हर बार छुट्टियों में सैर का ख्याल आते ही लोगों के जेहन में शिमला, मसूरी, नैनीताल की तस्वीर ही उभर कर आती है.. ऐसा इसलिए कि छुट्टियों में पहाड़ की सैर का लुत्फ उठाने के लिए मध्यम-वर्गीय परिवारों को वक्त और बजट के लिहाज से कोई और विकल्प सूझता ही नहीं.. जबकि ऐसा नहीं हैं कई और जगहें भी है जिन्हें देखकर आप स्तब्ध रह जाएंगे और अपनी सुध-बुध खो देंगे लेकिन जानकारी के अभाव में ऐसे पर्यटन स्थल आम पर्यटकों की पहुंच से आज भी कोसो दूर हैं। प्रकृति ने उत्तराखंड को फुर्सत से सजाया संवारा है। सैकड़ों की संख्या में ऐसे पर्यटन स्थल अपनी पहचान बना चुके हैं, जो पर्यटकों के मन मस्तिष्क में छा गए हैं लेकिन कई सुरम्य पर्यटक स्थल ऐसे भी हैं जो हैं तो बहुत सुन्दर पर वो अपनी पहचान नहीं बना पाए हैं। बहुत कम सैलानी ही वहां पहुंच पाते हैं। ऐसे अछूते सुन्दर स्थलों में एक है पौड़ी। कण्डोलिया नामक पर्वत के उत्तरी ढलान पर स्थित पौड़ी नगर 1650 से 1800 मीटर की ऊंचाई पर स्थित सीढ़ी दार खेतों पर एक कोने से दूसरे कोने तक अर्द्ध वृत्ताकार रूप में फैला हुआ है। पौड़ी गढ़वाल के मुख्यालय के रूप में भी अपनी पहचान रखता है.. सामने एक छोर से दूसरे छोर तक दिखाई देती हिमालय की विस्तृत श्रृंखला के साथ साथ सुहावना मौसम और जलवायु ही यहां की सबसे बड़ी विशेषता है। पौड़ी से हिमालय की जितनी बड़ी रेंज दिखाई देती शायद ही देश के किसी और कोने से इतनी बड़ी रेंज दिखाई देती हो.. चैखम्भा, त्रिशूल, बंदरपूंछ, हाथी पर्वत और गोमुख आदि कई चोटियों को आप यहां से बिना किसी यंत्र की सहायता से साफ देख सकते हैं। नगर के ऊपरी हिस्सों में ऐसे कई स्थान विद्यमान है जहां से हिमालय की अधिकांश चोटियों के दर्शन तो होते ही हैं साथ ही सूर्यास्त का दृश्य भी पर्यटकों को भाव-विभोर कर देता है। इन्हीं स्थानों के इर्द गिर्द देवदार, बांज, बुरांस और चीड़ का मनोरम जंगल सफारी का निमंत्रण देती है.. नगर से दो किलोमीटर की ऊंचाई पर कण्डोलिया नामक रमणीक स्थान है जिसके चारों ओर देवदार, बांज, बुरांस, और चीड़ के जंगल हैं। यहां पर ब्रिटिश कालीन खूबसूरत बंगले पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र हैं.. कण्डोलिया से ही नागदेव, रांसी, किंकालेश्वर, टेका, रानीगढ़, घुड़दौडी और सितनस्यूं और खिर्सू जैसे पिकनिक स्पाटों का आनन्द लिया जा सकता है। नागदेव प्राचीन मंदिर धार्मिक स्थल है ।यहां पर देवदार के घने वृक्षों के बीच नाग देवता का प्राचीन मंदिर है..जहां इक्के दुक्के सैलानी ही पहुंच पाते हैं। कण्डोलिसा के दूसरी तरफ रांसी नामक स्थान है। इस स्थान तक पहुंचने के लिए जंगल के बीचों-बीच पक्का मार्ग है। यहां पर एशिया में सबसे ऊंचाई वाला खेल का मैदान है.. जिसके चारों ओर वृक्षों का सौंदर्य शीतलता प्रदान करता रहता है। रांसी से छोटी सी पगडंडी जंगल से होकर किंकालेश्वर मंदिर की ओर जाती है..मंदिर तक जाने वाले रास्ते के बीच में पड़ने वाले घास के छोटे-छोटे मैदान हैं। चलते चलते थकान मिटाने के लिए इन मैदानों पर बैठकर सामने दिखाई देते गांव किसी भी कवि को कविता और किसी भी चित्रकार को तूलिका उठाने के लिए मजबूर कर देते हैं। मंदिर में शिवाजी की प्राचीन मूर्ति है श्रीनगर घाटी में बहती अलनंदा नदी के दृश्य को मंदिर के प्रांगण से साफ देखा जा सकता है.। विस्मयकारी सौन्दर्य पौड़ी से मात्र चैदह किलोमीटर की दूरी पर खिर्सू नामक पर्यटन स्थल है। इस स्थान तक पहुंचने वाला मार्ग भी अत्यन्त लुभावना और रोमांच पैदा करने वाला है। मार्ग पर पड़ने वाला सारा वन बांज और बुरांस के फूलों से भरा हुआ है मार्च अप्रैल के महीने में ये सारा इलाका बुरांस के फूलों से खिला रहता है। पौड़ी से आदवाणी तक मार्ग अत्यन्त ही खूबसूरत है ।स्फूर्तिदायक घने जंगलों के बीच से गुजरते हुए ये मार्ग वाकई विश्व का अत्यन्त ही खूबसूरत मार्ग है। इसके आस पास पड़ने वाले कई स्थल फोटोग्राफी के लिए स्वर्ग कहे जा सकते हैं। इसके अलावा वर्डवाचिंग के लिए भी ये स्थान काफी उपयुक्त है यहीं से एक किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद रानीगढ़ नामक स्थान आता है यहां हरे भरे घास के मैदान पर्यटकों को खूब भाते हैं यहां से मसूरी के भी दर्शन किए जा सकते हैं। घने जंगल के बीच में ये जगह वाकई विस्मयकारी है.पौड़ी से अदवाणी जाते हुए बीच में एक स्थान पड़ता है ठेका ये छोटी सी चट्टी है यहां पर खड़े होकर नई टिहरी के दर्शन किए जा सकते हैं। अदवाणी तक जाते हुए सामने दिखाई देता गगवाड़स्यू घाटी का दृश्य पर्यटकों को बरबस की आकर्षित करता है। घाटी में पसरे सीढ़ी नुमा खेतों का सौंदर्य देखते ही बनता है..हालांकि इस घाटी में पर्यटन विभाग ने झील बनाने की योजना बनाई थी लेकिन वो कहां खो गई ये तो पर्यटन महकमा ही जाने..