पटना। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) में तेजस्वी यादव को राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनाए जाने के बाद बिहार की राजनीति में बयानबाज़ी तेज़ हो गई है। विपक्षी दलों ने इस फैसले को लेकर न सिर्फ सवाल उठाए हैं, बल्कि राजद की आंतरिक लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर भी निशाना साधा है। इस सियासी घमासान में लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान का बयान सबसे ज्यादा चर्चा में है।
चिराग पासवान का सीधा सवाल—काबिलियत या विरासत?
चिराग पासवान ने तेजस्वी यादव की राजनीतिक क्षमता पर सवाल उठाते हुए कहा कि राजद आज भी एक परिवार के इर्द-गिर्द सिमटी हुई पार्टी है। उनके मुताबिक, “राजद में पद और जिम्मेदारी योग्यता के आधार पर नहीं, बल्कि पारिवारिक पहचान के आधार पर तय होती है।”
उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि अगर किसी दल में एक ही परिवार के सदस्य बार-बार शीर्ष पदों पर आसीन हों, तो यह लोकतंत्र नहीं, बल्कि वंशवाद का उदाहरण है।
जदयू ने उठाया आपराधिक मामलों का मुद्दा
वहीं, जनता दल (यूनाइटेड) ने भी तेजस्वी यादव की नियुक्ति पर सवाल खड़े किए हैं। जदयू नेताओं ने तेजस्वी यादव पर दर्ज आपराधिक मामलों का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे व्यक्ति को राष्ट्रीय स्तर की जिम्मेदारी देना गलत संदेश देता है। पार्टी नेताओं का कहना है कि नैतिकता और राजनीतिक शुचिता की बात करने वाली पार्टियों को पहले अपने घर में झांकना चाहिए।
राजद का पलटवार—युवाओं की आवाज हैं तेजस्वी
राजद की ओर से इन आरोपों को सिरे से खारिज किया गया है। पार्टी नेताओं का कहना है कि तेजस्वी यादव को उनकी संगठनात्मक क्षमता, युवाओं के बीच लोकप्रियता और राजनीतिक अनुभव के आधार पर यह जिम्मेदारी दी गई है।
राजद प्रवक्ताओं ने कहा कि “तेजस्वी यादव आज बिहार की सबसे मजबूत विपक्षी आवाज हैं और जनता ने उन्हें बार-बार अपना समर्थन दिया है।”
बिहार की राजनीति में फिर गर्माया वंशवाद का मुद्दा
तेजस्वी यादव की नई भूमिका ने एक बार फिर बिहार की राजनीति में वंशवाद बनाम नेतृत्व क्षमता की बहस को केंद्र में ला दिया है। जहां विपक्ष इसे परिवारवाद का प्रतीक बता रहा है, वहीं राजद इसे राजनीतिक उत्तराधिकार के साथ-साथ जनादेश का सम्मान करार दे रहा है।
आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह विवाद सिर्फ बयानबाज़ी तक सीमित रहता है या बिहार की सियासत में नए राजनीतिक समीकरणों को जन्म देता है।