खाद खरीद में बड़ा बदलाव: डिजिटल फार्मर आईडी से होगी बिक्री, सब्सिडी पर कसेगा शिकंजा

नई दिल्ली | केंद्र सरकार खाद बिक्री व्यवस्था को पारदर्शी, आसान और सुव्यवस्थित बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाने की तैयारी में है। इसके तहत सरकार डिजिटल फार्मर आईडी (Farmer ID) को खाद खरीद से जोड़ने पर गंभीरता से विचार कर रही है। यह वही डिजिटल पहचान है, जिसका उपयोग किसान पीएम किसान सम्मान निधि योजना में पंजीकरण के लिए करते हैं। सूत्रों के मुताबिक, आने वाले समय में खाद की खरीद के लिए किसान की डिजिटल आईडी अनिवार्य की जा सकती है, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि सरकारी सब्सिडी का लाभ वास्तविक और पात्र किसानों तक ही पहुंचे। क्या है डिजिटल फार्मर आईडी? डिजिटल फार्मर आईडी किसानों की एक यूनिक पहचान होगी, जिसमें उनकी जमीन, फसल, बोवाई पैटर्न और सरकारी योजनाओं से जुड़ी जानकारी दर्ज रहेगी। सरकार तेजी से देशभर में किसानों की यह आईडी बनाने पर काम कर रही है। कुछ राज्यों में पहले ही पीएम किसान योजना का लाभ लेने के लिए किसान आईडी जरूरी कर दी गई है। अब इसी आईडी को खाद बिक्री से जोड़ने की योजना है। पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर शुरुआत सरकारी सूत्रों के अनुसार, इस योजना को फिलहाल पायलट प्रोजेक्ट के रूप में लागू किया जाएगा। इसके जरिए यह परखा जाएगा कि डिजिटल आईडी के माध्यम से खाद वितरण कितना प्रभावी और पारदर्शी बन सकता है। सरकार का मानना है कि इस व्यवस्था से: फर्जी खरीद पर रोक लगेगी कालाबाजारी कम होगी जरूरत से ज्यादा खाद उठाव पर नियंत्रण होगा यूरिया सब्सिडी का बढ़ता बोझ खाद सुधार की इस कवायद के पीछे एक बड़ी वजह तेजी से बढ़ती फर्टिलाइजर सब्सिडी भी है। वित्त वर्ष 2026 (FY26) के लिए सरकार ने खाद सब्सिडी पर ₹1.68 ट्रिलियन खर्च का अनुमान लगाया है, लेकिन यह आंकड़ा बढ़कर ₹1.91 ट्रिलियन तक पहुंच सकता है। इसका मुख्य कारण है: यूरिया की रिकॉर्ड खपत बढ़ती अंतरराष्ट्रीय कीमतें घरेलू मांग में लगातार इजाफा यूरिया की रिकॉर्ड खपत आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल से दिसंबर 2025 के बीच यूरिया की खपत 31.15 मिलियन टन तक पहुंच चुकी है। यह 2024 की इसी अवधि की तुलना में करीब 4 प्रतिशत ज्यादा है। विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल फार्मर आईडी के जरिए सरकार यह ट्रैक कर सकेगी कि किस किसान को कितनी खाद की वास्तविक जरूरत है। यदि यह प्रयोग सफल रहा, तो आने वाले समय में: सभी खाद बिक्री केंद्रों पर Farmer ID अनिवार्य हो सकती है सब्सिडी सीधे किसान प्रोफाइल से जुड़ सकती है कृषि योजनाओं में पारदर्शिता और नियंत्रण बढ़ेगा सरकार का यह कदम न सिर्फ सब्सिडी के बोझ को संतुलित करने में मदद कर सकता है, बल्कि खेती को डेटा-आधारित और आधुनिक बनाने की दिशा में भी अहम साबित हो सकता है।

