“पार्टी से पहले संगठन”: नितिन नवीन के अध्यक्ष बनते ही बोले पीएम मोदी— ‘आज मेरे बॉस हैं, मैं उनका कार्यकर्ता’

नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी (BJP) के संगठनात्मक इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ गया, जब नितिन नवीन ने पार्टी के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में औपचारिक रूप से पदभार संभाला। इस मौके पर आयोजित कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं उपस्थित रहे और उन्होंने अपने संबोधन से न केवल माहौल को भावुक बनाया, बल्कि पार्टी की संगठनात्मक संस्कृति का भी सशक्त संदेश दिया। प्रधानमंत्री मोदी ने नितिन नवीन को बधाई देते हुए कहा,“आज नितिन नवीन मेरे बॉस हैं और मैं उनका कार्यकर्ता हूं।” पीएम मोदी का यह बयान मंच से उतरकर सियासी गलियारों तक गूंजता रहा। इसे भाजपा की उस परंपरा के रूप में देखा जा रहा है, जहां पद से पहले संगठन और व्यक्ति से पहले विचारधारा को महत्व दिया जाता है। अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने कहा कि भाजपा दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी इसलिए बनी है क्योंकि यहां नेतृत्व अहंकार नहीं, सेवा भाव से चलता है। अध्यक्ष का पद केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि करोड़ों कार्यकर्ताओं की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करता है। उन्होंने आगे कहा कि नितिन नवीन का संगठनात्मक अनुभव, जमीन से जुड़ा स्वभाव और कार्यकर्ताओं से संवाद करने की क्षमता पार्टी को नई ऊंचाइयों तक ले जाएगी। नितिन नवीन ने पदभार ग्रहण करते हुए कहा कि यह उनके लिए सम्मान के साथ-साथ एक बड़ी जिम्मेदारी भी है। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी, पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि— “मैं इस पद को सत्ता नहीं, सेवा का माध्यम मानता हूं। संगठन को और मजबूत करना मेरी पहली प्राथमिकता होगी।” नवीन ने स्पष्ट किया कि आने वाले समय में पार्टी का फोकस युवाओं, महिलाओं, किसानों और अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक संगठन की पकड़ मजबूत करने पर रहेगा। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, प्रधानमंत्री मोदी का “मैं कार्यकर्ता हूं” वाला बयान केवल विनम्रता नहीं, बल्कि 2029 और उससे आगे की राजनीति के लिए संगठन को केंद्र में रखने की रणनीति का संकेत है। यह संदेश साफ है कि भाजपा में व्यक्ति नहीं, संगठन चलता है। देशभर के भाजपा कार्यकर्ताओं में इस बदलाव को लेकर खासा उत्साह देखा गया। सोशल मीडिया से लेकर पार्टी कार्यालयों तक, नितिन नवीन के नेतृत्व में नए जोश और नई दिशा की चर्चा है। नितिन नवीन का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना केवल नेतृत्व परिवर्तन नहीं, बल्कि भाजपा की उस परंपरा की पुनर्पुष्टि है जहां *नेता भी कार्यकर्ता होता है प्रधानमंत्री मोदी का बयान इस बात का प्रतीक है कि सत्ता के शिखर पर बैठा व्यक्ति भी संगठन के अनुशासन में खुद को सबसे नीचे खड़ा मानता है—और यही भाजपा की असली ताकत है।

नोएडा हादसे में बड़ी कार्रवाई: इंजीनियर युवराज की मौत के मामले में बिल्डर अभय कुमार गिरफ्तार, लापरवाही पर प्रशासन सख्त

