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पहाड़ों में पलती साज़िश: 12,000 फीट पर आतंकियों का राशन, मददगार कौन?

किश्तवाड़ | विशेष रिपोर्ट: किश्तवाड़ के दुर्गम जंगलों में सुरक्षा बलों को मिला आतंकी बंकर केवल एक ठिकाना नहीं, बल्कि एक सुनियोजित आतंकी नेटवर्क की परतें खोलने वाला सबूत है। समुद्र तल से लगभग 12,000 फीट की ऊँचाई, चारों ओर बर्फ़ीली हवाएं और महीनों तक दुर्गम रहने वाला इलाका—इन हालातों में आतंकियों का टिके रहना अपने आप में एक बड़ा सवाल है। बंकर से जो सामान मिला है, उसमें शामिल हैं: * मैगी और इंस्टेंट फूड * बासमती चावल, दालें, मसाले * गैस सिलेंडर, बर्तन * थर्मल कपड़े, कंबल और सर्दियों का सामान विशेषज्ञों के अनुसार, यह राशन कुछ दिनों का नहीं, बल्कि महीनों तक चलने वाला है। इससे साफ है कि आतंकी किसी अस्थायी मिशन पर नहीं, बल्कि लंबे समय के लिए इलाके में जमे रहने की रणनीति पर काम कर रहे थे। सप्लाई लाइन बिना मदद के नामुमकिन इतनी ऊँचाई पर न तो दुकान है, न सड़क और न ही आम लोगों की आवाजाही। ऐसे में सवाल उठता है— यह राशन आखिर पहुंचा कैसे? सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि इसके पीछे: * स्थानीय ओवरग्राउंड वर्कर्स (OGW) * जंगल और पहाड़ी रास्तों की जानकारी रखने वाले मददगार * सीमापार बैठे हैंडलरों के निर्देश हो सकते हैं। जांच एजेंसियों को शक है कि राशन किश्तवाड़ के निचले इलाकों से चरणबद्ध तरीके से ऊपर पहुंचाया गया। बंकर में सर्दियों के पूरे इंतज़ाम यह संकेत देते हैं कि आतंकी बर्फबारी के दौरान भी ऑपरेशन जारी रखने की योजना बना रहे थे। आमतौर पर इस मौसम में आतंकी गतिविधियां धीमी पड़ जाती हैं, लेकिन इस बंकर ने उस धारणा को चुनौती दी है। जंगल भले ही शांत दिखते हों, लेकिन सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक: “यह बंकर बताता है कि आतंकी अब ऊँचाई वाले इलाकों में लंबे समय तक छिपकर रहने की रणनीति अपना रहे हैं।” ड्रोन सर्विलांस, मोबाइल डेटा एनालिसिस और स्थानीय पूछताछ के जरिए अब मददगारों की पहचान की जा रही है। इस ऑपरेशन के बाद फोकस सिर्फ आतंकियों पर नहीं, बल्कि: * राशन पहुंचाने वाले * सूचना देने वाले * शरण देने वाले पूरे नेटवर्क को तोड़ने पर है। एजेंसियों का मानना है कि जब तक सप्लाई लाइन खत्म नहीं होगी, तब तक आतंकी ठिकाने दोबारा बनते रहेंगे।

13 राज्यों से 50 स्टेट तक: अमेरिका का विस्तारवादी सफ़र और ‘ऑपरेशन ग्रीनलैंड’ की अंदरूनी कहानी