रिलायंस का बड़ा माइलस्टोन: क्विक कॉमर्स और FMCG बिजनेस पहली बार मुनाफे में, अंबानी के रिटेल साम्राज्य को नई रफ्तार

नई दिल्ली : देश की सबसे बड़ी निजी कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (RIL) ने अपने कंज्यूमर बिजनेस में एक अहम उपलब्धि हासिल कर ली है। कंपनी ने बताया है कि उसके दो सबसे बड़े उपभोक्ता कारोबार—क्विक कॉमर्स और फास्ट-मूविंग कंज्यूमर गुड्स (FMCG) अब कमाई करने लगे हैं। यह उपलब्धि बड़े पैमाने पर सोर्सिंग, ऑपरेशनल एफिशिएंसी और हाई-मार्जिन प्रोडक्ट कैटेगरी पर फोकस का नतीजा मानी जा रही है। क्विक कॉमर्स: लॉन्च के एक साल के भीतर ब्रेक-ईवन अक्टूबर 2024 में लॉन्च किया गया रिलायंस का क्विक कॉमर्स बिजनेस अब लगभग हर ऑर्डर पर मुनाफा कमा रहा है। कंपनी के अनुसार, इस सेगमेंट का कंट्रीब्यूशन मार्जिन पॉजिटिव हो चुका है, जो किसी भी नए डिजिटल रिटेल मॉडल के लिए बड़ी उपलब्धि मानी जाती है। विशेषज्ञों के मुताबिक, रिलायंस ने इस सेगमेंट में: * अपने विशाल सप्लाई चेन नेटवर्क * लोकल स्टोर इंटीग्रेशन * डेटा-ड्रिवन इन्वेंट्री मैनेजमेंट का बेहतर इस्तेमाल किया, जिससे डिलीवरी लागत घटी और प्रति ऑर्डर मार्जिन सुधरा। FMCG बिजनेस: EBITDA से पहले कमाई में पॉजिटिव रिलायंस ने करीब तीन साल पहले FMCG सेक्टर में कदम रखा था, जहां शुरुआत में भारी निवेश और ब्रांड बिल्डिंग पर जोर रहा। अब कंपनी ने बताया है कि यह कारोबार EBITDA (ब्याज, टैक्स, डेप्रिसिएशन और अमॉर्टाइजेशन से पहले) स्तर पर पॉजिटिव हो गया है। इस सफलता के पीछे प्रमुख कारण बताए जा रहे हैं: * बड़े पैमाने पर कच्चे माल की सोर्सिंग * अपने रिटेल नेटवर्क के जरिए सीधे उपभोक्ताओं तक पहुंच * प्राइवेट लेबल और हाई-मार्जिन प्रोडक्ट्स पर फोकस रिटेल सेक्टर में रिलायंस की मजबूत पकड़ चेयरमैन मुकेश अंबानी, जो एशिया के सबसे अमीर व्यक्ति हैं, लंबे समय से रिटेल और कंज्यूमर बिजनेस को रिलायंस के भविष्य का अहम स्तंभ बताते रहे हैं। क्विक कॉमर्स और FMCG में मुनाफे की शुरुआत इस रणनीति की सफलता का संकेत है।

Fastag New Rule: 1 अप्रैल से टोल टैक्स में बड़ा बदलाव, कैश पूरी तरह बंद; MLFF सिस्टम से होगी बिना रुके वसूली

