विशेष रिपोर्ट : दुनिया के कारोबारी इतिहास में कुछ रातें ऐसी होती हैं जो सब कुछ बदल देती हैं। ऐसी ही एक रात ने एलन मस्क को एक बार फिर दुनिया का सबसे अमीर आदमी बना दिया। एक बड़े कॉर्पोरेट विलय (Merger) ने न सिर्फ टेक इंडस्ट्री को हिला दिया, बल्कि मस्क की निजी संपत्ति में 84 अरब डॉलर का ज़बरदस्त उछाल ला दिया। 1.25 ट्रिलियन डॉलर की कंपनी, और बढ़ती दौलत इस ऐतिहासिक विलय के बाद संबंधित कंपनी की कुल वैल्यू 1.25 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गई। जैसे ही बाज़ार खुला, शेयरों में तेज़ उछाल देखने को मिला और उसका सीधा फायदा एलन मस्क को हुआ, जिनकी बड़ी हिस्सेदारी इस कंपनी में पहले से मौजूद थी। विशेषज्ञों के मुताबिक, यह बढ़त सामान्य नहीं थी—बल्कि यह अब तक के सबसे बड़े एक-दिवसीय वेल्थ जंप्स में से एक मानी जा रही है। एक रात में 84 अरब डॉलर कैसे जुड़े? एलन मस्क की संपत्ति का बड़ा हिस्सा नकद नहीं, बल्कि शेयरों और इक्विटी में है। जैसे ही विलय की खबर पब्लिक हुई— शेयर कीमतों में रिकॉर्ड उछाल आया निवेशकों का भरोसा कई गुना बढ़ा मार्केट कैप में ऐतिहासिक वृद्धि दर्ज हुई नतीजा? मस्क की नेटवर्थ में एक ही रात में 84 अरब डॉलर का इज़ाफा। अरबपतियों की रेस में फिर नंबर वन इस उछाल के साथ ही एलन मस्क ने दुनिया के अन्य दिग्गज अरबपतियों को पीछे छोड़ दिया। कुछ समय से टॉप पोज़िशन पर बदलाव देखा जा रहा था, लेकिन इस डील ने मस्क को फिर से पहले पायदान पर पहुंचा दिया। टेक इंडस्ट्री में मस्क का दबदबा एलन मस्क सिर्फ एक बिज़नेसमैन नहीं, बल्कि टेक और इनोवेशन की दुनिया में ट्रेंडसेटर माने जाते हैं। इलेक्ट्रिक कार, स्पेस टेक्नोलॉजी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सोशल मीडिया—हर क्षेत्र में उनकी मौजूदगी निवेशकों को आकर्षित करती है। यही वजह है कि किसी भी बड़े फैसले या विलय का असर सीधे उनके नेटवर्थ पर पड़ता है। क्या यह दौलत टिकेगी? बाज़ार विशेषज्ञ मानते हैं कि इतनी बड़ी वेल्थ का बने रहना बाज़ार की स्थिरता, कंपनी के प्रदर्शन और भविष्य की रणनीति पर निर्भर करेगा। हालांकि, एलन मस्क का ट्रैक रिकॉर्ड बताता है कि वह जोखिम लेते हैं—और अक्सर इतिहास रचते हैं। एक विलय, एक रात, और 84 अरब डॉलर की छलांग—एलन मस्क ने एक बार फिर साबित कर दिया कि आधुनिक दौर में दौलत सिर्फ पैसे से नहीं, बल्कि विजन, टेक्नोलॉजी और बाज़ार के भरोसे से बनती है।
आर्थिक अनुशासन से लेकर सामाजिक सशक्तिकरण तक, निर्मला सीतारमण का 9वां बजट विकास का रोडमैप
नई दिल्ली। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने रविवार को संसद में वित्त वर्ष 2026-27 का केंद्रीय बजट पेश किया। यह उनका लगातार नौवां बजट रहा, जिसमें सरकार की आर्थिक स्थिरता, समावेशी विकास और दीर्घकालिक सुधारों की स्पष्ट झलक देखने को मिली। बजट भाषण में उन्होंने आर्थिक अनुशासन, सामाजिक सशक्तिकरण, स्वास्थ्य, रियल एस्टेट, इंफ्रास्ट्रक्चर और कर सुधारों पर विशेष जोर दिया। बजट पेश करते समय वित्त मंत्री तमिलनाडु की पारंपरिक पर्पल रंग की ‘कट्टम कांजीवरम सिल्क साड़ी’ में नजर आईं। यह साड़ी भारतीय हैंडलूम और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक मानी जाती