई गवर्नमेंट विभागों — जैसे वित्त, योजना, जल संसाधन, ऊर्जा और ग्रामीण विकास — का प्रभार संभाला। वे छह बार उपमुख्यमंत्री के रूप में सेवा कर चुके हैं — किसी भी नेता द्वारा महाराष्ट्र में यह रिकॉर्ड हासिल करना दुर्लभ है। पार्टी नेतृत्व और राजनीतिक महत्ता अजित पवार राष्ट्रीयist Congress Party (NCP) के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहे और एक समय उनके नेतृत्व वाली NCP को चुनाव आयोग ने आधिकारिक पार्टी मान्यता प्रदान की। उनकी भूमिका महाराष्ट्र की राजनीति में इतनी निर्णायक थी कि उन्होंने दलों के बीच गठबंधन, बजट रणनीति और नीति निर्णयों में प्रमुख प्रभाव डाला — यही कारण है कि वे प्रशासनिक रणनीति के धुरंधरों के रूप में पहचाने जाते थे। शोक, विरासत और भविष्य का राजनीति अजित पवार का निधन सिर्फ एक राजनीतिक नेता का जाना नहीं है — यह महाराष्ट्र के राजनीतिक मानचित्र में एक अविस्मरणीय अध्याय का अंत है। समर्थक और कार्यकर्ता उन्हें प्यार से “दादा” कहते थे, और उनके administrative footprint ने राज्य के सरकारी कामकाज को दशक-दर-दशक प्रभावित किया। उनकी मौत से न सिर्फ पार्टी को नेतृत्व की कमी महसूस होगी बल्कि आगामी स्थानीय चुनावों और गठबंधन समीकरणों पर भी इसका गहरा असर पड़ेगा। इसके साथ ही, बारामती के राजनीतिक और सामाजिक जीवन में भी आज एक गहरा शून्य पैदा हो गया है।

भारत-यूरोप के बीच ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ पर मुहर: 90% टैरिफ खत्म

सस्ती होगी वाइन-बीयर से लेकर खुलेगा भारतीय निर्यात का महाद्वार नई दिल्ली/गोवा: करीब दो दशकों के इंतज़ार, लंबी कूटनीतिक बातचीत और कई दौर की अड़चनों के बाद आखिरकार भारत और यूरोपीय यूनियन (EU) के बीच ऐतिहासिक फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) पर मुहर लग गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन के बीच यह बहुप्रतीक्षित समझौता साइन हुआ है, जिसे आर्थिक जानकार ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ बता रहे हैं। इस डील के तहत यूरोपीय यूनियन से आने वाले करीब 90 फीसदी उत्पादों पर टैरिफ या तो पूरी तरह खत्म कर दिया गया है या फिर चरणबद्ध तरीके से काफी कम किया जाएगा। इसका सीधा असर आम उपभोक्ता से लेकर उद्योग जगत तक देखने को मिलेगा। क्या है इस ऐतिहासिक डील की सबसे बड़ी खासियत? भारत-EU ट्रेड डील दुनिया के सबसे बड़े आर्थिक समझौतों में से एक मानी जा रही है। पीएम मोदी के मुताबिक, यह समझौता ग्लोबल GDP के करीब 25 फीसदी और वैश्विक व्यापार के लगभग एक-तिहाई हिस्से को कवर करता है। यानी भारत और यूरोप के बीच कारोबार न सिर्फ तेज़ होगा, बल्कि दोनों अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे के लिए और ज्यादा अहम बन जाएंगी। आम आदमी को क्या मिलेगा फायदा? इस डील का असर सीधे आपकी जेब पर भी पड़ेगा— यूरोप से आने वाली बीयर और वाइन सस्ती होंगी, क्योंकि इन पर लगने वाला भारी-भरकम टैरिफ घटा दिया गया है। लग्ज़री प्रोडक्ट्स, हाई-एंड मशीनरी और टेक्नोलॉजी से जुड़े कई सामान अब पहले से कम कीमत पर उपलब्ध हो सकते हैं। प्रतिस्पर्धा बढ़ने से घरेलू बाजार में क्वालिटी बेहतर होने की उम्मीद है। भारतीय उद्योग के लिए खुले नए दरवाज़े इस फ्री ट्रेड एग्रीमेंट से भारत के कई प्रमुख सेक्टरों को बड़ा बूस्ट मिलने वाला है— टेक्सटाइल और रेडीमेड गारमेंट्स जेम्स और ज्वेलरी लेदर और फुटवियर मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर इन सेक्टरों को यूरोपीय बाजार में आसान पहुंच मिलेगी, जहां अब तक सख्त नियम और ऊंचे टैरिफ बड़ी चुनौती थे। India Energy Week से पीएम मोदी का संदेश गोवा में आयोजित India Energy Week के दौरान पीएम मोदी ने वर्चुअल संबोधन में इस डील को भारत की वैश्विक आर्थिक ताकत का प्रमाण बताया। उन्होंने कहा— भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बन रहा है। भारत पेट्रोलियम उत्पादों के टॉप-5 एक्सपोर्टर्स में शामिल है। आज भारत 150 से ज्यादा देशों को पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात कर रहा है। पीएम मोदी के मुताबिक, यह डील भारत की ‘मेक इन इंडिया’ और ‘वोकल फॉर लोकल’ रणनीति को ग्लोबल प्लेटफॉर्म देगी। यह समझौता सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं है। भारत और यूरोप के बीच रणनीतिक साझेदारी, सप्लाई चेन की मजबूती और जियो-पॉलिटिकल संतुलन में भी इसकी अहम भूमिका होगी। खासकर ऐसे समय में जब दुनिया आर्थिक अनिश्चितताओं और वैश्विक तनावों से गुजर रही है भारत-EU फ्री ट्रेड एग्रीमेंट न सिर्फ एक आर्थिक समझौता है, बल्कि यह भारत की वैश्विक पहचान को और मजबूत करने वाला कदम है। सस्ती विदेशी चीज़ें, मज़बूत निर्यात, नए रोज़गार और उद्योगों को रफ्तार—इस डील से फायदा हर स्तर पर दिखेगा। यही वजह है कि इसे सही मायनों में ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ कहा जा रहा है।