यदि ऐसा नहीं तो आम जनता एंटीबायोटिक के बजाय हर्ब्स को पहल क्यों नहीं देती प्रसिद्ध व्यक्ति यदि कोल्ड ड्रिंक गुटका खाएगा तो हम भी खाएंगे अब उसके हर्बल प्रेम को भी अपनाओ विदेशी फार्मा कंपनियों में हाहाकार मचा लाबिंग शुरू की डॉ अर्चिता महाजन न्यूट्रीशन डाइटिशियन एवं चाइल्ड केयर होम्योपैथिक फार्मासिस्ट एवं ट्रेंड योगा टीचर नॉमिनेटेड फॉर पद्मा भूषण राष्ट्रीय पुरस्कार और पंजाब सरकार द्वारा सम्मानित ने बताया कि प्रसिद्ध क्रिकेटर और नेता ने जब से यह बताया है कि उनकी पत्नी का 4th स्टेज का कैंसर सिर्फ हल्दी और नीम से ठीक हो गया बिना किसी एंटीबायोटिक के तब से विदेशी फार्मा कंपनियों में हाहाकार मच गया है। क्योंकि उनकी दुकान बहुत जल्द बंद होने जा रही है छोटे-छोटे रोगों के लिए भारी भरकम एंटीबायोटिक बेचने वालिया कंपनियां अब किसी न किसी तरीके उसे नेता को झूठा साबित करने के लिए कोशिश कर रही है। अब सोचने वाली बात यह है कि क्या हल्दी सिर्फ नेता लोगों के ही भयंकर रोग ठीक करती है यदि ऐसा नहीं तो आम जनता एंटीबायोटिक के बजाय हर्ब्स को पहल क्यों नहीं देती। प्रसिद्ध व्यक्ति यदि कोल्ड ड्रिंक गुटका खाएगा तो हम भी खाएंगे पर अब जब उसने यह कहा है कि सिर्फ हल्दी और नीम के पत्तों से उनकी पत्नी का फोर्थ स्टेज का कैंसर ठीक हो गया तो फिर उसको भी मानना चाहिए छोटे-मोटे रोगों के लिए भारी भरकम एंटीबायोटिक खाने से बचना चाहिए बहुत ज्यादा जरूरत हो तभी एंटीबायोटिक का प्रयोग करें। परंतु हमारे देश में तो छोटे-छोटे बच्चों को ही सर्दी जुकाम में ही भारी भरकम एंटीबायोटिक दे दिए जाते हैं। धीरे-धीरे उनका शरीर में एंटीबायोटिक का अभ्यस्त हो जाता है जब बड़े होते हैं तब इन एंटीबायोटिक का उन पर असर ही नहीं होताअगर विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों की बात करें तो 2019 में एंटी माइक्रोबियल रेजिस्टेंस के कारण लगभग 1.27 मिलियन लोगों की मौत हुई हैं। यह आंकड़े चौंका देने वाले हैं। वैसे तो हर बीमारी के इलाज के लिए एंटी माइक्रोबियल दवाइयों का प्रयोग किया जाता है।एंटीबायोटिक्स का ज़्यादा सेवन करने से बैक्टीरिया इनके प्रति प्रतिरोधी हो जाते हैं. इसे एंटीबायोटिक प्रतिरोध कहते हैं.