है। राजनीतिक गलियारों में इसे तमिलनाडु में प्रस्तावित विधानसभा चुनावों के मद्देनज़र एक सांकेतिक संदेश के रूप में भी देखा जा रहा है। राजकोषीय अनुशासन पर सरकार का फोकस वित्त मंत्री ने बताया कि FY 2027 में राजकोषीय घाटा GDP का 4.3 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जबकि कर्ज-से-GDP अनुपात 55.6 प्रतिशत रहने की संभावना जताई गई है। उन्होंने दोहराया कि सरकार राजकोषीय घाटे को 4.5 प्रतिशत से नीचे लाने के लक्ष्य की ओर मजबूती से आगे बढ़ रही है। यह संकेत देता है कि सरकार विकास और वित्तीय अनुशासन के बीच संतुलन बनाए रखना चाहती है। कर सुधार: छोटे करदाताओं को राहत बजट में करदाताओं के लिए बड़ी राहत की घोषणा की गई। वित्त मंत्री ने कहा कि नया आयकर कानून 1 अप्रैल 2026 से लागू होगा, जिससे टैक्स सिस्टम और प्रक्रियाएं सरल, पारदर्शी और करदाता-अनुकूल बनेंगी। इसके साथ ही आईटी सेवाओं के लिए समान सेफ हार्बर मार्जिन लागू करने और इसकी सीमा 2000 करोड़ रुपये तक बढ़ाने का प्रस्ताव रखा गया, जिससे स्टार्टअप्स और आईटी कंपनियों को अनुपालन में आसानी मिलेगी। विदेशी शिक्षा और इलाज हुआ सस्ता विदेश में पढ़ाई और मेडिकल ट्रीटमेंट कराने वालों के लिए सरकार ने बड़ी राहत दी है। लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम (LRS) के तहत शिक्षा और मेडिकल खर्च पर लगने वाला TCS 5% से घटाकर 2% कर दिया गया है। इससे मध्यम वर्ग और छात्रों पर वित्तीय बोझ कम होगा। रियल एस्टेट को नई रफ्तार रियल एस्टेट सेक्टर के लिए बजट में REITs (रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट्स) के जरिए एसेट रीसाइक्लिंग को बढ़ावा देने की घोषणा की गई। इससे डेवलपर्स और सरकारी संस्थाएं अपनी निष्क्रिय संपत्तियों को मॉनेटाइज कर नई परियोजनाओं में निवेश कर सकेंगी। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे नकदी प्रवाह सुधरेगा और निवेशकों का भरोसा मजबूत होगा। स्वास्थ्य क्षेत्र में ऐतिहासिक पहल स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए बजट में ₹10,000 करोड़ की ‘बायोफार्मा शक्ति योजना’ की घोषणा की गई। इस योजना के तहत कैंसर, डायबिटीज और ऑटो-इम्यून बीमारियों से जुड़ी दवाओं के स्वदेशी उत्पादन को बढ़ावा दिया जाएगा। इसका उद्देश्य भारत को फार्मा सेक्टर में आत्मनिर्भर बनाना और इलाज को सस्ता करना है। सामाजिक योजनाएं और ग्रामीण विकास बजट में कई नई और मौजूदा योजनाओं को विस्तार दिया गया, जिनमें शामिल हैं: नेशनल डेस्टिनेशन डिजिटल नॉलेज ग्रिड लखपति दीदी योजना दिव्यांगजन कौशल एवं सहारा योजना पशुधन उद्यमों का आधुनिकीकरण तटीय क्षेत्रों में काजू, नारियल और चंदन उत्पादन को बढ़ावा इन योजनाओं का मकसद ग्रामीण अर्थव्यवस्था, महिला सशक्तिकरण और रोजगार सृजन को मजबूती देना है। वाराणसी को मिली हाई-स्पीड रेल की सौगात बजट में वाराणसी के लिए एक बड़ी सौगात का ऐलान किया गया। शहर को हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर से जोड़ने की घोषणा की गई है। देश में प्रस्तावित **सात हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर में से दो वाराणसी से जुड़े होंगे, जिससे पूर्वांचल और आसपास के क्षेत्रों में आर्थिक और औद्योगिक विकास को नई गति मिलने की उम्मीद है। कुल मिलाकर, बजट 2026-27 को आर्थिक स्थिरता, सामाजिक न्याय और भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया बजट माना जा रहा है, जो भारत की विकास यात्रा को अगले चरण में ले जाने का रोडमैप पेश करता है।
