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माघ मेला में अफरा-तफरी: सेक्टर-5 के शिविर में भीषण आग, मची भगदड़; दमकल ने पाया काबू

प्रयागराज। माघ मेला क्षेत्र में मंगलवार शाम उस समय अफरा-तफरी मच गई, जब सेक्टर-5 स्थित एक शिविर में अचानक भीषण आग लग गई। आग की तेज लपटें और धुएं का गुबार दूर से ही दिखाई देने लगा, जिससे मेले में मौजूद श्रद्धालुओं और कल्पवासियों में दहशत फैल गई। हालात बिगड़ते देख लोग अपने-अपने तंबू छोड़कर सुरक्षित स्थानों की ओर भागने लगे, जिससे कुछ देर के लिए भगदड़ जैसी स्थिति बन गई। घटना की सूचना मिलते ही स्थानीय पुलिस, मेला प्रशासन और अग्निशमन विभाग की टीमें तत्काल मौके पर पहुंचीं। दमकल कर्मियों ने कई दमकल गाड़ियों की मदद से आग पर काबू पाने का प्रयास शुरू किया। कड़ी मशक्कत के बाद आग को फैलने से रोक लिया गया, जिससे आसपास के अन्य शिविरों को बड़ा नुकसान होने से बचा लिया गया। प्रशासन के अनुसार, प्रारंभिक जांच में आग लगने का कारण शॉर्ट सर्किट या किसी ज्वलनशील सामग्री का संपर्क माना जा रहा है, हालांकि वास्तविक कारणों की जांच की जा रही है। राहत की बात यह रही कि इस हादसे में किसी के हताहत होने की सूचना नहीं है, लेकिन शिविर में रखा सामान और तंबू पूरी तरह जलकर खाक हो गए। मेला प्रशासन ने मौके पर मौजूद लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की और सुरक्षा के मद्देनजर पूरे क्षेत्र में निगरानी बढ़ा दी गई है। अधिकारियों ने कहा कि भविष्य में ऐसी घटनाओं से बचने के लिए अग्नि सुरक्षा मानकों को और सख्ती से लागू किया जाएगा तथा शिविरों में बिजली और गैस के उपयोग की नियमित जांच की जाएगी। घटना के बाद माघ मेला क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था और चौकसी और मजबूत कर दी गई है, ताकि श्रद्धालु सुरक्षित रूप से अपने धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कर सकें।

‘ग्रीन फाइल’ से सत्ता की सियासत तक: बंगाल में ममता बनर्जी बनाम ईडी आमने-सामने, 2026 चुनाव से क्या है कनेक्शन?

