संसद में टला बड़ा सियासी हादसा? पीएम मोदी के न आने के पीछे की असली वजह का खुलासा

नई दिल्ली। लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भाषण न हो पाना अब एक गंभीर सियासी बहस का मुद्दा बन गया है। इस पूरे घटनाक्रम पर लोकसभा स्पीकर ओम बिरला का बयान सामने आने के बाद राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। स्पीकर ओम बिरला ने बड़ा खुलासा करते हुए कहा कि उन्होंने स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सदन में न आने का आग्रह किया था, क्योंकि उस समय परिस्थितियां सामान्य नहीं थीं। बिरला के मुताबिक, यदि प्रधानमंत्री उस वक्त सदन में आते, तो कोई अप्रत्याशित और गंभीर घटना घट सकती थी। स्पीकर का बयान और बढ़ता विवाद ओम बिरला के इस बयान के बाद विपक्ष ने सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं कि आखिर ऐसी कौन-सी स्थिति थी, जिसमें देश के प्रधानमंत्री का संसद में बोलना सुरक्षित नहीं माना गया। वहीं सत्ता पक्ष का कहना है कि यह फैसला सदन की गरिमा और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए लिया गया। स्पीकर ने स्पष्ट किया कि संसद की कार्यवाही सुचारू रूप से चलाना उनकी जिम्मेदारी है और किसी भी तरह की अव्यवस्था या टकराव से बचना सर्वोच्च प्राथमिकता होती है। ऐसे में उन्होंने हालात को देखते हुए प्रधानमंत्री को सदन में उपस्थित न होने की सलाह दी। विपक्ष का हमला इस पूरे मामले को लेकर विपक्ष ने सरकार पर तीखा हमला बोला है। विपक्षी दलों का आरोप है कि सरकार संसद में जवाब देने से बच रही है और प्रधानमंत्री का भाषण न होना लोकतांत्रिक परंपराओं के खिलाफ है। उनका कहना है कि यदि हालात इतने खराब थे, तो सरकार को देश को स्पष्ट जवाब देना चाहिए। राजनीतिक संदेश भी पढ़े जा रहे हैं राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह सिर्फ सुरक्षा या अव्यवस्था का मामला नहीं, बल्कि इसके पीछे गहरा राजनीतिक संदेश भी छिपा हो सकता है। संसद के भीतर बढ़ते तनाव और तीखी बहसों के बीच यह फैसला आने वाले दिनों में सियासी चर्चा का बड़ा मुद्दा बना रहेगा। अब सबकी नजर इस बात पर है कि सरकार और स्पीकर इस पूरे घटनाक्रम पर आगे क्या स्पष्टीकरण देते हैं और क्या प्रधानमंत्री भविष्य में इस मुद्दे पर संसद के भीतर या बाहर कोई बयान देते हैं। फिलहाल इतना तय है कि पीएम मोदी के संसद में न आने का कारण अब सिर्फ एक प्रक्रिया संबंधी फैसला नहीं, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक सवाल बन चुका है।

मणिपुर: वाई. खेमचंद सिंह ने संभाली मुख्यमंत्री की कमान, नेमचा किपगेन बनीं उपमुख्यमंत्री

इंफाल। मणिपुर में सत्ता परिवर्तन के साथ नई सरकार का गठन हो गया है। वरिष्ठ भाजपा नेता वाई. खेमचंद सिंह ने राज्य के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, जबकि कुकी समुदाय की प्रमुख नेता नेमचा किपगेन को उपमुख्यमंत्री बनाया गया है। इस राजनीतिक घटनाक्रम को राज्य की स्थिरता और समावेशी प्रतिनिधित्व की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है। शपथग्रहण समारोह में भाजपा के वरिष्ठ नेता, गठबंधन सहयोगी और प्रशासनिक अधिकारी मौजूद रहे। नई सरकार के गठन के साथ ही राज्य में विकास, कानून-व्यवस्था और सामुदायिक सौहार्द को प्राथमिकता देने का संदेश दिया गया। मुख्यमंत्री खेमचंद सिंह ने अपने पहले संबोधन में कहा कि सरकार “संवाद, विश्वास और विकास” के रास्ते पर आगे बढ़ेगी और सभी समुदायों के हितों की रक्षा करेगी। उपमुख्यमंत्री बनीं नेमचा किपगेन की नियुक्ति को राजनीतिक संतुलन और सामाजिक समावेशन के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। उनके जिम्मे आदिवासी क्षेत्रों के विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे अहम विभागों पर विशेष ध्यान देने की बात कही जा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, नई टीम के सामने सबसे बड़ी चुनौती शांति बहाली, आर्थिक गतिविधियों को गति देना और प्रशासनिक भरोसा कायम करना होगी। आने वाले दिनों में मंत्रिमंडल विस्तार और नीतिगत प्राथमिकताओं की घोषणा के साथ सरकार की दिशा और स्पष्ट होने की उम्मीद है।