विशेष रिपोर्ट :डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड को लेकर दिए गए बयानों ने एक बार फिर अमेरिका के विस्तारवादी इतिहास को वैश्विक बहस के केंद्र में ला दिया है। यह कोई नई सोच नहीं है—अमेरिका का इतिहास ही विस्तार, खरीद, युद्ध और कूटनीति के ज़रिये सीमाएँ बढ़ाने की कहानी है। आज का अमेरिका, जो 50 राज्यों का संघ है, कभी केवल 13 उपनिवेशों तक सीमित था। सवाल यह है कि यह परिवर्तन कैसे और किन ऐतिहासिक मोड़ों से होकर गुज़रा? शुरुआत: 13 उपनिवेशों से एक राष्ट्र तक (1776) 1776 में ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता प्राप्त करने के समय अमेरिका केवल अटलांटिक तट के किनारे बसे 13 उपनिवेशों का समूह था। ये राज्य थे—न्यू हैम्पशायर, मैसाचुसेट्स, रोड आइलैंड, कनेक्टिकट, न्यूयॉर्क, न्यू जर्सी, पेनसिल्वेनिया, डेलावेयर, मैरीलैंड, वर्जीनिया, नॉर्थ कैरोलाइना, साउथ कैरोलाइना और जॉर्जिया। स्वतंत्रता के तुरंत बाद ही अमेरिका में यह धारणा मज़बूत होने लगी कि उसे पूरे महाद्वीप में फैलना चाहिए—इसे बाद में “मैनिफेस्ट डेस्टिनी” कहा गया। लुइसियाना खरीद: एक सौदे ने बदला नक्शा (1803) अमेरिकी विस्तार की सबसे निर्णायक घटना थी लुइसियाना परचेज़। 1803 में अमेरिका ने फ्रांस से लगभग 8 लाख वर्ग मील क्षेत्र मात्र 15 मिलियन डॉलर में खरीद लिया। * इससे अमेरिका का क्षेत्रफल लगभग दोगुना हो गया * मिसिसिपी नदी पर नियंत्रण मिला * पश्चिम की ओर विस्तार का रास्ता खुल गया यह सौदा आज भी इतिहास के सबसे सस्ते और प्रभावशाली भू-राजनीतिक सौदों में गिना जाता है। फ्लोरिडा से लेकर टेक्सास तक: दबाव और कूटनीति * 1819 में स्पेन से फ्लोरिडा हासिल किया गया * 1845 में टेक्सास को अमेरिका में शामिल किया गया, जो पहले मैक्सिको का हिस्सा था टेक्सास के विलय ने सीधे तौर पर अगले बड़े संघर्ष की नींव रखी। मेक्सिको-अमेरिका युद्ध: ताक़त से सीमाओं का विस्तार (1846–1848)इस युद्ध के बाद अमेरिका ने मैक्सिको से विशाल क्षेत्र हासिल किए: * कैलिफ़ोर्निया * नेवादा * यूटा * एरिज़ोना * न्यू मैक्सिको * कोलोराडो का बड़ा हिस्सा इसके बाद अमेरिका प्रशांत महासागर तक पहुँच गया और एक महाद्वीपीय शक्ति बन गया। 1867 में अमेरिका ने रूस से अलास्का को 7.2 मिलियन डॉलर में खरीदा। उस समय इसे “सीवर्ड्स फॉली” (सीवर्ड की मूर्खता) कहा गया, लेकिन बाद में: * सोना * तेल * प्राकृतिक गैस * सामरिक स्थिति ने इसे अमेरिका की रणनीतिक संपत्ति बना दिया। 1898 में अमेरिका ने हवाई को अपने नियंत्रण में लिया। यही वह दौर था जब अमेरिका ने खुद को केवल महाद्वीपीय नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति के रूप में देखना शुरू किया। 50वां राज्य: विस्तार की अंतिम कड़ी (1959) * अलास्का – जनवरी 1959 * हवाई – अगस्त 1959 इनके साथ अमेरिका आधिकारिक रूप से 50 राज्यों का देश बना। ट्रंप और ‘ऑपरेशन ग्रीनलैंड’: इतिहास की गूंज डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड को “खरीदने” का विचार पहली बार 2019 में सामने आया। भले ही यह प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ा, लेकिन: * यह अमेरिका की ऐतिहासिक विस्तारवादी सोच की याद दिलाता है * आर्कटिक क्षेत्र में संसाधनों और रणनीतिक बढ़त की दौड़ को दर्शाता है * चीन और रूस की बढ़ती मौजूदगी के संदर्भ में इसे देखा गया ग्रीनलैंड आज भी डेनमार्क का हिस्सा है, लेकिन ट्रंप का बयान यह दिखाता है कि अमेरिकी राजनीति में भू-रणनीतिक विस्तार की सोच अब भी जीवित है। 13 राज्यों से 50 राज्यों तक का अमेरिका का सफ़र केवल नक्शे का विस्तार नहीं था—यह शक्ति, संसाधन, युद्ध और कूटनीति का मिश्रण रहा है। ट्रंप का ग्रीनलैंड बयान उसी लंबी ऐतिहासिक परंपरा की एक आधुनिक झलक है। अमेरिका का इतिहास बताता है—उसकी सीमाएँ हमेशा सिर्फ़ ज़मीन से नहीं, बल्कि महत्वाकांक्षाओं से तय हुई हैं।

प्रयागराज माघ मेले में शंकराचार्य पद को लेकर टकराव, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने प्रशासन को दिया कड़ा जवाब