नोएडा। नोएडा के सेक्टर-150 स्थित एक आवासीय परियोजना में इंजीनियर युवराज की दर्दनाक मौत के मामले में पुलिस ने बड़ी कार्रवाई करते हुए बिल्डर अभय कुमार को गिरफ्तार कर लिया है। यह घटना उस समय सामने आई जब बेसमेंट में भरे पानी में डूबने से युवराज की जान चली गई। मामले ने तूल पकड़ने के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने स्वयं संज्ञान लिया, जिसके बाद प्रशासन और पुलिस हरकत में आई। बेसमेंट बना मौत का कारण प्राप्त जानकारी के अनुसार, संबंधित प्रोजेक्ट के बेसमेंट में लंबे समय से पानी भरा हुआ था। उचित जल निकासी और सुरक्षा इंतजाम न होने के चलते यह जगह खतरनाक बन चुकी थी। इसी लापरवाही का शिकार इंजीनियर युवराज हुए, जिनकी मौके पर ही मौत हो गई। घटना के बाद स्थानीय लोगों और परिजनों में भारी आक्रोश देखने को मिला। दो बिल्डरों पर दर्ज हुआ मुकदमा पुलिस ने प्रारंभिक जांच के आधार पर दो बिल्डरों के खिलाफ मामला दर्ज किया था। जांच में गंभीर लापरवाही और सुरक्षा मानकों के उल्लंघन के साक्ष्य मिलने के बाद मुख्य आरोपी बिल्डर अभय कुमार को गिरफ्तार कर लिया गया। पुलिस का कहना है कि अन्य आरोपी की भूमिका की भी गहन जांच की जा रही है और जल्द ही आगे की कार्रवाई संभव है। मुख्यमंत्री के संज्ञान के बाद तेज हुई कार्रवाई मामले की गंभीरता को देखते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तत्काल संज्ञान लिया। इसके बाद नोएडा प्राधिकरण में भी हलचल मच गई। लापरवाही के आरोपों के चलते प्राधिकरण के सीईओ पर भी गाज गिरी और उनसे जवाब-तलब किया गया। प्रशासन ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि इस तरह की घटनाओं में जिम्मेदारों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा। इस पूरे मामले ने एक बार फिर रियल एस्टेट परियोजनाओं में सुरक्षा और रखरखाव पर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रशासन का कहना है कि नोएडा सहित पूरे प्रदेश में बिल्डरों द्वारा सुरक्षा मानकों की अनदेखी पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी, ताकि भविष्य में ऐसी दुखद घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो। इंजीनियर युवराज की मौत ने जहां एक परिवार को अपूरणीय क्षति पहुंचाई है, वहीं यह मामला सिस्टम की लापरवाही और जवाबदेही की भी कड़ी परीक्षा बन गया है। अब सबकी निगाहें आगे होने वाली जांच और न्यायिक प्रक्रिया पर टिकी हैं।

डेढ़ घंटे की कूटनीति, 200 अरब डॉलर की छलांग

भारत–यूएई की मेगा डील ने दक्षिण एशियाई भू-राजनीति का संतुलन बदला नई दिल्ली / अबू धाबी :प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान के बीच हुई महज़ डेढ़ घंटे की मुलाकात ने वैश्विक आर्थिक और रणनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। दोनों देशों ने वर्ष 2032 तक द्विपक्षीय व्यापार को 200 अरब डॉलर तक पहुँचाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है। यह समझौता केवल आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि भारत की तेजी से बढ़ती वैश्विक आर्थिक हैसियत और खाड़ी देशों के साथ उसकी मजबूत होती रणनीतिक साझेदारी का स्पष्ट संकेत है। एक मुलाकात, कई संदेश भारत और यूएई के नेताओं की इस बैठक को कूटनीतिक जानकार “फास्ट-ट्रैक डिप्लोमेसी” का बेहतरीन उदाहरण मान रहे हैं। जिस समझौते को अंतिम रूप देने में कई देशों को वर्षों लग जाते हैं, उसे भारत और यूएई ने बेहद कम समय में ठोस दिशा दे दी। विशेषज्ञों के अनुसार, यह डील उस तथाकथित “ऐतिहासिक”सऊदी समझौते से दस गुना बड़ी है, जिसे लेकर पाकिस्तान लंबे समय से अपनी उपलब्धि के रूप में प्रचार करता रहा है। किन क्षेत्रों में होगा सबसे बड़ा असर इस 200 अरब डॉलर के लक्ष्य को पाने के लिए दोनों देश कई प्रमुख क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर सहमत हुए हैं: * ऊर्जा और नवीकरणीय संसाधन * डिजिटल ट्रेड और फिनटेक * रक्षा और एयरोस्पेस सहयोग * इंफ्रास्ट्रक्चर और लॉजिस्टिक्स * फूड सिक्योरिटी और एग्री-टेक यूएई पहले से ही भारत के शीर्ष व्यापारिक साझेदारों में शामिल है, और यह नया लक्ष्य इस रिश्ते को पूरी तरह रणनीतिक साझेदारी में बदल देता है। पाकिस्तान के लिए असहज संकेत क्षेत्रीय राजनीति पर नज़र रखने वालों का मानना है कि यह डील अप्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तान के लिए भी एक सख़्त संदेश है। जहां पाकिस्तान अभी भी निवेश के वादों और एमओयू के स्तर पर अटका हुआ है, वहीं भारत ठोस परिणामों और दीर्घकालिक लक्ष्यों के साथ आगे बढ़ रहा है। भारत की बदलती वैश्विक छवि यह समझौता इस बात का प्रमाण है कि भारत अब केवल एक उभरती अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में प्रभावशाली भूमिका निभाने वाला देश बन चुका है। मोदी सरकार की आर्थिक कूटनीति—ट्रेड + टेक्नोलॉजी + ट्रस्ट—का यह सबसे मजबूत उदाहरण माना जा रहा है। डेढ़ घंटे की इस मुलाकात ने साफ कर दिया है कि आज की वैश्विक राजनीति में गंभीर नेतृत्व, स्पष्ट दृष्टि और भरोसेमंद साझेदारी ही असली पूंजी है। भारत–यूएई की यह 200 अरब डॉलर की छलांग न सिर्फ आर्थिक इतिहास रचेगी, बल्कि आने वाले दशक में एशिया और खाड़ी क्षेत्र की शक्ति-संतुलन को भी नए सिरे से परिभाषित करेगी।