SIR विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में ममता बनर्जी की सीधी दख़ल, कहा– “पश्चिम बंगाल को किया जा रहा है टारगेट”

नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर चुनाव आयोग और राज्य सरकार के बीच चल रहा टकराव अब सुप्रीम कोर्ट के दरवाज़े तक पहुँच चुका है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा दायर याचिका पर आज शीर्ष अदालत में सुनवाई हुई, जिसमें उन्होंने एक असामान्य लेकिन राजनीतिक रूप से अहम कदम उठाते हुए खुद अपना पक्ष रखने की अनुमति मांगी। सुनवाई के दौरान ममता बनर्जी ने अदालत से कहा कि “हमें इंसाफ नहीं मिल रहा है। पश्चिम बंगाल को जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा है।” उन्होंने आरोप लगाया कि SIR प्रक्रिया के नाम पर राज्य की चुनावी व्यवस्था में दख़ल दिया जा रहा है और यह कदम लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए ख़तरा बन सकता है। क्या है मामला? चुनाव आयोग द्वारा शुरू की गई SIR प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची की गहन समीक्षा बताया जा रहा है। लेकिन तृणमूल कांग्रेस और राज्य सरकार का आरोप है कि इस प्रक्रिया के ज़रिए वैध मतदाताओं के नाम हटाने की कोशिश की जा सकती है, जिससे आगामी चुनावों पर असर पड़ेगा। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए फिलहाल किसी अंतरिम आदेश से परहेज़ किया, लेकिन याचिका को सुनवाई योग्य मानते हुए अगली तारीख 9 फरवरी तय कर दी है। अदालत ने संकेत दिए कि अगली सुनवाई में चुनाव आयोग से भी विस्तृत जवाब माँगा जा सकता है। राजनीतिक मायने यह मामला केवल कानूनी नहीं, बल्कि गहरे राजनीतिक निहितार्थ भी रखता है। विपक्ष का कहना है कि केंद्र की संस्थाओं का इस्तेमाल गैर-भाजपा शासित राज्यों पर दबाव बनाने के लिए किया जा रहा है, जबकि चुनाव आयोग इन आरोपों को पहले ही खारिज करता रहा है। अब सबकी निगाहें 9 फरवरी पर टिकी हैं, जब यह तय हो सकता है कि SIR प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट क्या रुख अपनाता है और क्या पश्चिम बंगाल की राजनीति में यह विवाद नया मोड़ लेता है।

डेटा प्राइवेसी पर सुप्रीम सख्त, मेटा-व्हाट्सएप से मांगा लिखित आश्वासन; हलफनामा नहीं तो याचिका खारिज