पौड़ी से घुड़दौड़ी तक का सफर साइकिलिंग और घुड़सवारी के लिए काफी उपयुक्त है यहां पर गोविन्द-बल्लभपंत इंजीनियरिंग कालेज भी है छोटी-छोटी पहाड़ियों का समीपता से अवलोकन यहां की मुख्य विशेषता है जिसे देखकर कोई भी पर्यटक ठगा सा रह जाता है..पौड़ी की एक खासियत ये भी है कि यहां से अलकनंदा घाटी में बसा श्रीनगर, ब्रिटिशकालीन छावनी लैसडाउन, पंचप्रयागों में एक प्रयाग देव प्रयाग आजू बाजू ही हैं पौड़ी पहुंचकर इन स्थानों पर भी आसानी से पहुंचा जा सकता है। इतना सब होने के बाद भी ये नगर आज तक पर्यटकों को खींचने में नाकामयाब रहा है इक्के दुक्के सैलानी यहां रुख करते हैं। गढ़वाल विश्व विद्यालय पौड़ी परिसर में पर्यटन विभाग के प्रवक्ता आशुतोष नेगी का कहना है इसके पीछे सरकार की अनियोजित पर्यटन नीति जिम्मेदार है। उनका कहना है कि पौड़ी न केवल गर्मियों के लिए मुफीद हिल स्टेशन है। बल्कि जाड़ों में भी यहां पसरी खुशनुमा धूप पर्यटकों के लिए आकर्षण का केन्द्र हो सकती है। बशर्ते शासन प्रशासन इस ओर ध्यान दें। यही वजह है रॉक्लाइंबिंग, पैराग्लाइडिंग, स्केटिग, घुड़सवारी, साइकिलिंग, जंगल सफारी जैसे साहसिक खेलों की अपार संभावनाएं होने के बावजूद भी इन खेलों को यहां पर ठीक ढंग से विकसित नहीं किया गया..हालांकि यदि आप अबकी बार किसी हिल स्टेशन में जाने का मन बना रहे हैं तो आपकी जेब के अनुसार पौड़ी नगर
भारत में स्ट्रीट शॉपिंग के शौकीन है आप तो जरूर घूमे इन जगहों पर
शॉपिंग के शौकीनों के लिए स्ट्रीट मार्केट से बढ़िया कोई जगह नहीं होती. जिन लोगों का वेकेशन शॉपिंग के बिना पूरा नहीं होता, उनके लिए हम इंडिया के कुछ बेहतरीन स्ट्रीट शॉपिंग डेस्टिनेशन्स के बारे में बता रहे हैं. अर्पोरा सैटरडे नाइट, गोवा : अगर आपको लगता है कि गोवा सिर्फ़ नाइट पार्टीज़ और बीचेज़ के लिए मशहूर है तो आप गलत हैं. गोवा का अर्पोरा सैटरडे नाइट सबसे हैपनिंग मार्केट है, जो शाम को 6 बजे के बाद खुलता है. यहां ज्वेलरी, फैशनेबल कपड़े, हैंडीक्राफ्ट से लेकर होम डेकोर तक सभी तरह की चीज़ें मिलती हैं. इस मार्केट का माहौल शॉपिंग का मूड बना देता है. खूबसूरत लाइट्स और म्यूज़िक इस मार्केट को दूसरे फ्ली मार्केट से अलग बनाती हैं. सरोजनी मार्केट, दिल्ली : आप किसी भी दिल्लीवासी से पूछिए, वो आपको बता देंगे कि सरोजनी मार्केट उनके लिए क्या मायने रखता है. यह राजधानी दिल्ली का सबसे अच्छा स्ट्रीट मार्केट है. यहां एक्सपोर्ट क्वॉलिटी का मटेरियल बेहद सस्ते दरों में मिलता है. यह मार्केट फैशनेबल कपड़े, बैग्स और जूतों से भरा रहता है. यहां शॉपिंग करने के लिए आपकी बार्गेनिंग स्किल्स अच्छी होनी चाहिए. अगर आपको मोलभाव करना आएगा तो आप बेहतरीन चीज़ें एकदम कम दाम में ख़रीद सकते हैं. एफसी रोड, पुणे : पुणे का एफसी रोड फ्ली मार्केट के लिए फेमस है, जो स्टूडेंट्स से भरा रहता है. यहां वॉचेज़, एक्सेसरीज़, कपड़े, कुर्तीज़, बैग्स और जूते बेहद ही सस्ते दाम में मिलते हैं. यहां का ज़्यादातर सामान मुंबई से आता है इसलिए लेटेस्ट फैशन का होता है. कर्मशियल स्ट्रीट, बंगलुरु : कर्मशियल स्ट्रीट ने भारत में स्ट्रीट शॉपिंग की परिभाषा बदल दी है. इस फ्ली मार्केट के वाइब्रेंट स्ट्रीट्स आम स्ट्रीट मार्केट की तरह भीड़भाड से भरा नहीं होता. यहां आपके क्वॉलिटी प्रो़डक्ट्स बेहद सस्ते दाम में मिल जाएगा. कोलाबा कॉज़वे, मुंबई : कोलाबा कॉज़वे मुंबई का सबसे प्रसिद्ध स्ट्रीट मार्केट है. मुंबई का यह हाई-फैशन स्ट्रीट मार्केट आपकी जेब को खाली किए बिना ही आपको फैशनेबल लुक दे सकता है. यहां स्टाइलिश कपड़े, बैग्स, फुटवेयर, बेल्ट, एक्सेसरीज़ सबकुछ मिलता है. यहां जाने पर लोकल फूड या कैफे का चक्कर लगाना न भूलें. जनपथ, दिल्ली : जनपथ में आपको फैशन प्रोडक्ट्स ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की झलक देखने को मिल जाएगी. इस मार्केट में दो लेन हैं. एक लेन में इंडियन हैंडिक्राफ्ट, हैंडलूम्स, बैग्स इत्यादि मिलते हैं, जबकि दूसरा लेन स्ट्रीट स्टाइल क्लोथ्स व एक्सेसरीज से भरा हुआ है, जिनके दाम आपके चेहरे पर मुस्कान ला देंगे. इस मार्केट में अलग-अलग प्रदेशों से आए लोगों के स्टॉल्स मिलेंगे. बापू बाज़ार, जयपुर : यह शहर आपको बेहतरीन स्ट्रीट शॉपिंग का अनुभव देगा. जयपुर के ओल्ड सिटी एरिया में स्थित यह मार्केट राजस्थानी कल्चर और हैंडीक्रॉफ्ट ऑफर करता है. आप अपना शॉपिंग बैग बेडसीट्स, जयपुरी जूती, सलवार सूट्स, कुशन्स, होम डेकोर आर्टक्राफ्ट्स, एथनिक ज्वेलरी, लाह की चूड़ियों और रेडीमेड सूट्स सस्ते दामों में मिलते हैं. इसके अलावा यह मार्केट आयुर्वेदिक डायजेस्टिव्स और नैचुरल हीना के लिए भी मशहूर है.
