जिस डिजिटल क्रांति ने भारत की गलियों, ठेलों और छोटे दुकानों को कैशलेस बना दिया, वही यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) अब अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की तकनीकी ताकत का प्रतीक बनता जा रहा है। हाल ही में जापान में UPI के ट्रायल की शुरुआत ने यह साफ कर दिया है कि भारत का डिजिटल पेमेंट सिस्टम अब केवल घरेलू जरूरत नहीं, बल्कि वैश्विक समाधान के रूप में देखा जा रहा है।
दुकान से दुनिया तक का सफ़र
कुछ साल पहले तक भारत में डिजिटल पेमेंट को लेकर संदेह था—इंटरनेट, स्मार्टफोन और सुरक्षा को लेकर सवाल उठते थे। लेकिन UPI ने इन तमाम आशंकाओं को पीछे छोड़ दिया। आज सब्ज़ी वाले से लेकर बड़े मॉल, टैक्सी ड्राइवर से लेकर ऑनलाइन शॉपिंग तक—एक QR कोड और मोबाइल फोन ने लेन-देन की पूरी तस्वीर बदल दी है।
UPI की सबसे बड़ी ताकत उसकी सरलता, रफ्तार और भरोसा है। बिना कार्ड, बिना वॉलेट और बिना लंबी प्रक्रिया—सीधे बैंक से बैंक ट्रांजैक्शन। यही मॉडल अब दुनिया को आकर्षित कर रहा है।
जापान में ट्रायल: भारत की टेक्नोलॉजी को वैश्विक मान्यता
जापान जैसे तकनीकी रूप से उन्नत देश में UPI का ट्रायल शुरू होना अपने आप में बड़ी बात है। यह संकेत है कि भारत का डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर अब केवल “यूज़र बेस” के कारण नहीं, बल्कि टेक्नोलॉजिकल क्वालिटी और स्केलेबिलिटी के कारण अपनाया जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह ट्रायल सफल रहता है, तो भविष्य में भारतीय पर्यटक जापान में भी उसी तरह UPI से भुगतान कर सकेंगे, जैसे वे भारत में करते हैं—बिना करेंसी एक्सचेंज की झंझट के।
डिजिटल डिप्लोमेसी का नया चेहरा
UPI अब सिर्फ एक पेमेंट सिस्टम नहीं रहा। यह भारत की डिजिटल डिप्लोमेसी का अहम हिस्सा बन चुका है। पहले जहां भारत सॉफ्टवेयर सर्विसेज के लिए जाना जाता था, अब वह डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) के लिए पहचाना जा रहा है।
आज कई देश भारत के UPI मॉडल को अपनाने या उससे सीखने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। यह भारत के लिए आर्थिक ही नहीं, रणनीतिक बढ़त भी है।