नई दिल्ली। देशभर में हाईवे पर सफर करने वालों के लिए 1 अप्रैल 2026 से टोल टैक्स व्यवस्था पूरी तरह बदलने जा रही है। केंद्र सरकार मल्टी लेन फ्री फ्लो (MLFF) टोल सिस्टम लागू करने की तैयारी में है, जिसके तहत अब टोल प्लाजा पर कैश से भुगतान पूरी तरह बंद कर दिया जाएगा। यानी वाहन चालकों को हर हाल में FASTag या डिजिटल माध्यम से ही टोल देना होगा। सरकार का दावा है कि इस बदलाव से टोल प्लाजा पर लगने वाली लंबी कतारों, समय की बर्बादी और ईंधन की खपत में बड़ी कमी आएगी। साथ ही टोल कलेक्शन और ज्यादा पारदर्शी और तकनीक आधारित हो जाएगा। क्या है MLFF टोल सिस्टम? MLFF यानी Multi Lane Free Flow एक एडवांस्ड टोल वसूली प्रणाली है। इसमें टोल प्लाजा पर वाहन को रुकने की जरूरत नहीं होगी। * हाईवे पर लगे ANPR कैमरे (Automatic Number Plate Recognition) * और FASTag रीडर वाहन की पहचान कर सीधे बैंक अकाउंट या FASTag वॉलेट से टोल काट लेंगे। कैश लेन-देन क्यों हो रहा है बंद? सरकार के मुताबिक— * कैश लेन-देन से टोल प्लाजा पर जाम लगता है * मानव त्रुटि और टैक्स चोरी की आशंका रहती है * डिजिटल भुगतान से कलेक्शन तेज और रिकॉर्ड साफ रहता है इसी वजह से 1 अप्रैल 2026 से कैश लेन पूरी तरह खत्म की जा रही है। FASTag न होने पर क्या होगा? अगर किसी वाहन में FASTag नहीं है या वह काम नहीं कर रहा— * तो उस वाहन पर भारी जुर्माना लगाया जा सकता है * भविष्य में सीधे ई-चालान या वाहन मालिक के रजिस्टर्ड अकाउंट से टोल वसूली की व्यवस्था भी लागू हो सकती है आम लोगों को क्या फायदा? * टोल प्लाजा पर रुकना नहीं पड़ेगा * सफर होगा तेज और स्मूथ * ईंधन की बचत और प्रदूषण में कमी * टोल भुगतान में पारदर्शिता सरकार की तैयारी केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के अनुसार— * पहले चरण में चुनिंदा नेशनल हाईवे पर MLFF लागू होगा * इसके बाद पूरे देश में इसे चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाएगा क्या करना चाहिए वाहन चालकों को? * समय रहते FASTag जरूर लगवाएं * FASTag को बैंक अकाउंट से लिंक रखें * वॉलेट में पर्याप्त बैलेंस बनाए रखें 1 अप्रैल 2026 से टोल टैक्स सिस्टम पूरी तरह डिजिटल और हाईटेक होने जा रहा है। कैश भुगतान का दौर खत्म होगा और FASTag/MLFF देश के हाईवे सफर को नया रूप देगा। ऐसे में वाहन चालकों के लिए अभी से तैयारी करना जरूरी है।

टैरिफ टकराव की आग: अमेरिकी दालों पर भारत का 30% शुल्क, ट्रंप के फैसले पर कड़ा जवाब