प्रयागराज। प्रयागराज माघ मेले के दौरान ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और मेला प्रशासन के बीच चल रहा विवाद लगातार गहराता जा रहा है। मामला अब सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की व्याख्या और शंकराचार्य पद की मान्यता तक पहुंच गया है। मेला प्रशासन द्वारा सुप्रीम कोर्ट का हवाला देते हुए जारी नोटिस और स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के जवाब के बाद यह विवाद सार्वजनिक चर्चा का विषय बन गया है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने मेला प्रशासन पर सवाल उठाते हुए कहा कि जिस सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला दिया जा रहा है, उसमें कहीं भी यह नहीं लिखा है कि उनके नाम के आगे ‘शंकराचार्य’ न लगाया जाए। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, “हम कोई पट्टा अभिषेक या जमीन का विवाद माघ मेले में नहीं कर रहे हैं। अगर ऐसा कोई स्पष्ट आदेश है, तो प्रशासन उसे शब्दशः दिखाए।” उन्होंने यह भी कहा कि जब केंद्र सरकार स्वयं कोर्ट में एक पक्ष के रूप में खड़ी होती है, तब उनके नाम के आगे ‘शंकराचार्य’ लिखा जाता है। ऐसे में मेला प्रशासन द्वारा अलग मानदंड अपनाना समझ से परे है। माघ मेला प्राधिकरण ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को नोटिस जारी कर 24 घंटे के भीतर जवाब देने को कहा है। नोटिस में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का हवाला देते हुए यह स्पष्ट किया गया है कि मेला प्रशासन उन्हें ज्योतिष पीठ का शंकराचार्य नहीं मानता। इसी मुद्दे पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का तीखा प्रतिवाद सामने आया है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने शंकराचार्य पद की परंपरागत व्यवस्था का उल्लेख करते हुए कहा कि शंकराचार्य वही होता है, जिसे देश की अन्य तीन पीठों—श्रृंगेरी, द्वारका और पुरी—के शंकराचार्य मान्यता देते हैं। उन्होंने दावा किया कि उन्हें अन्य पीठों के शंकराचार्यों की स्वीकृति प्राप्त है और यही सनातन परंपरा का आधार है। इस पूरे विवाद ने संत समाज और प्रशासन को आमने-सामने खड़ा कर दिया है। एक ओर मेला प्रशासन कानूनी आदेशों का हवाला देकर अपनी स्थिति स्पष्ट कर रहा है, वहीं दूसरी ओर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद इसे धार्मिक परंपराओं और मान्यताओं से जोड़कर देख रहे हैं। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि 24 घंटे की समय-सीमा में दिए जाने वाले जवाब के बाद प्रशासन अगला कदम क्या उठाता है और क्या यह मामला दोबारा अदालत के दरवाजे तक पहुंचेगा। माघ मेले के शांत वातावरण में यह विवाद एक नई बहस को जन्म दे चुका है, जिसका असर आने वाले दिनों में और गहरा सकता है।