कोलकाता। पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर भूचाल आ गया है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की कथित ‘ग्रीन फाइल’ और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की कार्रवाई ने राज्य की सियासत को गरमा दिया है। ईडी द्वारा राजनीतिक रणनीतिकार संस्था आई-पैक (I-PAC) पर की गई छापेमारी और इस दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के हस्तक्षेप ने इस पूरे मामले को और भी संवेदनशील बना दिया है। अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह कार्रवाई केवल जांच तक सीमित है या फिर इसके तार 2026 के विधानसभा चुनाव से जुड़े हुए हैं। क्या है ‘ग्रीन फाइल’ विवाद सूत्रों के मुताबिक, ‘ग्रीन फाइल’ उन दस्तावेजों और डिजिटल जानकारियों को कहा जा रहा है, जिनमें कथित तौर पर चुनावी रणनीति, फंडिंग और राजनीतिक अभियानों से जुड़ी अहम जानकारियां दर्ज हैं। ईडी का आरोप है कि कोयला तस्करी से जुड़े अवैध धन का एक हिस्सा आई-पैक तक पहुंचा और उसका इस्तेमाल राजनीतिक गतिविधियों में किया गया। आई-पैक पर ईडी की कार्रवाई ईडी ने कोयला तस्करी मामले की जांच के सिलसिले में आई-पैक से जुड़े ठिकानों पर छापा मारा। जांच एजेंसी का दावा है कि उनके पास ऐसे सबूत हैं, जिनसे यह संकेत मिलता है कि अवैध फंड को राजनीतिक सलाह और चुनावी प्रबंधन में लगाया गया। इसी कार्रवाई के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी स्वयं मौके पर पहुंचीं और ईडी की टीम से सवाल-जवाब किए। ममता बनर्जी का पलटवार मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ईडी की कार्रवाई को “राजनीतिक बदले की भावना” से प्रेरित बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले तृणमूल कांग्रेस को कमजोर करने के लिए केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग कर रही है। ममता ने कहा कि बंगाल में लोकतंत्र और संघीय ढांचे पर हमला किया जा रहा है। भाजपा का आरोप वहीं भाजपा ने ममता बनर्जी के हस्तक्षेप पर कड़ा एतराज जताया है। भाजपा नेताओं का कहना है कि जांच एजेंसी को अपना काम करने से रोका गया और इससे साफ होता है कि सरकार कुछ छिपाना चाहती है। भाजपा ने मांग की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो और दोषियों को सजा मिले, चाहे वे कितने भी बड़े पद पर क्यों न हों।  2026 चुनाव से कनेक्शन? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह पूरा विवाद 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले सियासी माहौल को प्रभावित कर सकता है। एक तरफ ममता बनर्जी इसे केंद्र बनाम राज्य की लड़ाई के रूप में पेश कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर भाजपा इसे भ्रष्टाचार और अवैध फंडिंग का मामला बता रही है। ऐसे में ‘ग्रीन फाइल’ बंगाल की राजनीति में एक बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकती है। फिलहाल ईडी अपनी जांच पर कायम है और आने वाले दिनों में और पूछताछ व कार्रवाई की संभावना जताई जा रही है। वहीं तृणमूल कांग्रेस इसे जनसमर्थन जुटाने के अवसर के रूप में देख रही है। साफ है कि ‘ग्रीन फाइल’ विवाद ने बंगाल की राजनीति को एक बार फिर तीखे टकराव के रास्ते पर ला खड़ा किया है, जिसका असर 2026 के चुनावी रण में साफ नजर आ सकता है।

डिलीवरी बॉय की सुरक्षा को प्राथमिकता: 10 मिनट डिलीवरी मॉडल पर लगी रोक, केंद्र के निर्देश के बाद क्विक कॉमर्स कंपनियों का बड़ा फैसला