अमेरिका और भारत के बीच व्यापारिक रिश्तों में एक बार फिर तनाव की लकीरें गहरी हो गई हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारतीय उत्पादों पर 50 फीसदी टैरिफ लगाए जाने के बाद भारत ने भी जवाबी कदम उठाते हुए अमेरिकी दालों के आयात पर 30 फीसदी शुल्क लागू कर दिया है। यह फैसला पिछले साल अक्टूबर से प्रभावी है, लेकिन अब इसके राजनीतिक और आर्थिक असर खुलकर सामने आने लगे हैं। भारत का यह कदम सिर्फ एक आर्थिक निर्णय नहीं, बल्कि रणनीतिक संदेश भी माना जा रहा है। लंबे समय से भारत और अमेरिका के बीच एक व्यापक व्यापार समझौते को लेकर बातचीत चल रही थी, लेकिन इस टैरिफ वॉर ने उन वार्ताओं को और जटिल बना दिया है। नई दिल्ली का साफ संकेत है कि वह एकतरफा दबाव की नीति को स्वीकार नहीं करेगा। अमेरिकी राजनीति में हलचल भारत के इस फैसले से अमेरिकी राजनीति में भी बेचैनी देखी जा रही है। कई अमेरिकी सांसदों ने ट्रंप प्रशासन से भारत के साथ बातचीत का रास्ता अपनाने की अपील की है। उनका कहना है कि भारतीय बाजार अमेरिकी कृषि उत्पादों, खासकर दालों के लिए बेहद अहम है और ऊंचे टैरिफ से अमेरिकी किसानों को सीधा नुकसान होगा। भारतीय किसानों को संदेश दूसरी ओर, भारत में इस निर्णय को घरेलू किसानों के हित में उठाया गया कदम बताया जा रहा है। अमेरिकी दालों पर शुल्क बढ़ने से आयात महंगा होगा, जिससे देश के दाल उत्पादक किसानों को राहत मिल सकती है। सरकार इसे “हितों की रक्षा” और “संतुलित व्यापार” की दिशा में जरूरी कदम बता रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर दोनों देश जल्द किसी समझौते पर नहीं पहुंचे, तो यह टैरिफ टकराव और गहरा सकता है। इसका असर सिर्फ दालों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आईटी, फार्मा और ऑटो सेक्टर जैसे अन्य क्षेत्रों में भी तनाव बढ़ सकता है। फिलहाल, भारत ने साफ कर दिया है कि वह बराबरी के आधार पर व्यापार चाहता है। अब नजर इस बात पर है कि वॉशिंगटन इस कड़े संदेश को कैसे पढ़ता है—टकराव के तौर पर या बातचीत के न्योते के रूप में।

रिलायंस इंडस्ट्रीज का दमदार Q3 प्रदर्शन: मुनाफा 18,645 करोड़ रुपये, कुल आय 2.65 लाख करोड़ रुपये

नई दिल्ली: देश की सबसे बड़ी निजी कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (RIL) ने वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही (Q3) के नतीजे जारी कर दिए हैं। कंपनी ने इस तिमाही में 18,645 करोड़ रुपये का शुद्ध मुनाफा दर्ज किया है, जबकि कुल आय 2.65 लाख करोड़ रुपये रही। नतीजों से यह साफ है कि चुनौतीपूर्ण वैश्विक हालात के बावजूद रिलायंस के प्रमुख बिज़नेस सेगमेंट्स ने स्थिर और मजबूत प्रदर्शन किया है। कंपनी का कंसोलिडेटेड EBITDA 6.1 प्रतिशत की बढ़त के साथ 50,932 करोड़ रुपये पर पहुंच गया। इस बढ़ोतरी में डिजिटल सर्विसेज़ और ऑयल-टू-केमिकल्स (O2C) सेगमेंट की अहम भूमिका रही। इन दोनों क्षेत्रों में बेहतर कमाई ने अपस्ट्रीम ऑयल और गैस बिज़नेस की कमजोरी के असर को काफी हद तक संतुलित कर दिया। डिजिटल बिज़नेस की बात करें तो रिलायंस जियो और इससे जुड़ी सेवाओं में लगातार बढ़ती ग्राहक संख्या और डेटा खपत ने आय को मजबूती दी। वहीं, O2C सेगमेंट में परिचालन दक्षता और बेहतर मार्जिन ने EBITDA को सपोर्ट किया। हालांकि, वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल और गैस की कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर कंपनी के अपस्ट्रीम बिज़नेस पर देखने को मिला, लेकिन विविध बिज़नेस मॉडल के चलते इसका कुल नतीजों पर सीमित प्रभाव पड़ा। कुल मिलाकर, रिलायंस इंडस्ट्रीज के Q3 नतीजे यह दर्शाते हैं कि कंपनी का फोकस डिजिटल, रिटेल और O2C जैसे मजबूत स्तंभों पर बना हुआ है, जो कठिन बाजार परिस्थितियों में भी उसे स्थिर ग्रोथ की राह पर बनाए हुए हैं।