राष्ट्रगान पर टकराव: तमिलनाडु विधानसभा में संवैधानिक मर्यादा बनाम परंपरा की बहस

चेन्नई। तमिलनाडु विधानसभा के सत्र के दौरान उस समय अप्रत्याशित राजनीतिक और संवैधानिक तनाव देखने को मिला, जब राज्यपाल आर.एन. रवि राष्ट्रगान को लेकर हुए विवाद के बाद सदन से बाहर निकल गए। राज्यपाल ने तमिल एंथम के तुरंत बाद राष्ट्रगान बजाने की मांग की थी, जिसे विधानसभा अध्यक्ष एम. अप्पावु ने अस्वीकार कर दिया। इसके बाद राज्यपाल ने इसे राष्ट्रगान के सम्मान से जुड़ा विषय बताते हुए सदन छोड़ दिया। विधानसभा सत्र की शुरुआत पारंपरिक रूप से तमिल एंथम के साथ हुई। इसके बाद राज्यपाल आर.एन. रवि ने अपेक्षा जताई कि राष्ट्रगान भी बजाया जाए। उनका तर्क था कि राष्ट्रगान को समुचित सम्मान मिलना चाहिए और यह संवैधानिक भावनाओं के अनुरूप है। हालांकि, स्पीकर अप्पावु ने स्पष्ट किया कि तमिलनाडु विधानसभा की एक स्थापित परंपरा है, जिसके तहत सत्र की शुरुआत तमिल एंथम से होती है और अंत में राष्ट्रगान बजाया जाता है। इसी परंपरा का पालन किया जा रहा है। स्पीकर के इस निर्णय से असंतुष्ट होकर राज्यपाल सदन से बाहर चले गए। राज्यपाल आर.एन. रवि ने इसे केवल प्रक्रिया का नहीं, बल्कि सम्मान और संवैधानिक संकेतों का प्रश्न बताया। उनका मानना है कि राष्ट्रगान को उचित स्थान और सम्मान मिलना चाहिए, खासकर ऐसे मंच पर जो लोकतांत्रिक व्यवस्था का प्रतीक है। सदन से बाहर निकलते समय राज्यपाल का यह कदम राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया और इसे राज्य सरकार तथा राजभवन के बीच चल रहे तनाव की एक और कड़ी के रूप में देखा जा रहा है। स्पीकर अप्पावु और सत्तारूढ़ डीएमके सरकार ने दो टूक कहा कि यह मुद्दा किसी तरह के अपमान से जुड़ा नहीं है। उनके अनुसार, तमिल एंथम और राष्ट्रगान—दोनों का ही सम्मान है और सदन की परंपराओं के अनुसार दोनों का नियत स्थान और समय तय है। सरकार का कहना है कि राज्य की सांस्कृतिक पहचान और संवैधानिक मूल्यों के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है, और इसी भावना के तहत वर्षों से चली आ रही परंपरा का पालन किया जा रहा है। यह घटना केवल एक औपचारिक विवाद नहीं, बल्कि संघीय ढांचे, राज्य की स्वायत्तता और संवैधानिक मर्यादाओं पर चल रही व्यापक बहस को भी उजागर करती है। एक ओर राष्ट्रगान का सम्मान राष्ट्रीय भावना से जुड़ा मुद्दा है, तो दूसरी ओर राज्यों की अपनी परंपराएं और सांस्कृतिक पहचान भी संवैधानिक रूप से मान्य हैं।

सिर्फ 7 मिनट का फॉर्मूला: लंबी उम्र और स्वस्थ जीवन का नया विज्ञान

नई दिल्ली। लंबी उम्र जीना हर किसी की चाह होती है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि सिर्फ ज्यादा साल जीना नहीं, बल्कि उन सालों को स्वस्थ तरीके से जीना असली सफलता है। भारत जैसे देश में, जहां डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और हृदय रोग तेजी से बढ़ रहे हैं, औसतन लोग अपने जीवन के करीब 8–10 साल किसी न किसी गंभीर बीमारी से जूझते हुए बिताते हैं। लेकिन अब राहत की खबर है। अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल द लांसेट में प्रकाशित एक हालिया स्टडी के मुताबिक, रोज़मर्रा की जिंदगी में किए गए बहुत छोटे बदलाव भी आपकी सेहत और उम्र दोनों पर बड़ा असर डाल सकते हैं। नींद के सिर्फ 5 मिनट, सेहत के लिए बड़ा बदलाव स्टडी में बताया गया है कि अगर कोई व्यक्ति रोज़ अपनी नींद में सिर्फ 5 मिनट का इज़ाफा करता है, तो इससे शरीर पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। पर्याप्त नींद: * हार्मोन बैलेंस सुधारती है * इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाती है * तनाव और डिप्रेशन को कम करती है * डायबिटीज और हाई बीपी के खतरे को घटाती है विशेषज्ञों का कहना है कि नींद को “समय की बर्बादी” समझने की सोच बदलनी होगी, क्योंकि यही शरीर की असली मरम्मत का समय होता है। इतना ही नहीं, स्टडी में यह भी सामने आया कि दिन में सिर्फ 2 मिनट की अतिरिक्त वॉक करने से भी स्वास्थ्य पर चौंकाने वाला असर पड़ता है। यह छोटी सी आदत: * ब्लड सर्कुलेशन बेहतर करती है * दिल की बीमारियों का जोखिम घटाती है * मोटापे को कंट्रोल में रखती है * मानसिक थकान कम करती है विशेषज्ञ बताते हैं कि यह जरूरी नहीं कि आप रोज़ घंटों जिम जाएं। निरंतरता और छोटी आदतें ज्यादा असरदार होती हैं। क्यों खास है यह स्टडी भारतीयों के लिए? भारत में तेजी से बदलती जीवनशैली, बैठकर काम करने की आदत और अनियमित दिनचर्या के कारण लोग कम उम्र में ही बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। ऐसे में यह रिसर्च खास इसलिए है क्योंकि इसमें महंगे इलाज या कठिन नियमों की नहीं, बल्कि व्यावहारिक और आसान बदलावों की बात की गई है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर कोई व्यक्ति: * रोज़ 5 मिनट ज्यादा सोए * 2 मिनट ज्यादा चले * मोबाइल और स्क्रीन टाइम थोड़ा कम करे * नियमित दिनचर्या अपनाए तो वह न सिर्फ लंबी उम्र जी सकता है, बल्कि बीमारियों से दूर रहकर एक बेहतर जीवन भी जी सकता है। लंबी और स्वस्थ जिंदगी का राज किसी चमत्कारी दवा में नहीं, बल्कि रोज़ के छोटे फैसलों*में छिपा है। आज लिया गया एक छोटा सा कदम, आने वाले सालों को दर्द और दवाइयों से मुक्त कर सकता है। क्यों न आज से ही शुरुआत की जाए — सिर्फ 7 मिनट से।

