भारत की सनातन संस्कृति में सरस्वती पूजा का विशेष स्थान है। यह पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि ज्ञान, विवेक, सृजन और संस्कार का उत्सव है। माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व बसंत पंचमी के नाम से भी प्रसिद्ध है। वर्ष 2026 में यह पावन पर्व शुक्रवार, 23 जनवरी को श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाएगा। बसंत पंचमी: ऋतु परिवर्तन का प्रतीक बसंत पंचमी से ही प्रकृति में बदलाव स्पष्ट दिखाई देने लगता है। खेतों में सरसों पीले फूलों से लहलहाने लगती है, पेड़ों पर नई कोपलें फूट पड़ती हैं और वातावरण में एक नई ऊर्जा का संचार होता है। यही कारण है कि इस दिन पीले रंग को विशेष महत्व दिया गया है, जो उत्साह, ज्ञान और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। सरस्वती पूजा 2026: तिथि और समय * पर्व की तिथि: शुक्रवार, 23 जनवरी 2026 * पंचमी तिथि प्रारंभ: 23 जनवरी 2026, तड़के लगभग 02:28 बजे * पंचमी तिथि समाप्त: 24 जनवरी 2026, रात लगभग 01:46 बजे शुभ पूजा मुहूर्त प्रातः 07:13 बजे से दोपहर 12:33 बजे तक यह समय सरस्वती पूजा के लिए सर्वाधिक शुभ और फलदायी माना गया है। पौराणिक और धार्मिक महत्व शास्त्रों के अनुसार, ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना के समय जब चारों ओर नीरवता और अज्ञान देखा, तब उन्होंने अपने कमंडल से जल छिड़का, जिससे माँ सरस्वती का प्राकट्य हुआ। माँ सरस्वती ने वीणा के मधुर स्वर से सृष्टि में ज्ञान, वाणी और चेतना का संचार किया। माँ सरस्वती को— * विद्या की देवी * वाणी और संगीत की अधिष्ठात्री * बुद्धि, विवेक और स्मरण शक्ति की प्रतीक माना जाता है। इसलिए यह दिन विशेष रूप से विद्यार्थियों, शिक्षकों, लेखकों, कलाकारों, संगीतकारों और शोधकर्ताओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। सरस्वती पूजा की संपूर्ण विधि (विस्तार से) 1. प्रातः स्नान और संकल्प पूजा के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें। स्वच्छ पीले या सफेद वस्त्र धारण कर पूजा का संकल्प लें। 2.पूजा स्थल की तैयारी घर या विद्यालय में साफ-सुथरी जगह पर पीले कपड़े का आसन बिछाएं। माँ सरस्वती की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। 3. मूर्ति स्थापना और आवाहन दीप प्रज्वलित कर माँ सरस्वती का ध्यान करें और उन्हें आसन पर विराजमान होने का आवाहन करें। 4. पूजन सामग्री अर्पण * पीले फूल * अक्षत (चावल) * चंदन, हल्दी, कुमकुम * फल, मिठाई, विशेषकर केसर युक्त या पीले रंग की मिठाई 5. पुस्तक और वाद्य यंत्र पूजन किताबें, कॉपियाँ, कलम, पेंसिल, वाद्य यंत्र (वीणा, हारमोनियम आदि) माँ के चरणों में रखे जाते हैं। मान्यता है कि इस दिन पढ़ाई नहीं की जाती, बल्कि ज्ञान के साधनों की पूजा की जाती है। 6. मंत्र जाप और स्तुति “ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः” मंत्र का 108 बार जाप करें। सरस्वती वंदना, स्तोत्र और भजन का पाठ करें। 7. आरती और प्रसाद अंत में आरती कर प्रसाद वितरित करें। प्रसाद में खीर, बूंदी या पीले चावल का विशेष महत्व होता है। बसंत पंचमी के दिन छोटे बच्चों को पहली बार अक्षर ज्ञान कराया जाता है, जिसे विद्यारंभ संस्कार कहा जाता है। बच्चे से “ॐ”, “अ”, “क” जैसे अक्षर लिखवाए जाते हैं। यह परंपरा आज भी कई परिवारों में श्रद्धा से निभाई जाती है। विद्यालयों और समाज में उत्सव देश के कई हिस्सों, विशेषकर पूर्वी भारत (बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा) में सरस्वती पूजा बड़े धूमधाम से मनाई जाती है। विद्यालयों और कॉलेजों में— * भव्य पंडाल * सांस्कृतिक कार्यक्रम * गीत, संगीत और नृत्य का आयोजन होता है। 