नॉर्मल डिलीवरी के बाद शरीर का ज्यादा ध्यान कैसे रखें : डॉ अर्चिता महाजन
डिलीवरी के बाद सबका ध्यान बच्चों की तरफ होता है माता की तरफ कम बच्चों के साथ-साथ माता की डाइट का भी ध्यान रखें डॉ अर्चिता महाजन न्यूट्रीशन डाइटिशियन एवं चाइल्ड केयर होम्योपैथिक फार्मासिस्ट एवं ट्रेंड योगा टीचर नॉमिनेटेड फॉर पद्मा भूषण राष्ट्रीय पुरस्कार और पंजाब सरकार द्वारा सम्मानित ने बताया कि नॉर्मल डिलीवरी के बाद शरीर को ज्यादा देखभाल की जरूरत होती है। क्योंकि अक्सर हमारे समाज की यह आदत है डिलीवरी के बाद लोगों का ध्यान बच्चों की तरफ ज्यादा होता है और माता की तरफ कम नॉर्मल डिलीवरी के बाद शरीर को हाइड्रेटेड रखना बहुत जरूरी है। पानी पीने से शरीर में से सभी टॉक्सिन्स बाहर निकलते हैं और शरीर के अंग ठीक से काम करते हैं। इसके अलावा, यदि आप स्तनपान कर रही हैं, तो हाइड्रेशन लेवल को बनाए रखना बेहद जरूरी है। ऐसा इसलिए, क्योंकि इससे दूध उत्पादन में मदद मिलती है। नॉर्मल डिलीवरी के बाद, डाइट में इन बातों का ध्यान रखना चाहिए: डाइट में प्रोटीन, आयरन, फ़ाइबर, और कैल्शियम की कमी न होने दें. शरीर को हाइड्रेटेड रखने के लिए भरपूर मात्रा में पानी और तरल पदार्थ पिएं. डाइट में ताज़े फल और हरी सब्ज़ियां शामिल करें. ड्राई फ़्रूट्स जैसे बादाम,अखरोट, काजू, किशमिश, खजूर, और अंजीर खाएं. प्रोटीन की कमी को पूरा करने के लिए दूध, पनीर, सोया, और दालें खाएं. ओमेगा-3 फ़ैटी एसिड के लिए अखरोट, अलसी, और सालमन खाएं. डिलीवरी के बाद रोज़ाना दो बार दलिया खाएं. खिचड़ी को अपनी डाइट का हिस्सा ज़रूर बनाएं. खरबूज़े में पोटैशियम की मात्रा होती है, जो शरीर का आलस कम करता है और थकान कम करता है. अंडे में ओमेगा-3 फ़ैटी एसिड होता है, जो पोस्टपार्टम डिप्रेशन के खतरे को कम कर सकता है. डिलीवरी के बाद, इन चीज़ों से बचना चाहिए मसालेदार भोजन, तैलीय खाद्य पदार्थ, गैस बनाने वाले फ़ूड्स.
गेहूं चावल में आयरन कैल्शियम और जिंक की आश्चर्य जनक कमी और आर्सेनिक की वृद्धि : डॉ अर्चिता महाजन
अत्यधिक कीटनाशक और रासायनिक खादो के प्रयोग से मिट्टी की गुणवत्ता बिगड़ी फ्री में बांटने के लिए भी कुछ राज्य सरकारें पंजाब का चावल रिजेक्ट कर रहे हैं डॉ अर्चिता महाजन न्यूट्रीशन डाइटिशियन एवं चाइल्ड केयर होम्योपैथिक फार्मासिस्ट एवं ट्रेंड योगा टीचर नॉमिनेटेड फॉर पद्मा भूषण राष्ट्रीय पुरस्कार और पंजाब सरकार द्वारा सम्मानित ने बताया कि भारत में वर्तमान में चावल और गेहूं जैसी फसलों में पोषक तत्वों की कमी होती जा रही है. टेलीग्राफ में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, वैज्ञानिकों ने अपनी एक स्टडी में दावा किया है कि अनाज से कैल्शियम, आयरन और जिंक सहित आवश्यक तत्व 1960 के अनाज की तुलना में 19 प्रतिशत से 45 प्रतिशत कम हो गए हैं. ICAR की रिपोर्ट के मुताबिक, आधुनिक तरीके से उगाए जाने वाले गेहूं और चावल में पोषक तत्वों की कमी हो रही है और ये सेहत के लिए ज़हरीले भी हो सकते हैं. इन अनाजों को ज़्यादा पैदावार के लिए विकसित किया गया है, जिससे इनकी पौष्टिकता को नुकसान पहुंचा है. 