अलग-अलग डिजाइन वाले सिक्कों पर भ्रम खत्म, RBI का बड़ा स्पष्टीकरण

रिजर्व बैंक ने कहा—डिजाइन बदले हों तो भी सभी सिक्के पूरी तरह वैध, लेन-देन से इनकार गैरकानूनी नई दिल्ली, 13 दिसंबर:  अलग-अलग डिजाइन और आकार वाले सिक्कों को लेकर आम लोगों में फैली उलझन पर भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने स्थिति साफ कर दी है। RBI ने स्पष्ट किया है कि समय-समय पर जारी किए गए अलग-अलग डिजाइन वाले सभी सिक्के वैध हैं और उन्हें लेने-देने से कोई भी व्यक्ति या संस्था इनकार नहीं कर सकती। RBI के मुताबिक, सिक्कों के डिजाइन, आकार या धातु में बदलाव तकनीकी और प्रशासनिक कारणों से किए जाते हैं। इसका मतलब यह नहीं होता कि पुराने या अलग डिजाइन वाले सिक्के अमान्य हो गए हैं। जब तक किसी सिक्के को आधिकारिक रूप से वापस (डिमोनेटाइज) करने की घोषणा नहीं की जाती, तब तक वह कानूनी मुद्रा बना रहता है। असली सिक्के की पहचान कैसे करें RBI ने बताया कि असली सिक्कों पर स्पष्ट रूप से जारी वर्ष, मूल्य अंकन और भारत सरकार का चिह्न अंकित होता है। सिक्के की धातु, वजन और उभरी हुई छपाई (एंबॉसिंग) भी उसकी प्रामाणिकता दर्शाती है। किसी भी तरह के संदेह की स्थिति में नजदीकी बैंक शाखा से जानकारी ली जा सकती है। लेन-देन से इनकार करना नियमों का उल्लंघन RBI ने दोहराया कि दुकानदार, परिवहन सेवाएं या कोई भी संस्था वैध सिक्कों को स्वीकार करने से मना नहीं कर सकती। ऐसा करना नियमों का उल्लंघन माना जाएगा। केंद्रीय बैंक ने लोगों से अफवाहों पर ध्यान न देने और केवल आधिकारिक सूचनाओं पर भरोसा करने की अपील की है। इस स्पष्टीकरण के बाद उम्मीद है कि बाजार और रोजमर्रा के लेन-देन में सिक्कों को लेकर बनी भ्रम की स्थिति दूर होगी।

यूपी में प्रदूषण नियंत्रण पर बड़ा कदम: विश्व बैंक देगा 2700 करोड़ रुपये की मदद

लखनऊ, 12 दिसंबर: उत्तर प्रदेश में प्रदूषित हवा को साफ करने के लिए राज्य सरकार को विश्व बैंक से बड़ी राहत मिली है। विश्व बैंक ने लगभग 30 करोड़ डॉलर (करीब 2700 करोड़ रुपये) की आर्थिक सहायता देने का फैसला किया है। यह धनराशि वर्ष 2030 तक विभिन्न चरणों में खर्च की जाएगी। राज्य सरकार इस राशि का उपयोग मुख्य रूप से परिवहन, कृषि और उद्योग क्षेत्रों में प्रदूषण कम करने वाली योजनाओं पर करेगी। इसमें साफ ईंधन को बढ़ावा देना, पराली प्रबंधन में सुधार, औद्योगिक क्षेत्रों में आधुनिक तकनीक लागू करना और शहरों में स्वच्छ परिवहन सुविधाएं विकसित करना शामिल होगा। सरकारी अधिकारियों का कहना है कि इस सहायता से प्रदूषण नियंत्रण के प्रयासों को नई गति मिलेगी और आने वाले वर्षों में प्रदेश में वायु गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार की उम्मीद है।

12 दिसंबर: रिटेल एम्पलॉयीज़ डे—क्यों मनाया जाता है और इसकी शुरुआत कैसे हुई?