23 जनवरी 2026 को मनाई जाने वाली सरस्वती पूजा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि ज्ञान, संस्कृति और चेतना का उत्सव है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि सच्ची प्रगति का मार्ग शिक्षा, विवेक और सद्बुद्धि से होकर ही जाता है। माँ सरस्वती की कृपा से जीवन में अज्ञान का अंधकार दूर हो और ज्ञान का प्रकाश फैले—इसी कामना के साथ यह पर्व मनाया जाता है।
जया एकादशी 2026 — जाने तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और धार्मिक महत्व
सनातन धर्म में एकादशी व्रत को अत्यंत पवित्र और पुण्यदायक माना जाता है। विशेषकर जया एकादशी व्रत को भगवान विष्णु की भक्ति से जोड़कर मान्यता दी जाती है कि इससे जीवन के सारे दुख नष्ट होते हैं, मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं और आत्मा को शांति एवं मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग सरल होता है। जया एकादशी कब है? (तिथि एवं समय) * जया एकादशी व्रत का दिन:गुरुवार, 29 जनवरी 2026 * **एकादशी तिथि आरंभ: 28 जनवरी 2026 शाम लगभग 4:35 बजे * एकादशी तिथि समाप्त: 29 जनवरी 2026 दोपहर लगभग 1:55 बजे * परान (व्रत तोड़ने का शुभ समय):30 जनवरी 2026 सुबह 7:10 — 9:20 बजे के बीच यह व्रत माघ मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी तिथि पर रखा जाता है, जो भगवान विष्णु को समर्पित है। शुभ मुहूर्त — पूजा के उत्तम समय पंचांग के अनुसार जया एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा के लिए विशेष शुभ मुहूर्त इस प्रकार हैं: * सुबह पूजा का अच्छा समय:7:11 बजे से 8:32 बजे तक * दोपहर तक दूसरा शुभ समय:*11:14 बजे से 1:55 बजे तक इन समयों में भक्त विधि-विधान से पूजा-अर्चना और मंत्र जाप कर सकते हैं। पूजा विधि — कैसे करें जया एकादशी पूजा 1. प्रातः जल्दी उठकर स्नान करें और साफ वस्त्र धारण करें। 2. पूजा स्थान पर भगवान विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। 3. घी का दीपक जलाएँ, इत्र-अक्षत, तिल, दही, फूल आदि अर्पित करें। 4. भगवान विष्णु को तुलसी के पत्ते, पंचामृत और फल अर्पित करें। 5. “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” या विष्णु सहस्रनाम आदि मंत्रों का उच्चारण ध्यानपूर्वक करें। 6. दिनभर निर्जला व्रत या फलाहार व्रत रखें तथा मन को शुद्ध रखें। 7. परान (व्रत तोड़ने) के समय सुबह स्नान के बाद ही दान या ब्राह्मण भोजन अर्पित करना शुभ है। धार्मिक महत्व जया एकादशी व्रत को संपूर्ण कर लेने से मान्यता है कि: * जीवन के सारे दुख, विघ्न और पापों का नाश होता है। * भक्त की मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं और धार्मिक प्रगति संभव होती है। * पवित्र व्रत से आत्मा का शुद्धिकरण और मोक्ष की प्राप्ति में सहायता मिलती है। * एकादशी व्रत से न केवल भौतिक शुभ फल बल्कि आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है। समापन संदेश जया एकादशी का व्रत सनातन परंपरा में न केवल एक धार्मिक परंपरा है बल्कि जीवन को शांति, समृद्धि और आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करने वाला एक सशक्त साधन भी माना जाता है। इस पावन अवसर पर श्रद्धा और विधिपूर्वक उपासना करने से जीवन में सकारात्मकता और दैवी कृपा का प्रवेश होता है। अगर आप चाहें, तो मैं जया एकादशी की कथा/व्रत कथा भी सुना सकता हूँ — क्या आप उसके बारे में भी जानना चाहते हैं?