नई दिल्ली। केंद्र सरकार के सख्त रुख और श्रम मंत्रालय के हस्तक्षेप के बाद देश की प्रमुख क्विक कॉमर्स कंपनियों ने 10 मिनट में डिलीवरी देने वाली सेवा को बंद करने का फैसला किया है। केंद्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्री मनसुख मांडविया की पहल के बाद ब्लिंकिट, जेप्टो, जोमैटो और स्विगी ने इस अल्ट्रा-फास्ट डिलीवरी मॉडल को समाप्त करने पर सहमति जताई है। यह कदम डिलीवरी पार्टनर्स की सुरक्षा, स्वास्थ्य और बेहतर कार्य परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए उठाया गया है। मंत्रालय के अनुसार, 10 मिनट में डिलीवरी के दबाव के कारण डिलीवरी कर्मियों पर तेज रफ्तार से वाहन चलाने, ट्रैफिक नियमों की अनदेखी और लगातार मानसिक तनाव जैसी समस्याएं सामने आ रही थीं। कई मामलों में सड़क दुर्घटनाओं और स्वास्थ्य से जुड़ी शिकायतें भी बढ़ी थीं। इन्हीं चिंताओं को देखते हुए सरकार ने क्विक कॉमर्स कंपनियों के साथ बैठक कर इस मॉडल की समीक्षा की। श्रम मंत्रालय का स्पष्ट संदेश केंद्रीय श्रम मंत्री मनसुख मांडविया ने स्पष्ट किया कि रोजगार सृजन के साथ-साथ श्रमिकों की सुरक्षा सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। उन्होंने कहा कि किसी भी तरह की कारोबारी प्रतिस्पर्धा में कर्मचारियों की जान और सेहत से समझौता नहीं किया जा सकता। मंत्रालय ने कंपनियों को निर्देश दिया कि वे डिलीवरी टाइमलाइन को यथार्थवादी बनाएं और डिलीवरी पार्टनर्स पर अनावश्यक दबाव न डालें। कंपनियों ने मानी बात सरकारी निर्देशों के बाद क्विक कॉमर्स कंपनियों ने आश्वासन दिया है कि अब डिलीवरी समय को बढ़ाया जाएगा और काम के घंटे, बीमा कवर, हेल्थ सेफ्टी और ब्रेक जैसी सुविधाओं पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। कंपनियों का कहना है कि वे एक सुरक्षित और टिकाऊ डिलीवरी मॉडल की ओर बढ़ेंगी। डिलीवरी पार्टनर्स में राहत इस फैसले से डिलीवरी पार्टनर्स में राहत की भावना देखी जा रही है। उनका कहना है कि 10 मिनट की डिलीवरी के कारण उन पर अत्यधिक दबाव रहता था, जिससे दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ जाता था। नए फैसले से न सिर्फ उनकी सुरक्षा सुनिश्चित होगी, बल्कि कामकाजी माहौल भी बेहतर होगा। आगे क्या होगा? सरकार ने संकेत दिए हैं कि आने वाले समय में गिग वर्कर्स के लिए एक व्यापक नीति लागू की जा सकती है, जिसमें न्यूनतम सुरक्षा मानक, सामाजिक सुरक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं शामिल होंगी। कुल मिलाकर, 10 मिनट डिलीवरी मॉडल पर लगी यह रोक क्विक कॉमर्स सेक्टर में मानवीय और जिम्मेदार कार्य संस्कृति की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है।

आवारा कुत्तों के हमलों पर सुप्रीम कोर्ट का कड़ा आदेश, काटने की घटना में राज्य सरकारें देंगी मुआवजा

नई दिल्ली। देशभर में लगातार सामने आ रही आवारा कुत्तों के काटने की घटनाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए बड़ा फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि कुत्ते के काटने से यदि कोई व्यक्ति घायल होता है या उसकी जान जाती है, तो इसकी जिम्मेदारी राज्य सरकारों की होगी और पीड़ित या मृतक के परिजनों को मुआवजा देना अनिवार्य होगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह मुद्दा केवल पशु नियंत्रण का नहीं, बल्कि नागरिकों की सुरक्षा और जीवन के अधिकार से जुड़ा हुआ है। अदालत ने विशेष तौर पर बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा पर चिंता जताते हुए कहा कि सार्वजनिक स्थानों पर उनकी जान जोखिम में नहीं डाली जा सकती। लापरवाही पर राज्य जिम्मेदार अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि यदि आवारा कुत्तों के हमले में बच्चे या बुजुर्ग गंभीर रूप से घायल होते हैं या उनकी मौत हो जाती है, तो इसे प्रशासनिक लापरवाही माना जाएगा। ऐसे मामलों में राज्य सरकारें यह नहीं कह सकतीं कि यह नगर निगम या स्थानीय निकाय की जिम्मेदारी है। स्थानीय निकायों को निर्देश शीर्ष अदालत ने राज्य सरकारों को निर्देश दिया कि वे नगर निगमों और नगर पालिकाओं के माध्यम से आवारा कुत्तों की संख्या पर नियंत्रण, नसबंदी और टीकाकरण जैसे कार्यक्रमों को प्रभावी ढंग से लागू करें। अदालत ने यह भी कहा कि इन योजनाओं की नियमित निगरानी की जाए ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सके। पीड़ितों को मिलेगी राहत इस फैसले के बाद कुत्ते के हमलों के शिकार लोगों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है। अब पीड़ितों को इलाज के खर्च और अन्य नुकसान की भरपाई के लिए राज्य सरकारों से सीधे मुआवजा मिल सकेगा। जन सुरक्षा की दिशा में अहम कदम विशेषज्ञों के अनुसार सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला राज्य सरकारों को जवाबदेह बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है। इससे न केवल पीड़ितों को न्याय मिलेगा, बल्कि प्रशासन पर भी दबाव बनेगा कि वह आवारा कुत्तों की समस्या को गंभीरता से लेते हुए ठोस और प्रभावी कदम उठाए।

