पटना। बिहार सरकार ने राज्य में पुलिस अधिकारियों और कर्मियों के खिलाफ अभियोजन (मुकदमा चलाने) की प्रक्रिया को लेकर बड़ा प्रशासनिक फैसला लिया है। गृह विभाग द्वारा जारी नई अधिसूचना के अनुसार अब किसी भी पुलिस अधिकारी या कर्मचारी पर कानूनी कार्रवाई शुरू करने से पहले राज्य सरकार की पूर्व स्वीकृति लेना अनिवार्य होगा।
यह प्रावधान भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 218(2) के तहत लागू किया गया है। इस धारा में पहले “केंद्र सरकार” से अनुमति का प्रावधान था, जिसे राज्य स्तर पर संशोधित करते हुए “राज्य सरकार” को अधिकृत किया गया है। गृह विभाग के मुताबिक, यह बदलाव प्रशासनिक स्पष्टता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के उद्देश्य से किया गया है।
क्या है अधिसूचना का प्रावधान?
नई व्यवस्था के तहत:
- किसी भी पुलिस अधिकारी या कर्मी के खिलाफ अदालत
- अभियोजन शुरू करने से पहले राज्य सरकार की अनुमति आवश्यक होगी।
- संबंधित विभाग प्रस्ताव की जांच-पड़ताल कर अपनी अनुशंसा राज्य सरकार को भेजेगा।
- अनुमति मिलने के बाद ही विधिक प्रक्रिया आगे बढ़ सकेगी।
सरकार का कहना है कि यह कदम पुलिस बल को उनके कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान अनावश्यक कानूनी दबाव से बचाने के लिए उठाया गया है, ताकि कानून-व्यवस्था बनाए रखने में बाधा न आए।
पृष्ठभूमि में हालिया घटनाक्रम
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यह आदेश ऐसे समय में आया है जब आईपीएस अधिकारी सुनील नायक को गिरफ्तार करने की कोशिश से जुड़ी घटनाओं के बाद पुलिस कार्यप्रणाली और सुरक्षा मानकों की समीक्षा की जा रही थी। सूत्रों के अनुसार, इस घटनाक्रम के बाद राज्य सरकार ने उच्च स्तर पर विचार-विमर्श किया और कानूनी प्रक्रिया में स्पष्टता लाने की आवश्यकता महसूस की।
सरकार का तर्क
गृह विभाग के अधिकारियों का कहना है कि:
- पुलिसकर्मी अक्सर संवेदनशील परिस्थितियों में कार्य करते हैं।
- कई बार ड्यूटी के दौरान लिए गए निर्णयों पर बाद में कानूनी विवाद खड़े हो जाते हैं।
- पूर्व स्वीकृति की व्यवस्था से यह सुनिश्चित होगा कि केवल गंभीर और प्रथम दृष्टया प्रमाणित मामलों में ही अभियोजन की प्रक्रिया शुरू हो।
सरकार का दावा है कि इस कदम से कानून-व्यवस्था और पुलिस कर्मियों की कार्यस्वतंत्रता के बीच संतुलन स्थापित करने में मदद मिलेगी।
संभावित प्रभाव
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से पुलिस अधिकारियों को कार्य निष्पादन में मनोबल मिलेगा, लेकिन साथ ही पारदर्शिता और निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा। विपक्षी दलों की ओर से इस निर्णय पर प्रतिक्रिया आना अभी बाकी है, लेकिन इसे प्रशासनिक नियंत्रण और जवाबदेही के संदर्भ में अहम कदम माना जा रहा है।
मुख्य बात: अब बिहार में पुलिस अधिकारियों और कर्मियों पर मुकदमा चलाने की प्रक्रिया सीधे तौर पर राज्य सरकार की अनुमति के अधीन होगी, जिससे अभियोजन की शुरुआत से पहले प्रशासनिक स्तर पर जांच और स्वीकृति अनिवार्य हो गई है।