1980 के दशक के बाद से विकसित किए गए अनाजों में पोषक तत्वों की कमी हो रही है. इनमें ज़िंक और आयरन जैसे पोषक तत्वों में कमी आई है.नए अध्ययन में वैज्ञानिकों ने कई आवश्यक तत्वों और आर्सेनिक और क्रोमियम जैसे विषाक्त तत्वों में परिवर्तन की माप की गई. 2000 के दशक के चावल में औसत आर्सेनिक स्तर 1960 के दशक के चावल की तुलना में लगभग 16 गुना अधिक है जबकि औसत क्रोमियम स्तर लगभग चार गुना अधिक है.फ्री में बांटने के लिए भी कुछ राज्य सरकारें पंजाब का चावल रिजेक्ट कर रहे हैं यह चावल 4 नवंबर को संगरूर के दिमारपुर असम और नागालैंड भेजा गया था। इससे पहले अरुणाचल प्रदेश और कर्नाटक सरकार ने भी पंजाब का चावल रद्द कर दिया था।
फ़्रेंच फ़्राइज़ बच्चों के लिए धीमा जहर है: डॉ अर्चिता महाजन
आपको क्या पता एक ही तेल को कितनी बार गर्म किया गया है फ्राइड फूड्स का नियमित सेवन एंग्जाइटी और डिप्रेशन के खतरे को क्रमश 12 और 7 फीसदी तक बढ़ा देता है।प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज द्वारा की गई एक रिसर्च के मुताबिक, फ्रेंच फ्राइज खाने से शरीर में एक्रिलामाइड नामक रसायन बनता है, जिससे एंग्जाइटी और डिप्रेशन जैसी समस्याएं हो सकती है. इस स्टडी के मुताबिक, उबले हुए आलू के मुकाबले तला हुआ आलू मेंटल हेल्थ को कई तरह के नुकसान पहुंचा सकता है.फ्रेंच फ्राइज़ के नियमित सेवन को मोटापे, हृदय रोग, उच्च रक्तचाप और यहां तक कि टाइप 2 मधुमेह जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जोड़ा गया है। अस्वास्थ्यकर वसा और नमक से भरपूर आहार न केवल वजन बढ़ाता है बल्कि आपके दिल और धमनियों पर भी अतिरिक्त दबाव डालता है।जब हमारे बच्चे इन खराब वसा का सेवन करते हैं तो वे अपने रक्त में प्लेटलेट्स को चिपचिपा बना देते हैं। ये चिपचिपे छोटे प्लेटलेट्स फिर थक्के बनाते हैं जो धमनियों की दीवारों से चिपक जाते हैं जो शरीर के महत्वपूर्ण क्षेत्रों को ऑक्सीजन युक्त रक्त की आपूर्ति करते हैं। ये चिपचिपे छोटे थक्के प्लाक की एक दीवार बनाते हैं जो अंततः दिल के दौरे या स्ट्रोक का कारण बन सकते हैं।फ़्रेंच फ़्राइज़ को तलने के लिए इस्तेमाल होने वाले तेल में संतृप्त वसा और कोलेस्ट्रॉल की मात्रा ज़्यादा होती है.तले हुए खाद्य पदार्थों में कैलोरी और वसा की मात्रा ज़्यादा होती है. तलने से पहले इन्हें बैटर या आटे में लपेटा जाता है और तेल में तलने पर ये पानी खो देते हैं और वसा को अवशोषित करते हैं. कई रेस्तरां में डीप-फ़्राइड फ़्राइज़ बड़े आकार के हिस्सों में परोसे जाते हैं, जिससे वज़न बढ़ने और उससे जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है.हार्वर्ड टी.