मौत के बाद भी ‘जागता’ दिमाग? नई स्टडी ने जीवन-मृत्यु की सीमा पर खड़े किए सवाल

डिजिटल डेस्क। मौत सदियों से मानवता के लिए एक गूढ़ रहस्य रही है। जीवन की अंतिम सांस के बाद क्या होता है—क्या चेतना तुरंत समाप्त हो जाती है या कुछ क्षणों तक बनी रहती है—इस प्रश्न पर विज्ञान, दर्शन और धर्म सभी अपने-अपने दृष्टिकोण प्रस्तुत करते रहे हैं। अब एक नई वैज्ञानिक स्टडी ने इस बहस को फिर से जीवंत कर दिया है। हाल ही में प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल Resuscitation में प्रकाशित एक शोध ने चौंकाने वाला दावा किया है। अध्ययन के अनुसार, दिल की धड़कन रुक जाने के बाद भी कुछ समय तक इंसानी दिमाग सक्रिय रह सकता है। इतना ही नहीं, कुछ मामलों में मरीज अपने आसपास हो रही बातचीत—यहां तक कि डॉक्टरों द्वारा अपनी मृत्यु की घोषणा—तक सुन पाने की स्थिति में हो सकते हैं। क्या कहती है स्टडी? इस शोध से जुड़े चिकित्सकों का कहना है कि ‘क्लीनिकल डेथ’ यानी जब दिल की धड़कन और सांस रुक जाती है, वह अंतिम बिंदु नहीं हो सकता। अध्ययन के दौरान ऐसे मरीजों के अनुभव दर्ज किए गए जिन्हें कार्डियक अरेस्ट के बाद पुनर्जीवित किया गया था। कई मरीजों ने बताया कि वे अपने आसपास हो रही गतिविधियों, डॉक्टरों की आवाज़ और इलाज की प्रक्रिया को “महसूस” या “सुन” पा रहे थे। शोध में यह संकेत मिला कि हृदय रुकने के बाद भी कुछ मिनटों तक मस्तिष्क में विद्युत गतिविधि (ब्रेन वेव्स) दर्ज की जा सकती है। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह गतिविधि चेतना से जुड़ी हो सकती है, हालांकि इस पर अभी और गहन अध्ययन की आवश्यकता है। मौत की परिभाषा पर पुनर्विचार? न्यूयॉर्क के एक डॉक्टर द्वारा साझा किए गए निष्कर्षों ने मेडिकल जगत में नई बहस छेड़ दी है। परंपरागत रूप से, दिल की धड़कन रुकने को मृत्यु का संकेत माना जाता रहा है। लेकिन यदि दिमाग कुछ समय तक सक्रिय रहता है, तो यह सवाल उठता है कि वास्तविक मृत्यु का क्षण कौन-सा है—हृदय का रुकना या मस्तिष्क की अंतिम गतिविधि का समाप्त होना? विशेषज्ञों का मानना है कि यह शोध ‘नियर-डेथ एक्सपीरियंस’ (मृत्यु-समीप अनुभव) को समझने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कड़ी हो सकता है। वर्षों से कई लोग सुरंग जैसी रोशनी देखने, अतीत की झलकियां दिखने या किसी अलौकिक शांति का अनुभव करने की बात करते रहे हैं। अब वैज्ञानिक इन अनुभवों को मस्तिष्क की जैविक प्रक्रियाओं से जोड़कर समझने का प्रयास कर रहे हैं। नैतिक और चिकित्सकीय प्रभाव यदि यह साबित होता है कि मृत्यु के बाद कुछ समय तक चेतना बनी रह सकती है, तो अस्पतालों में इलाज और पुनर्जीवन (CPR) की प्रक्रियाओं को लेकर नए मानक तय करने पड़ सकते हैं। साथ ही, जीवन के अंतिम क्षणों में मरीज के साथ व्यवहार, संवाद और वातावरण को लेकर भी संवेदनशीलता और बढ़ानी होगी। यह अध्ययन न केवल विज्ञान की सीमाओं को चुनौती देता है, बल्कि जीवन और मृत्यु की हमारी पारंपरिक समझ को भी पुनर्परिभाषित करने की ओर इशारा करता है। हालांकि शोधकर्ता स्वयं मानते हैं कि यह अंतिम निष्कर्ष नहीं है, बल्कि एक नए विमर्श की शुरुआत है।

हर दूसरा भारतीय अभिभावक चिंतित: इंटरनेट पर गलत कंटेंट और साइबर बुलिंग से बच्चों का बचपन खतरे में