नई दिल्ली। डेटा प्राइवेसी के मसले पर सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया दिग्गज मेटा और उसकी सहयोगी कंपनी व्हाट्सएप को बड़ा झटका दिया है। राहत की मांग को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने साफ शब्दों में कहा कि अदालत को सिर्फ मौखिक दलीलों से संतोष नहीं होगा। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि मेटा और व्हाट्सएप को हलफनामा दाखिल कर यह स्पष्ट करना होगा कि वे किसी भी परिस्थिति में यूजर्स का डेटा साझा नहीं करेंगे। कोर्ट का सख्त रुख सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने कहा कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की जिम्मेदारी केवल तकनीकी सुविधा देने तक सीमित नहीं है, बल्कि करोड़ों यूजर्स की निजता की रक्षा करना भी उनकी संवैधानिक और नैतिक जिम्मेदारी है। अदालत ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि यदि कंपनियां इस संबंध में लिखित आश्वासन देने से बचती हैं, तो उनकी याचिका पर आगे सुनवाई का कोई औचित्य नहीं रहेगा। हलफनामा अनिवार्य सुप्रीम कोर्ट ने मेटा और व्हाट्सएप को निर्देश दिया है कि वे हलफनामे में यह बात स्पष्ट रूप से दर्ज करें कि न तो वे थर्ड पार्टी के साथ डेटा साझा करेंगे और न ही किसी अन्य व्यावसायिक उद्देश्य के लिए यूजर्स की निजी जानकारी का इस्तेमाल किया जाएगा। कोर्ट ने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि निर्धारित समय के भीतर ऐसा हलफनामा दाखिल नहीं किया गया, तो मामला सीधे तौर पर खारिज कर दिया जाएगा। प्राइवेसी बनाम टेक कंपनियां यह मामला ऐसे समय में सामने आया है, जब देश और दुनिया में डेटा सुरक्षा और डिजिटल निजता को लेकर बहस तेज है। भारत में डेटा प्रोटेक्शन कानून को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच सुप्रीम कोर्ट का यह रुख टेक कंपनियों के लिए एक स्पष्ट संदेश माना जा रहा है कि यूजर्स की निजता से किसी भी तरह का समझौता बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। अब सभी की नजर मेटा और व्हाट्सएप की अगली रणनीति पर टिकी है। यदि कंपनियां अदालत की शर्तों के अनुसार हलफनामा दाखिल करती हैं, तो मामले में आगे सुनवाई की संभावना बनेगी। वहीं, हलफनामा देने से इनकार करने की स्थिति में उन्हें कानूनी मोर्चे पर बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है। सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश न केवल मेटा और व्हाट्सएप के लिए अहम है, बल्कि देश में काम कर रही अन्य टेक कंपनियों के लिए भी एक नजीर साबित हो सकता है।

मिशन 2027 से पहले भाजपा में मंथन या महाभारत?

संगठन–सरकार की खींचतान से सड़क तक पहुंचा सत्ता का तनाव लखनऊ। उत्तर प्रदेश की सत्ता में लगातार दूसरी बार काबिज भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सामने 2027 का विधानसभा चुनाव जितना नज़दीक आ रहा है, उतनी ही तेज़ी से पार्टी के भीतर अंतर्विरोध उभरकर सामने आने लगे हैं। बंद कमरों में सुलग रहा असंतोष अब खुले मंचों, मीडिया बयानों और यहां तक कि सड़कों तक पहुंच गया है। जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के बीच टकराव, सरकार और संगठन के बीच समन्वय की कमी और लोकसभा चुनाव 2024 के बाद उठे सवालों ने पार्टी नेतृत्व की चिंता बढ़ा दी है। जनप्रतिनिधि बनाम अधिकारी: सत्ता के गलियारों में टकराव बीते कुछ महीनों में कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां भाजपा विधायक और सांसद सीधे तौर पर प्रशासनिक अधिकारियों से भिड़ते नजर आए। महोबा का मामला इसका ताज़ा उदाहरण है, जहां एक भाजपा विधायक ने खुलेआम अधिकारियों पर भ्रष्टाचार और अनदेखी के आरोप लगाए। यह पहला मौका नहीं है जब सत्ता पक्ष के जनप्रतिनिधि अपनी ही सरकार के सिस्टम पर सवाल उठा रहे हों। इससे यह संकेत मिल रहा है कि ज़मीनी स्तर पर संवाद और विश्वास की कमी गहराती जा रही है। दिनेश खटीक का इस्तीफा और उसके मायने जलशक्ति राज्य मंत्री दिनेश खटीक का इस्तीफा पार्टी के लिए बड़ा राजनीतिक झटका माना गया। उन्होंने अधिकारियों पर दलित जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा का आरोप लगाते हुए पद छोड़ दिया था। हालांकि बाद में मामला संभाल लिया गया, लेकिन यह घटना भाजपा के उस सामाजिक संतुलन पर सवाल खड़े कर गई, जिसे पार्टी अपनी सबसे बड़ी ताकत मानती रही है। अंदरखाने चर्चा है कि कई अन्य विधायक और नेता भी इसी तरह की नाराज़गी महसूस कर रहे हैं। लोकसभा चुनाव के बाद बढ़ी तल्खी लोकसभा चुनाव 2024 में उत्तर प्रदेश में अपेक्षा से कमजोर प्रदर्शन ने पार्टी के भीतर आत्ममंथन की बजाय आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू कर दिया। संगठन के कुछ नेताओं ने सरकार की नीतियों और कार्यशैली को जिम्मेदार ठहराया, तो वहीं सरकार समर्थक खेमे ने संगठन पर ज़मीनी फीडबैक में कमी का आरोप लगाया। यह खींचतान अब साफ तौर पर “सरकार बनाम संगठन” के रूप में दिखने लगी है। संगठन–सरकार समन्वय पर सवाल भाजपा की पहचान हमेशा मजबूत संगठन और अनुशासित कार्यशैली रही है, लेकिन मौजूदा हालात में यही मॉडल दबाव में नजर आ रहा है। कई जिलों में संगठन पदाधिकारी खुद को हाशिये पर महसूस कर रहे हैं, जबकि जनप्रतिनिधियों का आरोप है कि उनकी बात शासन स्तर पर नहीं सुनी जा रही। इस असंतुलन का सीधा असर कार्यकर्ताओं के मनोबल पर पड़ रहा है। 2027 की राह आसान नहीं राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि भाजपा ने समय रहते इन अंदरूनी मतभेदों को नहीं सुलझाया, तो विपक्ष इसे बड़ा मुद्दा बना सकता है। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस पहले से ही “भाजपा की अंदरूनी कलह” को जनता के बीच ले जाने की तैयारी में हैं। नेतृत्व के सामने बड़ी चुनौती अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व—चाहे वह दिल्ली हो या लखनऊ—इस बढ़ते आक्रोश को कैसे नियंत्रित करता है। क्या यह असंतोष केवल चुनावी दबाव का नतीजा है या फिर सत्ता के लंबे समय तक रहने से पैदा हुई स्वाभाविक थकान? जवाब आने वाले महीनों में मिलेगा, लेकिन इतना तय है कि मिशन 2027 से पहले भाजपा के लिए सबसे बड़ी लड़ाई विपक्ष से नहीं, बल्कि अपने भीतर से ही है।