एयरलाइन जैसा किराया, होटल जैसी सुविधा: 17 जनवरी को पटरी पर उतरेगी पहली वंदे भारत स्लीपर ट्रेन

नई दिल्ली। भारतीय रेलवे यात्रियों को लंबी दूरी की यात्रा में विश्वस्तरीय अनुभव देने जा रहा है। 17 जनवरी को देश की पहली वंदे भारत स्लीपर ट्रेन लॉन्च की जाएगी, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हरी झंडी दिखाएंगे। यह ट्रेन खास तौर पर रात की यात्रा को आरामदायक, तेज और सुरक्षित बनाने के उद्देश्य से तैयार की गई है। ऑनलाइन बुकिंग, एयरलाइन जैसा किराया वंदे भारत स्लीपर ट्रेन की टिकट बुकिंग पूरी तरह ऑनलाइन होगी। रेलवे सूत्रों के मुताबिक, इसका किराया लगभग 13 हजार रुपये तक हो सकता है, जो दूरी और श्रेणी के अनुसार तय किया जाएगा। किराया डायनामिक प्राइसिंग पर आधारित होगा, ठीक एयरलाइंस की तरह। नहीं मिलेगा RAC या वेटिंग टिकट इस ट्रेन की एक बड़ी खासियत यह है कि इसमें RAC (रिजर्वेशन अगेंस्ट कैंसिलेशन) और वेटिंग लिस्ट टिकट की सुविधा नहीं होगी। यानी केवल कन्फर्म टिकट पर ही यात्रा की अनुमति मिलेगी, जिससे यात्रियों को असुविधा का सामना नहीं करना पड़ेगा। रूट और यात्रा समय पहली वंदे भारत स्लीपर ट्रेन को लंबी दूरी के हाई-डिमांड रूट पर चलाया जाएगा। माना जा रहा है कि यह ट्रेन प्रमुख महानगरों को जोड़ेगी और पारंपरिक राजधानी व दुरंतो ट्रेनों की तुलना में कम समय में यात्रा पूरी करेगी। रेलवे जल्द ही आधिकारिक रूट की घोषणा करेगा। आधुनिक स्लीपर कोच की सुविधाएं वंदे भारत स्लीपर ट्रेन में यात्रियों को मिलेंगी कई अत्याधुनिक सुविधाएं— * आरामदायक एसी स्लीपर बर्थ * हर कोच में ऑटोमैटिक दरवाजे और CCTV कैमरे * पढ़ने की लाइट, मोबाइल चार्जिंग प्वाइंट * बेहतर सस्पेंशन सिस्टम से झटकों से मुक्त यात्रा * स्वच्छ और आधुनिक बायो-वैक्यूम टॉयलेट महिलाओं, दिव्यांगों और वरिष्ठ नागरिकों के लिए कोटा रेलवे ने इस ट्रेन में महिलाओं, दिव्यांगों और वरिष्ठ नागरिकों के लिए विशेष कोटा तय किया है, ताकि इन वर्गों को सुरक्षित और सुविधाजनक यात्रा का लाभ मिल सके। रेलवे के लिए बड़ा कदम वंदे भारत स्लीपर ट्रेन को भारतीय रेलवे के आधुनिकीकरण की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। इससे न सिर्फ लंबी दूरी की यात्रा का अनुभव बदलेगा, बल्कि रेल को हवाई यात्रा का एक मजबूत विकल्प भी मिलेगा। 17 जनवरी को लॉन्च होने जा रही वंदे भारत स्लीपर ट्रेन, किराया भले ही प्रीमियम हो, लेकिन सुविधाओं, समय की बचत और आराम के मामले में यह भारतीय रेल यात्रियों के लिए गेम चेंजर साबित हो सकती है।