सिलीगुड़ी कॉरिडोर के साए में कूटनीति: भारत के लिए नई चुनौती खड़ी कर रहा बांग्लादेश–चीन समीकरण

विशेष रिपोर्ट | भारत–बांग्लादेश संबंधों में चल रहे तनाव के बीच ढाका से एक ऐसा घटनाक्रम सामने आया है, जिसने नई दिल्ली की रणनीतिक चिंताओं को और गहरा कर दिया है। बांग्लादेश में यूनुस सरकार के कार्यकाल के दौरान चीनी राजदूत याओ वेन को तीस्ता नदी परियोजना क्षेत्र का दौरा कराया गया—एक ऐसा इलाका जो भारत के अत्यंत संवेदनशील सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) के बेहद करीब स्थित है। यह दौरा केवल एक तकनीकी या विकासात्मक पहल नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे दक्षिण एशिया की बदलती भू-राजनीति के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। तीस्ता परियोजना: विकास या रणनीतिक दांव? तीस्ता नदी लंबे समय से भारत और बांग्लादेश के बीच जल-विवाद का विषय रही है। अब चीन द्वारा प्रस्तावित तीस्ता मास्टर प्लान को बांग्लादेश में तेजी से आगे बढ़ाने की बात सामने आ रही है। इस परियोजना के तहत नदी प्रबंधन, सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण और इंफ्रास्ट्रक्चर विकास जैसे पहलुओं पर काम होना है, लेकिन इसके पीछे चीन की रणनीतिक मौजूदगी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह परियोजना चीनी तकनीक, फंडिंग और निगरानी में आगे बढ़ती है, तो इससे भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र की सुरक्षा और कनेक्टिविटी पर अप्रत्यक्ष असर पड़ सकता है। सिलीगुड़ी कॉरिडोर: भारत की जीवनरेखा सिलीगुड़ी कॉरिडोर भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को शेष भारत से जोड़ने वाला एकमात्र संकरा भू-भाग है। इसकी चौड़ाई कुछ स्थानों पर मात्र 20–25 किलोमीटर रह जाती है। इसी कारण इस क्षेत्र के आसपास होने वाली हर अंतरराष्ट्रीय गतिविधि भारत के लिए रणनीतिक चेतावनी मानी जाती है। चीनी राजदूत का इस क्षेत्र के नजदीक दौरा और बांग्लादेश सरकार की सक्रिय भूमिका यह संकेत देती है कि ढाका अब केवल संतुलन की नीति तक सीमित नहीं रहना चाहता। यूनुस सरकार का संदेश क्या है? यूनुस सरकार द्वारा चीनी राजदूत को इस संवेदनशील क्षेत्र में ले जाना कई सवाल खड़े करता है: * क्या बांग्लादेश भारत पर दबाव बनाने की रणनीति अपना रहा है? * क्या चीन को क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में बड़ी भूमिका देने की तैयारी है? * या फिर यह भारत को यह संदेश है कि ढाका के पास विकल्प मौजूद हैं? राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह कदम भारत के साथ चल रही बातचीत—चाहे वह जल बंटवारा हो, व्यापार या सीमा प्रबंधन—में बांग्लादेश की सौदेबाजी की ताकत बढ़ाने का प्रयास भी हो सकता है।