भारत पर अमेरिकी टैरिफ में बड़ी कटौती, रूस से तेल खरीद पर भी बड़ा संकेत

नई दिल्ली/वॉशिंगटन। भारत और अमेरिका के रिश्तों में एक बार फिर बड़ा मोड़ आया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच हुए उच्चस्तरीय समझौते के बाद अमेरिका ने भारत पर लगाए गए टैरिफ में बड़ी राहत दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत पर लगने वाला टैरिफ 25 फीसदी से घटाकर सीधे 18 फीसदी करने का ऐलान किया है। इसके साथ ही दोनों देशों के बीच व्यापारिक टैरिफ अब केवल 18 फीसदी रह गया है, जिसे द्विपक्षीय व्यापार संबंधों के लिहाज से एक अहम कदम माना जा रहा है। भारतीय निर्यातकों को मिलेगी बड़ी राहत टैरिफ में इस कटौती से भारतीय निर्यातकों को सीधा फायदा मिलने की उम्मीद है। खासकर टेक्सटाइल, फार्मास्यूटिकल्स, ऑटो कंपोनेंट्स और आईटी से जुड़े उत्पादों के लिए अमेरिकी बाजार और ज्यादा अनुकूल हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भारत-अमेरिका व्यापार में तेजी आएगी और निवेश के नए रास्ते खुलेंगे। रूस से तेल खरीद पर ट्रंप का दावा इस समझौते के साथ ही राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक और बड़ा दावा किया है। ट्रंप के मुताबिक, भारत अब रूस से तेल नहीं खरीदेगा। यह बयान ऐसे समय आया है जब वैश्विक स्तर पर ऊर्जा आपूर्ति और भू-राजनीतिक तनाव लगातार चर्चा में हैं। अगर यह दावा जमीन पर उतरता है, तो इसका असर अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार और भारत की ऊर्जा नीति पर भी दिख सकता है। रणनीतिक साझेदारी को नई धार राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह समझौता केवल व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत-अमेरिका की रणनीतिक साझेदारी को भी मजबूत करता है। टैरिफ में कटौती और ऊर्जा नीति को लेकर दिए गए संकेत यह बताते हैं कि दोनों देश वैश्विक मंच पर एक-दूसरे के करीब आ रहे हैं। अब सबकी नजर इस बात पर है कि यह समझौता कब और कैसे पूरी तरह लागू होता है। टैरिफ में कमी और ऊर्जा खरीद से जुड़े फैसलों का असर आने वाले महीनों में व्यापार आंकड़ों और कूटनीतिक रिश्तों में साफ तौर पर दिख सकता है। फिलहाल, मोदी–ट्रंप बातचीत को भारत-अमेरिका संबंधों में एक बड़े ब्रेकथ्रू के तौर पर देखा जा रहा है।