मंत्रमुग्ध कर देंगे लद्दाख के ये 10 पर्यटन स्थल
जम्मू-कश्मीर राज्य में स्थित लद्दाख अपने में अनोखी विशेषताओं को समेटे हुए है। कुदरत ने तो यहां अपना भरपूर सौंदर्य लुटाया ही है, यहां की संस्कृति और धार्मिक-ऐतिहासिक विरासत भी इसे पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बनाता है। समुद्र तल से करीब 10000 कि.मी. की ऊंचाई पर स्थित लद्दाख में मानव-सभ्यता का इतना समृद्धशाली रूप देख कर हर कोई दंग हो जाता है। इस स्थल की सड़क मार्ग से अगर यात्रा करें तो लगता है कि ना जाने किस लोक में जा रहे हैं हम। और हवाई-जहाज से जाएं तो दूर-दूर तक फैले पहाड़ और हरी-भरी घाटियां देखकर एक अनोखा ही अनुभव होता है। यहां पहुंचकर एक अनोखी सभ्यता से साक्षात होते हैं हम। मुस्कुराते चेहरे, विशेष वेशभूषा, भिन्न खान-पान, मुग्ध करने वाली पूजा-पद्धति, पोषित करने वाली प्रकृति और प्यार-मुहब्बत वाले लोग लद्दाख को अलग सभ्यता करार देती है। लद्दाख से लौटकर वहां की तमाम रोमांचक और अनोखी विशेषताओं को हरिभूमि के साथ साझा कर रही हैं लेखिका। जीवनशैली जुले है संबोधन: लद्दाख के निचासियों की जीवनशैली कई मायनों में अलग और प्यारी है। वहां जब भी आपस में लोग मिलते हैं तो एक-दूसरे को जुले कहते हैं। हमें पहले दिन ही शहर के नुक्कड़ पर पैंपलेट दिए गए, जिसमे लिखा था विश्व में जुले शब्द फैलाओ। हमने पूछा कि भई ये जुले क्या है तो हमें बताया गया कि इसका मतलब है-नमस्ते। फिर तो हम जितने दिन वहां रहे, हर किसी से सामना करने वाले बच्चे बड़े-बुजुर्ग को जुले कहने लगे। सबके मुस्कुराते चेहरे जुले के बदले जुले कहते। बेहद खुशनुमा अनुभूति अनोखा परिधान गुंचा: लद्दाख में स्त्री-पुरुष प्रायः शरीर के ऊपरी हिस्से पर एक घेरदार गाउन जैसा वस्त्र पहनते हैं, जो ज्यादातर गहरे भूरे या मैरून रंग का होता है और वहां की तीव्र ठंड से सुरक्षा करता है। इसे स्थानीय बोली में गुंचा कहते हैं। मंत्रमुग्ध कर रहे थे फिरोजी पत्थर गहने में फिरोजी पत्थर: फिरोजी रंग का पत्थर कईं गहनों में जड़ा हुआ दिखाई दे रहा था। जिस तरह से वहां के गोंपा, वेशभूषा, संबोधन मंत्रमुग्ध कर रहे थे, वैसे ही यह फिरोजी रंग के गहने आकर्षित कर रहे थे। हमने देखा कि वहां महल के संग्रहालय में रानियों के ताज में भी बड़े-बड़े फिरोजी पत्थर जड़े थे। फिर देखा कि पटरी पर भी वही पत्थर तौल कर बिक रहे थे। एक स्थानीय महिला जो यह पत्थर खरीद रही थी ने बताया कि यह सुहाग की निशानी होती है, इसलिए हर सुहागन महिला को यह पहनना आवश्यक है, चाहे वो साधारण काले डोरे में पिरोकर ही पहने। शाही अंदाज एल शेप किचेन एल शेप किचेनः यहां के घरों की रसोई भी विशेष तरह की होती है। जिस गेस्ट हाउस में हम रुके थे, वहां खाने की भी सुविधा थी। एक दिन हमने खाने का ऑर्डर दिया तो वहां की मुखिया ने आदरपूर्वक हमें रसोई में आने का निमंत्रण दिया। रसोई में बैठ कर खाने की व्यवस्था थी। एल शेप में शाही अंदाज में चैकियां लगी हुई थीं। चमचमाते बर्तन रसोई की शोभा बढ़ा रहे थे। चाय बनाने का अनोखा उपकरण देखा, जिस्में वो लोग बटर टी बनाते हैं। दर्शनीय स्थल वैसे तो लद्दाख में जिधर भी निगाह जाती है, वहां कुछ अनोखा नजर आ जाता है, लेकिन फिर भी कुछ ऐसे स्थल हैं, जिन्हें आप एक बार देखकर कभी भुला नहीं पाएंगे। रहस्यमयी गोंपा लद्दाख के धर्मस्थल गोंपा कहलाते हैं। ये रहस्यमयी मंदिर मन को बेहद सुकून देने वाले होते हैं। इनमें रखी पीतल की बड़ी-बड़ी मूर्तियां मंत्र-मुग्ध कर देती हैं। बड़े-बड़े प्रेयर व्हील को घुमा कर प्रार्थना करना अपने आप में अनोखा अनुभव देता है। प्रेयर व्हील गोंपा में रखे बड़े प्रेयर व्हील के अलावा यहां के लोग हाथ में भी छोटा-सा प्रेयर व्हील लेकर घूमते हैं। हमने सड़क पर जाते हुए कुछ लोगों को देखा कि वो इन्हें घुमाते हुए चल रहे हैं। हमने पूछा तो उन्होंने बताया कि यह प्रेयर व्हील है। इसमें एक कागज में मंत्र लिख कर रखा जाता है। जब इस प्रेयर व्हील को घुमाया जाता है तो यह मंत्र उच्चारण का प्रभाव देता है। शांति स्तूप लेह शहर की ऊंची पहाड़ी पर धवल गुंबद वाला शांति स्तूप, शहर के हर कोने से दिखता है। 600 सीढ़ियां चढ़ने के बाद जो नजारा देखने को मिलता है, उसे केवल स्वयं मह्सूस किया जा सकता है। महात्मा बुद्ध की ऊंची प्रतिमा को निहारने में अद्भुत सुकून मिलता है, वहीं जीवन के चार चरण के चित्र जीवन दर्शन का बयान करते हैं। वहां से पूरा शहर एक ही नजारे में आंखों में सिमट जाता है। अनोखा महल यहां के राजा का महल भी अनोखा है। मिट्टी के पहाड़ पर छोटे-छोटे कमरों वाले साधारण भवन में भी महल जैसी भव्यता झलकती है। पहाड़ की ऊंचाई के अनुसार भवन भी ऊंचा-नीचा बना हुआ है। पर इसके शाही अंदाज में कोई कमी नहीं लगती। पहाड़ी पर दूर से बना महल बेहद खूबसूरत और रहस्यमयी लगता है। सिंधु नदी के किनारे सिंधु नदी के किनारे बैठ कर अतीत के गौरव सिंधु घाटी की सभ्यता याद आ जाती है। दूर-दूर तक फैला मैदान कभी पानी बहने की कहानी कह रहा था। रेगिस्तान और कूबड़ वाला ऊंट पेनामिक और डिस्किट यहां जुड़वा गांव के रूप में जाने जाते हैं। अपनी विशेषताओं के कारण यहां भी पर्यटक आते हैं। जहां पेनामिक में गरम पानी का झरना दिखाई देता है, वहीं डिस्किट में रेगिस्तान नजर आता है। रेगिस्तान ऐसा कि रेत का रंग सीमेंट के रंग जैसा । डिस्किट में तो ऊंट भी नजर आए वो भी दो कूबड़ वाले। इन गांवों में विचरण करना ऐसा लग रहा था कि हम किसी विचित्र दुनिया में आ गए हैं। इतना तो तय है कि लद्दाख बहुत अनूठा पर्यटन स्थल है। यहां की यात्रा के अनुभव आपके मन पर सदैव अंकित रहेंगे।
इको टूरिज्म के लिए मशहूर राजगढ़ का कैंप