नई दिल्ली। डिजिटल दौर में इंटरनेट ने जहां बच्चों के लिए ज्ञान और मनोरंजन के अनगिनत दरवाजे खोले हैं, वहीं इसके बढ़ते दुष्प्रभाव अब अभिभावकों के लिए चिंता का कारण बनते जा रहे हैं। हाल ही में लोकल सर्कल्स द्वारा किए गए एक सर्वे में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि देश के 300 से अधिक शहरों में हर दूसरा अभिभावक मानता है कि उनके बच्चों ने इंटरनेट पर या तो अनुचित कंटेंट देखा है या वे साइबर बुलिंग का शिकार हुए हैं। यह स्थिति न केवल सामाजिक बल्कि मानसिक स्वास्थ्य के लिहाज से भी गंभीर संकेत दे रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इंटरनेट पर अनियंत्रित और असुरक्षित एक्सपोजर बच्चों के व्यक्तित्व और व्यवहार पर गहरा असर डाल सकता है। कम उम्र में गलत कंटेंट का असर बच्चों का दिमाग अत्यंत संवेदनशील होता है। जब वे अपनी उम्र से पहले हिंसक, अश्लील या अनुचित सामग्री देखते हैं, तो उनका मानसिक विकास प्रभावित हो सकता है। कई बार वे वास्तविक और काल्पनिक दुनिया के बीच अंतर नहीं कर पाते, जिससे उनके सोचने और समझने की क्षमता पर असर पड़ता है। विशेषज्ञ बताते हैं कि हिंसक वीडियो गेम्स और कंटेंट बच्चों में संवेदनहीनता बढ़ा सकते हैं। बार-बार ऐसे दृश्य देखने से उनके भीतर हिंसा को सामान्य मानने की प्रवृत्ति विकसित हो सकती है। व्यवहार में बढ़ती आक्रामकता सर्वे में यह भी सामने आया है कि कई अभिभावकों ने बच्चों के व्यवहार में पहले की तुलना में अधिक गुस्सा और चिड़चिड़ापन देखा है। इंटरनेट पर मौजूद हिंसक गेम्स और वीडियो बच्चों के मस्तिष्क पर ऐसा प्रभाव डाल सकते हैं कि वे छोटी-छोटी बातों पर प्रतिक्रिया देने लगते हैं।  बात-बात पर गुस्सा करना माता-पिता की बात न मानना स्कूल में अनुशासनहीन व्यवहार भावनाओं पर नियंत्रण में कमी ये संकेत बताते हैं कि डिजिटल एक्सपोजर का असर वास्तविक जीवन में दिखाई देने लगा है। साइबर बुलिंग: अदृश्य लेकिन गहरा घाव साइबर बुलिंग आज के समय की सबसे गंभीर समस्याओं में से एक बन चुकी है। सोशल मीडिया, गेमिंग प्लेटफॉर्म या मैसेजिंग ऐप्स के जरिए बच्चों को अपमानित करना, धमकाना या उनका मजाक उड़ाना आम होता जा रहा है। ऐसी स्थिति में बच्चे अक्सर खुद को दोषी मानने लगते हैं। वे डरते हैं कि अगर उन्होंने किसी को बताया तो स्थिति और बिगड़ जाएगी। परिणामस्वरूप वे चुपचाप मानसिक पीड़ा सहते रहते हैं। सामाजिक अलगाव और आत्मविश्वास में गिरावट ऑनलाइन ट्रोलिंग या बुलिंग का शिकार होने वाले बच्चे धीरे-धीरे सामाजिक गतिविधियों से दूर होने लगते हैं। दोस्तों से मिलना-जुलना कम कर देना  परिवार से दूरी बनाना कमरे में अकेले समय बिताना  स्कूल जाने से बचना हीन भावना और आत्मविश्वास की कमी उनके व्यक्तित्व विकास को प्रभावित करती है। लंबे समय में यह सामाजिक अलगाव गंभीर मानसिक समस्याओं का रूप ले सकता है। मानसिक तनाव, एंग्जायटी और डिप्रेशन का खतरा ऑनलाइन धमकी या गलत कंटेंट के निरंतर संपर्क में रहने से बच्चों में मानसिक तनाव बढ़ सकता है। इसके लक्षणों में शामिल हैं— नींद न आना भूख में कमी पढ़ाई में ध्यान न लगना अचानक मूड बदलना अत्यधिक चुप्पी या रोना यदि समय रहते इन संकेतों को नहीं पहचाना गया तो बच्चे एंग्जायटी या डिप्रेशन की ओर बढ़ सकते हैं। अभिभावकों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण विशेषज्ञों का मानना है कि इस चुनौती से निपटने के लिए केवल तकनीकी उपाय पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि संवाद और समझ भी जरूरी है। बच्चों के साथ खुलकर बातचीत करें उनके ऑनलाइन गतिविधियों पर नजर रखें पैरेंटल कंट्रोल और सुरक्षित ब्राउजिंग टूल्स का इस्तेमाल करें बच्चों को डिजिटल एटीकेट और ऑनलाइन सुरक्षा के बारे में जागरूक करें किसी भी असामान्य व्यवहार पर तुरंत ध्यान दें इंटरनेट आधुनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुका है, लेकिन बच्चों के लिए सुरक्षित डिजिटल माहौल सुनिश्चित करना समय की मांग है। सर्वे के आंकड़े यह स्पष्ट संकेत देते हैं कि यदि अभी ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में बच्चों का मानसिक और सामाजिक स्वास्थ्य गंभीर रूप से प्रभावित हो सकता है। अभिभावकों, शिक्षकों और समाज को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि तकनीक बच्चों के विकास का साधन बने, बाधा नहीं।

स्वैग, स्क्रीन और स्मार्टर ब्रेन की जंग: क्या Gen-Z वाकई पिछड़ रही है?