नई दिल्ली , 11 दिसंबर: हर साल 12 दिसंबर को रिटेल एम्पलॉयीज़ डे मनाया जाता है। यह दिन उन सभी कर्मचारियों को समर्पित है जो दुकानों, सुपरमार्केट, मॉल, शोरूम और रिटेल चेन में काम करते हैं। इनकी मेहनत से ही हमें अपनी ज़रूरत की चीजें आसानी से मिल जाती हैं—कपड़ों से लेकर किराने तक और इलेक्ट्रॉनिक्स से लेकर दवाई तक। कैसे शुरू हुआ यह दिन? रिटेल एम्पलॉयीज़ डे की शुरुआत साल 2011 में नेशनल रिटेल फेडरेशन और विभिन्न रिटेल संगठनों ने मिलकर की थी। इसका उद्देश्य था—रिटेल कामगारों के योगदान को सामने लाना और उन्हें वह सम्मान देना, जिसका वे रोज़ हक़दार हैं। रिटेल सेक्टर में काम करने वालों का काम सिर्फ ग्राहक को सामान देना नहीं होता, बल्कि— स्टोर को खोलना–बंद करना स्टॉक संभालना ग्राहकों के सवालों और शिकायतों का समाधान कैश काउंटर की जिम्मेदारी त्योहारों और सेल सीजन में अतिरिक्त समय देना इन सभी जिम्मेदारियों को निभाने में ये कर्मचारी अक्सर अपनी छुट्टियाँ और त्यौहार भी त्याग देते हैं। 12 दिसंबर को ही क्यों चुना गया? इस तारीख के पीछे एक विशेष सोच है। दिसंबर का महीना रिटेल सेक्टर का सबसे व्यस्त महीना होता है—क्रिसमस, न्यू ईयर और विंटर सेल के कारण। ऐसे में 12 दिसंबर का दिन उन कर्मचारियों को धन्यवाद कहने का एक सुनहरा अवसर माना गया, क्योंकि वही इस पीक सीजन की असली रीढ़ होते हैं। इस दिन क्या होता है? कई कंपनियाँ 12 दिसंबर को अपने कर्मचारियों के लिए खास आयोजन करती हैं— धन्यवाद समारोह अवॉर्ड वितरण टीम इवेंट्स छोटे गिफ्ट या बोनस सोशल मीडिया कैंपेन कुछ ग्राहक भी इस दिन कर्मचारियों को “थैंक यू” कहकर या मुस्कुराकर उनका दिन खास बनाते हैं। रिटेल कर्मचारियों की असली भूमिका रिटेल कर्मचारी वह चेहरा हैं जिनसे ग्राहक सीधे जुड़ता है। वे किसी भी ब्रांड की पहली छवि बनाते हैं। उनकी वजह से— ग्राहक का अनुभव बेहतर होता है बिक्री बढ़ती है कंपनी की प्रतिष्ठा मजबूत होती है रिटेल सेक्टर भारत की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा है और इसमें करोड़ों लोग काम करते हैं। इसलिए यह दिन सिर्फ एक औपचारिकता नहीं बल्कि उनके बड़े योगदान का सम्मान है। क्यों है यह दिन महत्वपूर्ण? क्योंकि— रिटेल कर्मचारी रोज़ लंबे घंटे काम करते हैं कई बार तनावपूर्ण हालात में ग्राहकों को संभालते हैं त्योहारों और छुट्टियों में भी ड्यूटी पर रहते हैं ग्राहकों के लिए खरीदारी को आसान बनाते हैं इसलिए 12 दिसंबर हमें याद दिलाता है कि हर प्रोडक्ट, हर बिल और हर मुस्कान के पीछे किसी रिटेल कर्मचारी की मेहनत जुड़ी होती है।

कंपनी देसी, CEO विदेशी: भारत की उन एयरलाइंस पर एक नजर जिनकी कमान विदेशियों के हाथ में है – लिस्ट में टाटा का भी नाम