ज्यादातर पर्यटक अब इको टूरिज्म को महत्ता देते नजर आ रहे हैं। इको टूरिज्म प्रकृति से जुड़ने का अच्छा विकल्प है। ऐसा ही इको टूरिज्म का एक हिस्सा है राजगढ़ का बोधिसत्व कैम्प। यह जगह आर्किड के फूलों की तरह खूबसूरत है। यहां आने के बाद आपको एडवेंचर के साथ प्रकृति से घुलने मिलने का भी भरपूर समय मिलता है। हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले के छोटे और अनोखे पहाड़ों के शहर राजगढ़ का यह कैम्प अपने आप में बेहद अनोखा है। राजगढ़ आज भी प्रसिद्ध पर्यटक स्थलों में शामिल नहीं हो पाया है जबकि यहां प्राकृतिक दृश्यों का भरपूर खजाना भरा पड़ा है। हरी-भरी घाटियां, घने जंगल और पहाड़ों से आती ताजी हवाओं का आनंद लेने यहां दूर-दूर से पर्यटक आते हैं। गांव की खूबसूरत जीवनशैली को दर्शाती यह जगह हर सुविधा से परिपूर्ण है। बिजली और ट्रांसपोर्ट की बेहतरीन सुविधा राजगढ़ में देखने को मिलती है। यहां के शांत वातावरण में आप अपने आप को रिलैक्स कर सकते हैं। चुड़धर चोटी पर चढ़ना चुनौतीपूर्ण होता है। 12 हजार फीट की ऊंचाई पर इस चोटी पर जाने के लिए लोग हाइकिंग जैसे साहसिक खेल का सहारा लेते हैं। कैम्प के पास कल-कल बहती नदी मन को शीतल कर देती है। कैम्प के पास प्राकृतिक वरदान के रूप में दो धाराएं साल भर बहती रहती हैं जिससे इस जगह की खूबसूरती और बढ़ जाती है। कैंप के पास ही घाटी इस जगह को हमेशा ठंडा रखती है। दूर तक फैले देवदार के वृक्ष यहां का तापमान सामान्य रखने में मदद करते हैं। कैम्प बोधिसत्व में तरह-तरह की एक्टीविटी आपको हफ्तों तक व्यस्त रख सकती है जैसे हाइकिंग, रॉक क्लाइबिंग, रैंपलिंग वगैरह। आप यहां के प्राकृतिक दृश्यों के बीच बर्ड देखने का मजा ले सकते हैं। यहां की हरियाली में इधर-उधर फुदकती चिड़ियों की कई प्रजातियां हमें लुभाती हैं। कैम्प के पास बहती धारा में पर्यटक स्वीमिंग का मजा लेते हैं। इसे स्प्लैश स्वीमिंग कहते हैं। यहां की घाटियों में छुपे खूबसूरत वाटरफॉल आपको अपने पास से हटने नहीं देंगे। इनकी खूबसूरती देखते बनती है। यहां एक बेहतरीन पिकनिक स्पॉट भी है। इसके अलावा और भी कई चीजें हैं जिसका मजा यहां ले सकते हैं जैसे बैडमिंटन, शतरंज, रोप स्वींग, सांस्कृतिक नृत्य आयोजन वगैरह आपको हर पल व्यस्त रखेंगे। राजगढ़ के पास ऐसी और भी जगहें हैं जिसे आप देख सकते हैं। जैसे ओछघाट की खूबसूरत मोनेस्ट्री, 40 साल पुराने बॉन-पा मोनेस्ट्री जहां महिलाओं के लिए अलग व्यवस्था है। 40 किलोमीटर दूर बारू-साहब गुरुद्वारा भी दर्शनीय है। यह सिखों का सबसे पुराना पवित्र स्थान है। यहां जाने के लिए सड़क व रेल यातायात का इस्तेमाल कर सकते हैं। नजदीकी रेलवे स्टेशन कालका-चंडीगढ़ है। यहां से राजगढ़ के लिए टैक्सी आसानी से मिल जाती है।
सफर के दौरान इन चीजों का सेवन हो सकता है हानिकारक
लंबी छुट्टियों के दौरान हर कोई पूरे परिवार के साथ कहीं न कहीं घूमने जाने का प्लान बनाता है। गर्मियों की छुट्टी हो या वेकेशन हिल स्टेशन जाने का अपना ही मजा होता है। कई लोग सफर के दौरान गाने सुनते हैं तो कोई किताब पढते हैं तो कोई आराम करते हैं। सफर के समय भूख लगना एक बहुत ही ज़ाहिर सी बात हैं। हम घर से काफी सारी चीजें लेकर जाते हैं सफर के लिए लेकिन सफर में हम और चीजें भी खरीद लेते हैं। जिससे कई लोगों को सफर के दौरान उल्टी, जी मचलने की, सर घूमने की शिकायत रहती है और ऐसा होने पर सफर का मजा फीका पड़ जाता है। तो चलिए आज हम आपको बताते हैं कि सफर में कि चिजों का सेवन हानिकार साबित हो सकता है। तला हुआ खाना :- ध्यान रहे कि सफर में कभी भी आप तले हुए खाने का सेवन ना करें ऐसा करने से आपकी सेहत को नुकसान पहुंच सकता हैं। ट्रेन से यात्रा के दौरान कई बार स्टेशन पर समोसे, कटलेट जैसी चीजें मिलती हैं। इन्हें देखकर मन ललचाने लगता है और हम भूख न लगने पर भी इनका सेवन कर लेते हैं। बाहर खुले में बिकने वाली इन चीजों को यात्रा के दौरान खाने की गलती न करें। नॉन वेज :– अगर आप सफर के दौरान नॉन वेज खाते हैं तो वह आपके पेट के लिए सहीं नहीं हैं क्योंकि नॉन वेज काफी हेवी होता हैं और उसे पचने मे काफी समय लगता हैं और सफर में हम सिर्फ बैठे रहते हैं और हम ज्यादा हिल डुल नहीं सकते हैं जिससे नॉन वेज पच नहीं पाता हैं। इसलिए ध्यान रहें कि आप सफर के समय में हल्की चीजों का सेवन करें। दूध अंडा :- दूध और अंडा भी काफी भारी होते हैं हमारे पेट के लिए और इन्हें पचने में काफी समय लगता हैं तो अगली बार जब भी आप सफर करें तो ध्यान रहें कि आप दूध और अंडे का सेवन ना करें ताकी आपकी सेहत को कोई नुकसान ना हों और आपका सफर अच्छे से बीते। केले के चिप्स :– सफर के दौरान आप सूखे केले के चीप्स खा सकते हैं। ये आपको बाजार में आसानी से मिल जाएंगे। इसके अलावा एक मुट्ठी बादाम, भूने हुए चने, पिस्ता, सूखे कॉर्नफ्लैक्स और मूंगफली को हल्का सा सरसों के तेल या ऑलिव ऑयल में फ्राई करके पैक करके रख लें। इनके अलावा आप सेब और केले का सेवन भी कर सकते हैं।
चेरापूंजी जहां होती है दुनिया की सबसे ज्यादा बारिश, यहां और भी बहुत कुछ है खास