लाइफस्टाइल: साल 2025 के साथ ही दुनिया ने ‘बीटा जनरेशन’ का स्वागत कर लिया है, लेकिन बाज़ार, सोशल मीडिया और बहसों के केंद्र में आज भी ‘Gen-Z’ ही है। कॉलेज की कैंटीन से लेकर कॉर्पोरेट के क्यूबिकल्स तक अपनी पहचान बनाने में जुटी यह पीढ़ी अक्सर अपने बेबाक अंदाज़, डिजिटल समझ और अलग सोच के लिए जानी जाती है। लेकिन इस बार Gen-Z चर्चा में है, और वजह चौंकाने वाली है। एक हालिया अंतरराष्ट्रीय स्टडी ने इस कूल कही जाने वाली पीढ़ी की स्मार्टनेस पर सवाल खड़े कर दिए हैं। पहली बार इतिहास में… इस शोध का दावा है कि इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है जब बच्चे, बुद्धिमत्ता के पैमाने पर अपने माता-पिता से पीछे रह गए हैं। स्टडी के अनुसार, ‘जनरेशन Z’ (Gen-Z) अपने से पिछली पीढ़ी यानी मिलेनियल्स (Millennials) के मुकाबले औसतन कम स्मार्ट साबित हो रही है। इस रिपोर्ट को और गंभीर बनाता है न्यूरोसाइंटिस्ट और पूर्व शिक्षक डॉ. जेरेड कूनी होर्वाथ का बयान, जो उन्होंने अमेरिकी सीनेट के सामने दिया। डॉ. होर्वाथ के मुताबिक, इस गिरावट की सबसे बड़ी वजह है — पढ़ाई में तकनीक और स्क्रीन का अत्यधिक इस्तेमाल (EdTech Overuse) रिसर्च में क्या निकला सामने? स्टडी में Gen-Z से जुड़ी कुछ चिंताजनक बातें सामने आई हैं: ध्यान लगाने की क्षमता में गिरावट गणित और पढ़ने का कौशल कमजोर समस्या सुलझाने की क्षमता (Problem Solving Ability) में कमी यानी जानकारी तक पहुंच पहले से कहीं ज्यादा आसान है, लेकिन उसे समझने, जोड़ने और लागू करने की क्षमता कमजोर होती जा रही है। स्क्रीन बन रही है सबसे बड़ी दुश्मन? डॉ. होर्वाथ के अनुसार, आज की पीढ़ी का बड़ा हिस्सा अपना ज्यादातर समय मोबाइल, टैबलेट और लैपटॉप स्क्रीन के सामने बिताता है। हैरानी की बात यह है कि स्कूल-कॉलेज जाने के मौके पहले से ज्यादा मिलने के बावजूद, 2010 के बाद से सीखने की क्षमता में लगातार गिरावट दर्ज की गई है। असल में, इंसानी दिमाग आमने-सामने बातचीत, गहराई से पढ़ने और लंबे फोकस के लिए विकसित हुआ है। इसके उलट, तेज़ी से स्क्रॉल करना छोटे-छोटे बुलेट पॉइंट्स में जानकारी लेना मल्टीटास्किंग के नाम पर ध्यान बांटना ये सब मिलकर दिमाग की गहरी समझ विकसित करने की प्रक्रिया को धीमा कर रहे हैं। डिजिटल पढ़ाई: सहायक या बाधा? स्टडी का साफ संकेत है कि डिजिटल एजुकेशन अपने आप में बुरी नहीं है, लेकिन उसका अत्यधिक और असंतुलित इस्तेमाल दिमागी विकास के लिए नुकसानदेह साबित हो रहा है। आसान शब्दों में कहें तो — स्क्रीन ने पढ़ाई को तेज़ जरूर किया है, लेकिन सोच को उथला भी बना दिया है। Gen-Z अभी भी युवा है, सीखने और बदलने की क्षमता रखती है। सवाल यह नहीं कि यह पीढ़ी कम स्मार्ट है या ज्यादा, सवाल यह है कि क्या हम टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल दिमाग को मजबूत करने के लिए कर रहे हैं, या सिर्फ समय काटने के लिए? क्योंकि आने वाली बीटा जनरेशन उसी रास्ते पर चलेगी, जो आज Gen-Z बना रही है।