अंतरिक्ष में ‘अन्वेषा’ की उड़ान, लेकिन PSLV मिशन में आई तकनीकी अड़चन — PS3 स्टेज पर खराबी से इसरो की चुनौती बढ़ी

श्रीहरिकोटा: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने रविवार को आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से PSLV-C62/EOS-N1 मिशन के तहत अत्याधुनिक निगरानी उपग्रह ‘अन्वेषा’ का सफल प्रक्षेपण किया। यह उपग्रह रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) द्वारा विकसित एक गोपनीय हाइपरस्पेक्ट्रल निगरानी सैटेलाइट है, जिसका उपयोग रणनीतिक निगरानी और सुरक्षा संबंधी जरूरतों के लिए किया जाएगा। हालांकि, मिशन के दौरान PS3 (तीसरे चरण) में तकनीकी खराबी दर्ज की गई, जिसने वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा दी। क्या है ‘अन्वेषा’ की खासियत ‘अन्वेषा’ हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग तकनीक से लैस है, जो धरती की सतह से निकलने वाले विभिन्न स्पेक्ट्रल सिग्नल्स का विश्लेषण कर सटीक जानकारी प्रदान करती है। इससे सीमावर्ती इलाकों की निगरानी, संदिग्ध गतिविधियों की पहचान और आपदा प्रबंधन जैसे अहम क्षेत्रों में मदद मिलने की उम्मीद है। रक्षा क्षेत्र में इसे एक बड़ी तकनीकी उपलब्धि माना जा रहा है। 15 सह-उपग्रह भी भेजे गए कक्षा में इस मिशन के तहत ‘अन्वेषा’ के साथ 15 सह-उपग्रह (को-पैसेंजर सैटेलाइट्स) भी अंतरिक्ष में भेजे गए। ये उपग्रह विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों और स्टार्टअप्स द्वारा विकसित किए गए हैं, जिनका उद्देश्य संचार, पृथ्वी अवलोकन और प्रायोगिक अनुसंधान है। इससे भारत के स्पेस स्टार्टअप इकोसिस्टम को भी मजबूती मिलने की उम्मीद है। PS3 स्टेज पर तकनीकी खराबी मिशन के दौरान रॉकेट के तीसरे चरण यानी PS3 स्टेज में तकनीकी समस्या सामने आई। इसरो ने प्रारंभिक बयान में कहा कि खराबी की विस्तृत जांच की जा रही है और सभी टेलीमेट्री डेटा का विश्लेषण किया जाएगा। वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि समस्या का असर मिशन के समग्र उद्देश्यों पर कितना पड़ा है। इसरो का बयान इसरो अधिकारियों के मुताबिक, प्रक्षेपण प्रक्रिया के अधिकांश चरण निर्धारित योजना के अनुसार पूरे हुए। एजेंसी ने कहा कि वह पारदर्शिता के साथ तकनीकी पहलुओं की समीक्षा करेगी और भविष्य के मिशनों में सुधार के लिए आवश्यक कदम उठाएगी। आगे की राह हाल के वर्षों में PSLV भारत का सबसे भरोसेमंद प्रक्षेपण यान रहा है। ऐसे में इस तकनीकी अड़चन को एक सीख के रूप में देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसरो की मजबूत इंजीनियरिंग क्षमता और अनुभव के चलते इस समस्या का समाधान जल्द ही निकाल लिया जाएगा। कुल मिलाकर, ‘अन्वेषा’ का प्रक्षेपण भारत की अंतरिक्ष और रक्षा क्षमताओं में एक और महत्वपूर्ण अध्याय जोड़ता है, भले ही इस मिशन ने वैज्ञानिकों के सामने नई तकनीकी चुनौतियां भी खड़ी कर दी हों।

इतिहास के घाव कुरेदकर देश को बांटने की कोशिश” — अजीत डोभाल के बयान पर महबूबा मुफ्ती का तीखा हमला