पहाड़ों पर बरसात का मौसम बहुत ही खूबसूरत और रोमांटिक होता है और फिर चेरापूंजी में तो 12 महीने बरसात होती ही रहती है। ऐसे में यहां के मौसम के तो कहने ही क्या। सबसे ज्यादा बारिश का रिकॉर्ड दर्ज होने की वजह से चेरापूंजी को ”वेटेस्ट प्लेस ऑफ द वर्ड” तथा ”बारिश की राजधानी” भी कहा जाता है। सदाबहार मौसम के कारण ही यहां साल भर टूरिस्ट्स का आना-जाना लगा रहता है। मेघालय की राजधानी शिलांग से चेरापूंजी केवल 56 किमी. दूर है। रास्ते में चढ़ाई है, लेकिन ज्यादा नहीं। ऊंची-नीची पहाडि़यों और टेडे-मेडे रास्तों से गुजरते हुए आप कब चेरापूंजी पहुंच जाएंगे, पता भी नहीं चलेगा। चेरापूंजी के चारों तरफ पहाड़ और घाटियां हैं। यहां फर्न, चीड़ और ऐरोकेरिया के पेड़, कई तरह के लोकल फ्रूट्स, संतरा और अन्नानास बहुत होते हैं। कुछ खास किस्म की घास और फूल भी देखने को मिलते हैं। यहां की खासी जाति का मुख्य व्यवसाय जंगली उपज ही है। ये लोग सौंदर्य प्रेमी होते हैं। कलात्मक कपड़ों, शालों व सजावटी चीज़ों को बनाते हैं और उन्हें बेचते भी हैं। इनके घर बड़े सुंदर होते हैं, जिन्हें ये सजाकर रखते हैं। अपनी धरती, धर्म, समाज और रीति-रिवाज के प्रति ये बहुत ही आस्थावान होते हैं। ‘सोहरा’ नाम है इसका : मेघालय आने वाले देशी-विदेशी पर्यटकों के इस पसंदीदा जगह का नाम अब बदल गया है। इसका नाम पहले भी सोहरा था और अब फिर से सोहरा हो गया है। ब्रिटिश शासकों ने सन् 1830 में चेरापूंजी को अपना क्षेत्रीय मुख्यालय बनाया था। अंग्रेजों को इसके तत्कालीन नाम सोहरा के उच्चारण में काफी दिक्कत होती थी। वे लोग इसे चेरा कहने लगे। उसके बाद स्थानीय लोगों ने बादलों के समूह को देखते हुए इस नाम में पूंजो जोड़ दिया जो बाद में चेरापूंजी हो गया, लेकिन चेरापूंजी को उसका असली नाम देने की मांग जोर पकड़ने लगी और जन आंदोलन के बाद राज्य सरकार ने इसका नाम बदल कर फिर से सोहरा करने का फैसला किया। होती है रिकॉर्ड बारिश : चेरापूंजी या सोहरा के नाम बारिश के कई रिकॅार्ड दर्ज है। गिनीज बुक ऑफ वर्ड रिकॉर्ड के अनुसार यहां एक ही साल में सबसे ज्यादा बारिश 22 हजार 987 मि.मि. एक अगस्त 1860 से जुलाई 1861 के बीच हुई थी। एक महीने में सबसे ज्यादा बारिश भी जुलाई 1861 में 9300 मि.मि. दर्ज की गई। एक दिन में सबसे ज्यादा 61 इंच बारिश का रिकॉर्ड भी सोहरा के नाम ही दर्ज हैं। इन सबके बावजूद पिछले कुछ सालों से यहां बरसात कम होने लगी हैं और मोहसिनराम में यहां से अधिक वर्षा होती है। खैर, बारिश कम हो या ज्यादा, लेकिन होती बहुत खूब हैं। अपनी अद्भुत व आकर्षक नैसर्गिक छटा के कारण ही चेरापूंजी के आसपास स्थित झरने और नेचुरल ब्यूटी टूरिस्ट्स को लुभाती रही है। खूबसूरत झरने : चेरापूंजी की सबसे आकर्षक जगह है नोहकलिकाई जलप्रपात, काफी उंचाई से गिरता यह दूधिया झरना अपने में एक मार्मिक कथा समेटे हुए है। कहते हैं कि लिकाई नाम की एक महिला जब एक दिन अपने काम पर से घर लौटी तो उसने अपने बच्चे के लिए पति से पूछताछ की। पति ने कहा कि बच्चे को काट कर खाने के लिए पका लिया है। सुनते ही लिकाई सदमे से भर गई और इस झरने में कूद पड़ी। तभी से इस झरने का नाम नोहकलिकाई पड़ा । वैसे तो व्यू प्वाइंट से झरने का समग्र स्वरुप देखा जा सकता है, लेकिन ठेठ नीचे तक जाने के लिए सीढि़यां भी बनी हुई हैं। रामकृष्ण मिशन संस्थान : चेरापूंजी में एक सबसे पुराना रामकृष्ण मिशन संस्थान है। यहां के विद्यार्थी हिंदी, अंग्रेजी, खासी, बंगला भाषाओं के ज्ञाता हैं। यहां ऊनी कपड़े, कलात्मक वस्तुएं, जड़ी बूटियों से दवा बनाने आदि का काम होता हैं। पूरा संस्थान अपनी भव्यता, शांति, सफाई और अलग-अलग एक्टिविटीज के लिए मशहूर है। मोसमाई की गुफाएं : चेरापूंजी से 5 किमी. दक्षिण में बसा नोह संगीथियांग प्रपात और मौसमाई प्रपात है। मौसमाई ग्राम के निकट जंगल में गुफाएं प्रकृति की अपनी विशिष्ठ रचना है। यहां चूने के पत्थरों के साथ पानी के मेल से अजीबोगरीब अश्चुताष्म एवं निश्चुताष्म आकृतियां बन गई है, जो पर्यटकों को बेहद आकर्षित करती हैं। गुफा में घुटनों तक पानी भरा होता है। पत्थरों की उंची-नीची, चिकनी और तीखी, कहीं संकरी और कहीं चौड़ी आकृतियों पर चलना, चढ़ना डराता भी है और रोमाचिंत भी करता है। गुफा में जाने के तीन रास्ते हैं। लिविंग ब्रिज : चेरापूंजी के जंगलों में पेड़ की शाखाओं और जड़ों से बने पुल देखे जा सकते हैं। इन्हें ”लिविंग ब्रिज” भी कहा जाता है। यहां के लोग खास तकनीक से ऐसे पुल बनाते हैं, जो 10-15 साल में बनकर तैयार हो जाते हैं और सैकड़ों सालों तक इस्तेमाल में आते हैं। यहां ऐसी ही एक सबसे पुरानी पुलिया 500 सालों से प्रयोग में ली जा रही है। चेरापूंजी की दूसरी देखने वाली जगहों में मोकडोक डिम्पेप वेली जो शिलांग से चेरापूंजी के रास्ते में आती है, बहुत ही सुंदर और हरी-भरी हैं। यहां डाइन्थलेन वाटरफाल, डोन बोस्को श्राइन, चर्च, डेविड स्कोट मेमोरियल, ग्रीन केन्योन ऑफ चेरापूंजी, ईको पार्क, केर्नरम वाटरफाल आदि भी घूमने लायक है। माउलंग सीम पीक : चेरापूंजी आने वाले यात्रियों के लिए रोमांच, साहस और सौंदर्य से भरा एक और स्थान है माउलंग सीम पीक। यहां दूर से गिरता एक झरना, बादलों का आवरण, बांगलादेश के सिलहट जिले का मैदानी भाग और घने वृक्षों से घिरा जंगल दिखाई देता है। यहां एक सुंदर बगीचा है, जिसमें यात्रियों के बैठने, घूमने और देखने की सुविधा है। बगीचे में तरह-तरह के फूलों की क्यारियां, झूले, फव्वारे और चहलकदमी के लिए बनी सीढि़यां व पगडंडियां है, जिन पर चलते, अठखेलियां करते पर्यटक मस्ती में गाते-गुनगुनाते रहते हैं। इस पूर्वी प्रदेश में शाम जल्दी होती है। इसलिए माउलंग सीम पीक से सीधे शिलांग जा सकते हैं। कैसे जाएं : चेरापूंजी जाने के लिए शिलांग के बड़ा बजार बस स्टेंड से बसें मिल जाती हैं। शिलांग से टैक्सी किराये पर लेकर भी चेरापूंजी की एक दिन की यात्रा की जा सकती हैं। ठहरने के लिये यहां कई हॉलीडे रिजॉर्ट हैं।
ब्रह्मा नगरी के नाम से प्रसिद्ध है पुष्कर, जानें दर्शनीय स्थल
