अमेरिका और भारत के बीच व्यापारिक रिश्तों में एक बार फिर तनाव की लकीरें गहरी हो गई हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारतीय उत्पादों पर 50 फीसदी टैरिफ लगाए जाने के बाद भारत ने भी जवाबी कदम उठाते हुए अमेरिकी दालों के आयात पर 30 फीसदी शुल्क लागू कर दिया है। यह फैसला पिछले साल अक्टूबर से प्रभावी है, लेकिन अब इसके राजनीतिक और आर्थिक असर खुलकर सामने आने लगे हैं।
भारत का यह कदम सिर्फ एक आर्थिक निर्णय नहीं, बल्कि रणनीतिक संदेश भी माना जा रहा है। लंबे समय से भारत और अमेरिका के बीच एक व्यापक व्यापार समझौते को लेकर बातचीत चल रही थी, लेकिन इस टैरिफ वॉर ने उन वार्ताओं को और जटिल बना दिया है। नई दिल्ली का साफ संकेत है कि वह एकतरफा दबाव की नीति को स्वीकार नहीं करेगा।
अमेरिकी राजनीति में हलचल
भारत के इस फैसले से अमेरिकी राजनीति में भी बेचैनी देखी जा रही है। कई अमेरिकी सांसदों ने ट्रंप प्रशासन से भारत के साथ बातचीत का रास्ता अपनाने की अपील की है। उनका कहना है कि भारतीय बाजार अमेरिकी कृषि उत्पादों, खासकर दालों के लिए बेहद अहम है और ऊंचे टैरिफ से अमेरिकी किसानों को सीधा नुकसान होगा।
भारतीय किसानों को संदेश
दूसरी ओर, भारत में इस निर्णय को घरेलू किसानों के हित में उठाया गया कदम बताया जा रहा है। अमेरिकी दालों पर शुल्क बढ़ने से आयात महंगा होगा, जिससे देश के दाल उत्पादक किसानों को राहत मिल सकती है। सरकार इसे “हितों की रक्षा” और “संतुलित व्यापार” की दिशा में जरूरी कदम बता रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर दोनों देश जल्द किसी समझौते पर नहीं पहुंचे, तो यह टैरिफ टकराव और गहरा सकता है। इसका असर सिर्फ दालों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आईटी, फार्मा और ऑटो सेक्टर जैसे अन्य क्षेत्रों में भी तनाव बढ़ सकता है।
फिलहाल, भारत ने साफ कर दिया है कि वह बराबरी के आधार पर व्यापार चाहता है। अब नजर इस बात पर है कि वॉशिंगटन इस कड़े संदेश को कैसे पढ़ता है—टकराव के तौर पर या बातचीत के न्योते के रूप में।