चीन पर टकराव, सदन में संग्राम

राहुल गांधी के बयान से लोकसभा में सियासी भूचाल, बार-बार स्थगित हुई कार्यवाही नई दिल्ली। केंद्रीय बजट के बाद राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव की चर्चा के दौरान सोमवार को लोकसभा का माहौल अचानक गरमा गया। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के भाषण ने सदन की कार्यवाही को उस दिशा में मोड़ दिया, जहां चर्चा बजट और नीतियों से हटकर भारत-चीन संबंधों, सेना और सरकार की मंशा पर केंद्रित हो गई। नतीजा—दिनभर हंगामा, तीखी बहस और बार-बार स्थगित होती लोकसभा। राहुल गांधी का आक्रामक रुख अपनी बारी आने पर राहुल गांधी ने चर्चा से इतर पूर्व थलसेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की अप्रकाशित किताब का हवाला देते हुए सरकार पर गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि किताब में चीनी सेना की ओर से भारतीय सीमा में घुसपैठ का ज़िक्र है और सरकार ने जानबूझकर इसे प्रकाशित होने से रोका। राहुल गांधी ने सत्तापक्ष पर पलटवार करते हुए कहा कि जब बीजेपी सांसद विपक्ष की देशभक्ति पर सवाल उठाते हैं, तो ऐसे तथ्यों पर बात करना जरूरी हो जाता है। रक्षा मंत्री का पलटवार राहुल गांधी के आरोपों पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कड़ा जवाब दिया। उन्होंने कहा कि जिस किताब का ज़िक्र किया जा रहा है, वह अभी प्रकाशित ही नहीं हुई है। अगर उसमें तथ्यात्मक सच्चाई होती, तो उसके प्रकाशन पर कोई रोक नहीं लगती। राजनाथ सिंह ने यह भी जोड़ा कि यदि पूर्व आर्मी चीफ को लगता कि सरकार ने गलत तरीके से हस्तक्षेप किया है, तो उनके पास न्यायालय जाने का विकल्प मौजूद था। स्पीकर और राहुल के बीच तीखी नोक-झोंक हंगामे के बीच लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने राहुल गांधी को विषय पर ही बोलने और सदन की मर्यादा बनाए रखने की नसीहत दी। लेकिन राहुल गांधी अपनी बात पर अड़े रहे। उन्होंने स्पीकर से कहा, “मुझे बोलने नहीं दिया जा रहा है। मेरी बात चीन से ज्यादा प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री के कैरेक्टर को लेकर है। आप ही बता दीजिए कि मुझे क्या बोलना है।” इस पर स्पीकर ओम बिरला ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वह किसी के सलाहकार नहीं हैं, बल्कि उनका कर्तव्य है कि सदन नियम और प्रक्रिया के अनुसार चले। अखिलेश यादव का समर्थन समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने राहुल गांधी के पक्ष में खड़े होते हुए कहा कि चीन का मुद्दा बेहद संवेदनशील है और नेता प्रतिपक्ष की पूरी बात सुनी जानी चाहिए। उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि इस विषय पर खुली और गंभीर चर्चा हो। केसी वेणुगोपाल को स्पीकर की फटकार राहुल गांधी के भाषण के दौरान कांग्रेस नेता केसी वेणुगोपाल के खड़े होकर तालियां बजाने पर स्पीकर ने नाराज़गी जताई। ओम बिरला ने कहा, “यह तरीका बिल्कुल ठीक नहीं है। आप वरिष्ठ नेता हैं। क्या आप नेता प्रतिपक्ष के वकील हैं?” अमित शाह का हस्तक्षेप गृह मंत्री अमित शाह ने बहस में हस्तक्षेप करते हुए कहा कि सत्तापक्ष के किसी भी सांसद ने विपक्ष की देशभक्ति पर सवाल नहीं उठाया है। उन्होंने आरोप लगाया कि राहुल गांधी ने सदन के नियमों का उल्लंघन किया और चर्चा को भटकाया। बार-बार स्थगित होती कार्यवाही लगातार हंगामे के चलते लोकसभा की कार्यवाही पहले दोपहर, फिर शाम चार बजे तक और अंततः मंगलवार सुबह 11 बजे तक के लिए स्थगित कर दी गई। सियासी संदेश साफ इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर साफ कर दिया कि चीन जैसे संवेदनशील मुद्दे पर सरकार और विपक्ष के बीच टकराव कितना गहरा है। जहां विपक्ष सरकार की पारदर्शिता पर सवाल उठा रहा है, वहीं सरकार इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और सदन की मर्यादा से जोड़कर देख रही है। सवाल अब यही है—क्या आने वाले सत्रों में चीन पर ठोस चर्चा हो पाएगी, या यह मुद्दा सियासी शोर में ही दबकर रह जाएगा?