टी20 वर्ल्ड कप विवाद में पाकिस्तान ने खींचे कदम, बांग्लादेश को नहीं मिला खुला समर्थन

आईसीसी के फैसले पर नहीं पड़ेगा असर, पीसीबी ने बहिष्कार की अटकलों को बताया बेबुनियाद नई दिल्ली। आगामी टी20 वर्ल्ड कप को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (PCB) ने बांग्लादेश से जुड़ी खबरों पर बड़ा और स्पष्ट संकेत दे दिया है। हाल के दिनों में ऐसी अटकलें तेज़ थीं कि अगर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (ICC) बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड (BCB) की मांगों को नहीं मानती है, तो पाकिस्तान भी टूर्नामेंट से दूरी बना सकता है। हालांकि अब इस पूरे मामले पर पाकिस्तान की स्थिति लगभग साफ हो चुकी है, जिससे भारतीय क्रिकेट फैंस को राहत की खबर मिली है। खेल वेबसाइट RevSportz की रिपोर्ट के मुताबिक, भले ही आईसीसी बांग्लादेश के अनुरोध को खारिज कर दे, लेकिन पाकिस्तान के टी20 वर्ल्ड कप से बहिष्कार करने की संभावना बेहद कम है। पीसीबी से जुड़े एक करीबी सूत्र ने साफ शब्दों में कहा है कि इस पूरे विवाद पर पाकिस्तान ने अब तक कोई आधिकारिक रुख नहीं अपनाया है और न ही उसके पास टूर्नामेंट से हटने का कोई ठोस कारण है। सूत्र के अनुसार, “यह पीसीबी का रुख नहीं है। पाकिस्तान के पास बहिष्कार का कोई आधार नहीं है, क्योंकि आईसीसी पहले ही पाकिस्तान के सभी मुकाबले श्रीलंका में आयोजित करा रही है। कुछ लोग बेवजह इस मुद्दे को तूल देने की कोशिश कर रहे हैं।” दरअसल, इससे पहले खबरें सामने आई थीं कि बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड ने अपने मौजूदा विवाद में समर्थन जुटाने के लिए पाकिस्तान से संपर्क किया था। कहा जा रहा था कि पीसीबी की ओर से उन्हें सकारात्मक प्रतिक्रिया भी मिली, जिसके बाद यह माना जाने लगा कि दोनों देश मिलकर आईसीसी पर दबाव बना सकते हैं। इसी कड़ी में पाकिस्तान के संभावित बहिष्कार की खबरों ने ज़ोर पकड़ लिया था और वर्ल्ड क्रिकेट में हलचल मच गई थी। लेकिन अब ताज़ा जानकारी के बाद यह लगभग स्पष्ट हो गया है कि पाकिस्तान इस मामले में कोई बड़ा कदम उठाने के मूड में नहीं है। आईसीसी द्वारा पहले से तय किए गए कार्यक्रम और पाकिस्तान के मैचों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था (श्रीलंका में आयोजन) के चलते पीसीबी को किसी तरह की आपत्ति नहीं है। इस पूरे घटनाक्रम का असर यह हुआ है कि टी20 वर्ल्ड कप को लेकर अनिश्चितता का माहौल काफी हद तक कम हो गया है। खास तौर पर भारतीय फैंस के लिए यह खबर सुकून देने वाली है, क्योंकि टूर्नामेंट के बहिष्कार जैसी किसी भी स्थिति से प्रतियोगिता की रोमांचक तस्वीर प्रभावित हो सकती थी। फिलहाल, नज़रें अब आईसीसी के अंतिम फैसले पर टिकी हैं, लेकिन इतना तय माना जा रहा है कि पाकिस्तान मैदान से बाहर किसी बड़े विवाद का हिस्सा बनने के बजाय क्रिकेट पर ही फोकस करना चाहता नोट दिखाई दे रहा है।