बांके बिहारी मंदिर ट्रस्ट बिल 2025 को राज्यपाल की मंजूरी, अब 18 सदस्यीय ट्रस्ट के अधीन होगा मंदिर प्रबंधन
वृंदावन, 22 दिसंबर: उत्तर प्रदेश के प्रसिद्ध श्री बांके बिहारी मंदिर के प्रशासन और व्यवस्था में ऐतिहासिक बदलाव हुआ है। राज्यपाल ने ‘श्री बांके बिहारी मंदिर ट्रस्ट बिल 2025’ को मंजूरी दे दी है। इस कानून के लागू होने के बाद अब मंदिर की संपूर्ण देखरेख, संचालन और व्यवस्थाएं 18 सदस्यीय ट्रस्ट द्वारा की जाएंगी। सरकार का कहना है कि यह कदम श्रद्धालुओं की सुविधा, पारदर्शिता और मंदिर की परंपराओं की रक्षा के लिए उठाया गया है। अब तक मंदिर प्रबंधन को लेकर अव्यवस्था, भीड़ नियंत्रण की कमी और आर्थिक पारदर्शिता जैसे मुद्दे लगातार सामने आते रहे हैं। विशेष रूप से पैसे लेकर कराए जाने वाले VIP दर्शन, विशेष सुविधा के नाम पर आम भक्तों के साथ भेदभाव और ठाकुर जी को निर्धारित समय पर विश्राम न मिलने पर सवाल उठते रहे हैं। इन सभी बातों को लेकर अदालत तक मामला पहुंचा था। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा था कि पैसे लेकर VIP दर्शन कराना और भगवान को उचित समय पर विश्राम न देना आस्था का शोषण है। कोर्ट ने यह भी कहा था कि धार्मिक स्थलों पर व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए, जिससे भगवान की सेवा और श्रद्धालुओं की आस्था दोनों का सम्मान बना रहे। अदालत की इन्हीं टिप्पणियों के बाद मंदिर प्रशासन में सुधार की मांग और तेज हो गई थी। नए कानून के तहत गठित ट्रस्ट में विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधि शामिल किए जाएंगे, ताकि मंदिर संचालन में संतुलन बना रहे। ट्रस्ट की जिम्मेदारी होगी कि दर्शन व्यवस्था सुचारु हो, भीड़ नियंत्रण के पुख्ता इंतजाम किए जाएं, मंदिर की आय-व्यय में पारदर्शिता रहे और धार्मिक परंपराओं का पूरी तरह पालन हो। साथ ही, ठाकुर जी की सेवा, पूजा-पाठ और विश्राम का समय भी नियमबद्ध तरीके से तय किया जाएगा। राज्य सरकार का कहना है कि यह कानून किसी की आस्था में हस्तक्षेप नहीं करता, बल्कि मंदिर को बेहतर ढंग से संचालित करने की व्यवस्था करता है। सरकार के मुताबिक, ट्रस्ट व्यवस्था लागू होने से आम श्रद्धालुओं को राहत मिलेगी और मंदिर में अव्यवस्था की शिकायतें कम होंगी। वहीं, इस फैसले को लेकर कुछ संत समाज और सेवायतों में मिली-जुली प्रतिक्रियाएं भी सामने आ रही हैं। कुछ लोग इसे सुधार की दिशा में जरूरी कदम बता रहे हैं, तो कुछ इसे परंपरागत व्यवस्था में हस्तक्षेप मान रहे हैं। बावजूद इसके, सरकार का दावा है कि सभी पक्षों से संवाद कर मंदिर की गरिमा और परंपराओं को सुरक्षित रखा जाएगा। कुल मिलाकर, श्री बांके बिहारी मंदिर ट्रस्ट बिल 2025 को धार्मिक स्थलों के प्रबंधन में सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है, जिसका सीधा असर आने वाले समय में मंदिर की व्यवस्था और श्रद्धालुओं के अनुभव पर देखने को मिलेगा।
Festivals List 2026: मकर संक्रांति से दीपावली तक, यहां पढ़ें साल 2026 के प्रमुख व्रत-त्योहारों की पूरी सूची