अदाणी ग्रुप की तीन कंपनियों को ग्लोबल रेटिंग, भारतीय इंफ्रास्ट्रक्चर की बढ़ी साख
नई दिल्ली/टोक्यो: जापान की दिग्गज क्रेडिट रेटिंग एजेंसी JCR (Japan Credit Rating Agency) ने अदाणी ग्रुप की तीन प्रमुख कंपनियों—अदाणी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन (APSEZ), अदाणी ग्रीन एनर्जी (AGEL) और अदाणी एनर्जी सॉल्यूशंस (AESL)—को जो रेटिंग दी है, वह न सिर्फ समूह के लिए बल्कि भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर के लिए भी एक अहम उपलब्धि मानी जा रही है। वैश्विक निवेशकों के बीच भारत की परियोजनाओं की विश्वसनीयता और फाइनेंशियल स्ट्रेंथ को यह कदम नई पहचान देता है। अदाणी पोर्ट्स का कमाल: सॉवरेन रेटिंग से भी ऊपर इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ी उपलब्धि Adani Ports & SEZ Ltd (APSEZ) के नाम रही। JCR ने कंपनी को ‘A-’ (स्टेबल आउटलुक) की रेटिंग दी है। आमतौर पर किसी भी देश की कंपनियों की रेटिंग, उस देश की सॉवरेन रेटिंग से ऊपर नहीं जाती—लेकिन अदाणी पोर्ट्स ने इस परंपरा को तोड़ते हुए भारत की सॉवरेन रेटिंग से एक पायदान ऊपर की रेटिंग हासिल की है। रेटिंग एजेंसी के मुताबिक, इसके पीछे कंपनी का मजबूत और स्थिर कैश-फ्लो, विशाल एसेट बेस और ग्लोबल पोर्टफोलियो प्रमुख वजहें हैं। अदाणी पोर्ट्स के पास कुल 19 पोर्ट्स का नेटवर्क है—15 भारत में और 4 अंतरराष्ट्रीय स्तर पर। कंपनी भारत के लगभग 30% कार्गो और 50% कंटेनर वॉल्यूम को संभालती है, जो इसकी ऑपरेशनल मजबूती और बाजार में पकड़ को दर्शाता है। ग्रीन एनर्जी और पावर ट्रांसमिशन में भी भरोसा अदाणी ग्रुप की अन्य दो कंपनियों—अदाणी ग्रीन एनर्जी (AGEL) और अदाणी एनर्जी सॉल्यूशंस (AESL)—को भी JCR ने ‘BBB+’ (स्टेबल) रेटिंग दी है, जो भारत की सॉवरेन रेटिंग के बराबर मानी जाती है। रेटिंग एजेंसी ने दोनों कंपनियों के मजबूत EBITDA, दीर्घकालिक पावर परचेज एग्रीमेंट्स, और तेज़ी से हो रहे विस्तार को रेटिंग का आधार बताया है। रिन्यूएबल एनर्जी और पावर ट्रांसमिशन जैसे भविष्य के सेक्टर्स में इन कंपनियों की बढ़ती मौजूदगी, भारत के ऊर्जा परिवर्तन लक्ष्यों को भी मजबूती देती है। निवेशकों के लिए क्या मायने? JCR की यह रेटिंग्स अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के लिए एक सकारात्मक संकेत हैं। इससे न केवल अदाणी ग्रुप की फंड जुटाने की क्षमता मजबूत होगी, बल्कि भारतीय इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में वैश्विक पूंजी का भरोसा भी बढ़ेगा। कुल मिलाकर, जापान की प्रतिष्ठित एजेंसी की यह मुहर बताती है कि भारतीय कंपनियां अब ग्लोबल बेंचमार्क पर खड़ी होकर प्रतिस्पर्धा कर रही हैं—और अदाणी ग्रुप इस बदलाव की अग्रिम पंक्ति में है।
भारत का UPI: अब सिर्फ एक ऐप नहीं, बल्कि ग्लोबल डिजिटल पावर