रिश्ता टूटा, बाल बदले: ब्रेकअप के बाद महिलाओं के हेयरकट में छुपी मन की कहानी

ब्रेकअप किसी भी इंसान के लिए भावनात्मक झटका होता है, लेकिन महिलाओं के मामले में अक्सर एक दिलचस्प बदलाव देखने को मिलता है—वे अपने बाल कटवा लेती हैं। यह कदम देखने में भले ही फैशन या अचानक लिया गया फैसला लगे, लेकिन मनोविज्ञान की नजर से देखें तो इसके पीछे कई गहरे और अर्थपूर्ण कारण छिपे होते हैं। 1. कंट्रोल वापस पाने की कोशिश ब्रेकअप के बाद सबसे बड़ी भावना होती है—नियंत्रण खो देने की। रिश्ता टूटते ही ऐसा लगता है जैसे ज़िंदगी हाथ से फिसल गई हो। ऐसे में हेयरकट एक ऐसा फैसला होता है, जिस पर पूरा कंट्रोल महिला के हाथ में होता है। बाल कटवाना एक संकेत होता है: “मेरी ज़िंदगी पर अब भी मेरा अधिकार है।” 2. पुराने रिश्ते से जुड़ी यादों को काटना बाल सिर्फ बाल नहीं होते, वे यादों का हिस्सा भी बन जाते हैं—किसी की पसंद, किसी की तारीफ, किसी के साथ बिताए पल। जब रिश्ता खत्म होता है, तो बाल कटवाना प्रतीक बन जाता है उस अतीत से दूरी बनाने का। यह मानो खुद से कहा गया वाक्य हो—“अब आगे बढ़ना है।” 3. नई पहचान की तलाश रिश्ते में रहते हुए कई बार महिलाएं अपनी पहचान को “हम” में बदल लेती हैं। ब्रेकअप के बाद “मैं” को फिर से खोजने की जरूरत महसूस होती है। नया हेयरकट एक नई पहचान की शुरुआत करता है—नई सोच, नया आत्मविश्वास और नई ऊर्जा के साथ। 4. भावनात्मक दर्द को शारीरिक बदलाव में बदलना दर्द जब शब्दों में नहीं निकल पाता, तो वह किसी और रूप में बाहर आता है। बाल कटवाना उस भावनात्मक पीड़ा को एक दृश्य, महसूस करने योग्य बदलाव में बदल देता है। इससे मन हल्का होता है, जैसे दिल का बोझ थोड़ा कम हो गया हो। 5. खुद को दोबारा आकर्षक महसूस करने की चाह ब्रेकअप के बाद आत्मविश्वास अक्सर डगमगा जाता है। नया हेयरस्टाइल, आईने में खुद को नए अंदाज़ में देखना—यह सब आत्म-सम्मान को दोबारा मजबूत करने का तरीका होता है। यह खुद से कहा गया एक संदेश होता है: “मैं अब भी खूबसूरत हूं, मजबूत हूं।” 6. समाज और संस्कृति में जड़ें फिल्मों, कहानियों और पॉप कल्चर में भी ब्रेकअप के बाद हेयरकट को “रीबूट मोमेंट” की तरह दिखाया गया है। यह सांस्कृतिक रूप से भी महिलाओं के दिमाग में बैठा हुआ संकेत है कि बदलाव की शुरुआत यहीं से होती है। ब्रेकअप के बाद बाल कटवाना कोई सतही या हल्का फैसला नहीं होता। यह दर्द, आज़ादी, आत्म-खोज और नई शुरुआत का मिश्रण होता है। यह एक शांत लेकिन ताकतवर घोषणा होती है—“जो टूट गया, उसने मुझे खत्म नहीं किया।” नया हेयरकट सिर्फ लुक नहीं बदलता, कई बार वह ज़िंदगी का नजरिया ही बदल देता है।