एच. चैन स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्त में एपिडमियोलॉजी और न्यूट्रिशन के प्रोफेसर डॉ. वॉल्टर विलेट का कहना है कि इन तले हुए फूड्स का स्वास्थ्य प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि कौन से फूड्स को तला जा रहा है और किस प्रकार के फैट को तलने के लिए यूज किया जा रहा है। जहां तक बात आलू की है तो इसका हमारे मूड पर प्रभावपड़ सकता है क्योंकि ये ब्लड शुगर बढ़ाने काम करता है और ये हार्मोन रिस्पॉन्स की वजह से होता है। कुछ प्रभाव फैट का भी होता है, जो कि तलने से पैदा होता है।तेल को बार-बार गर्म करने से कई नुकसान हो सकते हैं:1. तेल की गुणवत्ता खराब होती है।2. तेल में मौजूद पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं3. तेल में हानिकारक रसायन बनते हैं।4. तेल का रंग और स्वाद बदल जाता है।5. तेल में मौजूद विटामिन और मिनरल नष्ट हो जाते हैं।बार-बार गर्म करने से तेल में हानिकारक यौगिक बनते हैं: 1. पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन (पीएएच) 2. हाइड्रोकार्बन 3. अल्डिहाइड 4. केटोन इन यौगिकों के सेवन से स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकते हैं: 1. कैंसर 2. हृदय रोग 3. मधुमेह 4. मानसिक समस्याएं 5. पाचन समस्याएं
KFC जीभ के स्वाद के लिए आपको मुर्गा नहीं केमिकल खिला रहा हैं : डॉ अर्चिता महाजन
यह विदेशी कंपनियां कैसे हिंदुस्तानियों की सेहत से खिलवाड़ कर रही है KFC तमिलनाडु के थूथुकुडि जिले अपने चिकन में मैग्नीशियम सिलिकेट-सिंथेटिक का इस्तेमाल कर रहा था। डॉ अर्चिता महाजन न्यूट्रीशन डाइटिशियन एवं चाइल्ड केयर होम्योपैथिक फार्मासिस्ट एवं ट्रेंड योगा टीचर नॉमिनेटेड फॉर पद्मा भूषण राष्ट्रीय पुरस्कार और पंजाब सरकार द्वारा सम्मानित ने बताया कि लोग बहुत शौक से सेहत बनाने के चक्कर में मुर्गा खा रहे हैं। बड़ी-बड़ी कंपनियां जैसे की (KFC) तरह-तरह के पकवान मुर्गो के बनाकर लोगों को खिलाएं जा रहे हैं जोकि केमिकल से तैयार किया गया है। जीभ को स्वाद सिर्फ उस पर लगे हुए मसाले का ही आता है। बाकी जो मुर्गी का मांस खा रहे हैं वह आपको ताकत नहीं देगा बल्कि आपके हॉरमोन इंबैलेंस कर देगा। तमिलनाडु के थूथुकुडि जिले से सामने आया है। यहां जिला खाद्य सुरक्षा विभाग के अधिकारीयों ने दुनियाभर में फेमस अमेरिकी रेस्टोरेंट केंटकी फ्राइड चिकन (KFC) के एक आउटलेट में छापा मारा। आरोप है कि केएफसी अपने चिकन में मैग्नीशियम सिलिकेट-सिंथेटिक का इस्तेमाल कर रहा था। रेस्टोरेंट का लाइसेंस टेम्पररी कैंसल कर दिया गया है।मैग्नीशियम सिलिकेट-सिंथेटिक एक खतरनाक केमिकल है, जिसके इस्तेमाल पर खाद्य पदार्थों पर नजर रखने वाली देश की सबसे बड़ी संस्था FSSAI ने बैन लगा रखा है।