नई दिल्ली: नया साल 2026 व्रत-त्योहारों और पर्वों से भरपूर रहने वाला है। हिंदू पंचांग के अनुसार वर्ष 2026 में मकर संक्रांति से लेकर दीपावली तक कई बड़े धार्मिक, सांस्कृतिक और पारंपरिक पर्व मनाए जाएंगे। इनमें महाशिवरात्रि, होली, चैत्र नवरात्र, राम नवमी, कृष्ण जन्माष्टमी, गणेश चतुर्थी, शारदीय नवरात्र और दीपावली जैसे प्रमुख त्योहार शामिल हैं। जो लोग पहले से यात्रा, पूजा-पाठ या पारिवारिक आयोजनों की योजना बनाना चाहते हैं, उनके लिए यह सूची बेहद उपयोगी है। साल 2026 के प्रमुख व्रत-त्योहारों की विस्तृत लिस्ट जनवरी 2026 1 जनवरी (गुरुवार):नव वर्ष 14 जनवरी (बुधवार): मकर संक्रांति / उत्तरायण / पोंगल 26 जनवरी (सोमवार):गणतंत्र दिवस फरवरी 2026 1 फरवरी (रविवार): वसंत पंचमी (सरस्वती पूजा) 15 फरवरी (रविवार):महाशिवरात्रि मार्च 2026 4 मार्च (बुधवार): होलिका दहन 5 मार्च (गुरुवार):होली (धुलेंडी) 20 मार्च (शुक्रवार): चैत्र नवरात्र प्रारंभ 27 मार्च (शुक्रवार): राम नवमी अप्रैल 2026 6 अप्रैल (सोमवार): महावीर जयंती 10 अप्रैल (शुक्रवार): हनुमान जयंती 14 अप्रैल (मंगलवार): बैसाखी / मेष संक्रांति मई 2026 3 मई (रविवार): अक्षय तृतीया 25 मई (सोमवार): बुद्ध पूर्णिमा जून 2026 14 जून (रविवार):गंगा दशहरा जुलाई 2026 5 जुलाई (रविवार):गुरु पूर्णिमा 23 जुलाई (गुरुवार): हरियाली तीज अगस्त 2026 2 अगस्त (रविवार):नाग पंचमी 15 अगस्त (शनिवार): स्वतंत्रता दिवस 19 अगस्त (बुधवार):रक्षाबंधन 26 अगस्त (बुधवार):श्रीकृष्ण जन्माष्टमी सितंबर 2026 7 सितंबर (सोमवार): गणेश चतुर्थी 21 सितंबर (सोमवार):अनंत चतुर्दशी अक्टूबर 2026 10 अक्टूबर (शनिवार): शारदीय नवरात्र प्रारंभ 18 अक्टूबर (रविवार): दुर्गा अष्टमी 19 अक्टूबर (सोमवार): महानवमी 20 अक्टूबर (मंगलवार):विजयदशमी (दशहरा) 28 अक्टूबर (बुधवार): करवा चौथ नवंबर 2026 8 नवंबर (रविवार): धनतेरस 9 नवंबर (सोमवार):नरक चतुर्दशी 10 नवंबर (मंगलवार): दीपावली 11 नवंबर (बुधवार): गोवर्धन पूजा 12 नवंबर (गुरुवार): भैया दूज 24 नवंबर (मंगलवार): छठ पूजा दिसंबर 2026 25 दिसंबर (शुक्रवार):क्रिसमस नोट: तिथियां पंचांग और स्थान के अनुसार थोड़ी बहुत बदल सकती हैं। व्रत या पूजा से पहले अपने स्थानीय पंचांग या विद्वान से पुष्टि अवश्य करें। इस तरह साल 2026 में धार्मिक आस्था, उत्सव और परंपराओं का पूरा रंग देखने को मिलेगा। यह कैलेंडर आपके लिए पूरे साल की प्लानिंग में मददगार साबित हो सकता है।
भगवान गजानन को चढ़ाएं ये चीजें, धन-संपदा की नहीं होगी कमी मन को मिलेगी शांति
गणेश जी हमेशा प्रसन्न रहने वाले देवता माने जाते हैं। गजानन की बुधवार के दिन विधि विधान से पूजा अर्चना की जाती है, जिससे प्रसन्न होकर वे खुशहाली और समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करते हैं। यदि बुधवार के दिन या चतुर्थी के दिन हम गणेश जी को उनकी पसंद की चीजें अर्पित करेंगे तो वे जल्द प्रसन्न होंगे और हमारी मनोकामनाएं पूरी करेंगे। हमारे पास धन-संपदा, ज्ञान आदि की कोई कमी नहीं रहेगी। मोदक : गणेश जी को मोदक बेहद ही प्रिय है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, परशुराम जी से युद्ध के दौरान जब गजानन का एक दांत टूट गया और वे एक दंत हो गए। तब से उनको अन्य खाद्य पदार्थों को खाने में दिक्कत होने लगी, उसके बाद उनके खाने के लिए मोदक बनाया गया। गजानन ने आराम से मोदक खाए, जिससे उनका मन बेहद प्रसन्न हो उठा। इसके बाद से मोदक उनका पसंदीदा व्यंजन बन गया, इसलिए गणेश जी को जल्द प्रसन्न करने के लिए मोदक का भोग लगाते हैं। दुर्वा : गणेश जी को पूजा में 21 दुर्वा अर्पित करने का विधान है। इसके पीछे भी एक कथा है। अनलासुर और गणपति के बीच जब भयंकर युद्ध हुआ था, तब गजानन ने अनलासुर को निगल लिया था। जिसके बाद उनके उदर में असहनीय तेज जलन होने लगी। तब कश्यप ऋषि दूर्वा की 21 गांठ बनाकर गणपति को खिलाते हैं, जिससे वे स्वस्थ हो जाते हैं। केला : गजानन जैसा की नाम से प्रतीत है – गज मुख वाले। हाथी को केला खाना पसंद होता है। गज मुख होने के कारण गजानन को भी केला खाना पसंद है। पूजा में गणपति को केला चढ़ाने से वे प्रसन्न होते हैं। गेंदा का फूल : गणपति को लाल या पीले गेंदे का फूल चढ़ाया जाता है। यदि आप गेंदे के फूल की माला उनको अर्पित करें तो यह और भी अच्छा होगा। शंख : गणेश जी की पूजा में तेज आवाज में शंख बजाने का विधान है। इसका कारण यह है कि गजानन की चार भुजाएं हैं, एक भुजा में वे शंख धारण करते हैं। इसकी आवाज उनको प्रिय है।
