पूर्णिया, प्रतिनिधि। बिहार के पूर्णिया जिले के बनमनखी अनुमंडल अंतर्गत सिकलीगढ़ धरहरा गांव सोमवार की देर संध्या आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक वैभव के अद्भुत संगम का साक्षी बना। मान्यता है कि इसी पावन भूमि पर भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए भगवान नरसिंह खंभा फाड़कर प्रकट हुए थे। इस ऐतिहासिक आस्था से जुड़ा राजकीय होलिका दहन महोत्सव इस वर्ष भी भव्यता और दिव्यता के साथ संपन्न हुआ, जिसमें करीब एक लाख से अधिक श्रद्धालुओं की उपस्थिति ने आयोजन को ऐतिहासिक बना दिया।

प्रह्लाद स्तंभ परिसर में आयोजित इस महोत्सव का उद्घाटन बिहार सरकार की खाद्य एवं उपभोक्ता संरक्षण मंत्री लेसी सिंह और बनमनखी के विधायक कृष्ण कुमार ऋषि ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलित कर किया। कार्यक्रम का आयोजन राज्य के कला, संस्कृति एवं युवा विभाग द्वारा किया गया।

उद्घाटन अवसर पर मंत्री लेसी सिंह ने कहा कि सिकलीगढ़ धरहरा केवल पूर्णिया ही नहीं, बल्कि पूरे देश की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक धरोहर है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार इस ऐतिहासिक स्थल के संरक्षण, संवर्द्धन और धार्मिक पर्यटन के रूप में इसके विकास के लिए प्रतिबद्ध है। वहीं विधायक कृष्ण कुमार ऋषि ने कहा कि सिकलीगढ़ धरहरा को धार्मिक पर्यटन के राष्ट्रीय मानचित्र पर सशक्त पहचान दिलाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि यहां के कण-कण में भगवान नरसिंह की आस्था रची-बसी है और अनेक पुरातात्विक साक्ष्य इसकी पुष्टि करते हैं।

वैदिक मंत्रोच्चार और विधि-विधान के बीच जैसे ही विशाल होलिका में अग्नि प्रज्वलित हुई, पूरा परिसर “नरसिंह भगवान की जय” के उद्घोष से गूंज उठा। आसमान रंग-बिरंगी आतिशबाजी से जगमगा उठा और श्रद्धालुओं ने परंपरागत ‘धुरखेल’ की शुरुआत की। यहां सदियों से चली आ रही मान्यता के अनुसार होलिका की भस्म से होली खेली जाती है, जिसे अत्यंत शुभ और पवित्र माना जाता है।

इस अनूठी परंपरा को देखने और उसमें सहभागिता के लिए बिहार के विभिन्न जिलों के अलावा नेपाल, झारखंड और पश्चिम बंगाल से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी धरती पर दैत्यराज हिरण्यकश्यप की बहन होलिका भक्त प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठी थी, किंतु वरदान के बावजूद वह स्वयं भस्म हो गई और प्रह्लाद सुरक्षित बच गए। इसके पश्चात भगवान विष्णु ने नरसिंह अवतार धारण कर हिरण्यकश्यप का वध किया। यह घटना अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक मानी जाती है, जो आगे चलकर होली पर्व के रूप में स्थापित हुई।

आयोजन को लेकर प्रशासन ने व्यापक सुरक्षा प्रबंध किए थे। कार्यक्रम स्थल से लगभग डेढ़ किलोमीटर पहले बैरिकेडिंग कर वाहनों का प्रवेश रोका गया था। महिला एवं पुरुष श्रद्धालुओं के लिए अलग-अलग प्रवेश एवं निकास द्वार बनाए गए थे। बड़ी संख्या में पुलिस बल और दंडाधिकारियों की तैनाती के कारण पूरा आयोजन शांतिपूर्ण और सुव्यवस्थित ढंग से संपन्न हुआ।

सिकलीगढ़ धरहरा में आयोजित यह राजकीय होलिका दहन महोत्सव केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आस्था, इतिहास और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत उत्सव बनकर उभरा। इस आयोजन ने एक बार फिर पूर्णिया को देश-विदेश के श्रद्धालुओं के आध्यात्मिक केंद्र के रूप में स्थापित कर दिया है।

Rajnish Pandey
A media professional with experience in print and digital journalism, handling news editing and content management with a focus on accuracy and responsible reporting.

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