पुष्कर दर्शनीय स्थल : राजस्थान में स्थित पुष्कर एक प्राचीन शहर है और इस जगह पर कई सारे तीर्थ स्थल मौजूद हैं। ब्रह्मा जी का इकलौता मंदिर पुष्कर में ही स्थित है और इस शहर को ब्रह्मा नगरी के नाम से भी जाना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस मंदिर में आकर ब्रह्मा जी के दर्शन करने से सारे पापों से मुक्ति मिल जाती है। पुष्कर दर्शनीय स्थल पुष्कर को एक पवित्र नगरी भी कहा जाता है और इसे अंतर्राष्ट्रीय पर्यटक स्थल में गिना जाता है। पुष्कर में कौन-कौन से दर्शनीय स्थल मौजूद हैं उनकी जानकारी इस तरह से है। पुष्कर झील पुष्कर दर्शनीय स्थल में से पुष्कर झील एक है। इस झील में 52 स्नान घाट हैं और इस झील में आकर लोगों द्वारा डुबकी लगाई जाती है। इस झील के पास ही लगभग 500 मंदिर बने हुए हैं और इन सभी मंदिरों को नीले रंग से रंगा हुआ है। इस झील से जुड़ी पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान ब्रह्मा द्वारा इस झील को बनाया गया था। इस झील में कार्तिक मास के दौरान स्नान करना शुभ माना जाता है। महात्मा गांधी की अस्थियों का विसर्जन पुष्कर झील में ही किया गया था। ब्रह्मा मन्दिर पुष्कर में स्थित ब्रह्मा मन्दिर इस दुनिया का इकलौता ऐसा मंदिर है जहां पर ब्रह्मा जी की पूजा की जाती है। इस मंदिर में ब्रह्मा की मूर्ति विराजमान है और हर साल लाखों की संख्या में लोग इस मंदिर में आया करते हैं। ऐसा कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण लगभग 14वीं शताब्दी में हुआ था और यह मंदिर 700 वर्ष पुराना है। इस मंदिर के मुख्य द्वार को बनाने के लिए संगमरमर के पत्थरों से का प्रयोग किया गया है। यह मंदिर काफी भव्य हैं और कार्तिक मास के दौरान इस मंदिर में काफी भीड़ होती है। पुष्कर मेला पुष्कर दर्शनीय स्थल में प्रसिद्ध मेला भी लगता हैं। पुष्कर मेला हर साल कार्तिक पूर्णिमा को आयोजन किया जाता है और इस मेले को देखने के लिए विदेशी पर्यटक भी आते हैं। यह एक पशु मेले होता है और इस मेले में लोग अपने पशुओं को खासकर ऊंटों को लेकर आते हैं। इस मेले का आयोजन काफी भव्य तरीके से किया जाता है। पुष्कर शहर से जुड़ी अन्य जानकारी -पुष्कर शहर को वेद माता गायत्री की जन्मभूमि भी कहा जाता है। -यह जगह भगवान शिव जी के शक्ति पीठ में से एक है और ऐसा कहा जाता है कि चारों धामों की यात्रा करने के बाद पुष्कर झील में डुबकी जरूर लगानी चाहिए। -पुष्कर ‘राजस्थान का गुलाब उद्यान’ के नाम से भी प्रसिद्ध हैं। क्योंकि यहां पर गुलाब की खेती खूब की जाती है और यह फूल अन्य देशों में भेजे जाते हैं। -पुष्कर में कई सारी दुकाने स्थित हैं जहां से आप शॉपिंग भी कर सकते हैं। कैसे पहुंचे अजमेर जिले में स्थित पुष्कर शहर आसानी से पहुंचा जा सकता है। यह शहर वायु, सड़क और रेलवे मार्ग से जुड़ा हुआ है। इस जगह पर कई सारी धर्मशाला और होटल मौजूद हैं। हालांकि कार्तिक मास के समय आप पहले से ही कमरे बुक करवाकर इस जगह पर पर जाएं। क्योंकि इस महीने के दौरान यहां पर खूब भीड़ होती है। पुष्कर दर्शनीय स्थल जानने के बाद आप इस जगह एक बार जरूर जाएं।
परिवार के साथ महाकुंभ मेले में घूमने का बना रहे प्लान तो इन बातों का रखें खास ख्याल
महाकुंभ मेले का आयोजन 12 साल में एक बार किया जाता है। महाकुंभ एक महीने के लिए लगता है, जिसकी तैयारियां और सुरक्षा के इंतजाम महीनों पहले से कर लिए जाते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि इस मेले का हिस्सा बनने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं। तो वहीं लोग यहां पर परिवार के सदस्यों के साथ भी आते हैं। अक्सर ऐसा सुनने को मिलता है कि मेले में बच्चे ज्यादा खोते हैं। इसलिए जरूरी है कि बच्चों को महाकुंभ घुमाने के साथ-साथ आप उनकी सुरक्षा का भी ध्यान रखें। इससे आप और आपका परिवार महाकुंभ मेले का अच्छे से आनंद ले पाएंगे। ऐसे में अगर आप भी महाकुंभ मेले में परिवार और बच्चों के साथ आ रहे हैं, तो हम इस आर्टिकल के जरिए आपको बताने जा रहे हैं कि आपको इस दौरान किन-किन बातों का खास ख्याल रखना चाहिए। हाथ या गले पर डालें पहचान वाली पट्टी बता दें कि महाकुंभ मेले में अधिक भीड़ है और धक्का-मुक्की में कोई खो सकता है। इसलिए आपको अपने बच्चे के गले या फिर हाथ में पहचान वाली पट्टी जरूर डालें। इसके लिए आप किसी डार्क कपड़े का भी यूज कर सकते हैं। इसका एक हिस्सा बच्चे के हाथ या गले में डाल दें और दूसरा हिस्सा अपने पास रखें। इसके अलावा आप बच्चों के पॉकेट में पेरेंट्स का फोन नंबर की पर्ची जरूर डाल दें। इससे बच्चा आपको आसानी से मिल जाएगा और पुलिस भी आपको आसानी से खोज पाएगी। साथ ही ऐसा करने से आपको महाकुंभ की यात्रा में कोई दिक्कत भी नहीं आएगी। बच्चों को जरूर बताएं सुरक्षा के नियम अगर आपका बच्चा 10-12 साल का है, तो आपको इन्हें सुरक्षा के नियमों के बारे में जरूर बताना चाहिए। जिससे कि अगर कुंभ मेले में बच्चे का हाथ आपसे छूट जाए, तो वह नियमों को ध्यान में रखते हुए सुरक्षाकर्मी के पास जा सकें। बता दें कि पोल पर कुछ नंबर लिखे जाते हैं, उनका भी ध्यान रख सकते हैं। इससे आपको यात्रा में किसी तरह की परेशानी नहीं आएगी और भीड़ में खोने वाला बच्चा भी आसानी से आपको मिल जाएगा। बच्चे को कंधे पर बिठाकर घूमाएं मेला अगर आपका बच्चा छोटा है और आप महाकुंभ मेला घूमने जा रहे हैं। तो बच्चे को कंधे पर बैठाकर मेले का आनंद दिलाएं। क्योंकि अधिक भीड़ होने की वजह बच्चा नीचे कुछ देख नहीं पाएगा और उसका सारा समय परेशान होने या रोने में निकल जाएगा। साथ ही बच्चे के परेशान होने पर आप भी परेशान होंगे। वहीं जब आप बच्चे को कंधे पर बिठा लेंगे, तो आप भी अच्छे से घूम पाएंगे और बच्चा भी अच्छे से मेला देख पाएगा। उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से इस बार के महाकुंभ मेले के लिए कुछ खास बातों का ध्यान रखा गया है। इससे सुरक्षा में किसी तरह की कोई ढील नहीं होगी और समय पर सारे कार्य होते रहेंगे। लोगों को मेले में घूमने में किसी तरह की कोई दिक्कत न हो, इस बात का भी खास ख्याल रखा जाएगा।
प्राकृतिक सौंदर्य से भरा खूबसूरत वादियों का शहर है ऊटी