मैग्नीशियम सिलिकेट को सांस के ज़रिए अंदर लेने से श्वसन मार्ग में जलन हो सकती है. इससे खांसी, गले में खराश, और सांस लेने में तकलीफ़ जैसी समस्याएं हो सकती हैं. कई सालों तक एंटासिड के तौर पर मैग्नीशियम सिलिकेट का नियमित इस्तेमाल करने से मूत्राशय और गुर्दे में पथरी बन सकती है. यह आंखों, त्वचा, और श्वसन मार्गों के लिए हल्का परेशान करने वाला पदार्थ हैमैग्नीशियम की अधिकता के सामान्य लक्षण मतली, उल्टी, दस्त, चक्कर आना, मांसपेशियों में कमज़ोरी हैं। मैग्नीशियम की अधिक खुराक लेने से शरीर में बहुत ज़्यादा मैग्नीशियम पहुँच जाता है, जिससे दिल को नुकसान पहुँचता है या श्वसन तंत्र फेल हो जाता है, खास तौर पर पहले से किडनी की बीमारी वाले लोगों के लिए और भी खतरनाक है।
फैमिली हिस्ट्री प्रॉस्टेट प्रोबलम की हो पेशाब रुक कर या दर्द के साथ आए तो सावधान हो जाइए : डॉ अर्चिता महाजन
अश्वेत पुरुषों को इसकी संभावना ज्यादा होती है डॉ अर्चिता महाजन न्यूट्रीशन डाइटिशियन एवं चाइल्ड केयर होम्योपैथिक फार्मासिस्ट एवं ट्रेंड योगा टीचर नॉमिनेटेड फॉर पद्मा भूषण राष्ट्रीय पुरस्कार और पंजाब सरकार द्वारा सम्मानित ने बताया कि पेशाब करने में दिक्कत होना ,बार-बार पेशाब आना ,पेशाब में खून आना ,पीठ के निचले हिस्से, श्रोणि, या ऊपरी जांघों में दर्द प्रॉस्टेट प्रोबलम के लक्षण है। साबुत अनाज, जैसे दलिया, जौ, क्विनोआ और ब्राउन चावल, फाइबर से भरपूर होते हैं और सूजन को कम करने में मदद कर सकते हैं।सब्जियां, विशेष रूप से गहरे हरे पत्तेदार सब्जियां, फाइबर और विटामिन से भरपूर होती हैं और सूजन को कम करने में मदद कर सकती हैं। फल विटामिन औरएंटीऑक्सीडेंट का एक बेहतरीन स्रोत हैं और सूजन को कम करने में मदद कर सकते हैं। स्वस्थ प्रोस्टेट के लिए कुछ सबसे अच्छे फल अंगूर, सेब, अनार, रसभरी, ब्लूबेरी और तरबूज हैं। मेवे और बीज स्वस्थ वसा का एक बड़ा स्रोत हैं और सूजन को कम करने में मदद कर सकते हैं।फलियां, जैसे सेम, दाल और मटर, फाइबर से भरपूर होती हैं और सूजन को कम करने में मदद कर सकती हैं। अश्वेत पुरुषों को पुरुषों को प्रोस्टेट कैंसर होने के चांसेस ज्यादा होते हैं।जड़ी-बूटियाँ और मसाले: अदरक और हल्दी जैसी जड़ी-बूटियाँ और मसाले एंटीऑक्सीडेंट का एक बड़ा स्रोत हैं और सूजन को कम करने में मदद कर सकते हैं। 40 की आजू के बाद यह पदार्थ खाने बंद कर दो।कैलोरी, पशु वसा और परिष्कृत चीनी से भरपूर आहार प्रोस्टेट कैंसर के बढ़ते जोखिम से जुड़ा हुआ है। अपने आहार में स्वस्थ वसा को शामिल करना भी महत्वपूर्ण है। नट्स, बीज, एवोकाडो और सैल्मन जैसी वसायुक्त मछली में पाए जाने वाले स्वस्थ वसा सूजन को कम करने और समग्र स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मदद कर सकते हैं।
कभी कभी या सिर्फ सुबह पीला पेशाब आए तो जरूरी नहीं किडनी प्रॉब्लम हो : डॉ अर्चिता महाजन