नई दिल्ली/श्रीनगर: पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (PDP) की अध्यक्ष और जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल के हालिया बयान पर कड़ा ऐतराज जताया है। उन्होंने कहा कि “सदियों पुरानी घटनाओं का बदला लेने” जैसे बयान न सिर्फ खतरनाक हैं, बल्कि देश के युवाओं को गुमराह कर उन्हें अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ उकसाने का काम भी करते हैं। महबूबा मुफ्ती ने आरोप लगाया कि इस तरह की भाषा एक खास सांप्रदायिक विचारधारा को बढ़ावा देती है, जिससे समाज में नफरत और ध्रुवीकरण गहराता है। उन्होंने कहा कि देश को आगे बढ़ाने के लिए भविष्य की सोच जरूरी है, न कि अतीत के विवादों को फिर से हवा देना। युवाओं को गलत दिशा में धकेला जा रहा’ पीडीपी प्रमुख ने कहा कि आज का युवा रोजगार, शिक्षा और विकास की उम्मीद करता है, लेकिन ऐसे बयान उन्हें नफरत और बदले की राजनीति की ओर धकेल रहे हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर नेतृत्व स्तर पर जिम्मेदार भाषा का इस्तेमाल नहीं किया गया, तो इसके गंभीर सामाजिक परिणाम हो सकते हैं। ‘संविधान और भाईचारे की भावना पर हमला’ महबूबा मुफ्ती ने यह भी कहा कि भारत की ताकत उसकी विविधता और संविधान में निहित धर्मनिरपेक्ष मूल्यों में है। सदियों पुराने घटनाक्रमों का हवाला देकर बदले की भावना पैदा करना संविधान की आत्मा और देश की एकता—दोनों के खिलाफ है। केंद्र सरकार से अपील उन्होंने केंद्र सरकार से अपील की कि वह विभाजनकारी बयानबाजी से दूरी बनाए और देश में सौहार्द, संवाद और विश्वास बहाली पर ध्यान दे। मुफ्ती ने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा का मतलब सिर्फ बाहरी खतरों से निपटना नहीं, बल्कि देश के भीतर शांति और सामाजिक समरसता को मजबूत करना भी है। इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में बहस तेज हो गई है। विपक्षी दलों ने भी इस मुद्दे पर सरकार से स्पष्ट रुख अपनाने की मांग की है, वहीं सत्तापक्ष की ओर से अब तक इस पर औपचारिक प्रतिक्रिया का इंतजार है।

सोमनाथ में शिवभक्ति और स्वाभिमान का संगम: डमरू की गूंज के बीच शौर्य यात्रा में शामिल हुए पीएम मोदी

सोमनाथ (गुजरात): प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात के दो दिवसीय दौरे पर हैं। दौरे के दूसरे दिन उन्होंने विश्व प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर में आयोजित ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ के तहत निकाली गई भव्य शौर्य यात्रा में हिस्सा लिया। इस अवसर पर पूरा सोमनाथ क्षेत्र हर-हर महादेव और डमरू की गूंज से गूंज उठा। दोनों हाथों में डमरू थामे शिव भक्तों का विशाल हुजूम प्रधानमंत्री के स्वागत के लिए उमड़ पड़ा। शौर्य यात्रा में पारंपरिक वेशभूषा, ढोल-नगाड़ों और धार्मिक नारों के बीच ऐतिहासिक और आध्यात्मिक वातावरण देखने को मिला। प्रधानमंत्री मोदी ने यात्रा के दौरान शिवभक्तों का अभिवादन किया और सोमनाथ की ऐतिहासिक विरासत को नमन किया। उन्होंने कहा कि सोमनाथ केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि भारत की आस्था, साहस और स्वाभिमान का प्रतीक है। पीएम मोदी ने अपने संबोधन में कहा कि बार-बार आक्रमणों और विनाश के बावजूद सोमनाथ का पुनर्निर्माण भारत की सांस्कृतिक चेतना और अदम्य साहस का उदाहरण है। उन्होंने इसे नए भारत की आत्मा से जोड़ते हुए कहा कि देश अपनी परंपराओं और विरासत पर गर्व के साथ आगे बढ़ रहा है। इस मौके पर गुजरात के मुख्यमंत्री, राज्यपाल, संत-महात्मा, साधु-संत और बड़ी संख्या में स्थानीय नागरिक उपस्थित रहे। सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे, जबकि प्रशासन ने पूरे आयोजन को सुचारू रूप से संपन्न कराने के लिए व्यापक व्यवस्थाएं की थीं। सोमनाथ स्वाभिमान पर्व के जरिए धार्मिक आस्था के साथ-साथ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का संदेश भी दिया गया। कार्यक्रम के अंत में प्रधानमंत्री मोदी ने मंदिर में पूजा-अर्चना कर देश की शांति, समृद्धि और विकास की कामना की। सोमनाथ में आयोजित यह आयोजन न सिर्फ धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा, बल्कि इसने देशभर में सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रीय गौरव की भावना को और मजबूत किया।