रिलायंस का बड़ा माइलस्टोन: क्विक कॉमर्स और FMCG बिजनेस पहली बार मुनाफे में, अंबानी के रिटेल साम्राज्य को नई रफ्तार

नई दिल्ली : देश की सबसे बड़ी निजी कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (RIL) ने अपने कंज्यूमर बिजनेस में एक अहम उपलब्धि हासिल कर ली है। कंपनी ने बताया है कि उसके दो सबसे बड़े उपभोक्ता कारोबार—क्विक कॉमर्स और फास्ट-मूविंग कंज्यूमर गुड्स (FMCG) अब कमाई करने लगे हैं। यह उपलब्धि बड़े पैमाने पर सोर्सिंग, ऑपरेशनल एफिशिएंसी और हाई-मार्जिन प्रोडक्ट कैटेगरी पर फोकस का नतीजा मानी जा रही है। क्विक कॉमर्स: लॉन्च के एक साल के भीतर ब्रेक-ईवन अक्टूबर 2024 में लॉन्च किया गया रिलायंस का क्विक कॉमर्स बिजनेस अब लगभग हर ऑर्डर पर मुनाफा कमा रहा है। कंपनी के अनुसार, इस सेगमेंट का कंट्रीब्यूशन मार्जिन पॉजिटिव हो चुका है, जो किसी भी नए डिजिटल रिटेल मॉडल के लिए बड़ी उपलब्धि मानी जाती है। विशेषज्ञों के मुताबिक, रिलायंस ने इस सेगमेंट में: * अपने विशाल सप्लाई चेन नेटवर्क * लोकल स्टोर इंटीग्रेशन * डेटा-ड्रिवन इन्वेंट्री मैनेजमेंट का बेहतर इस्तेमाल किया, जिससे डिलीवरी लागत घटी और प्रति ऑर्डर मार्जिन सुधरा। FMCG बिजनेस: EBITDA से पहले कमाई में पॉजिटिव रिलायंस ने करीब तीन साल पहले FMCG सेक्टर में कदम रखा था, जहां शुरुआत में भारी निवेश और ब्रांड बिल्डिंग पर जोर रहा। अब कंपनी ने बताया है कि यह कारोबार EBITDA (ब्याज, टैक्स, डेप्रिसिएशन और अमॉर्टाइजेशन से पहले) स्तर पर पॉजिटिव हो गया है। इस सफलता के पीछे प्रमुख कारण बताए जा रहे हैं: * बड़े पैमाने पर कच्चे माल की सोर्सिंग * अपने रिटेल नेटवर्क के जरिए सीधे उपभोक्ताओं तक पहुंच * प्राइवेट लेबल और हाई-मार्जिन प्रोडक्ट्स पर फोकस रिटेल सेक्टर में रिलायंस की मजबूत पकड़ चेयरमैन मुकेश अंबानी, जो एशिया के सबसे अमीर व्यक्ति हैं, लंबे समय से रिटेल और कंज्यूमर बिजनेस को रिलायंस के भविष्य का अहम स्तंभ बताते रहे हैं। क्विक कॉमर्स और FMCG में मुनाफे की शुरुआत इस रणनीति की सफलता का संकेत है।

45 की उम्र में BJP की कमान: नितिन नवीन बने निर्विरोध राष्ट्रीय अध्यक्ष, संगठन में नई पीढ़ी का उदय

नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी (BJP) के संगठनात्मक इतिहास में एक अहम पड़ाव जुड़ गया है। नितिन नवीन को पार्टी का निर्विरोध राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया है। रिटर्निंग ऑफिसर के. लक्ष्मण ने औपचारिक घोषणा करते हुए बताया कि नितिन नवीन के समर्थन में 37 सेट नॉमिनेशन पेपर दाखिल किए गए थे, जिसके बाद उनका निर्विरोध निर्वाचन तय हो गया। संगठन में पीढ़ीगत बदलाव का संकेत महज 45 वर्ष की उम्र में देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी की कमान संभालना, नितिन नवीन के लिए ही नहीं बल्कि भाजपा संगठन के लिए भी एक मजबूत संदेश माना जा रहा है। यह फैसला पार्टी में युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाने और संगठनात्मक ढांचे में नई ऊर्जा भरने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। निर्विरोध चयन, व्यापक सहमति का प्रमाण 37 सेट नॉमिनेशन का दाखिल होना इस बात का संकेत है कि नितिन नवीन के नाम पर पार्टी के भीतर व्यापक सहमति थी। किसी अन्य उम्मीदवार के सामने न आने से यह साफ हुआ कि शीर्ष नेतृत्व से लेकर संगठन के विभिन्न स्तरों तक उनके नेतृत्व पर भरोसा जताया गया है। प्राथमिकताएं और चुनौतियां नए राष्ट्रीय अध्यक्ष के सामने आने वाले समय में कई अहम जिम्मेदारियां होंगी— * संगठन को चुनावी रूप से और मजबूत करना * बूथ स्तर तक कैडर को सक्रिय रखना * युवा, महिला और नए मतदाताओं से जुड़ाव बढ़ाना * आगामी चुनावों के लिए रणनीतिक दिशातय करना राजनीतिक हलकों में प्रतिक्रियाएं नितिन नवीन के निर्विरोध अध्यक्ष चुने जाने के बाद पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थकों में उत्साह देखा गया। कई नेताओं ने इसे स्थिरता और निरंतरता के साथ-साथ नवाचार का संतुलित कदम बताया है। नितिन नवीन का अध्यक्ष बनना भाजपा के लिए केवल एक नेतृत्व परिवर्तन नहीं, बल्कि भविष्य की राजनीति की तैयारी के तौर पर देखा जा रहा है। संगठन को एकजुट रखते हुए चुनावी चुनौतियों का सामना करना अब उनकी प्राथमिक जिम्मेदारी होगी।

नोएडा में सिस्टम की लापरवाही ने ली एक इंजीनियर की जान: बेसमेंट में डूबा युवराज, सवालों के घेरे में प्रशासन और बिल्डर

नोएडा। उत्तर प्रदेश के नोएडा सेक्टर-150 से सामने आई यह घटना केवल एक हादसा नहीं, बल्कि शहरी व्यवस्था की गंभीर नाकामी की दर्दनाक मिसाल बन गई है। जल निकासी के पुख्ता इंतजाम न होने के कारण पानी से भरे बेसमेंट में डूबकर सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज की मौत हो गई। इस घटना के बाद इलाके में लोगों का गुस्सा फूट पड़ा है और प्रशासन, बिल्डर व सोसाइटी प्रबंधन पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। क्या है पूरा मामला? बताया जा रहा है कि हालिया बारिश के बाद सेक्टर-150 स्थित एक रिहायशी/कमर्शियल परिसर के बेसमेंट में भारी मात्रा में पानी भर गया था। इसी दौरान सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज किसी काम से बेसमेंट में गया, जहां अचानक पानी के तेज बहाव और जलभराव के कारण वह बाहर नहीं निकल सका। समय रहते रेस्क्यू न होने से युवराज की डूबकर मौत हो गई। सामने आया हैरान करने वाला सच जांच में जो तथ्य सामने आए हैं, वे और भी चौंकाने वाले हैं * बेसमेंट में ड्रेनेज सिस्टम काम नहीं कर रहा था या पूरी तरह बंद था। * पानी निकासी के लिए लगाए गए पंप खराब पड़े थे। * बेसमेंट में जलभराव के बावजूद कोई चेतावनी बोर्ड या बैरिकेडिंग नहीं थी। * सोसाइटी प्रबंधन को पहले भी जलभराव की शिकायतें मिल चुकी थीं, लेकिन ठोस कार्रवाई नहीं की गई। इस हादसे ने कई स्तरों पर जिम्मेदारी तय करने की मांग तेज कर दी है— * बिल्डर: निर्माण के समय मानकों की अनदेखी और अपर्याप्त ड्रेनेज। * सोसाइटी मैनेजमेंट: रखरखाव में लापरवाही, पंपों की खराब हालत। * प्रशासन/प्राधिकरण: समय-समय पर निरीक्षण न होना और मानसून से पहले तैयारियों की कमी। लोगों का फूटा गुस्सा घटना के बाद स्थानीय निवासियों और परिजनों ने विरोध प्रदर्शन किया। लोगों का कहना है कि नोएडा जैसे आधुनिक शहर में इस तरह की मौतें ‘प्राकृतिक’ नहीं, बल्कि ‘प्रशासनिक’ हादसे हैं। सोशल मीडिया पर भी युवराज को न्याय दिलाने की मांग तेज हो गई है। प्रशासन की प्रतिक्रिया प्रशासन ने मामले की जांच के आदेश देने और दोषियों पर कार्रवाई का आश्वासन दिया है। साथ ही, सेक्टर-150 सहित अन्य इलाकों में बेसमेंट और जल निकासी व्यवस्था की तत्काल जांच की बात कही गई है। हालांकि, लोगों का कहना है कि आश्वासन नहीं, जवाबदेही और सख्त कार्रवाई चाहिए।