“पार्टी से पहले संगठन”: नितिन नवीन के अध्यक्ष बनते ही बोले पीएम मोदी— ‘आज मेरे बॉस हैं, मैं उनका कार्यकर्ता’

नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी (BJP) के संगठनात्मक इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ गया, जब नितिन नवीन ने पार्टी के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में औपचारिक रूप से पदभार संभाला। इस मौके पर आयोजित कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं उपस्थित रहे और उन्होंने अपने संबोधन से न केवल माहौल को भावुक बनाया, बल्कि पार्टी की संगठनात्मक संस्कृति का भी सशक्त संदेश दिया। प्रधानमंत्री मोदी ने नितिन नवीन को बधाई देते हुए कहा,“आज नितिन नवीन मेरे बॉस हैं और मैं उनका कार्यकर्ता हूं।” पीएम मोदी का यह बयान मंच से उतरकर सियासी गलियारों तक गूंजता रहा। इसे भाजपा की उस परंपरा के रूप में देखा जा रहा है, जहां पद से पहले संगठन और व्यक्ति से पहले विचारधारा को महत्व दिया जाता है। अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने कहा कि भाजपा दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी इसलिए बनी है क्योंकि यहां नेतृत्व अहंकार नहीं, सेवा भाव से चलता है। अध्यक्ष का पद केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि करोड़ों कार्यकर्ताओं की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करता है। उन्होंने आगे कहा कि नितिन नवीन का संगठनात्मक अनुभव, जमीन से जुड़ा स्वभाव और कार्यकर्ताओं से संवाद करने की क्षमता पार्टी को नई ऊंचाइयों तक ले जाएगी। नितिन नवीन ने पदभार ग्रहण करते हुए कहा कि यह उनके लिए सम्मान के साथ-साथ एक बड़ी जिम्मेदारी भी है। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी, पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि— “मैं इस पद को सत्ता नहीं, सेवा का माध्यम मानता हूं। संगठन को और मजबूत करना मेरी पहली प्राथमिकता होगी।” नवीन ने स्पष्ट किया कि आने वाले समय में पार्टी का फोकस युवाओं, महिलाओं, किसानों और अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक संगठन की पकड़ मजबूत करने पर रहेगा। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, प्रधानमंत्री मोदी का “मैं कार्यकर्ता हूं” वाला बयान केवल विनम्रता नहीं, बल्कि 2029 और उससे आगे की राजनीति के लिए संगठन को केंद्र में रखने की रणनीति का संकेत है। यह संदेश साफ है कि भाजपा में व्यक्ति नहीं, संगठन चलता है। देशभर के भाजपा कार्यकर्ताओं में इस बदलाव को लेकर खासा उत्साह देखा गया। सोशल मीडिया से लेकर पार्टी कार्यालयों तक, नितिन नवीन के नेतृत्व में नए जोश और नई दिशा की चर्चा है। नितिन नवीन का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना केवल नेतृत्व परिवर्तन नहीं, बल्कि भाजपा की उस परंपरा की पुनर्पुष्टि है जहां *नेता भी कार्यकर्ता होता है प्रधानमंत्री मोदी का बयान इस बात का प्रतीक है कि सत्ता के शिखर पर बैठा व्यक्ति भी संगठन के अनुशासन में खुद को सबसे नीचे खड़ा मानता है—और यही भाजपा की असली ताकत है।

नोएडा हादसे में बड़ी कार्रवाई: इंजीनियर युवराज की मौत के मामले में बिल्डर अभय कुमार गिरफ्तार, लापरवाही पर प्रशासन सख्त