विष्णु के ऋषि अवतार नर और नारायण
भगवान विष्णु ने धर्म की पत्नी रुचि के माध्यम से नर और नारायण नाम के दो ऋषियों के रूप में अवतार लिया। वे जन्म से तपोमूर्ति थे, अतः जन्म लेते ही बदरीवन में तपस्या करने के लिये चले गये। उनकी तपस्या से ही संसार में सुख और शांति का विस्तार होता है। बहुत से ऋषि मुनियों ने उनसे उपदेश ग्रहण करके अपने जीवन को धन्य बनाया। आज भी भगवान नर नारायण निरन्तर तपस्या में रत रहते हैं। इन्होंने ही द्वापर में श्रीकृष्ण और अर्जुन के रूप में अवतार लेकर पृथ्वी का भार हरण किया था। एक बार इनकी उग्र तपस्या को देखकर देवराज इंद्र ने सोचा कि ये तप के द्वारा मेरे इंद्रासन को लेना चाहते हैं, अतः उन्होंने इनकी तपस्या को भंग करने के लिए कामदेव, वसंत तथा अप्सराओं को भेजा। उन्होंने जाकर भगवान नर नारायण को अपनी नाना प्रकार की कलाओं के द्वारा तपस्या से च्युत करने का प्रयास किया, किंतु उनके ऊपर कामदेव तथा उसके सहयोगियों का कोई प्रभाव न पड़ा। कामदेव, वसंत तथा अप्सराएं शाप के भय से थर थर कांपने लगे। उनकी यह दशा देखकर भगवान नर नारायण ने कहा-, तुम लोग तनिक भी मत डरो। हम प्रेम और प्रसन्नता से तुम लोगों का स्वागत करते हैं। भगवान नर नारायण की अभय देने वाली वाणी को सुनकर काम अपने सहयोगियों के साथ अत्यन्त लज्जित हुआ। उसने उनकी स्तुति करते हुए कहा- प्रभो! आप निर्विकार परम तत्व हैं। बड़े बड़े आत्मज्ञानी पुरुष आपके चरण कमलों की सेवा के प्रभाव से कामविजयी हो जाते हैं। देवताओं का तो स्वभाव ही है कि जब कोई तपस्या करके ऊपर उठना चाहता है, तब वे उसके तप में विघ्न उपस्थित करते हैं। काम पर विजय प्राप्त करके भी जिन्हें क्रोध आ जाता है, उनकी तपस्या नष्ट हो जाती है। परंतु आप तो देवाधिदेव नारायण हैं। आपके सामने भला ये काम क्रोधादि विकार कैसे फटक सकते हैं? हमारे ऊपर आप अपनी कृपादृष्टि सदैव बनाये रखें। हमारी आपसे यही प्रार्थना है। कामदेव की स्तुति सुनकर भगवान नर नारायण परम प्रसन्न हुए और उन्होंने अपनी योगमाया के द्वारा एक अद्भुत लीला दिखायी। सभी लोगों ने देखा कि साक्षात लक्ष्मी के समान सुंदर सुंदर नारियां नर नारायण की सेवा कर रही हैं। नर नारायण ने कहा- तुम इन िस्त्रयों में से किसी एक को मांगकर स्वर्ग में ले जा सकते हो, वह स्वर्ग के लिए भूषण स्वरूप होगी। उनकी आज्ञा मानकर कामदेव ने अप्सराओं में सर्वश्रेष्ठ अप्सरा उर्वशी को लेकर स्वर्ग के लिए प्रस्थान किया। उसने देवसभा में जाकर भगवान नर नारायण की अतुलित महिमा से सबको परिचित कराया, जिसे सुनकर देवराज इंद्र चकित और भयभीत हो गये। उन्हें भगवान नर नारायण के प्रति अपनी दुर्भावना और दुष्कृति पर विशेष पश्चाताप हुआ। भगवान नर नारायण के लिये यह कोई बड़ी बात नहीं थी। इससे उनके तप के प्रभाव की अतुलित महिमा का परिचय मिलता है। उन्होंने अपने चरित्र के द्वारा काम पर विजय प्राप्त करके क्रोध के अधीन होने वाले और क्रोध पर विजय प्राप्त करके अभिमान से फूल जाने वाले तपस्वी महात्माओं के कल्याण के लिए अनुपम आदर्श स्थापित किया।
इस व्रत को करने पर हनुमानजी करेंगे सभी कष्ट दूर, जानें महत्व ..
