नई दिल्ली, 27 नवंबर: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने दिल्ली विश्वविद्यालय में पुस्तक का लोकार्पण किया. इस मौके पर उन्होंने कहा कि अध्यात्म एवं विज्ञान में कोई विरोध नहीं है. विज्ञान में भी और अध्यात्म में भी श्रद्धायुक्त व्यक्ति को ही न्याय मिलता है. अपने साधन एवं ज्ञान का अहंकार जिसके पास होता है, उसे न्याय नहीं मिलता है. श्रद्धा में अंधत्व का कोई स्थान नहीं है. जानो और मानो यही श्रद्धा है.

डॉ. मोहन भागवत मंगलवार को दिल्ली विश्वविद्यालय में मुकुल कानिटकर द्वारा लिखित एवं आई व्यू एंटरप्रायजेस द्वारा प्रकाशित जीवन मूल्यों पर आधारित पुस्तक ‘बनाएं जीवन प्राणवान’ के विमोचन के अवसर पर बोल रहे थे. दिल्ली विश्वविद्यालय के उत्तरी परिसर में आयोजित इस पुस्तक विमोचन कार्यक्रम में पंचदशनाम जूना अखाड़ा के आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि जी महाराज तथा दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. योगेश सिंह विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे.

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि गत 2000 वर्षों से विश्व अहंकार के प्रभाव में चला है. मैं अपने ज्ञानेन्द्रिय से जो ज्ञान प्राप्त करता हूं वही सही है. उसके ऊपर कुछ भी नहीं है. इस सोच के साथ मानव तब से चला है जब से विज्ञान का प्रचलन हुआ है. परंतु यही सब कुछ नहीं है. विज्ञान का भी एक दायरा है, एक मर्यादा है.

उन्होंने कहा कि यह भारतीय सनातन संस्कृति की विशेषता है कि हमने बाहर देखने के साथ-साथ अंदर देखना भी प्रारंभ किया. हमने अंदर तह तक जाकर जीवन के सत्य को जान लिया. इसका और विज्ञान का विरोध होने का कोई कारण नहीं है. जानो तब मानो. अध्यात्म में भी यही पद्धति है. साधन अलग है. अध्यात्म में साधन मन है. मन की ऊर्जा प्राण से आती है. यह प्राण की शक्ति जितनी प्रबल होती है उतना ही उस पथ पर आगे जाने के लिए आदमी समर्थ होता है.

इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि पंचदशनाम जूना अखाड़ा के आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि ने कहा कि प्राण का आधार परमात्मा है जो सर्वत्र है. प्राण की सत्ता परमात्मा से ही है, उसमें स्पंदन है. उसी से चेतना है. उसी से अभिव्यक्ति है. उसी से रस संचार है और वही जीवन है. प्राण चैतन्य होता है. स्वामी अवधेशानंद ने दिल्ली विश्वविद्यालय में आकर रोमांचित अनुभव करते हुए कहा कि 70 के दशक में उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ने का सपना देखा था, लेकिन उन्हें राजस्थान जाना पड़ गया. उन्होंने कहा कि यहां आने का विचार उनके मन में 50 वर्ष पहले आया था और वह आज यहां पहुंच पाए हैं. पुस्तक को लेकर उन्होंने अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि परमात्मा की सहज अभिव्यक्ति प्राण है और उसकी व्याख्या इस पुस्तक में है.

तर्क एक सीमा तक ही सही

दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. योगेश सिंह ने इस अवसर पर सभी अतिथियों का स्वागत किया. उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि 100 वर्ष पुराने इस विश्वविद्यालय में मोहन भागवत जी का आना हमारे लिए अविस्मरणीय पल है. कुलपति ने कहा कि आज की पीढ़ी तर्क प्रधान पीढ़ी है. लेकिन, अंग्रेजी में लिखी हर बात को सही मान लेना और हिन्दी व संस्कृत में लिखी बातों पर अधिक तर्क उचित नहीं है. तर्क एक सीमा तक ही सही है. पुस्तक पर चर्चा करते हुए कुलपति ने कहा कि जब हम इस पुस्तक को पढ़ेंगे तो जीवन से संबंधित लाइफ स्टाइल को समझने का मौका मिलेगा. इस पुस्तक में सबको कुछ न कुछ नया मिलेगा. जैसे पत्थर में भी प्राण हैं, ये नई बात है. इस पर बहुत तर्क करना सही नहीं, क्योंकि ज्यादा तर्क से श्रद्धा कम हो जाती है.

भारतीय संस्कृति में सब कुछ वैज्ञानिक है

पुस्तक के लेखक मुकुल कानिटकर ने कहा कि भारतीय संस्कृति में सब कुछ वैज्ञानिक है. आयुर्वेद, वास्तुशास्त्र, स्थापत्य के साथ ही दिनचर्या और ऋतुचर्या के सभी नियम भी बिना कारण के नहीं हैं. हज़ार वर्षों के संघर्ष काल में इस शास्त्र का मूल तत्व विस्मृत हो गया. वही प्राण विद्या है. सारी सृष्टि में प्राण आप्लावित है. उसकी मात्रा और सत्व-रज-तम गुणों के अनुसार ही भारत में जीवन चलता है. मुकुल कानिटकर द्वारा लिखित पुस्तक बनाएं जीवन प्राणवान हिन्दू जीवन मूल्यों को समर्पित है. यह पुस्तक भारतीयता के गूढ़ रहस्यों और हिंदुत्व के सनातन दर्शन पर आधारित है, जिसमें प्राचीन ऋषियों के सिद्धांतों और उनके व्यावहारिक उपयोग को प्रस्तुत किया गया है.

Rajnish Pandey
A media professional with experience in print and digital journalism, handling news editing and content management with a focus on accuracy and responsible reporting.

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