नई दिल्ली, 10 दिसंबर: भारत की एविएशन इंडस्ट्री आज तेजी से बदल रही है। एयर ट्रैवल बढ़ रहा है, नई टेक्नोलॉजी शामिल हो रही है और एयरलाइंस अपने संचालन को ग्लोबल स्टैंडर्ड पर ले जाने के लिए इंटरनेशनल टैलेंट पर दांव लगा रही हैं। खास बात यह है कि कई भारतीय एयरलाइंस की कमान अब विदेशी CEOs के हाथ में है—और इस सूची में टाटा समूह की बड़े ब्रांड भी शामिल है। 1. एयर इंडिया – कैंपबेल विल्सन (सिंगापुर) टाटा समूह के अधिग्रहण के बाद एयर इंडिया तेज़ी से ट्रांसफॉर्मेशन के दौर से गुजर रही है। कंपनी की बागडोर कैंपबेल विल्सन के हाथ में है, जो इससे पहले सिंगापुर एयरलाइंस और Scoot के साथ काम कर चुके हैं। उनका अनुभव एयर इंडिया के revival प्लान का अहम हिस्सा माना जा रहा है। 2. विस्तारा – विनोद कन्नन (सिंगापुर में जन्मे, अंतरराष्ट्रीय अनुभव वाले) टाटा और सिंगापुर एयरलाइंस के जॉइंट वेंचर विस्तारा की कमान भी एक ग्लोबल-एक्स्पोज़्ड CEO संभाल रहे हैं। विनोद कन्नन पहले Singapore Airlines के महत्वपूर्ण पदों पर रह चुके हैं और अब भारतीय मार्केट में प्रीमियम उड़ानों का मॉडल मजबूती से स्थापित कर रहे हैं। 3. इंडिगो – पीटर एल्बर्स (नीदरलैंड) भारत की सबसे बड़ी एयरलाइन इंडिगो का संचालन पीटर एल्बर्स देख रहे हैं, जो KLM Royal Dutch Airlines के शीर्ष पदों पर लम्बे समय तक रहे। उनके नेतृत्व में इंडिगो अंतरराष्ट्रीय रूट्स पर तेजी से विस्तार कर रही है। 4. आकासा एयर – विनय दुबे (अमेरिका में लंबे समय तक aviation अनुभव) हालांकि आकासा एयर पूरी तरह भारतीय कंपनी है, लेकिन इसके CEO विनय दुबे का अधिकतर अनुभव अमेरिकी एविएशन सिस्टम में रहा है। वे Delta और Jet Airways के साथ भी जुड़े रहे।