हनुमानजी को पराक्रम, बल, सेवा और भक्ति के आदर्श देवता माने जाते हैं। इसी वजह से पुराणों में हनुमानजी को सकलगुणनिधान भी कहा गया है। गोस्वामी तुलसीदास ने भी लिखा है कि- ‘चारो जुग परताप तुम्हारा है परसिद्ध जगत उजियारा।’ इस चौपाई का अर्थ है कि हनुमानजी इकलौते ऐसे देवता हैं, जो हर युग में किसी न किसी रूप गुणों के साथ जगत के लिए संकटमोचक बनकर मौजूद रहेंगे। शास्त्रों में कहा गया है कि हनुमानजी की सेवा करने और उनका व्रत रखने से उनकी विशेष कृपा अपने भक्तों पर बनी रहती है। जानिए मंगलवार की व्रत कथा और पूजन विधि। हनुमानजी का व्रत करने का लाभ ज्योतिष शास्त्रों के अनुसार, हनुमानजी का व्रत करने से कुंडली में मौजूद सभी ग्रह शांत हो जाते हैं और उनकी अशीम कृपा प्राप्त होती है। अपने भक्तों पर आने वाले हर संकट को हनुमानजी दूर करते हैं। संतान प्राप्ति के लिए हनुमानजी का व्रत फलदायी माना जाता है। इस व्रत को करने से भूत-प्रेत और काली शक्तियों का प्रभाव नहीं पड़ता है। मंगलवार का व्रत करने से सम्मान, साहस और पुरुषार्थ बढ़ता है। मंगलवार पूजन विधि हनुमानजी का व्रत लगातार 21 मंगलवार करना चाहिए। मंगलवा के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान वगैरह से निवृत्त होकर सबसे पहले हनुमानजी का ध्यान करें और व्रत का संकल्प करें। इसके बाद ईशान कोण की दिशा (उत्तर-पूर्व कोने) में किसी एकांत स्थान पर हनुमानजी की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें। फिर गंगाजल के छीटें देकर उनका लाल कपड़ा धारण कराएं। फिर पुष्प, रोली और अक्षत के छीटें दें। इसके बाद चमेली के तेल का दीपक जलाएं और तेल की कुछ छीटें मूर्ति या तस्वीर पर डाल दें। इसके बाद हनुमानजी फूल अर्पित करें और अक्षत व फूल हाथ में रखकर उनकी कथा सुनें और हनुमान चालिसा और सुंदरकांड का पाठ भी करें। इसके बाद आप भोग लगाएं और अपनी मनोकामना बाबा से कहें और प्रसाद सभी में वितरण कर दें। अगर संभव हो सके तो दान जरूर करें। शाम के समय भी हनुमान मंदिर जाकर चमेली के तेल का दीपक जलाएं और सुंदरकांड का पाठ करें और उनकी आरती करें। 21 मंगलवार के व्रत होने के बाद 22वें मंगलवार को विधि-विधान के साथ बजरंगबली का पूजा कर उन्हें चोला चढ़ाएं। उसके बाद 21 ब्राह्मणों को बुलाकर उन्हें भोजन कराएं और क्षमतानुसार दान–दक्षिणा दें। मंगलवार व्रत कथा एक समय की बात है एक ब्राह्मण दंपत्ति प्रेमभाव से साथ-साथ रहते थे लेकिन उनकी कोई संतान ना होने के कारण दुखी रहते थे। ब्राह्मण हर मंगलवार के वन जाकर हनुमानजी की पूजा करने जाता था और संतान की कामना करता था। ब्राह्मण की पत्नी भी हनुमानजी की बहुत बड़ी भक्त थी और मंगलवार का व्रत रखती थी। वह हमेशा मंगलवार के दिन हनुमानजी का भोग लगाकर ही भोजन करती थी। एक बार व्रत के दिन ब्राह्मणी भोजन नहीं बना पाई, जिससे हनुमानजी का भोग नहीं लग सका। तब उसने प्रण किया कि वह अगले मंगलवार को हनुमानजी को भोग लगाकर ही भोजन करेगी। वह छह दिन तक भूखी-प्यासी रखी और मंगलवार के दिन व्रत के दौरान बेहोश हो गई। ब्राह्मणी की निष्ठा और लगन को देखकर हनुमानजी बहुत प्रसन्न हुए और आशीर्वाद के रूप में एक संतान दी और कहा कि यह तुम्हारी बहुत सेवा करेगा। संतान पाकर ब्राह्मणी बहुत प्रसन्न हुई और उसने बालक का नाम मंगल रखा। कुछ समय बाद जब ब्राह्मण घर आया, तो घर में बच्चे की आवाज सुनाई दी और अपनी पत्नी से पूछा कि आखिर यह बच्चा कौन है? ब्राह्मणी की पत्नी ने कहा कि हनुमानजी ने व्रत से प्रसन्न होकर अपने आशीर्वाद के रूप में यह संतान हम दोनो की दी है। ब्राह्मण को अपनी पत्नी की इस बात पर विश्वास नहीं हुआ। एक दिन जब ब्राह्मणी घर पर नहीं थी तो ब्राह्मण ने मौका देखकर बच्चे को कुएं में गिरा दिया। अजब-गजब हनुमान, पंचायत