गाजा शांति पहल में भारत की भूमिका बढ़ी: ट्रंप ने पीएम मोदी को ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में शामिल होने का दिया न्योता

वॉशिंगटन/नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गाजा के लिए गठित अंतरराष्ट्रीय संगठन बोर्ड ऑफ पीस’ में शामिल होने का औपचारिक न्योता दिया है। यह कदम गाजा में जारी संघर्ष को समाप्त कर स्थायी शांति, मानवीय सहायता और पुनर्निर्माण की दिशा में एक अहम पहल के रूप में देखा जा रहा है। ट्रंप प्रशासन का मानना है कि भारत की वैश्विक साख, संतुलित विदेश नीति और मानवीय दृष्टिकोण इस बोर्ड को मजबूती प्रदान करेगा। क्या है ‘बोर्ड ऑफ पीस’? ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की घोषणा 15 जनवरी को राष्ट्रपति ट्रंप की 20 बिंदुओं वाली शांति योजना के दूसरे चरण के तहत की गई थी। इस अंतरराष्ट्रीय बोर्ड का मुख्य उद्देश्य गाजा में हथियारों के खात्मे की निगरानी, आम नागरिकों तक मानवीय सहायता की निर्बाध आपूर्ति, युद्ध से तबाह बुनियादी ढांचे के पुनर्निर्माण और एक नई, स्थिर शासन व्यवस्था की रूपरेखा तैयार करना है। भारत की भूमिका क्यों अहम? भारत लंबे समय से मध्य-पूर्व में शांति और संवाद का पक्षधर रहा है। गाजा संकट के दौरान भी भारत ने मानवीय सहायता भेजी है और संघर्षविराम की अपील की है। ऐसे में पीएम मोदी को बोर्ड में शामिल होने का न्योता भारत की बढ़ती वैश्विक कूटनीतिक भूमिका को दर्शाता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत की भागीदारी से बोर्ड को एक संतुलित और विश्वसनीय नेतृत्व मिल सकता है। शांति योजना का दूसरा चरण ट्रंप की 20 बिंदुओं वाली योजना के दूसरे चरण में संघर्षविराम के बाद दीर्घकालिक शांति पर जोर दिया गया है। इसमें हथियारों के पूर्ण निष्क्रियकरण, राहत एजेंसियों के लिए सुरक्षित गलियारे, स्कूल-अस्पतालों का पुनर्निर्माण और स्थानीय प्रशासन को सशक्त करने जैसे मुद्दे शामिल हैं। ‘बोर्ड ऑफ पीस’ इन्हीं लक्ष्यों की निगरानी करेगा। सूत्रों के अनुसार, भारत इस न्योते पर विचार कर रहा है और अंतिम फैसला कूटनीतिक स्तर पर विमर्श के बाद लिया जाएगा। यदि पीएम मोदी इस बोर्ड में शामिल होते हैं, तो यह न केवल गाजा में शांति प्रयासों को नई दिशा देगा, बल्कि भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी को भी और मजबूत करेगा। कुल मिलाकर, गाजा संकट के समाधान की दिशा में यह पहल अंतरराष्ट्रीय सहयोग का नया अध्याय खोल सकती है, जिसमें भारत की संभावित भागीदारी वैश्विक शांति प्रयासों के लिए निर्णायक साबित हो सकती है।