बजट 2026 का सीधा असर: दवाएं, मोबाइल और सोलर हुए सस्ते, शराब-तंबाकू और लग्जरी शौक पड़े महंगे

नई दिल्ली। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा आज संसद में पेश किए गए केंद्रीय बजट 2026 में आम जनता की रोजमर्रा की जरूरतों से लेकर भविष्य की अर्थव्यवस्था तक को ध्यान में रखते हुए बड़े फैसले किए गए हैं। इस बजट का मुख्य फोकस घरेलू विनिर्माण (Make in India) को मजबूती देने, स्वास्थ्य सेवाओं को किफायती बनाने और ग्रीन एनर्जी व इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को बढ़ावा देने पर रहा। सरकार ने सीमा शुल्क (Custom Duty) के ढांचे में अहम बदलाव करते हुए कई जरूरी और उपयोगी वस्तुओं को सस्ता किया है, जबकि राजस्व बढ़ाने और सामाजिक नियंत्रण के उद्देश्य से कुछ ‘सिन गुड्स’ और लग्जरी उत्पादों को महंगा किया गया है। आइए, जानते हैं बजट 2026 के बाद आपकी जेब पर क्या असर पड़ेगा। ये चीजें हुईं सस्ती चमड़े के उत्पाद (Leather Products) सरकार ने कच्चे चमड़े और उससे जुड़े इनपुट्स पर आयात शुल्क घटा दिया है। इसका सीधा फायदा उपभोक्ताओं को मिलेगा। अब ब्रांडेड जूते, बैग, बेल्ट और लेदर कपड़े पहले की तुलना में सस्ते दामों पर उपलब्ध हो सकते हैं। कैंसर की जीवन रक्षक दवाएं स्वास्थ्य के मोर्चे पर बजट 2026 को बड़ी राहत देने वाला माना जा रहा है। सरकार ने कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली 17 जीवन रक्षक दवाओं पर सीमा शुल्क पूरी तरह खत्म कर दिया है। इससे गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों और उनके परिवारों पर इलाज का आर्थिक बोझ काफी कम होगा। स्मार्टफोन और मोबाइल डिवाइसेज़ मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने फोन बनाने में इस्तेमाल होने वाले पार्ट्स और कुछ कैपिटल गुड्स पर टैक्स में राहत दी है। विशेषज्ञों के मुताबिक, आने वाले महीनों में नए स्मार्टफोन्स की कीमतों में गिरावट देखने को मिल सकती है। सोलर पैनल और रिन्यूएबल एनर्जी ग्रीन एनर्जी मिशन को गति देते हुए सरकार ने सोलर सेल और पैनल्स के निर्माण में इस्तेमाल होने वाले इनपुट्स पर ड्यूटी घटा दी है। अब घरों में सोलर सिस्टम लगवाना ज्यादा किफायती हो जाएगा, जिससे बिजली बिल में भी राहत मिलेगी। ईवी बैटरी और इलेक्ट्रिक वाहन (EV) इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने के लिए लिथियम-आयन सेल्स के कच्चे माल पर टैक्स में छूट दी गई है। इसका असर आने वाले समय में इलेक्ट्रिक कार और स्कूटर की कीमतों में कमी के रूप में दिख सकता है। स्पोर्ट्स इक्विपमेंट खेलों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से सरकार ने खेल सामग्री पर सीमा शुल्क घटा दिया है। अब क्रिकेट बैट, फुटबॉल, टेनिस रैकेट और अन्य स्पोर्ट्स गियर युवाओं और खिलाड़ियों के लिए अधिक सुलभ होंगे। घरेलू इलेक्ट्रॉनिक्स (Kitchen Appliances) माइक्रोवेव और कुछ अन्य घरेलू इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के खास पुर्जों पर आयात शुल्क घटाया गया है। बजट के बाद किचन के आधुनिक उपकरण अपेक्षाकृत सस्ते मिल सकते हैं। ये चीजें हुईं महंगी शराब (Alcohol) राजस्व बढ़ाने के साथ-साथ सामाजिक नियंत्रण के मकसद से शराब पर टैक्स बढ़ाया गया है। राज्यों की एक्साइज ड्यूटी और केंद्र के रुख के चलते प्रीमियम शराब और इंपोर्टेड वाइन की कीमतों में साफ बढ़ोतरी देखने को मिलेगी। तंबाकू और पान मसाला बजट 2026 में सिगरेट और पान मसाले पर नई एक्साइज ड्यूटी और सेस लगाया गया है। इसके चलते इन उत्पादों की कीमतों में 20% से 40% तक उछाल आने की आशंका है। लग्जरी घड़ियां शौक और विलासिता की चीजों पर सरकार ने सख्ती दिखाई है। आयातित लग्जरी घड़ियों पर सीमा शुल्क बढ़ा दिया गया है, जिससे अंतरराष्ट्रीय ब्रांड्स अब और महंगे हो जाएंगे। स्टॉक ऑप्शंस और फ्यूचर्स ट्रेडिंग (F&O) डेरिवेटिव बाजार में बढ़ती सट्टेबाजी पर लगाम लगाने के लिए सरकार ने STT और कैपिटल गेन टैक्स के ढांचे में बदलाव किया है। इससे छोटे निवेशकों के लिए F&O ट्रेडिंग अब ज्यादा खर्चीली हो जाएगी। कुल मिलाकर, बजट 2026 आम आदमी के लिए राहत और संयम का मिश्रण लेकर आया है। जहां एक ओर दवाएं, मोबाइल, सोलर और इलेक्ट्रिक वाहन जैसे जरूरी व भविष्य के सेक्टर सस्ते हुए हैं, वहीं शराब, तंबाकू और लग्जरी उत्पादों पर महंगाई की मार पड़ी है।