में करते हैं फैसला, उतारते हैं प्रेम का भूत जब ब्राह्मणी घर लौटी तो उसने मंगल के बारे में पूछा। तभी पीछे से मंगल मुस्कुरा कर आ गया और ब्राह्मण बच्चे को देखकर आश्चर्य चकित रह गया। रात को हनुमानजी ने ब्राह्मण को सपने में दर्शन दिए और बताया कि यह संतान तुम्हारी है। ब्राह्मण सत्य जानकर बहुत खुश हुआ। इसके बाद ब्राह्मण दंपत्ति प्रत्येक मंगलवार को व्रत रखने लगे। शास्त्रों के अनुसार, जो भी मनुष्य मंगलवार व्रत और कथा पढ़ता या सुनता है, उसे हनुमानजी की विशेष कृपा प्राप्ति होती है। उसके सभी कष्ट दूर होते हैं और हनुमानजी की दया के पात्र बनते हैं।
वास्तु शास्त्र में तांबा का चमत्कारी प्रभाव, जाने कैसे करें इस्तमाल
वैज्ञानिक तौर पर तांबा शरीर के लिए उपयोगी माना गया है, लेकिन आज हम आपको बता रहें है कैसे ज्योतिषशास्त्र के अनुसार तांबा आपके जीवन की परेशानियों को दूर कर सकता है। तांबे की शुद्धता को ध्यान में रखते हुए इसे धारण किया जा सकता है। आइये जानते है तांबा पहनने के क्या फायदे होते है…. -अगर आपके घर में वास्तुदोष है जिसके कारण आपके और आपके परिवार के सदस्यों को अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है तो वास्तु के अनुसार अपने घर में एक चौकोर तांबे का टुकड़ा रखें। ऐसा करने से आपका घर वास्तुदोष से मुक्त होगा। -अगर आपने घर बनवाते समय वास्तु के नियमों को ध्यान में नहीं रखा है और आपके घर का मुख्य द्वार वास्तु के अनुसार नहीं है तो अपने दरवाजे के वास्तुदोष को दूर करने के लिए दरवाजे पर तांबे के सिक्के लटका दें। ये सिक्के आपके घर में नकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश नहीं होने देंगे। -अगर आपके घर की दक्षिण दिशा में दोष है तो आप इस दिशा के दोष से छुटकारा पाने के लिए ठोस तांबे का पिरामिड घर में रखें। इसे घर में रखने से घर में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहेगी। -छोटे बच्चे को अगर बार-बार नजर लग जाती है तो आप अपने बच्चे को एक तांबे के सिक्के में छेद करके उसे काले धागे में पिरोकर बच्चे को पहनाएं। ऐसा करने से आपका बच्चा किसी की बुरी नजर से सुरक्षित रहेगा। -तांबे की अंगूठी पहने से व्यक्ति के सूर्य दोष दूर होते हैं। इसलिए अगर कमजोर सूर्य के कारण जीवन में परेशानियां आप कम नहीं कर पा रहे तो ऐसे में यह अंगूठी पहनें। बहुत जल्द आपको इसका असर दिखेगा, आपको मान-सम्मान और प्रसिद्धि मिलेगी। -तांबे की अंगूठी गुस्सा नियंत्रण करने में कारगर है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यह शांत प्रकृति का है और गर्मी दूर करता है। इसलिए व्यक्ति के मानसिक स्थिति को संतुलित कर गुस्सा शांत करता है। -आश्चर्यजनक रूप से तांबे का प्रयोग आपको वास्तु दोषों से भी दूर रखता है। शुद्धक होने के कारण आप अगर इसे किसी भी रूप में शरीर पर धारण करते हैं तो यह आपको वास्तु दोषों के प्रभाव से मुक्त करता है।
मन के कारण ही पूरा शरीर कार्य करता है…
मन अत्यंत शक्तिशाली है। यदि सद्विचारों के साथ आगे बढ़ा जाए तो मन के द्वारा जीवन में व्यक्ति को सर्वश्रेष्ठ परिणाम प्राप्त होते हैं। जेम्स एलेन ने एक पुस्तक में कहा भी है कि अच्छे विचार बीजों से सकारात्मक और स्वास्थ्यप्रद फल सामने आते हैं। इसी तरह बुरे विचार बीजों से नकारात्मक और घातक फल आपको वहन करने ही पड़ेंगे। जिस प्रकार व्यक्ति के व्यक्तित्व के दो प्रकार-बाहरी और आंतरिक होते हैं ठीक उसी प्रकार मन के भी चार प्रकार होते हैं। मनोवैज्ञानिकों ने मन की चार प्रवृत्तियां बताई हैं। मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि व्यक्ति अक्सर वर्तमान मन, अनुपस्थित मन, एकाग्र मन और दोहरे मन वाले होते हैं। जो व्यक्ति जीवन में अधिकतर वर्तमान मन के साथ आगे बढ़ते