ईमेल से बम की धमकी ने बढ़ाई चिंता: बिहार से पंजाब तक जिला अदालतों में हाई अलर्ट, सुरक्षा एजेंसियां सतर्क

न्यूज रिपोर्ट: देश के कई राज्यों में जिला अदालतों को बम से उड़ाने की धमकी मिलने के बाद न्यायिक परिसरों में हड़कंप मच गया। यह धमकी ईमेल के जरिए भेजी गई, जिसके बाद बिहार, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश और पंजाब समेत कई राज्यों की अदालतों में तत्काल सुरक्षा अलर्ट जारी कर दिया गया। प्राप्त जानकारी के अनुसार, धमकी भरे ईमेल मिलते ही स्थानीय प्रशासन और पुलिस हरकत में आ गई। एहतियातन अदालत परिसरों को खाली कराया गया और वकीलों, कर्मचारियों तथा आम लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला गया। बम निरोधक दस्ता, डॉग स्क्वॉड और फॉरेंसिक टीमें मौके पर पहुंचीं और पूरे परिसर की गहन तलाशी ली गई। अब तक कोई संदिग्ध वस्तु बरामद नहीं घंटों चली तलाशी के बाद किसी भी अदालत परिसर से कोई विस्फोटक या संदिग्ध सामग्री बरामद नहीं हुई है। अधिकारियों का कहना है कि फिलहाल स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में है, लेकिन सुरक्षा में किसी तरह की ढील नहीं दी जा रही। साइबर सेल जांच में जुटी ईमेल के जरिए दी गई धमकी को गंभीरता से लेते हुए साइबर सेल और खुफिया एजेंसियां जांच में जुट गई हैं। ईमेल के सोर्स, आईपी एड्रेस और संभावित नेटवर्क की तकनीकी जांच की जा रही है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि धमकी किसने और कहां से भेजी। न्यायिक कामकाज पर असर इस घटना के चलते कई जगहों पर अदालतों का कामकाज अस्थायी रूप से प्रभावित रहा। कुछ अदालतों में सुनवाई स्थगित करनी पड़ी, जबकि कई स्थानों पर सीमित कार्य ही हो सका। वकील संगठनों ने भी सुरक्षा को लेकर चिंता जताई है और स्थायी सुरक्षा व्यवस्था की मांग की है। प्रशासन की अपील प्रशासन ने आम लोगों से अफवाहों पर ध्यान न देने और शांति बनाए रखने की अपील की है। अधिकारियों का कहना है कि हर पहलू से मामले की जांच की जा रही है और दोषियों को जल्द ही चिन्हित कर सख्त कार्रवाई की जाएगी। लगातार मिल रही ऐसी धमकियों ने देश की न्यायिक सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। फिलहाल सभी संबंधित एजेंसियां अलर्ट मोड पर हैं और स्थिति पर कड़ी नजर रखी जा रही है।

