नई दिल्ली। ऑस्कर, ग्रैमी और गोल्डन ग्लोब जैसे अंतरराष्ट्रीय सम्मान हासिल कर चुके ए.आर. रहमान आज दुनिया के सबसे प्रभावशाली संगीतकारों में गिने जाते हैं। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस वैश्विक पहचान से पहले उनका नाम दिलीप कुमार हुआ करता था। 1980 के दशक में, महज़ 23 साल की उम्र में, उन्होंने न सिर्फ़ इस्लाम धर्म अपनाया बल्कि अपना नाम बदलकर अल्लाह रक्खा रहमान रख लिया, जिसे बाद में ए.आर. रहमान के नाम से जाना गया। आखिर ऐसा क्या हुआ जिसने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी?

बचपन से संघर्षों में घिरा जीवन

ए.आर. रहमान का जन्म 6 जनवरी 1967 को तमिलनाडु के मद्रास (अब चेन्नई) में हुआ। उनके पिता आर.के. शेखर दक्षिण भारतीय फिल्मों में संगीतकार थे। लेकिन जब रहमान महज़ 9 साल के थे, तब पिता का अचानक निधन हो गया। परिवार पर आर्थिक संकट आ गया और कम उम्र में ही रहमान को काम करना पड़ा।

संगीत उनके लिए सिर्फ़ कला नहीं, बल्कि परिवार को संभालने का ज़रिया बन गया।

बीमारी, सवाल और आस्था की तलाश

किशोरावस्था और युवावस्था के शुरुआती दौर में रहमान का परिवार लगातार कठिनाइयों से जूझता रहा। इसी दौरान उनकी बहन गंभीर रूप से बीमार पड़ीं। कई इलाजों के बावजूद स्थिति में सुधार नहीं हुआ।

इसी समय परिवार का संपर्क क़ादिरी इस्लामी सूफ़ी संत शेख क़ादिर से हुआ। सूफ़ी परंपरा की आध्यात्मिक शिक्षाओं और प्रार्थनाओं का परिवार पर गहरा असर पड़ा। रहमान की बहन की तबीयत में धीरे-धीरे सुधार आने लगा, जिसने पूरे परिवार को भीतर तक झकझोर दिया।

23 साल में लिया बड़ा फैसला

इन घटनाओं ने दिलीप कुमार को जीवन, ईश्वर और आस्था पर नए सिरे से सोचने पर मजबूर किया। लंबे आत्ममंथन और अध्ययन के बाद, 1989 में 23 साल की उम्र में उन्होंने अपनी मां और बहनों के साथ इस्लाम धर्म अपनाया।

इसके साथ ही उनका नाम बदला गया—

* दिलीप कुमार → अल्लाह रक्खा रहमान

बाद में यही नाम संक्षेप में ए.आर. रहमान के रूप में दुनिया भर में मशहूर हुआ।

नाम बदला, सोच बदली, संगीत को मिला नया आयाम

धर्म परिवर्तन के बाद रहमान के संगीत में एक गहराई, शांति और आध्यात्मिकता साफ़ झलकने लगी। सूफ़ी संगीत, इंसानियत, प्रेम और ईश्वर से जुड़ाव उनके सुरों का अहम हिस्सा बन गया।

उन्होंने खुद कई बार कहा है कि इस्लाम और सूफ़ी विचारधारा ने उन्हें अनुशासन, धैर्य और विनम्रता सिखाई, जो उनके रचनात्मक जीवन की नींव बनी।

ऑस्कर तक पहुंचा सफ़र

1992 में रोज़ा फ़िल्म के संगीत से धमाकेदार एंट्री करने वाले रहमान ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। दिल से, ताल, लगान, रंग दे बसंती से लेकर स्लमडॉग मिलियनेयर तक—

2009 में ऑस्कर अवॉर्ड जीतकर उन्होंने भारतीय संगीत को वैश्विक पहचान दिलाई।

निजी आस्था, सार्वजनिक प्रेरणा

ए.आर. रहमान आज भी अपनी निजी आस्था को बेहद सादगी से जीते हैं। वे मानते हैं कि धर्म उनके लिए दिखावे का नहीं, बल्कि आत्मिक संतुलन का माध्यम है।

उनकी कहानी बताती है कि आस्था, संघर्ष और कला जब एक साथ चलते हैं, तो साधारण इंसान भी असाधारण बन सकता है।

Rajnish Pandey
A media professional with experience in print and digital journalism, handling news editing and content management with a focus on accuracy and responsible reporting.

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