Fastag New Rule: 1 अप्रैल से टोल टैक्स में बड़ा बदलाव, कैश पूरी तरह बंद; MLFF सिस्टम से होगी बिना रुके वसूली

नई दिल्ली। देशभर में हाईवे पर सफर करने वालों के लिए 1 अप्रैल 2026 से टोल टैक्स व्यवस्था पूरी तरह बदलने जा रही है। केंद्र सरकार मल्टी लेन फ्री फ्लो (MLFF) टोल सिस्टम लागू करने की तैयारी में है, जिसके तहत अब टोल प्लाजा पर कैश से भुगतान पूरी तरह बंद कर दिया जाएगा। यानी वाहन चालकों को हर हाल में FASTag या डिजिटल माध्यम से ही टोल देना होगा। सरकार का दावा है कि इस बदलाव से टोल प्लाजा पर लगने वाली लंबी कतारों, समय की बर्बादी और ईंधन की खपत में बड़ी कमी आएगी। साथ ही टोल कलेक्शन और ज्यादा पारदर्शी और तकनीक आधारित हो जाएगा। क्या है MLFF टोल सिस्टम? MLFF यानी Multi Lane Free Flow एक एडवांस्ड टोल वसूली प्रणाली है। इसमें टोल प्लाजा पर वाहन को रुकने की जरूरत नहीं होगी। * हाईवे पर लगे ANPR कैमरे (Automatic Number Plate Recognition) * और FASTag रीडर वाहन की पहचान कर सीधे बैंक अकाउंट या FASTag वॉलेट से टोल काट लेंगे। कैश लेन-देन क्यों हो रहा है बंद? सरकार के मुताबिक— * कैश लेन-देन से टोल प्लाजा पर जाम लगता है * मानव त्रुटि और टैक्स चोरी की आशंका रहती है * डिजिटल भुगतान से कलेक्शन तेज और रिकॉर्ड साफ रहता है इसी वजह से 1 अप्रैल 2026 से कैश लेन पूरी तरह खत्म की जा रही है। FASTag न होने पर क्या होगा? अगर किसी वाहन में FASTag नहीं है या वह काम नहीं कर रहा— * तो उस वाहन पर भारी जुर्माना लगाया जा सकता है * भविष्य में सीधे ई-चालान या वाहन मालिक के रजिस्टर्ड अकाउंट से टोल वसूली की व्यवस्था भी लागू हो सकती है आम लोगों को क्या फायदा? * टोल प्लाजा पर रुकना नहीं पड़ेगा * सफर होगा तेज और स्मूथ * ईंधन की बचत और प्रदूषण में कमी * टोल भुगतान में पारदर्शिता सरकार की तैयारी केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के अनुसार— * पहले चरण में चुनिंदा नेशनल हाईवे पर MLFF लागू होगा * इसके बाद पूरे देश में इसे चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाएगा क्या करना चाहिए वाहन चालकों को? * समय रहते FASTag जरूर लगवाएं * FASTag को बैंक अकाउंट से लिंक रखें * वॉलेट में पर्याप्त बैलेंस बनाए रखें 1 अप्रैल 2026 से टोल टैक्स सिस्टम पूरी तरह डिजिटल और हाईटेक होने जा रहा है। कैश भुगतान का दौर खत्म होगा और FASTag/MLFF देश के हाईवे सफर को नया रूप देगा। ऐसे में वाहन चालकों के लिए अभी से तैयारी करना जरूरी है।

23 साल की उम्र में दिलीप कुमार से ए.आर. रहमान बनने की कहानी: आस्था, संघर्ष और संगीत के सफ़र का अनसुना अध्याय