इतिहास रचती शपथ: भावुक क्षणों में सुनेत्रा पवार बनीं महाराष्ट्र की पहली महिला उपमुख्यमंत्री

मुंबई। महाराष्ट्र की राजनीति में आज एक ऐतिहासिक अध्याय जुड़ गया, जब भरी आंखों और दृढ़ संकल्प के साथ सुनेत्रा पवार ने उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली। इस शपथ के साथ ही वह महाराष्ट्र की पहली महिला डिप्टी सीएम बन गईं। लोकभवन में आयोजित गरिमामय समारोह में राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने उन्हें पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। शपथ ग्रहण के दौरान सुनेत्रा पवार की आंखों में भावनाएं साफ झलक रही थीं। यह सिर्फ एक संवैधानिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि दशकों के राजनीतिक संघर्ष, सामाजिक प्रतिबद्धता और महिलाओं के बढ़ते नेतृत्व का प्रतीक क्षण था। समारोह में सत्ता और विपक्ष के कई वरिष्ठ नेता, प्रशासनिक अधिकारी और सामाजिक क्षेत्र की प्रमुख हस्तियां मौजूद रहीं।  महिला नेतृत्व को मिला नया आयाम सुनेत्रा पवार का उपमुख्यमंत्री बनना केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे महाराष्ट्र की राजनीति में महिला सशक्तिकरण की बड़ी उपलब्धि के तौर पर देखा जा रहा है। अब तक राज्य की सत्ता में महिलाओं की भागीदारी सीमित रही है, ऐसे में यह नियुक्ति आने वाले समय में नई राजनीतिक धारा तय कर सकती है। अनुभव और विश्वास का मेल राजनीतिक हलकों में सुनेत्रा पवार को एक संतुलित, शांत और जमीनी मुद्दों से जुड़ी नेता के रूप में जाना जाता है। सामाजिक कार्यों से लेकर संगठनात्मक जिम्मेदारियों तक, उनका अनुभव अब राज्य के शीर्ष नेतृत्व में दिखाई देगा। माना जा रहा है कि वह प्रशासनिक फैसलों में समन्वय और संवेदनशीलता को प्राथमिकता देंगी। शपथ के बाद पहला संदेश शपथ लेने के बाद सुनेत्रा पवार ने कहा कि यह जिम्मेदारी उनके लिए सम्मान के साथ-साथ बड़ी जवाबदेही भी है। उन्होंने राज्य की जनता का विश्वास बनाए रखने, महिलाओं, किसानों और युवाओं के हित में काम करने का संकल्प दोहराया। राजनीति में दूरगामी असर राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम न केवल सत्ता संतुलन को मजबूत करेगा, बल्कि आने वाले चुनावी समीकरणों पर भी असर डालेगा। खासतौर पर महिला मतदाताओं और युवा वर्ग में इसका सकारात्मक संदेश जाएगा। कुल मिलाकर, सुनेत्रा पवार की यह शपथ महाराष्ट्र के राजनीतिक इतिहास में एक भावुक और निर्णायक मोड़ के रूप में दर्ज हो गई है—जहां सत्ता के गलियारों में पहली बार महिला नेतृत्व ने उपमुख्यमंत्री पद पर दस्तक दी।