नोएडा। नोएडा के सेक्टर-150 स्थित एक आवासीय परियोजना में इंजीनियर युवराज की दर्दनाक मौत के मामले में पुलिस ने बड़ी कार्रवाई करते हुए बिल्डर अभय कुमार को गिरफ्तार कर लिया है। यह घटना उस समय सामने आई जब बेसमेंट में भरे पानी में डूबने से युवराज की जान चली गई। मामले ने तूल पकड़ने के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने स्वयं संज्ञान लिया, जिसके बाद प्रशासन और पुलिस हरकत में आई। बेसमेंट बना मौत का कारण प्राप्त जानकारी के अनुसार, संबंधित प्रोजेक्ट के बेसमेंट में लंबे समय से पानी भरा हुआ था। उचित जल निकासी और सुरक्षा इंतजाम न होने के चलते यह जगह खतरनाक बन चुकी थी। इसी लापरवाही का शिकार इंजीनियर युवराज हुए, जिनकी मौके पर ही मौत हो गई। घटना के बाद स्थानीय लोगों और परिजनों में भारी आक्रोश देखने को मिला। दो बिल्डरों पर दर्ज हुआ मुकदमा पुलिस ने प्रारंभिक जांच के आधार पर दो बिल्डरों के खिलाफ मामला दर्ज किया था। जांच में गंभीर लापरवाही और सुरक्षा मानकों के उल्लंघन के साक्ष्य मिलने के बाद मुख्य आरोपी बिल्डर अभय कुमार को गिरफ्तार कर लिया गया। पुलिस का कहना है कि अन्य आरोपी की भूमिका की भी गहन जांच की जा रही है और जल्द ही आगे की कार्रवाई संभव है। मुख्यमंत्री के संज्ञान के बाद तेज हुई कार्रवाई मामले की गंभीरता को देखते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तत्काल संज्ञान लिया। इसके बाद नोएडा प्राधिकरण में भी हलचल मच गई। लापरवाही के आरोपों के चलते प्राधिकरण के सीईओ पर भी गाज गिरी और उनसे जवाब-तलब किया गया। प्रशासन ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि इस तरह की घटनाओं में जिम्मेदारों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा। इस पूरे मामले ने एक बार फिर रियल एस्टेट परियोजनाओं में सुरक्षा और रखरखाव पर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रशासन का कहना है कि नोएडा सहित पूरे प्रदेश में बिल्डरों द्वारा सुरक्षा मानकों की अनदेखी पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी, ताकि भविष्य में ऐसी दुखद घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो। इंजीनियर युवराज की मौत ने जहां एक परिवार को अपूरणीय क्षति पहुंचाई है, वहीं यह मामला सिस्टम की लापरवाही और जवाबदेही की भी कड़ी परीक्षा बन गया है। अब सबकी निगाहें आगे होने वाली जांच और न्यायिक प्रक्रिया पर टिकी हैं।

डेढ़ घंटे की कूटनीति, 200 अरब डॉलर की छलांग

भारत–यूएई की मेगा डील ने दक्षिण एशियाई भू-राजनीति का संतुलन बदला नई दिल्ली / अबू धाबी :प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान के बीच हुई महज़ डेढ़ घंटे की मुलाकात ने वैश्विक आर्थिक और रणनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। दोनों देशों ने वर्ष 2032 तक द्विपक्षीय व्यापार को 200 अरब डॉलर तक पहुँचाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है। यह समझौता केवल आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि भारत की तेजी से बढ़ती वैश्विक आर्थिक हैसियत और खाड़ी देशों के साथ उसकी मजबूत होती रणनीतिक साझेदारी का स्पष्ट संकेत है। एक मुलाकात, कई संदेश भारत और यूएई के नेताओं की इस बैठक को कूटनीतिक जानकार “फास्ट-ट्रैक डिप्लोमेसी” का बेहतरीन उदाहरण मान रहे हैं। जिस समझौते को अंतिम रूप देने में कई देशों को वर्षों लग जाते हैं, उसे भारत और यूएई ने बेहद कम समय में ठोस दिशा दे दी। विशेषज्ञों के अनुसार, यह डील उस तथाकथित “ऐतिहासिक”सऊदी समझौते से दस गुना बड़ी है, जिसे लेकर पाकिस्तान लंबे समय से अपनी उपलब्धि के रूप में प्रचार करता रहा है। किन क्षेत्रों में होगा सबसे बड़ा असर इस 200 अरब डॉलर के लक्ष्य को पाने के लिए दोनों देश कई प्रमुख क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर सहमत हुए हैं: * ऊर्जा और नवीकरणीय संसाधन * डिजिटल ट्रेड और फिनटेक * रक्षा और एयरोस्पेस सहयोग * इंफ्रास्ट्रक्चर और लॉजिस्टिक्स * फूड सिक्योरिटी और एग्री-टेक यूएई पहले से ही भारत के शीर्ष व्यापारिक साझेदारों में शामिल है, और यह नया लक्ष्य इस रिश्ते को पूरी तरह रणनीतिक साझेदारी में बदल देता है। पाकिस्तान के लिए असहज संकेत क्षेत्रीय राजनीति पर नज़र रखने वालों का मानना है कि यह डील अप्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तान के लिए भी एक सख़्त संदेश है। जहां पाकिस्तान अभी भी निवेश के वादों और एमओयू के स्तर पर अटका हुआ है, वहीं भारत ठोस परिणामों और दीर्घकालिक लक्ष्यों के साथ आगे बढ़ रहा है। भारत की बदलती वैश्विक छवि यह समझौता इस बात का प्रमाण है कि भारत अब केवल एक उभरती अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में प्रभावशाली भूमिका निभाने वाला देश बन चुका है। मोदी सरकार की आर्थिक कूटनीति—ट्रेड + टेक्नोलॉजी + ट्रस्ट—का यह सबसे मजबूत उदाहरण माना जा रहा है। डेढ़ घंटे की इस मुलाकात ने साफ कर दिया है कि आज की वैश्विक राजनीति में गंभीर नेतृत्व, स्पष्ट दृष्टि और भरोसेमंद साझेदारी ही असली पूंजी है। भारत–यूएई की यह 200 अरब डॉलर की छलांग न सिर्फ आर्थिक इतिहास रचेगी, बल्कि आने वाले दशक में एशिया और खाड़ी क्षेत्र की शक्ति-संतुलन को भी नए सिरे से परिभाषित करेगी।