गर्मी का मौसम आते ही सभी का मन हिल स्टेशंस पर जाने का करता है। अगर आपकी भी यही प्लानिंग है, तो इस बार आप ऊटी जाने के बारे में सोच सकते हैं। तमिलनाडु के इस हिल स्टेशन के नजारे आपको पूरे सीजन फ्रेश रखेंगे… नीलगिरी की पहाड़ियों में समुद्रतल से करीब 7,350 फीट की ऊंचाई पर बसा है ऊटी। घाटी में चारों ओर पसरी हरियाली, प्रकृति के खूबसूरत नजारे, ऊंचे बुलंद पहाड़, आसमान को छूते देवदार व चीड़ के पेड़ और सीढ़ीनुमा खेत, बेशक नेचर लवर्स को ये नजारे खूब लुभाते हैं। यही नहीं, चाय-कॉफी के बागानों की महक भी यहां आने वालों को तरोताजा कर देती है। गौरतलब है कि ऊटी का तापमान हमेशा 5 से 25 डिग्री सेल्सियस रहता है। यानी यहां आपको हमेशा खुशगवार मौसम मिलेगा। क्या देखें बॉटेनिकल गार्डन 1848 में बनाया गया बॉटेनिकल गार्डन आज भी ऊटी का बड़ा आकर्षण है। 22 हेक्टेयर में फैले इस गार्डन में छोटी-बड़ी क्यारियों में अलग-अलग प्रजाति के पेड़-पौधों की 650 से ज्यादा वैराइटी रखी गई है। यहां आप एक अच्छी वॉक का मजा ले सकते हैं। थक जाएं, तो छतरी के नीचे लगे बेंच पर बैठकर सुस्ताएं। बेशक यह आपको एक अलग ही मजा देगा। ऊटी लेक शहर से 3 किलोमीटर दूर ऊटी लेक टूरिस्ट्स में खासी पॉप्युलर है। इस आर्टिफिशल लेक का निर्माण 1825 में कोयम्बटूर के कलेक्टर जॉन सुलीवन ने करवाया था। बाद में इसी लेक के नाम पर शहर का नाम रखा गया। यहां आप बोटिंग और परमिशन मिलने पर फिशिंग भी कर सकते हैं। लेक परिसर के बाहर घुड़सवारी का भी आनंद उठा सकते हैं। चिल्ड्रन पार्क लेक परिसर में बना चिल्ड्रन पार्क बच्चों को नहीं, बड़ों को भी खूब पसंद आता है। यहां लगे झूलों का तो बच्चों में खासा क्रेज रहता है। छोटे-छोटे डिब्बों वाली टॉय ट्रेन में बच्चे ही नहीं, बड़े भी सैर करते हैं। यही नहीं, यहां जादू का खेल भी दिखाया जाता है। रोज गार्डन ऊटी के चेरिंग क्रॉस के पास 10 एकड़ में फैला रोज गार्डन पर्यटकों को खूब लुभाता है। गार्डन में गुलाब की 1000 से अधिक किस्में देखने को मिलती हैं। यहां सजाए गए डेकोरेटिव प्लांट्स भी सभी को बहुत पसंद आते हैं। ऊटी म्यूजियम मैसूर रोड पर 1989 में बनाया गया ऊटी का म्यूजियम भी देखने लायक है। यहां जहां एक ओर आदिवासी वस्तुओं और कपड़ों को प्रदर्शित किया गया है, वहीं दुनिया भर में मशहूर तमिलनाडु की मूर्तिकला, चित्रकला, सैंडलवुड से बनी अनेक वस्तुओं, मैसूर सिल्क और साउथ कॉटन के कपड़ों को भी दिखाया गया है। यहां आपको ऊटी से जुड़ी तमाम जानकारी भी मिलेगी। चेरिंग क्रॉस इसे ऊटी का दिल कहा जा सकता है। मूलत यह एक चैराहा है, जिसके चारों ओर कमर्शल रोड है। चैराहे के बीचोंबीच चारों दिशाओं की ओर मुंह एंजेल बच्चों वाला एक फाउंटेन है, जो आपका ध्यान बरबस ही खींच लेगा। रात के समय फव्वारे के बहते पानी पर पड़ने वाली रंग-बिरंगी लाइट की बदौलत इसकी खूबसूरती और बढ़ जाती है। चेरिंग क्रॉस में तकरीबन हर दूसरी दुकान पर ऊटी में बनी चाय पत्ती, होममेड चॉकलेट और मसालों की पचासों वराइटी मिल जाती है। इनके अलावा, आप यहां से हैंडीक्राफ्ट आइटम या फिर हाथ से बनी वूलन शॉल ले सकते हैं। टॉय ट्रेन ऊटी से कुन्नूर के बीच चलने वाली टॉय ट्रेन में जाने का अलग ही मजा है। तीन डिब्बों वाली यह टॉय ट्रेन स्टीम इंजन से चलती है। इस ट्रेन के रास्ते में 16 सुरंगे और करीब 250 पुल आते हैं। तकरीबन एक घंटे के इस सफर में आपको नीलगिरी की पहाड़ियों को नजदीक से देखने का मौका मिलता है। मात्र 3 रुपये का टिकट लेकर आप इंजॉय कर सकते हैं। ऊटी के आसपास ऊटी की सैर पर निकले हैं, तो इसके आसपास भी कई दिलचस्प जगहें हैं। इसलिए यहां इंजॉय करना भी अपने टूर में शामिल कर लें। दोड्डाबेट्टा यह पहाड़ी सागर तल से 2,623 मीटर की ऊंचाई पर है और ऊटी से यह 10 किलोमीटर की दूरी पर है। यह जगह प्राकृतिक सौंदर्य से लबरेज है, जिससे आप अभिभूत हुए बिना नहीं रह पाएंगे। यहां लगी दूरबीन से नीलगिरी की छोटी-बड़ी पहाड़ियों, घाटियों और पठारों के सुंदर दृश्य निहारना कभी न भूलने वाला अनुभव है। इस दूरबीन से आप ऊटी का बस स्टैंड और पूरे शहर का नजारा सकते हैं। दोड्डाबेट्टा चाय फैक्ट्री दोड्डाबेट्टा से करीब 4 किमी दूर इस फैक्ट्री को देखने भी टूरिस्ट खूब जाते हैं। आप इस चाय फैक्टरी में न केवल चाय तैयार होते देख सकते हैं, बल्कि अलग-अलग जायकों की चाय का भी मजा ले सकते हैं। यहां काम करने वाले आपको चाय की पत्तियां तोड़ने से लेकर पैक करने तक का पूरा प्रोसेस समझाएंगे। वैसे, आप यहां से डिफरेंट फ्लेचर की चाय खरीद भी सकते हैं। होममेड चॉकलेट स्टोर चाय फैक्ट्री के साथ बना होममेड चॉकलेट स्टोर भी पर्यटकों को लुभाता है। यहां के बेसमेंट में स्टोर के वर्कर्स को चॉकलेट बनाते हुए देख भी सकते हैं। तमाम फ्लेवर्स वाली इन चॉकलेट्स को वराइटी के हिसाब से 30 रुपये से 70 रुपये प्रति 100 ग्राम के हिसाब से ले सकते हैं। कुन्नूर ऊटी से करीब 20 किमी दूर कुन्नूर हिल स्टेशन वाकई घूमने लायक जगह है। यह समुद्र तल से 2,000 फुट ऊपर है। रास्ते में कालाहट्टी वॉटर फॉल्स देखने लायक हैं। तकरीबन 36 मीटर की ऊंचाई से गिरता यह खूबसूरत झरना पर्यटकों को मोह लेता है। कुन्नूर में सिम डॉल्फिन नोज और कोतागिरी पॉप्युलर पिकनिक स्पॉट्स हैं। मुदुमलाय सेंचुरी वाइल्डलाइफ में इंटरेस्ट रखते हैं, तो यहां जा सकते हैं। इसके लिए आपको सड़क मार्ग से ऊटी से मैसूर जाना पड़ेगा। यहां आप जंगल सफारी का मजा ले सकते हैं। यहां पर्यटकों के ठहरने की व्यवस्था भी की गई है। कब जाएं ऊटी जाने का सबसे बेस्ट टाइम अप्रैल से जून और सितंबर से अक्टूबर के बीच का है। कहां ठहरें ऊटी में आपको कई मंहगे-सस्ते होटल और रिजॉर्ट मिल जाएंगे। आप अपने बजट के हिसाब से होटल ले सकते हैं। कैसे पहुंचें ऊटी का सबसे निकटतम हवाई अड्डा कोयंबटूर है। यहां से टैक्सी करके आप ऊटी आ सकते हैं। वैसे, ऊटी देश के प्रमुख रेल और सड़क मार्ग से जुड़ा हुआ है।