निर्जलीकरण, विटामिन बी की दवाई, गाजर चुकंदर का ज्यादा सेवन करने से भी पीला पेशाब आता है चाय कॉफी और अल्कोहल के ज्यादा सेवन से भी ऐसा हो सकता है डॉ अर्चिता महाजन न्यूट्रीशन डाइटिशियन एवं चाइल्ड केयर होम्योपैथिक फार्मासिस्ट एवं ट्रेंड योगा टीचर नॉमिनेटेड फॉर पद्मा भूषण राष्ट्रीय पुरस्कार और पंजाब सरकार द्वारा सम्मानित ने बताया कि इसमें कोई शक नहीं पीला पेशाब आना किडनी प्रॉब्लम को दर्शाता है परंतु यदि यह कभी कभार जा फिर सिर्फ सुबह को पीला आए तो घबराने की जरूरत नहीं हां यदि यह सारा दिन पीला ही आता रहे और यह लंबे समय तक चलता रहे तो आपको कुछ टेस्ट जरूर कराने चाहिए। ज्यादा चुकंदर और गाजर खाने से भी कुछ समय तक पेशाब पीला आ सकता है। यदि आपने विटामिन बी की कोई दवाई खाई है तो भी पेशाब पीला आता है। सबसे बड़ी बात जब भी शरीर में पानी की कमी होगी तो पेशाब पीला ही आएगा शरीर में पानी की कमी होने पर पेशाब का रंग पीला हो जाता है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि पानी की कमी में किडनी पानी रोककर सिर्फ़ गंदगी बाहर निकालती है. मूत्र पथ में संक्रमण यानी यूटीआई से भी पेशाब का रंग पीला या धुंधला हो सकता है. विटामिन बी की मात्रा ज़्यादा होने की वजह से भी पेशाब का रंग चमकीला पीला हो सकता। इसलिए घबराने की जरूरत नहीं होती सबसे पहले पूरे दिन में 10 से 12 गिलास पानी पीना शुरू कर दीजिए निर्जलीकरण के कारण यदि पेशाब पीला रहा होगा तो ठीक हो जाएगा । विटामिन सी बिलीरुबिन को तोड़ने और पीले पेशाब की उपस्थिति को कम करने में मदद कर सकता है। विटामिन सी से भरपूर खाद्य पदार्थों में खट्टे फल, जामुन और पत्तेदार सब्जियाँ शामिल हैं।पानी से भरपूर फल और सब्जियां खाएं:खीरा, तरबूज और खट्टे फल जैसे खाद्य पदार्थ हाइड्रेशन में योगदान कर सकते हैं और स्वस्थ पेशाब के रंग को बनाए रखने में मदद कर सकते हैं। ज्यादा चाय कॉफी और अल्कोहल लेने से भी पेशाब पीला आता है यदि आप पीले पेशाब से परेशान है तो कुछ दिन तक चाए काफी और अल्कोहल छोड़ दें
प्रदूषित शहरों में रहने वाले बच्चे इंटेलिजेंट नहीं हो पाते :डॉ अर्चिता महाजन
याददाश्त में कमी, एकाग्रता में कमी, ब्रेन डैमेज ,न्यूरो डेवलपमेंट ,कॉग्निटिव फंक्शन आदि समस्याएं हो सकती हैं डॉ अर्चिता महाजन न्यूट्रीशन डाइटिशियन एवं चाइल्ड केयर होम्योपैथिक फार्मासिस्ट एवं ट्रेंड योगा टीचर नॉमिनेटेड फॉर पद्मा भूषण राष्ट्रीय पुरस्कार और पंजाब सरकार द्वारा सम्मानित ने बताया कि यूनीसेफ और विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट्स में ऐसा कहा गया है कि छोटे बच्चों का इम्यून सिस्टम कमज़ोर होने के कारण वायु प्रदूषण का बुरा असर उनपर अधिक पड़ सकता है। इसी तरह बच्चों के दिमाग पर भी वायु प्रदूषण का बुरा प्रभाव पड़ने की आशंका जतायी गयी हैंस्टडीज़ और रिपोर्ट्स के अनुसार, वायु प्रदूषण के बुरे प्रभावों के प्रति बच्चों के अधिक संवेदनशील होने की एक वजह उनकी तेज गति से सांस लेने की प्रवृति भी है। बच्चे वयस्कों की तुलना में ज़्यादा तेज गति से सांस लेते हैं जिसके चलते प्रदूषित हवा और प्रदूषण फैलाने वाले कण बच्चों के शरीर में जल्दी और अधिक मात्रा में प्रवेश कर सकते हैं। इससे शरीर के अंदरूनी अंगों को नुकसान पहुंच सकता है और विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा भी बढ़ सकता है।