हैं वे जीवन में सफलता पाते हैं। इसी तरह अनुपस्थित व दोहरे मन वाले व्यक्ति भटकते रहते हैं। वर्तमान मन यानी अभी क्या चल रहा है, उसे देखने वाला मन। अनुपस्थित मन से अभिप्राय है कि मन का कार्य के समय वहां पर न होकर कहीं ओर होना। एकाग्र मन में व्यक्ति एक ही सत्य और कार्य के लिए ग्रहणशील होता है। दोहरे मन में व्यक्ति के दो मन बन जाते हैं। एक ओर उसका मन कह रहा होता है कि किसी काम को करना चाहिए तो दूसरा मन कह रहा होता है कि अभी रुकना चाहिए। वर्तमान और एकाग्र मन के साथ काम करने वाले व्यक्ति असाधारण सफलता प्राप्त करते हैं। दार्शनिक मार्ले का मानना है कि विश्व के हर काम में यश प्राप्त करने के लिए एकाग्रचित्त होना आवश्यक है। दोहरा और अनुपस्थित मन व्यक्ति को लक्ष्य व कार्य से भटका देता है। यदि मन कहीं ओर होता है यानी अनुपस्थित होता है तो महत्वपूर्ण निर्णय और बातें भी समझ में नहीं आती हैं। मन के कारण ही पूरा शरीर कार्य करता है। कई व्यक्तियों के मन में प्रारंभ से ही यह बात बैठ जाती है कि वह किसी विशेष काम को नहीं कर सकते। मसलन कई लोगों को लगता है कि वे अपने जीवन में कभी मंच पर नहीं बोल सकते हैं तो कई लोगों को गणित विषय हौवा लगता है। इसी तरह कई लोगों को यह संकोच होता है कि अंग्रेजी न बोल पाने के कारण वे कामयाबी नहीं पा सकते। यह स्थिति उस समय उत्पन्न होती है जब व्यक्ति मन की शक्ति को समझ नहीं पाता और मन में दोहरी स्थितियां उत्पन्न कर लेता है।
सुख का संबंध आत्मा से होता है
समाज में सभी सुखी रहना चाहते हैं, लेकिन यह हो कैसे? इसका एक सूत्र है-प्रेम। वस्तुतः प्रेम वह तत्व है जो प्रेम करने वाले को सुखी तो बनाता ही है, जिससे प्रेम किया जाता है वह भी सुखी होता है। याद रखें, सुख और सुविधा दो भिन्न चीजें हैं। जो शरीर को आराम पहुंचाता है वह सुख नहीं, सुविधा है, लेकिन सुख का संबंध आत्मा से होता है। आप अच्छे घर में रहते हैं, अच्छी कार में बैठते हैं, एयरकंडीशन ऑफिस में काम करते हैं उससे आपके शरीर को सुविधा प्राप्त होती है, परंतु आप सत्य बोलते हैं, सबको प्रेम करते हैं, ईमानदारी और नैतिकता का व्यवहार अपनाते हैं, सच्चाई और संवेदना दर्शाते हैं, अहिंसा के मार्ग पर चलते हैं तो उससे आपको जो सुख मिलता है वह आत्मिक सुख कहलाता है। यही सुख व्यक्ति और समाज को सुखी बनाता है। जिंदगी के सफर में नैतिक व मानवीय उद्देश्यों के प्रति मन में अटूट विश्वास होना जरूरी है। कहा जाता है आदमी नहीं चलता, उसका विश्वास चलता है। आत्मविश्वास सभी गुणों को एक जगह बांध देता है यानी विश्वास की रोशनी में मनुष्य का संपूर्ण व्यक्तित्व और आदर्श उजागर होता है। दुनिया में कोई भी व्यक्ति महंगे वस्त्र, आलीशान मकान, विदेशी कार, धन-वैभव के आधार पर बड़ा या छोटा नहीं होता। उसकी महानता उसके चरित्र से बंधी है और चरित्र उसी का होता है जिसका खुद पर विश्वास है। मनुष्य के भीतर देवत्व है, तो पशुत्व भी है। सर्वे भवंतु सुखिनः का पुरातन भारतीय मंत्र संभवतः दानवों को नहीं सुहाया और उन्होंने अपने दानवत्व को दिखाया। पूर्वजों के लगाए पेड़ आंगन में सुखद छांव और फल-फूल दे रहे थे, लेकिन जब शैतान जागा और दानवता हावी हुई तो भाई-भाई के बीच दीवार खड़ी हो गई। बड़े भाई के घर में वृक्ष रह गए और छोटे भाई के घर में छांव पडऩे लगी। अधिकारों में छिपा वैमनस्य जागा और बड़े भाई ने सभी वृक्षों को कटवा डाला। पड़ोसियों ने देखा तो दुख भी हुआ। उन्होंने पूछा इतने छांवदार और फलवान वृक्ष को आखिर कटवा क्यों दिया? उसने उत्तर दिया, क्या करूं पेड़ों की छाया का लाभ दूसरों को मिल रहा था और जमीन मेरी रुकी हुई थी। वर्तमान में हमने जितना पाया है, उससे कहीं अधिक खोया है। भौतिक मूल्य इंसान की सुविधा के लिए हैं, इंसान उनके लिए नहीं है।