श्रीहरिकोटा: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने रविवार को आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से PSLV-C62/EOS-N1 मिशन के तहत अत्याधुनिक निगरानी उपग्रह ‘अन्वेषा’ का सफल प्रक्षेपण किया। यह उपग्रह रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) द्वारा विकसित एक गोपनीय हाइपरस्पेक्ट्रल निगरानी सैटेलाइट है, जिसका उपयोग रणनीतिक निगरानी और सुरक्षा संबंधी जरूरतों के लिए किया जाएगा। हालांकि, मिशन के दौरान PS3 (तीसरे चरण) में तकनीकी खराबी दर्ज की गई, जिसने वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा दी।
क्या है ‘अन्वेषा’ की खासियत
‘अन्वेषा’ हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग तकनीक से लैस है, जो धरती की सतह से निकलने वाले विभिन्न स्पेक्ट्रल सिग्नल्स का विश्लेषण कर सटीक जानकारी प्रदान करती है। इससे सीमावर्ती इलाकों की निगरानी, संदिग्ध गतिविधियों की पहचान और आपदा प्रबंधन जैसे अहम क्षेत्रों में मदद मिलने की उम्मीद है। रक्षा क्षेत्र में इसे एक बड़ी तकनीकी उपलब्धि माना जा रहा है।
15 सह-उपग्रह भी भेजे गए कक्षा में
इस मिशन के तहत ‘अन्वेषा’ के साथ 15 सह-उपग्रह (को-पैसेंजर सैटेलाइट्स) भी अंतरिक्ष में भेजे गए। ये उपग्रह विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों और स्टार्टअप्स द्वारा विकसित किए गए हैं, जिनका उद्देश्य संचार, पृथ्वी अवलोकन और प्रायोगिक अनुसंधान है। इससे भारत के स्पेस स्टार्टअप इकोसिस्टम को भी मजबूती मिलने की उम्मीद है।
PS3 स्टेज पर तकनीकी खराबी
मिशन के दौरान रॉकेट के तीसरे चरण यानी PS3 स्टेज में तकनीकी समस्या सामने आई। इसरो ने प्रारंभिक बयान में कहा कि खराबी की विस्तृत जांच की जा रही है और सभी टेलीमेट्री डेटा का विश्लेषण किया जाएगा। वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि समस्या का असर मिशन के समग्र उद्देश्यों पर कितना पड़ा है।
इसरो का बयान
इसरो अधिकारियों के मुताबिक, प्रक्षेपण प्रक्रिया के अधिकांश चरण निर्धारित योजना के अनुसार पूरे हुए। एजेंसी ने कहा कि वह पारदर्शिता के साथ तकनीकी पहलुओं की समीक्षा करेगी और भविष्य के मिशनों में सुधार के लिए आवश्यक कदम उठाएगी।
आगे की राह
हाल के वर्षों में PSLV भारत का सबसे भरोसेमंद प्रक्षेपण यान रहा है। ऐसे में इस तकनीकी अड़चन को एक सीख के रूप में देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसरो की मजबूत इंजीनियरिंग क्षमता और अनुभव के चलते इस समस्या का समाधान जल्द ही निकाल लिया जाएगा।
कुल मिलाकर, ‘अन्वेषा’ का प्रक्षेपण भारत की अंतरिक्ष और रक्षा क्षमताओं में एक और महत्वपूर्ण अध्याय जोड़ता है, भले ही इस मिशन ने वैज्ञानिकों के सामने नई तकनीकी चुनौतियां भी खड़ी कर दी हों।