रेलवे भर्ती घोटाला: फर्जी नौकरी के नाम पर करोड़ों की मनी लॉन्ड्रिंग, ED ने चार राज्यों में 15 ठिकानों पर मारा छापा

न्यूज़ रिपोर्ट: रेलवे में नौकरी दिलाने के नाम पर चल रहे बड़े फर्जीवाड़े में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने बड़ी कार्रवाई करते हुए बिहार, उत्तर प्रदेश, गुजरात और तमिलनाडु में एक साथ 15 ठिकानों पर छापेमारी की है। यह कार्रवाई करोड़ों रुपये की मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े एक संगठित नेटवर्क के खिलाफ की गई है, जिसमें बेरोजगार युवाओं को रेलवे में नौकरी का झांसा देकर उनसे मोटी रकम वसूली गई। कैसे हुआ घोटाले का खुलासा ईडी की जांच के मुताबिक, इस गिरोह ने रेलवे की विभिन्न भर्तियों का हवाला देकर अभ्यर्थियों से 5 से 15 लाख रुपये तक की रकम ली। आरोप है कि फर्जी नियुक्ति पत्र, जाली कॉल लेटर और नकली जॉइनिंग दस्तावेज तैयार किए गए। कई मामलों में उम्मीदवारों को कुछ समय के लिए काम पर लगवाने का नाटक भी किया गया, ताकि उन्हें भरोसे में लिया जा सके। यह मामला पहले स्थानीय पुलिस और सीबीआई की जांच में सामने आया था, जिसके बाद मनी लॉन्ड्रिंग एंगल जुड़ने पर ईडी ने प्रवर्तन निदेशालय अधिनियम (PMLA) के तहत जांच शुरू की। छापेमारी में क्या मिला सूत्रों के अनुसार, छापेमारी के दौरान ईडी को बड़ी मात्रा में नकद, संदिग्ध बैंक लेनदेन से जुड़े दस्तावेज, डिजिटल डिवाइस, फर्जी नियुक्ति पत्र, स्टांप और कई अहम रजिस्टर मिले हैं। जांच एजेंसी को ऐसे सबूत भी हाथ लगे हैं, जिनसे पता चलता है कि घोटाले की रकम को रियल एस्टेट, शेल कंपनियों और रिश्तेदारों के खातों के जरिए खपाया गया। चार राज्यों तक फैला नेटवर्क ईडी अधिकारियों का कहना है कि यह सिर्फ किसी एक राज्य तक सीमित मामला नहीं है। बिहार और यूपी में जहां अभ्यर्थियों से सीधे पैसे लिए गए, वहीं गुजरात और तमिलनाडु में रकम को निवेश और लेनदेन के जरिए ठिकाने लगाने की भूमिका सामने आई है। इससे साफ है कि यह एक अंतरराज्यीय संगठित गिरोह है। राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में हलचल जैसे ही छापेमारी की खबर सामने आई, राजनीतिक गलियारों में भी हलचल तेज हो गई। विपक्ष ने मामले की निष्पक्ष जांच और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है, जबकि एजेंसियों का कहना है कि जांच पूरी तरह सबूतों के आधार पर आगे बढ़ रही है और किसी को बख्शा नहीं जाएगा। आगे क्या ईडी अब जब्त दस्तावेजों और डिजिटल डेटा की फॉरेंसिक जांच करेगी। आने वाले दिनों में इस मामले में और गिरफ्तारियां संभव हैं। साथ ही, अवैध कमाई से बनाई गई संपत्तियों को जब्त करने की प्रक्रिया भी तेज की जा सकती है। रेलवे में नौकरी के सपने दिखाकर बेरोजगार युवाओं को ठगने वाला यह घोटाला न सिर्फ आर्थिक अपराध है, बल्कि युवाओं के भविष्य के साथ किया गया गंभीर खिलवाड़ भी है। ईडी की इस कार्रवाई को ऐसे फर्जीवाड़ों पर लगाम लगाने की दिशा में बड़ी पहल माना जा रहा है।