सिलीगुड़ी कॉरिडोर के साए में कूटनीति: भारत के लिए नई चुनौती खड़ी कर रहा बांग्लादेश–चीन समीकरण

विशेष रिपोर्ट | भारत–बांग्लादेश संबंधों में चल रहे तनाव के बीच ढाका से एक ऐसा घटनाक्रम सामने आया है, जिसने नई दिल्ली की रणनीतिक चिंताओं को और गहरा कर दिया है। बांग्लादेश में यूनुस सरकार के कार्यकाल के दौरान चीनी राजदूत याओ वेन को तीस्ता नदी परियोजना क्षेत्र का दौरा कराया गया—एक ऐसा इलाका जो भारत के अत्यंत संवेदनशील सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) के बेहद करीब स्थित है। यह दौरा केवल एक तकनीकी या विकासात्मक पहल नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे दक्षिण एशिया की बदलती भू-राजनीति के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। तीस्ता परियोजना: विकास या रणनीतिक दांव? तीस्ता नदी लंबे समय से भारत और बांग्लादेश के बीच जल-विवाद का विषय रही है। अब चीन द्वारा प्रस्तावित तीस्ता मास्टर प्लान को बांग्लादेश में तेजी से आगे बढ़ाने की बात सामने आ रही है। इस परियोजना के तहत नदी प्रबंधन, सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण और इंफ्रास्ट्रक्चर विकास जैसे पहलुओं पर काम होना है, लेकिन इसके पीछे चीन की रणनीतिक मौजूदगी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह परियोजना चीनी तकनीक, फंडिंग और निगरानी में आगे बढ़ती है, तो इससे भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र की सुरक्षा और कनेक्टिविटी पर अप्रत्यक्ष असर पड़ सकता है। सिलीगुड़ी कॉरिडोर: भारत की जीवनरेखा सिलीगुड़ी कॉरिडोर भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को शेष भारत से जोड़ने वाला एकमात्र संकरा भू-भाग है। इसकी चौड़ाई कुछ स्थानों पर मात्र 20–25 किलोमीटर रह जाती है। इसी कारण इस क्षेत्र के आसपास होने वाली हर अंतरराष्ट्रीय गतिविधि भारत के लिए रणनीतिक चेतावनी मानी जाती है। चीनी राजदूत का इस क्षेत्र के नजदीक दौरा और बांग्लादेश सरकार की सक्रिय भूमिका यह संकेत देती है कि ढाका अब केवल संतुलन की नीति तक सीमित नहीं रहना चाहता। यूनुस सरकार का संदेश क्या है? यूनुस सरकार द्वारा चीनी राजदूत को इस संवेदनशील क्षेत्र में ले जाना कई सवाल खड़े करता है: * क्या बांग्लादेश भारत पर दबाव बनाने की रणनीति अपना रहा है? * क्या चीन को क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में बड़ी भूमिका देने की तैयारी है? * या फिर यह भारत को यह संदेश है कि ढाका के पास विकल्प मौजूद हैं? राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह कदम भारत के साथ चल रही बातचीत—चाहे वह जल बंटवारा हो, व्यापार या सीमा प्रबंधन—में बांग्लादेश की सौदेबाजी की ताकत बढ़ाने का प्रयास भी हो सकता है।