जिस डिजिटल क्रांति ने भारत की गलियों, ठेलों और छोटे दुकानों को कैशलेस बना दिया, वही यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) अब अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की तकनीकी ताकत का प्रतीक बनता जा रहा है। हाल ही में जापान में UPI के ट्रायल की शुरुआत ने यह साफ कर दिया है कि भारत का डिजिटल पेमेंट सिस्टम अब केवल घरेलू जरूरत नहीं, बल्कि वैश्विक समाधान के रूप में देखा जा रहा है। दुकान से दुनिया तक का सफ़र कुछ साल पहले तक भारत में डिजिटल पेमेंट को लेकर संदेह था—इंटरनेट, स्मार्टफोन और सुरक्षा को लेकर सवाल उठते थे। लेकिन UPI ने इन तमाम आशंकाओं को पीछे छोड़ दिया। आज सब्ज़ी वाले से लेकर बड़े मॉल, टैक्सी ड्राइवर से लेकर ऑनलाइन शॉपिंग तक—एक QR कोड और मोबाइल फोन ने लेन-देन की पूरी तस्वीर बदल दी है। UPI की सबसे बड़ी ताकत उसकी सरलता, रफ्तार और भरोसा है। बिना कार्ड, बिना वॉलेट और बिना लंबी प्रक्रिया—सीधे बैंक से बैंक ट्रांजैक्शन। यही मॉडल अब दुनिया को आकर्षित कर रहा है। जापान में ट्रायल: भारत की टेक्नोलॉजी को वैश्विक मान्यता जापान जैसे तकनीकी रूप से उन्नत देश में UPI का ट्रायल शुरू होना अपने आप में बड़ी बात है। यह संकेत है कि भारत का डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर अब केवल “यूज़र बेस” के कारण नहीं, बल्कि टेक्नोलॉजिकल क्वालिटी और स्केलेबिलिटी के कारण अपनाया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह ट्रायल सफल रहता है, तो भविष्य में भारतीय पर्यटक जापान में भी उसी तरह UPI से भुगतान कर सकेंगे, जैसे वे भारत में करते हैं—बिना करेंसी एक्सचेंज की झंझट के। डिजिटल डिप्लोमेसी का नया चेहरा UPI अब सिर्फ एक पेमेंट सिस्टम नहीं रहा। यह भारत की डिजिटल डिप्लोमेसी का अहम हिस्सा बन चुका है। पहले जहां भारत सॉफ्टवेयर सर्विसेज के लिए जाना जाता था, अब वह डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) के लिए पहचाना जा रहा है। आज कई देश भारत के UPI मॉडल को अपनाने या उससे सीखने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। यह भारत के लिए आर्थिक ही नहीं, रणनीतिक बढ़त भी है।
भारत-यूरोप के बीच ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ पर मुहर: 90% टैरिफ खत्म
सस्ती होगी वाइन-बीयर से लेकर खुलेगा भारतीय निर्यात का महाद्वार नई दिल्ली/गोवा: करीब दो दशकों के इंतज़ार, लंबी कूटनीतिक बातचीत और कई दौर की अड़चनों के बाद आखिरकार भारत और यूरोपीय यूनियन (EU) के बीच ऐतिहासिक फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) पर मुहर लग गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन के बीच यह बहुप्रतीक्षित समझौता साइन हुआ है, जिसे आर्थिक जानकार ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ बता रहे हैं। इस डील के तहत यूरोपीय यूनियन से आने वाले करीब 90 फीसदी उत्पादों पर टैरिफ या तो पूरी तरह खत्म कर दिया गया है या फिर चरणबद्ध तरीके से काफी कम किया जाएगा। इसका सीधा असर आम उपभोक्ता से लेकर उद्योग जगत तक देखने को मिलेगा। क्या है इस ऐतिहासिक डील की सबसे बड़ी खासियत? भारत-EU ट्रेड डील दुनिया के सबसे बड़े आर्थिक समझौतों में से एक मानी जा रही है। पीएम मोदी के मुताबिक, यह समझौता ग्लोबल GDP के करीब 25 फीसदी और वैश्विक व्यापार