प्रदूषण का दिमाग पर बहुत बुरा असर पड़ सकता है, जिनमें से कुछ प्रमुख प्रभाव निम्नलिखित हैं: 1. ब्रेन डैमेज: वायु प्रदूषण ब्रेन डैमेज का एक कारण हो सकता है, जिससे मस्तिष्क की कोशिकाएं नष्ट हो सकती हैं। 2. न्यूरो-डेवलपमेंट: प्रदूषण बच्चों में न्यूरो-डेवलपमेंट को प्रभावित कर सकता है, जिससे उनकी सीखने की क्षमता और स्मृति प्रभावित हो सकती है। 3. कॉग्निटिव फंक्शन: वायु प्रदूषण बच्चों की कॉग्निटिव फंक्शन को कम कर सकता है, जिससे उनकी सोच, सीखने और याद रखने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। 4. मानसिक स्वास्थ्य: प्रदूषण मानसिक स्वास्थ्य पर भी बुरा असर डाल सकता है, जिससे डिप्रेशन, एंग्जाइटी और अन्य मानसिक समस्याएं हो सकती हैं। 5. नींद की समस्या: प्रदूषण के कारण नींद की समस्या हो सकती है, जिससे दिमाग की क्षमता प्रभावित हो सकती है। 6. एकाग्रता की कमी: प्रदूषण के कारण एकाग्रता की कमी हो सकती है, जिससे काम और अध्ययन में परेशानी हो सकती है। 7. याददाश्त की कम: प्रदूषण के कारण याददाश्त की कमी हो सकती है, जिससे सीखने और याद रखने में परेशानी हो सकती है।
कहीं आप तो नहीं खा रहे कच्चे अंडे,अधपका मांस,और प्रोसेस्ड फूड : डॉ अर्चिता महाजन
आंतों को धीमे जहर की तरह कर रहा तबाह यह बैक्टीरिया डॉ अर्चिता महाजन न्यूट्रीशन डाइटिशियन एवं चाइल्ड केयर होम्योपैथिक फार्मासिस्ट एवं ट्रेंड योगा टीचर नॉमिनेटेड फॉर पद्मा भूषण राष्ट्रीय पुरस्कार और पंजाब सरकार द्वारा सम्मानित ने बताया कि कच्चे अंडे, अधपका मांस, सब्जियां, और प्रोसेस्ड फूड में पाए जाने वाला यह साल्मोनेला बैक्टीरिया आंत में गंभीर संक्रमण पैदा कर सकता है. हाल ही में नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज में प्रकाशित एक शोध में खुलासा हुआ है कि साल्मोनेला बैक्टीरिया आंत में पोषक तत्वों के संतुलन को बदलकर खुद को जीवित रखता है और संक्रमण फैलाता है.साल्मोनेला संक्रमण वाले कुछ लोगों में कोई लक्षण नहीं दिखते। ज़्यादातर लोगों को संक्रमण के 8 से 72 घंटों के भीतर दस्त, बुखार और पेट (उदर) में ऐंठन की समस्या हो जाती है। साल्मोनेला बैक्टीरिया की कुछ किस्मों के कारण टाइफाइड बुखार होता हैसाल्मोनेला एक बैक्टीरिया है जो आमतौर पर जानवरों और इंसानों की आंतों में रहता है. यह बैक्टीरिया मल के ज़रिए बाहर निकलता है. इंसानों में साल्मोनेला संक्रमण (साल्मोनेलोसिस) होने की वजहें ये हैं: साल्मोनेला सबसे पहले छोटी आंत में प्रवेश करता है और आंत की परत में सूजन उत्पन्न करता है. इससे भोजन से अमीनो एसिड के सामान्य अवशोषण में रुकावट आती है. परिणामस्वरूप, ये अमीनो एसिड जैसे लाइसिन और ऑर्निथिन बड़ी आंत में जमा हो जाते हैं. यह बैक्टीरिया को शॉर्ट-चेन फैटी एसिड (एससीएफए) के हानिकारक प्रभावों से बचाने में मदद करता है, जिससे यह बैक्टीरिया तेजी से बढ़ता है.