प्राकृतिक सौन्दर्य से परिपूर्ण है भारत का आखिरी गांव माणा, कहते है इसी रास्ते पांडव गए थे अलकापुरी
पांडव इसी प्राकृतिक सौन्दर्य से पूर्ण मार्ग से होते हुए अलकापुरी गए थे।कहते हैं कि अब भी कुछ लोग इस स्थान को स्वर्ग जाने का रास्ता मानकर चुपके से चले जाते हैं। हिमालय में बद्रीनाथ से तीन किमी आगे समुद्र तल से 18,000 फुट की ऊंचाई पर बसा है भारत का अंतिम गांव माणा। भारत-तिब्बत सीमा से लगे इस गांव की सांस्कृतिक विरासत तो महत्त्वपूर्ण है ही, यह अपनी अनूठी परम्पराओं के लिए भी खासा मशहूर है। यहां रडंपा जनजाति के लोग निवास करते हैं। पहले बद्रीनाथ से कुछ ही दूर गुप्त गंगा और अलकनंदा के संगम पर स्थित इस गांव के बारे में लोग बहुत कम जानते थे लेकिन अब सरकार ने यहां तक पक्की सड़क बना दी है। इससे यहां पर्यटक आसानी से आ जा सकते हैं, और इनकी संख्या भी पहले की तुलना में अब काफी बढ़ गई है। भारत की उत्तरी सीमा पर स्थित इस गांव के आसपास कई दर्शनीय स्थल हैं जिनमें व्यास गुफा, गणेश गुफा, सरस्वती मन्दिर, भीम पुल, वसुधारा आदि मुख्य हैं। बहुत कठिन है जीवन माणा में कड़ाके की सर्दी पड़ती है। छह महीने तक यह क्षेत्र केवल बर्फ से ही ढका रहता है। यही कारण है कि यहां कि पर्वत चोटियां बिल्कुल खड़ी और खुश्क हैं। सर्दियां शुरु होने से पहले यहां रहने वाले ग्रामीण नीचे स्थित चमोली जिले के गांवों में अपना बसेरा करते हैं। आपको जानकर हैरत होगी कि यहां का एकमात्र इंटर कॉलेज छह महीने माणा में और छह महीने चमोली में चलाया जाता है। हालांकि यह पूरा क्षेत्र सालभर ठंडा रहता है लेकिन यहां की जमीन को बंजर नहीं कहा जा सकता। अप्रैल-मई में जब यहां बर्फ पिघलती है, तब यहां की हरियाली देखने लायक होती है। यहां की मिट्टी आलू की खेती के लिए सबसे अच्छी मानी जाती है। जौ और थापर (इसका आटा बनता है) भी अन्य प्रमुख फसलों में हैं। इनके अलावा यहां भोजपत्र भी बड़ी संख्या में पाए जाते हैं, जिन पर हमारे महापुरुषों ने अपने ग्रंथों की रचना की थी। बद्रीनाथ में तो ये बिकते भी हैं। खेत जोतने के लिए यहां के लोग पशु-पालन भी करते हैं। पहले भेड़-बकरियां काफी संख्या में पाली जाती थीं लेकिन जाड़ों में उन्हें निचले क्षेत्रों में ले जाने वाली परेशानी को देखते हुए उनकी संख्या काफी कम हो गई है। मिलती हैं जड़ी-बूटियां हिमालय क्षेत्र में मिलने वाली अचूक जड़ी-बूटियों के लिए भी माणा गांव बहुत प्रसिद्ध है। हालांकि यहां के बहुत कम लोगों को इसकी जानकारी है। यहां मिलने वाली कुछ उपयोगी जड़ी-बूटियों में बालछड़ी है जो बालों में रूसी खतम करने और उन्हें स्वस्थ रखने के काम आती है। इसके अलावा खोया है जिसकी पत्तियों से सब्जी बना कर खाने से पेट बिल्कुल साफ हो जाता है। यहां मिलने वाली पीपी की जड़ भी काफी प्रसिद्ध है, इसकी जड़ को पानी में उबाल कर पीने से भी पेट साफ होता है और कब्ज की शिकायत नहीं रहती। पाखान जड़ी भी अपने आप में बहुत कारगर है, इसको नमक और घी के साथ चाय बनाकर पीने से पथरी की समस्या कभी नहीं होती और पथरी के इलाज में भी ये बहुत कारगर साबित होती है। चावल की शराब और गलीचे माणा गांव की आबादी चार सौ के करीब है और यहां केवल 60 घर हैं। ज्यादातर घर दो मंजिलों पर बने हुए हैं और इन्हें बनाने में लकड़ी का ज्यादा प्रयोग हुआ है। छत पत्थर के पटालों की बनी है। इन घरों की खूबी ये है कि इस तरह के मकान भूकम्प के झटकों को आसानी से झेल लेते हैं। इन मकानों में ऊपर की मंजिल में घर के लोग रहते हैं जबकि नीचे पशुओं को रखा जाता है। शराब के बाद चाय यहां के लोगों का प्रमुख पेय पदार्थ है। यहां चावल से शराब बनाई जाती है और यह घर-घर में बनती है। बद्रीनाथ धाम के पास शराब का यह बढ़ता प्रचलन मन को झिंझोड़ता और कचोटता जरूर है लेकिन हिमालयी क्षेत्र और जनजाति होने के कारण सरकार ने इन्हें शराब बनाने की छूट दे रखी है। दर्शनीय स्थल माणा गांव से लगे कई ऐतिहासिक दर्शनीय स्थल हैं। गांव से कुछ ऊपर चढ़ाई पर चढ़ें तो पहले नजर आती है गणेश गुफा और उसके बाद व्यास गुफा। व्यास गुफा के बारे में कहा जाता है कि यहीं पर वेदव्यास ने पुराणों की रचना की थी और वेदों को चार भागों में बांटा था।व्यास गुफा और गणेश गुफा यहां होने से इस पौराणिक कथा को सिद्ध करते हैं कि महाभारत और पुराणों का लेखन करते समय व्यासजी ने बोला और गणेशजी ने लिखा था। व्यास गुफा, गणेश गुफा से बड़ी है। गुफा में प्रवेश करते ही किसी की भी नजर एक छोटी सी शिला पर पड़ती है। इस शिला पर प्राकृत भाषा में वेदों का अर्थ लिखा गया है। इसके पास ही है भीमपुल पांडव इसी मार्ग से होते हुए अलकापुरी गए थे।कहते हैं कि अब भी कुछ लोग इस स्थान को स्वर्ग जाने का रास्ता मानकर चुपके से चले जाते हैं। प्राकृतिक सौन्दर्य के साथ-साथ भीम पुल से एक रोचक लोक मान्यता भी जुड़ी हुई है।जब पांडव इस मार्ग से गुजरे थे। तब वहां दो पहाड़ियों के बीच गहरी खाई थी, जिसे पार करना आसान नहीं था। तब कुंतीपुत्र भीम ने एक भारी-भरकम चट्टान उठाकर फेंकी और खाई को पाटकर पुल के रूप में परिवर्तित कर दिया। बगल में स्थानीय लोगों ने भीम का मंदिर भी बना रखा है। वसुधारा– इसी रास्ते से आगे बढ़ें तो पांच किमी. का पैदल सफर तय कर पर्यटक पहुंचते हैं वसुधारा. लगभग 400 फीट ऊंचाई से गिरता इस जल-प्रपात का पानी मोतियों की बौछार करता हुआ-सा प्रतीत होता है। ऐसा कहा जाता है कि इस पानी की बूंदें पापियों के तन पर नहीं पड़तीं। यह झरना इतना ऊंचा है कि पर्वत के मूल से पर्वत शिखर तक पूरा प्रपात एक नजर में नहीं देखा जा सकता।