सिर्फ़ 30 सेकंड का सेल्फ-रिव्यू बदल सकता है आपकी सोच, व्यवहार और आत्मविश्वास

आज की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में हम हर किसी को समझने की कोशिश करते हैं, लेकिन सबसे ज़रूरी इंसान — खुद को — समझने के लिए समय नहीं निकाल पाते। जबकि एक्सपर्ट्स मानते हैं कि अगर इंसान रोज़ सिर्फ़ कुछ सेकंड खुद का ‘सेल्फ-रिव्यू’ करे, तो उसकी पर्सनैलिटी में बड़े और स्थायी बदलाव आ सकते हैं। यह तरीका न तो महंगा है, न ही समय लेने वाला। बस जरूरत है थोड़ी ईमानदारी और रोज़ाना की आदत बनाने की। क्या है ‘सेल्फ-रिव्यू’ या आत्म-विश्लेषण? सेल्फ-रिव्यू का मतलब है दिन खत्म होने से पहले खुद से यह पूछना — आज मैंने क्या सही किया? कहां मुझसे गलती हुई? कल मैं क्या बेहतर कर सकता हूं? यह प्रक्रिया आपको अपने व्यवहार, सोच और भावनाओं को बाहर से देखने में मदद करती है। रोज़ चंद सेकंड का रिव्यू लाएगा पर्सनैलिटी में ये 4 बड़े बदलाव 1. सोच बनेगी ज्यादा पॉजिटिव और साफ़ जब आप रोज़ अपने दिन का विश्लेषण करते हैं, तो नेगेटिव सोच अपने-आप कम होने लगती है। आप समस्याओं को बोझ नहीं, बल्कि सीख के तौर पर देखने लगते हैं। नतीजा: ओवरथिंकिंग कम होती है और दिमाग शांत रहता है। 2. आत्मविश्वास में होगा जबरदस्त इज़ाफा सेल्फ-रिव्यू आपको यह एहसास दिलाता है कि आप हर दिन कुछ न कुछ सही कर रहे हैं। छोटी-छोटी जीतें दिखने लगती हैं, जो आत्मविश्वास को मजबूत बनाती हैं। नतीजा: खुद पर भरोसा बढ़ता है और फैसले लेने की क्षमता मजबूत होती है। 3. रिश्तों में आएगी गहराई और समझदारी जब आप सोचते हैं कि आपने किसी से कैसा व्यवहार किया, तो अगली बार ज्यादा संवेदनशील और समझदार बनते हैं। नतीजा: गुस्सा कम, सहनशीलता ज्यादा और रिश्ते मजबूत। 4. खुद को सुधारने की आदत बनेगी सेल्फ-रिव्यू आपको परफेक्ट बनने का दबाव नहीं देता, बल्कि हर दिन थोड़ा बेहतर बनने की प्रेरणा देता है। नतीजा: पर्सनैलिटी में नैचुरल ग्रोथ और लगातार सुधार। सेल्फ-रिव्यू कैसे करें? (30 सेकंड का आसान तरीका) सोने से पहले या दिन खत्म होने पर मन में बस ये 3 सवाल दोहराएं: आज मैंने क्या अच्छा किया? आज मैं कहां बेहतर हो सकता था? कल मैं कौन-सी एक चीज़ सुधारूंगा? बस इतना ही। न लिखना ज़रूरी, न किसी ऐप की जरूरत। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, रोज़ाना किया गया सेल्फ-रिव्यू दिमाग को ट्रेन करता है कि वह गलतियों से भागे नहीं, बल्कि उनसे सीखे। यही आदत लंबे समय में एक संतुलित और प्रभावशाली पर्सनैलिटी की नींव बनती है। अगर आप अपनी पर्सनैलिटी में बदलाव चाहते हैं, तो किसी मोटिवेशनल किताब या महंगे कोर्स से पहले खुद से बात करना शुरू करें। क्योंकि दिन के सिर्फ़ चंद सेकंड, आपकी ज़िंदगी की दिशा बदल सकते हैं।

न झगड़ा, न कोर्ट-कचहरी… क्या है ‘क्वाइट डिवोर्स’, जिसे लोग चुपचाप अपना रहे हैं?

डिजिटल डेस्क | लाइफस्टाइल : आजकल रिश्तों में एक नया शब्द सुनने को मिल रहा है—‘क्वाइट डिवोर्स’। इसमें न तलाक होता है, न कानूनी लड़ाई, लेकिन पति-पत्नी भावनात्मक रूप से एक-दूसरे से अलग हो जाते हैं। आसान शब्दों में कहें तो शादी कागज़ों में बनी रहती है, पर रिश्ता दिल से खत्म हो जाता है। क्या होता है क्वाइट डिवोर्स? क्वाइट डिवोर्स में पति-पत्नी कानूनी रूप से साथ रहते हैं, लेकिन उनके बीच पति-पत्नी जैसा रिश्ता नहीं रहता। वे साथ रह सकते हैं या अलग, पर भावनात्मक जुड़ाव खत्म हो जाता है। इसे लोग “चुपचाप अलग होना” भी कहते हैं। लोग इसे क्यों चुन रहे हैं? इसके पीछे कई वजहें हैं— तलाक की झंझट से बचने के लिए बच्चों पर असर न पड़े, इसलिए पैसों और प्रॉपर्टी की परेशानी से बचाव समाज और रिश्तेदारों के सवालों से दूरी * रोज़-रोज़ के झगड़ों से शांति पाने के लिए एक्सपर्ट क्या कहते हैं? रिलेशनशिप एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह तरीका कुछ लोगों के लिए आसान लग सकता है, लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं है। अगर बातचीत और समझ खत्म हो जाए, तो यह स्थिति आगे चलकर अकेलापन और तनाव बढ़ा सकती है। इसके फायदे घर में झगड़े कम होते हैं बच्चों की पढ़ाई और दिनचर्या पर कम असर कोर्ट और वकील के खर्च से राहत नुकसान भी हैं रिश्ते में अपनापन खत्म हो जाता है मानसिक तनाव बढ़ सकता है बच्चे रिश्तों को लेकर उलझन में पड़ सकते हैं क्वाइट डिवोर्स उन लोगों का रास्ता बन रहा है, जो खुला तलाक नहीं चाहते। लेकिन एक्सपर्ट मानते हैं कि खुलकर बात करना और सही सलाह लेना आज भी रिश्ते को समझने और संभालने का सबसे बेहतर तरीका है।