भारत का हर सातवां व्यक्ति डायबिटीज से पीड़ित है लैंसेट जर्नल की रिपोर्ट ने चौंकाया: डॉ अर्चिता महाजन
ऐसा क्यों हुआ कि अमीर देशों ने इसे कंट्रोल कर लिया अब तो कोल्ड ड्रिंक फास्ट फूड छोड़ दो डॉ अर्चिता महाजन न्यूट्रीशन डाइटिशियन एवं चाइल्ड केयर होम्योपैथिक फार्मासिस्ट एवं ट्रेंड योगा टीचर नॉमिनेटेड फॉर पद्मा भूषण राष्ट्रीय पुरस्कार और पंजाब सरकार द्वारा सम्मानित ने बताया कि द लैंसेट जर्नल में प्रकाशित आंकड़ों के मुताबिक, 2022 तक 82.8 करोड़ लोग डायबिटीज से पीड़ित हैं. इनमें से एक चौथाई से ज्यादा मरीज भारत से हैं.जिनमें से एक चौथाई से अधिक करीब 21.2 करोड़ डायबिटीज के मरीज भारत में रहते थे. इसके बाद सबसे अधिक डायबिटीक मरीजों वाले देश की सूची में चीन 14.8 करोड़, अमेरिका 4.2 करोड़, पाकिस्तान 3.6 करोड़, इंडोनेशिया 2.5 करोड़ और ब्राजील 2.2 करोड़ मरीजों के साथ शामिल है. भारत में फ्री डायबीटिक्स केसेस जाता है। क्योंकि उन्होंने कभी अपनी डायबिटीज चेक ही नहीं की इसलिए यह आंकड़ा भी कम है।रिसर्च के अनुसार डायबिटीज के चलते हर मरीज की उम्र औसतन 3-4 साल कम हो रही है। इससे जुड़े शोधकर्ताओं का अनुमान है कि 30 साल की उम्र में मधुमेह की पहचान होने पर उम्र 14 वर्ष, 40 वर्ष की उम्र में पहचान होने पर उम्र 10 वर्ष और 50 वर्ष की उम्र में पहचान होने पर उम्र 6 वर्ष तक घटने की आशंका रहती हैभारतीयों में आनुवंशिक रूप से मधुमेह होने की संभावना अधिक होती है ।भारत तो वैसे ही ‘डायबिटीज कैपिटल ऑफ द वर्ल्ड’ कहलाता है. यानी हमारे देश में डायबिटीज के सबसे ज्यादा मामले हैं.स्टडी के मुताबिक, साल 1990 और 2022 के बीच पुरुषों (6.8% से 14.3%) और महिलाओं में (6.9% से 13.9%) डायबिटीज होने का खतरा दोगुना हो गया है. निम्न और मध्यम आय वाले देशों में इसका सबसे अधिक प्रभाव देखा गया. जबकि कुछ उच्च आय वाले देशों (जापान, कनाडा और पश्चिमी यूरोप के फ्रांस, स्पेन और डेनमार्क) में पिछले तीन दशको में डायबिटीज में प्रभाव में मामूली कमी देखी गई. अमीर देश में कानून थोड़ा शक्ति से पालन किए जाते हैं इसलिए वहां पर फास्ट फूड और सॉफ्ट ड्रिंक वाली कंपनियां नियमित रूप से प्रोडक्ट बनाती हैं परंतु हमारे यहां तो कोई रूल्स एंड रेगुलेशन फॉलो नहीं किया जाता।