नई दिल्ली। ऑस्कर, ग्रैमी और गोल्डन ग्लोब जैसे अंतरराष्ट्रीय सम्मान हासिल कर चुके ए.आर. रहमान आज दुनिया के सबसे प्रभावशाली संगीतकारों में गिने जाते हैं। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस वैश्विक पहचान से पहले उनका नाम दिलीप कुमार हुआ करता था। 1980 के दशक में, महज़ 23 साल की उम्र में, उन्होंने न सिर्फ़ इस्लाम धर्म अपनाया बल्कि अपना नाम बदलकर अल्लाह रक्खा रहमान रख लिया, जिसे बाद में ए.आर. रहमान के नाम से जाना गया। आखिर ऐसा क्या हुआ जिसने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी? बचपन से संघर्षों में घिरा जीवन ए.आर. रहमान का जन्म 6 जनवरी 1967 को तमिलनाडु के मद्रास (अब चेन्नई) में हुआ। उनके पिता आर.के. शेखर दक्षिण भारतीय फिल्मों में संगीतकार थे। लेकिन जब रहमान महज़ 9 साल के थे, तब पिता का अचानक निधन हो गया। परिवार पर आर्थिक संकट आ गया और कम उम्र में ही रहमान को काम करना पड़ा। संगीत उनके लिए सिर्फ़ कला नहीं, बल्कि परिवार को संभालने का ज़रिया बन गया। बीमारी, सवाल और आस्था की तलाश किशोरावस्था और युवावस्था के शुरुआती दौर में रहमान का परिवार लगातार कठिनाइयों से जूझता रहा। इसी दौरान उनकी बहन गंभीर रूप से बीमार पड़ीं। कई इलाजों के बावजूद स्थिति में सुधार नहीं हुआ। इसी समय परिवार का संपर्क क़ादिरी इस्लामी सूफ़ी संत शेख क़ादिर से हुआ। सूफ़ी परंपरा की आध्यात्मिक शिक्षाओं और प्रार्थनाओं का परिवार पर गहरा असर पड़ा। रहमान की बहन की तबीयत में धीरे-धीरे सुधार आने लगा, जिसने पूरे परिवार को भीतर तक झकझोर दिया। 23 साल में लिया बड़ा फैसला इन घटनाओं ने दिलीप कुमार को जीवन, ईश्वर और आस्था पर नए सिरे से सोचने पर मजबूर किया। लंबे आत्ममंथन और अध्ययन के बाद, 1989 में 23 साल की उम्र में उन्होंने अपनी मां और बहनों के साथ इस्लाम धर्म अपनाया। इसके साथ ही उनका नाम बदला गया— * दिलीप कुमार → अल्लाह रक्खा रहमान बाद में यही नाम संक्षेप में ए.आर. रहमान के रूप में दुनिया भर में मशहूर हुआ। नाम बदला, सोच बदली, संगीत को मिला नया आयाम धर्म परिवर्तन के बाद रहमान के संगीत में एक गहराई, शांति और आध्यात्मिकता साफ़ झलकने लगी। सूफ़ी संगीत, इंसानियत, प्रेम और ईश्वर से जुड़ाव उनके सुरों का अहम हिस्सा बन गया। उन्होंने खुद कई बार कहा है कि इस्लाम और सूफ़ी विचारधारा ने उन्हें अनुशासन, धैर्य और विनम्रता सिखाई, जो उनके रचनात्मक जीवन की नींव बनी। ऑस्कर तक पहुंचा सफ़र 1992 में रोज़ा फ़िल्म के संगीत से धमाकेदार एंट्री करने वाले रहमान ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। दिल से, ताल, लगान, रंग दे बसंती से लेकर स्लमडॉग मिलियनेयर तक— 2009 में ऑस्कर अवॉर्ड जीतकर उन्होंने भारतीय संगीत को वैश्विक पहचान दिलाई। निजी आस्था, सार्वजनिक प्रेरणा ए.आर. रहमान आज भी अपनी निजी आस्था को बेहद सादगी से जीते हैं। वे मानते हैं कि धर्म उनके लिए दिखावे का नहीं, बल्कि आत्मिक संतुलन का माध्यम है। उनकी कहानी बताती है कि आस्था, संघर्ष और कला जब एक साथ चलते हैं, तो साधारण इंसान भी असाधारण बन सकता है।