आत्मविश्वास और सौंदर्य की नई परिभाषा बनी वोगस्टार इंडिया सीज़न-4

जोधपुर की डॉ. भूमिका बैनर्जी ने सेकंड रनर-अप बनकर रचा प्रेरणादायी इतिहास जोधपुर। महिलाओं के आत्मविश्वास, साहस और नई शुरुआत का उत्सव बनकर उभरा मिस एंड मिसेज़ वोगस्टार इंडिया सीज़न-4 इस वर्ष केवल एक फैशन शो या ब्यूटी पेजेंट तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह मंच महिलाओं की सोच, व्यक्तित्व और आत्मबल को नई पहचान देने का सशक्त माध्यम बना। जयपुर के भव्य द पैलेस बाय पार्क ज्वेल्स में 16 से 18 जनवरी तक आयोजित इस प्रतिष्ठित आयोजन ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि सौंदर्य की परिभाषा उम्र या पारंपरिक मानकों से नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, उद्देश्य और व्यक्तित्व से तय होती है। इस राष्ट्रीय स्तर के मंच पर जोधपुर की डॉ. भूमिका बैनर्जी ने बतौर मॉडल अपना शानदार डेब्यू किया और Mrs VogueStar India Season-4 (G2 कैटेगरी) में सेकंड रनर-अप का खिताब जीतकर न केवल शहर, बल्कि पूरे क्षेत्र को गौरवान्वित किया। उनके आत्मविश्वास से भरे रैंप वॉक, सहजता और गरिमामय प्रस्तुति ने निर्णायक मंडल के साथ-साथ दर्शकों को भी गहराई से प्रभावित किया। डॉ. भूमिका बैनर्जी की यह उपलब्धि उन सभी महिलाओं के लिए प्रेरणास्रोत बनी, जो पारिवारिक, सामाजिक या पेशेवर जिम्मेदारियों के बीच अपने सपनों को दोबारा जीने का साहस जुटाती हैं। उन्होंने यह साबित कर दिया कि सही मंच और मजबूत इच्छाशक्ति के साथ हर महिला अपनी नई पहचान बना सकती है। कार्यक्रम की फाउंडर और डायरेक्टर कीर्ति चौधरी के नेतृत्व में आयोजित इस सीज़न में तीन श्रेणियां रखी गई थीं— मिस, मिसेज़ G1 और मिसेज़ G2। देश के विभिन्न राज्यों से आई प्रतिभागियों ने इन श्रेणियों में भाग लेकर मंच को विविधता, ऊर्जा और आत्मविश्वास से भर दिया। हर प्रतिभागी ने अपनी कहानी, संघर्ष और आत्मबल के जरिए मंच को जीवंत बना दिया। वोगस्टार इंडिया एक महिला-नेतृत्व वाला ऐसा मंच है, जो उम्र, पृष्ठभूमि या जीवन की परिस्थितियों की परवाह किए बिना महिलाओं को आगे बढ़ने और खुद को साबित करने का अवसर देता है। यह आयोजन इस बात का सशक्त उदाहरण है कि जब महिलाओं को सही मार्गदर्शन और प्रोत्साहन मिलता है, तो वे केवल मॉडल ही नहीं बनतीं, बल्कि समाज के लिए प्रेरणा और बदलाव की मिसाल भी बनती हैं। वोगस्टार इंडिया सीज़न-4 ने यह संदेश दिया कि सपनों की कोई उम्र नहीं होती और आत्मविश्वास ही असली सौंदर्य है।

मेनोपॉज नहीं, पहचान का मोड़ है यह दौर — 40 के बाद महिलाओं में क्यों बदलने लगता है स्वभाव और सोच?

