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मुंबई। महाराष्ट्र में आगामी नगर निकाय चुनावों से पहले राजनीति में बड़ा उलटफेर देखने को मिल रहा है। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने स्थानीय स्तर पर अलग-अलग दलों के साथ गठबंधन कर सभी को चौंका दिया है। ठाणे जिले के अंबरनाथ में कांग्रेस के साथ तालमेल और विदर्भ के अकोला जिले के आकोट में AIMIM के साथ समझौते ने सियासी गलियारों में हलचल तेज कर दी है। इन फैसलों से पार्टी के भीतर भी असहजता दिख रही है और उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की नाराजगी की चर्चाएं सामने आ रही हैं।

स्थानीय मजबूरी या राजनीतिक प्रयोग?

सूत्रों के मुताबिक, बीजेपी ने यह गठबंधन पूरी तरह ‘स्थानीय परिस्थितियों’ को ध्यान में रखकर किए हैं। अंबरनाथ में जहां कांग्रेस के साथ साझा उम्मीदवार उतारे गए हैं, वहीं आकोट में AIMIM से समझौता कर मुकाबले को त्रिकोणीय होने से रोका गया है। पार्टी नेताओं का तर्क है कि निकाय चुनावों में विचारधारा से ज्यादा स्थानीय समीकरण, जातीय संतुलन और जीत की संभावना अहम होती है।

विपक्ष का हमला, समर्थकों में असमंजस

बीजेपी के इन कदमों पर विपक्ष ने तीखा हमला बोला है। कांग्रेस और शिवसेना (उद्धव गुट) ने सवाल उठाया है कि जो पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस और AIMIM की नीतियों का विरोध करती रही है, वही अब स्थानीय चुनावों में उनके साथ हाथ मिला रही है। वहीं बीजेपी के कुछ समर्थकों और कार्यकर्ताओं में भी असमंजस की स्थिति है, जो इसे ‘सिद्धांतों से समझौता’ बता रहे हैं।

फडणवीस की भूमिका पर अटकलें

राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि देवेंद्र फडणवीस इन गठबंधनों से पूरी तरह सहमत नहीं हैं। हालांकि पार्टी की ओर से आधिकारिक बयान में इसे ‘स्थानीय इकाइयों का निर्णय’ बताया गया है, लेकिन संकेत मिल रहे हैं कि शीर्ष नेतृत्व इस प्रयोग के नतीजों पर करीबी नजर रखे हुए है।

क्या बदलेगा महाराष्ट्र का सियासी गणित?

विश्लेषकों का मानना है कि अगर ये गठबंधन सफल रहते हैं, तो बीजेपी भविष्य में भी निकाय स्तर पर लचीली रणनीति अपना सकती है। वहीं असफलता की स्थिति में पार्टी के भीतर नेतृत्व और रणनीति को लेकर बहस तेज हो सकती है। कुल मिलाकर, महाराष्ट्र के निकाय चुनाव इस बार सिर्फ स्थानीय सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि राज्य की राजनीति की दिशा तय करने वाले साबित हो सकते हैं।

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