कोलकाता अग्निकांड पर अमित शाह का ममता सरकार पर तीखा हमला

कोलकाता/नई दिल्ली। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कोलकाता के आनंदपुर इलाके में स्थित एक मोमो फैक्ट्री में हुए भीषण अग्निकांड को लेकर पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार पर जोरदार हमला बोला है। शाह ने इस हादसे को महज दुर्घटना मानने से इनकार करते हुए इसे “भ्रष्टाचार और लापरवाही का नतीजा” बताया। उन्होंने सीधे सवाल किया— “आखिर उस मोमो फैक्ट्री में किसका पैसा लगा है, जिसे बचाने की कोशिश की जा रही है?” हादसे की सच्चाई छिपा रही है सरकार अमित शाह ने आरोप लगाया कि इस अग्निकांड में 25 लोगों की मौत हुई, जबकि 27 लोग अब भी लापता हैं, लेकिन राज्य सरकार सच्चे आंकड़े सामने लाने से बच रही है। उन्होंने कहा कि घटना के बाद प्रशासन की भूमिका संदेह के घेरे में है और पीड़ित परिवारों को अब तक न्याय नहीं मिला है। बिना अनुमति चल रही थी फैक्ट्री? गृह मंत्री ने सवाल उठाया कि रिहायशी इलाके में इतनी बड़ी फैक्ट्री कैसे चल रही थी। क्या फैक्ट्री के पास फायर सेफ्टी की अनुमति थी? क्या स्थानीय प्रशासन को इसकी जानकारी नहीं थी? या फिर सब कुछ जानते हुए आंखें मूंद ली गईं? शाह ने दावा किया कि अगर निष्पक्ष जांच हो, तो यह साफ हो जाएगा कि स्थानीय प्रशासन से लेकर ऊपर तक संरक्षण दिया गया था। “रावण का भी अहंकार टूटा था” अपने भाषण में अमित शाह ने राजनीतिक हमला तेज करते हुए कहा,“इतिहास गवाह है कि रावण का भी अहंकार टूटा था। जो सरकारें खुद को कानून से ऊपर समझती हैं, उनका भी वही हश्र होता है।” उन्होंने कहा कि बंगाल में कानून-व्यवस्था पूरी तरह चरमरा चुकी है, और आम जनता असुरक्षित महसूस कर रही है। भाजपा ने इस मामले में न्यायिक जांच, दोषियों पर सख्त कार्रवाई, और मृतकों के परिजनों को उचित मुआवज़ा देने की मांग की है। पार्टी नेताओं का कहना है कि जब तक सच्चाई सामने नहीं आती, तब तक इस मुद्दे को सड़क से संसद तक उठाया जाएगा। कोलकाता अग्निकांड को लेकर बंगाल की राजनीति गरमा गई है। एक ओर भाजपा इसे भ्रष्टाचार और प्रशासनिक विफलता का प्रतीक बता रही है, वहीं तृणमूल कांग्रेस सरकार सभी आरोपों को राजनीति से प्रेरित बता रही है। आने वाले दिनों में यह मामला राज्य की सियासत में और बड़ा तूफान खड़ा कर सकता है।