अक्सर महिलाएं मेनोपॉज को केवल पीरियड्स के बंद हो जाने तक सीमित समझ लेती हैं। लेकिन हकीकत इससे कहीं गहरी और असरदार है। मेनोपॉज महिलाओं के जीवन का वह चरण है, जहां शरीर ही नहीं, मन, सोच और व्यवहार तक बदलाव के दौर से गुजरते हैं। यही वजह है कि कई महिलाएं खुद से सवाल करने लगती हैं — “क्या मैं बदल रही हूं?” मेनोपॉज क्या सिर्फ शारीरिक बदलाव है? नहीं। मेनोपॉज हार्मोनल बदलावों की एक जटिल प्रक्रिया है। इस दौरान एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन हार्मोन तेजी से घटते हैं, जिसका सीधा असर दिमाग, भावनाओं और ऊर्जा स्तर पर पड़ता है। क्यों बदलने लगती है पर्सनैलिटी? मेनोपॉज के समय दिखने वाले कुछ आम लेकिन अनदेखे बदलाव— * मूड स्विंग्स: छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा या अचानक उदासी * थकान और सुस्ती: बिना ज्यादा काम किए भी थक जाना * नींद की समस्या: रात को नींद न आना या बार-बार टूटना * चिंता और चिड़चिड़ापन: हर बात पर बेचैनी महसूस होना * आत्मविश्वास में कमी: खुद को पहले जैसा न महसूस करना ये लक्षण धीरे-धीरे महिला के व्यवहार और फैसलों को प्रभावित करने लगते हैं, जिससे उन्हें लगता है कि उनकी पर्सनैलिटी बदल रही है। वजन बढ़ना और शरीर से नाराज़गी मेनोपॉज के बाद मेटाबॉलिज़्म धीमा हो जाता है। पेट और कमर के आसपास वजन बढ़ना आम बात है। इससे महिलाएं अपने शरीर को लेकर असहज महसूस करने लगती हैं, जिसका असर आत्मसम्मान पर पड़ता है। रिश्तों पर भी पड़ता है असर भावनात्मक असंतुलन का असर पारिवारिक और सामाजिक रिश्तों पर भी दिखता है। कई महिलाएं खुद को कम समझी जाने वाली या अकेली महसूस करने लगती हैं। चुप रहना समाधान नहीं सबसे बड़ी गलती यही होती है कि महिलाएं इन बदलावों को “उम्र का असर” मानकर सहती रहती हैं। जबकि मेनोपॉज के लक्षणों पर खुलकर बात करना, डॉक्टर से सलाह लेना और सही जीवनशैली अपनाना बेहद जरूरी है। * संतुलित आहार और कैल्शियम युक्त भोजन * नियमित वॉक, योग या हल्की एक्सरसाइज * पर्याप्त नींद और तनाव कम करने की कोशिश * जरूरत हो तो काउंसलिंग या मेडिकल सलाह मेनोपॉज कोई बीमारी नहीं, बल्कि जीवन का नया अध्याय है। यह दौर आपकी कमजोरी नहीं, बल्कि खुद को नए सिरे से समझने और अपनाने का मौका है। जरूरी है कि महिलाएं इसे नजरअंदाज न करें, क्योंकि सही जानकारी और देखभाल से यह सफर आसान और सशक्त बन सकता है।

सिर्फ 7 मिनट का फॉर्मूला: लंबी उम्र और स्वस्थ जीवन का नया विज्ञान

नई दिल्ली। लंबी उम्र जीना हर किसी की चाह होती है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि सिर्फ ज्यादा साल जीना नहीं, बल्कि उन सालों को स्वस्थ तरीके से जीना असली सफलता है। भारत जैसे देश में, जहां डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और हृदय रोग तेजी से बढ़ रहे हैं, औसतन लोग अपने जीवन के करीब 8–10 साल किसी न किसी गंभीर बीमारी से जूझते हुए बिताते हैं। लेकिन अब राहत की खबर है। अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल द लांसेट में प्रकाशित एक हालिया स्टडी के मुताबिक, रोज़मर्रा की जिंदगी में किए गए बहुत छोटे बदलाव भी आपकी सेहत और उम्र दोनों पर बड़ा असर डाल सकते हैं। नींद के सिर्फ 5 मिनट, सेहत के लिए बड़ा बदलाव स्टडी में बताया गया है कि अगर कोई व्यक्ति रोज़ अपनी नींद में सिर्फ 5 मिनट का इज़ाफा करता है, तो इससे शरीर पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। पर्याप्त नींद: * हार्मोन बैलेंस सुधारती है * इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाती है * तनाव और डिप्रेशन को कम करती है * डायबिटीज और हाई बीपी के खतरे को घटाती है विशेषज्ञों का कहना है कि नींद को “समय की बर्बादी” समझने की सोच बदलनी होगी, क्योंकि यही शरीर की असली मरम्मत का समय होता है। इतना ही नहीं, स्टडी में यह भी सामने आया कि दिन में सिर्फ 2 मिनट की अतिरिक्त वॉक करने से भी स्वास्थ्य पर चौंकाने वाला असर पड़ता है। यह छोटी सी आदत: * ब्लड सर्कुलेशन बेहतर करती है * दिल की बीमारियों का जोखिम घटाती है * मोटापे को कंट्रोल में रखती है * मानसिक थकान कम करती है विशेषज्ञ बताते हैं कि यह जरूरी नहीं कि आप रोज़ घंटों जिम जाएं। निरंतरता और छोटी आदतें ज्यादा असरदार होती हैं। क्यों खास है यह स्टडी भारतीयों के लिए? भारत में तेजी से बदलती जीवनशैली, बैठकर काम करने की आदत और अनियमित दिनचर्या के कारण लोग कम उम्र में ही बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। ऐसे में यह रिसर्च खास इसलिए है क्योंकि इसमें महंगे इलाज या कठिन नियमों की नहीं, बल्कि व्यावहारिक और आसान बदलावों की बात की गई है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर कोई व्यक्ति: * रोज़ 5 मिनट ज्यादा सोए * 2 मिनट ज्यादा चले * मोबाइल और स्क्रीन टाइम थोड़ा कम करे * नियमित दिनचर्या अपनाए तो वह न सिर्फ लंबी उम्र जी सकता है, बल्कि बीमारियों से दूर रहकर एक बेहतर जीवन भी जी सकता है। लंबी और स्वस्थ जिंदगी का राज किसी चमत्कारी दवा में नहीं, बल्कि रोज़ के छोटे फैसलों*में छिपा है। आज लिया गया एक छोटा सा कदम, आने वाले सालों को दर्द और दवाइयों से मुक्त कर सकता है। क्यों न आज से ही शुरुआत की जाए — सिर्फ 7 मिनट से।