पीपीपी परियोजनाओं की ओर निजी क्षेत्र का आकर्षण बढ़ रहा है: निर्मला सीतारमण

नई दिल्ली, 03 अक्टूबर: वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने शुक्रवार को कहा कि पिछले पांच वर्षों से सरकार विकास परियोजनाओं के लिए पूंजीगत व्यय में लगातार बढोतरी कर रही है और अब निजी-सरकारी भागीदारी (पीपीपी) परियोजनाओं में निजी क्षेत्र का आकर्षण भी दिख रहा है। श्रीमती सीतारमण यहां चौथे कौटिल्य आर्थिक सम्मेलन (केईसी) का उद्घाटन भाषण देने के बाद एक सवाल का जवाब दे रही थीं। वित्त मंत्रालय के सहयोग से इंस्टिट्यूट ऑफ इकोनामिक ग्रोथ (आईईजी) द्वारा आयोजित ‘गहन वैश्विक अनिश्चिताओं के दौर में समृद्धि’ विषय पर तीन दिवसीय इस सम्मेलन में देश विदेश के अर्थशास्त्री, विशेषज्ञ, नीति निर्माता और वैश्विक संगठनों के प्रतिनिधि भाग ले रहे हैं। श्रीमती सीतारमण ने कहा कि इस समय पुरानी विश्व व्यवस्था के पैर की जमीन इतनी तेजी से खिसक रही है कि आगे क्या होगा, इसका सही अुमान लगाना कठिन है। पर उन्होंने कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था अपने बूते खड़ी है इसलिए इस दौर में भी इसका प्रदर्शन मजबूत है। उन्होंने सम्मेलन से ऐसे सुझाओं ओर सिफारिशों की उम्मीद की जिसमें ऐसी बहु ध्रुवीय व्यवस्था को मजबूत किया जा सके जो गलाकाट होड़ की जगह सहयोग को बढ़ाने वाली हो तथा भारत जैसा विकासशील देश नई विश्व व्यवस्था के आयाम तय करने में अपनी भूमिका भी निभा सकें। उन्होंने अपने संबोधन के बाद एक सवाल के जबाब में कहा कि भारत सकल घरेलू उत्पाद ( जीडीपी) का कितना प्रतिशत पूंजी निवेश पर खर्च करने का लक्ष्य रखता, इसके लिए वह कोई अंक प्रस्तुत करना ठीक नहीं मातनी पर पिछले पांच साल से सरकारी पूंजीगत निवेश में लगातार वृद्धि हो रही है। सरकारी पूंजीगत निवेश में महत्वपूर्ण वृद्धि हुई है। वित्त मंत्री ने कहा कि अब दिख रहा है कि निजी क्षेत्र भी पूंजी निवेश बढ़ाने में रूचि ले रहा है। पीपीपी परियोजनाओं के प्रति उसका आकर्षण दिखायी दे रहा है। श्रीमती सीतारमण ने यह भी कहा कि सरकार राज्यों को भी अपने-अपने क्षेत्र में अपनी जरूरत के हिसाब से विकास की परियोजाओं के विकास के लिए पूंजीगत व्यय के लिए मदद कर रही है। प्रयास है कि देश के हर क्षेत्र में निवेश बढे़। अपने संबोधन में वित्त मंत्री ने कहा, “…भू-राजनीतिक संघर्ष तेज़ हो रहे हैं। प्रतिबंध, प्रशुल्क और अलगाव की रणनीतियाँ वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को बदल रही हैं। इनसे जहां भारत की कुछ कमजोरियां उजागर हुई हैं वहीं देश की मजबूती भी उजागर हुई है। यह दिखा है कि झटकों को झेलने की हमारी क्षमता मज़बूत है।” उन्होंने कहा कि इन अनिश्चितताओं के बीच हमें चुनाव यह तय करना है कि हमारी यह मजबूती और जुझारूपन हमें विकसित हो रही नई बहुध्रुवीय व्यवस्था में हमारे नेतृत्व का आधार बनेगा या यह केवल अनिश्चितताओं के समक्ष सुरक्षा कवच की भूमिका में रहेगा। इसलिए निष्कर्षतः, इतिहास हमें सिखाता है कि संकट अक्सर नवीनीकरण से पहले आते हैं। श्रीमती सीतारमण ने कहा, “इस समय हम जो विखराव देख रहे हैं, वह सहयोग के अधिक स्थायी और अप्रत्याशित रूपों को जन्म दे सकता है। चुनौती यह सुनिश्चित करने की है कि समावेशी सिद्धांत के आधार पर सहयोग की नई व्यवस्थाओं को ढाला जा सके। विकासशील देशों के लिए, यह केवल एक रोमांटिक आकांक्षा नहीं बल्कि आवश्यकता है। वित्त मंत्री ने कहा, “हम अभूतपूर्व परिवर्तनों और अनिश्चितताओं के इस दौर में हाथ-पर हाथ धर कर बैठने का जोखिम नहीं उठा सकते। ऐसी दुनिया में घटना कहीं भी हो, फैसले कहीं भी हों वे हमारी नियति निर्धारित करते हैं, इस लिए हमें उनमें सक्रिय भागीदार बनना होगा, जहाँ संभव हो परिणामों को आकार देना होगा और जहाँ आवश्यक हो, अपनी स्वायत्तता की हिफाजत करनी होगी।”