प्रदूषण से जल रही हैं आंखें? ये 8 आम गलतियां बना सकती हैं इन्फेक्शन की वजह

बढ़ता वायु प्रदूषण अब आंखों के लिए भी एक गंभीर खतरा बन चुका है। धूल, धुआं और जहरीले कण सीधे आंखों की नाजुक सतह को प्रभावित करते हैं, जिससे जलन, लालिमा, खुजली, सूखापन और पानी आने जैसी समस्याएं बढ़ जाती हैं। कई बार लोग राहत पाने के चक्कर में ऐसी गलतियां कर बैठते हैं, जो हालात को और बिगाड़ देती हैं। अगर प्रदूषण के कारण आपकी आंखें भी परेशान हैं, तो इन 8 बड़ी गलतियों से हर हाल में बचना जरूरी है 1. आंखों को बार-बार रगड़ना जलन या खुजली होते ही आंखों को रगड़ना सबसे आम गलती है। ऐसा करने से आंखों की बाहरी परत को नुकसान पहुंचता है और हाथों पर मौजूद कीटाणु सीधे आंखों में चले जाते हैं, जिससे इन्फेक्शन का खतरा बढ़ जाता है। 2. खुद से आई ड्रॉप डालना हर आंख की समस्या का इलाज एक जैसा नहीं होता। बिना डॉक्टर की सलाह के आई ड्रॉप का इस्तेमाल एलर्जी, सूजन या आंखों की ड्राइनेस को और बढ़ा सकता है। 3. गंदे हाथों से आंखों को छूना प्रदूषण के कण पहले से ही आंखों को परेशान करते हैं, ऐसे में गंदे हाथों से आंखों को छूना बैक्टीरिया और वायरस को न्योता देना है। 4. कॉन्टैक्ट लेंस का लापरवाही से इस्तेमाल प्रदूषित वातावरण में लंबे समय तक कॉन्टैक्ट लेंस पहनने से आंखों में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है, जिससे जलन और इन्फेक्शन की संभावना बढ़ जाती है। 5. बिना चश्मे बाहर निकलना धूल और धुएं से आंखों को बचाने के लिए सनग्लास या प्रोटेक्टिव चश्मा बेहद जरूरी है। बिना सुरक्षा के बाहर निकलने से आंखों पर सीधा असर पड़ता है। 6. आंखों की सही सफाई न करना दिनभर प्रदूषण में रहने के बाद आंखों की सफाई न करना एक बड़ी चूक है। हल्के गुनगुने पानी से आंखें धोने से जलन और थकान में राहत मिलती है। 7. जरूरत से ज्यादा स्क्रीन टाइम मोबाइल, लैपटॉप और टीवी की स्क्रीन आंखों को और ज्यादा ड्राई बना देती है। प्रदूषण के साथ ज्यादा स्क्रीन टाइम आंखों की समस्या को दोगुना कर देता है। 8. लक्षणों को नजरअंदाज करना अगर आंखों में लगातार दर्द, लालिमा, सूजन या धुंधलापन बना रहे, तो इसे हल्के में लेना खतरनाक हो सकता है। समय पर इलाज न मिलने से गंभीर इन्फेक्शन हो सकता है। आंखों की सुरक्षा के लिए क्या करें? * बाहर निकलते समय आंखों को ढककर रखें * आंखों को बार-बार छूने से बचें * पर्याप्त पानी पिएं * स्क्रीन से नियमित ब्रेक लें * समस्या बढ़ने पर तुरंत नेत्र विशेषज्ञ से सलाह लें याद रखें, बदलते मौसम और बढ़ते प्रदूषण में थोड़ी सी सावधानी आपकी आंखों को लंबे समय तक स्वस्थ रख सकती है।