के लगभग एक-तिहाई हिस्से को कवर करता है। यानी भारत और यूरोप के बीच कारोबार न सिर्फ तेज़ होगा, बल्कि दोनों अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे के लिए और ज्यादा अहम बन जाएंगी। आम आदमी को क्या मिलेगा फायदा? इस डील का असर सीधे आपकी जेब पर भी पड़ेगा— यूरोप से आने वाली बीयर और वाइन सस्ती होंगी, क्योंकि इन पर लगने वाला भारी-भरकम टैरिफ घटा दिया गया है। लग्ज़री प्रोडक्ट्स, हाई-एंड मशीनरी और टेक्नोलॉजी से जुड़े कई सामान अब पहले से कम कीमत पर उपलब्ध हो सकते हैं। प्रतिस्पर्धा बढ़ने से घरेलू बाजार में क्वालिटी बेहतर होने की उम्मीद है। भारतीय उद्योग के लिए खुले नए दरवाज़े इस फ्री ट्रेड एग्रीमेंट से भारत के कई प्रमुख सेक्टरों को बड़ा बूस्ट मिलने वाला है— टेक्सटाइल और रेडीमेड गारमेंट्स जेम्स और ज्वेलरी लेदर और फुटवियर मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर इन सेक्टरों को यूरोपीय बाजार में आसान पहुंच मिलेगी, जहां अब तक सख्त नियम और ऊंचे टैरिफ बड़ी चुनौती थे। India Energy Week से पीएम मोदी का संदेश गोवा में आयोजित India Energy Week के दौरान पीएम मोदी ने वर्चुअल संबोधन में इस डील को भारत की वैश्विक आर्थिक ताकत का प्रमाण बताया। उन्होंने कहा— भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बन रहा है। भारत पेट्रोलियम उत्पादों के टॉप-5 एक्सपोर्टर्स में शामिल है। आज भारत 150 से ज्यादा देशों को पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात कर रहा है। पीएम मोदी के मुताबिक, यह डील भारत की ‘मेक इन इंडिया’ और ‘वोकल फॉर लोकल’ रणनीति को ग्लोबल प्लेटफॉर्म देगी। यह समझौता सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं है। भारत और यूरोप के बीच रणनीतिक साझेदारी, सप्लाई चेन की मजबूती और जियो-पॉलिटिकल संतुलन में भी इसकी अहम भूमिका होगी। खासकर ऐसे समय में जब दुनिया आर्थिक अनिश्चितताओं और वैश्विक तनावों से गुजर रही है भारत-EU फ्री ट्रेड एग्रीमेंट न सिर्फ एक आर्थिक समझौता है, बल्कि यह भारत की वैश्विक पहचान को और मजबूत करने वाला कदम है। सस्ती विदेशी चीज़ें, मज़बूत निर्यात, नए रोज़गार और उद्योगों को रफ्तार—इस डील से फायदा हर स्तर पर दिखेगा। यही वजह है कि इसे सही मायनों में ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ कहा जा रहा है।
74वें इंडिया इंटरनेशनल गारमेंट फेयर का भव्य शुभारंभ, 2030 तक 40 अरब डॉलर निर्यात का लक्ष्य
नई दिल्ली/गुरुग्राम : केंद्रीय वस्त्र मंत्री श्री गिरिराज सिंह ने 23 जनवरी 2026 को यशोभूमि, द्वारका (नई दिल्ली) में इंडिया इंटरनेशनल गारमेंट फेयर (IIGF) के 74वें संस्करण का भव्य उद्घाटन किया। इस अवसर पर देश-विदेश से आए सैकड़ों प्रदर्शक, अंतरराष्ट्रीय खरीदार और उद्योग जगत के प्रमुख प्रतिनिधि उपस्थित रहे। उद्घाटन समारोह में दीप प्रज्वलन, फेयर गाइड का विमोचन तथा मंत्री का संबोधन शामिल रहा। उद्घाटन के बाद मंत्री ने विभिन्न स्टॉलों का निरीक्षण भी किया। अपने संबोधन में केंद्रीय वस्त्र मंत्री श्री गिरिराज सिंह ने कहा कि इंडिया इंटरनेशनल गारमेंट फेयर आज अंतरराष्ट्रीय परिधान खरीदारों के लिए एक भरोसेमंद और सशक्त वैश्विक मंच बन चुका है। उन्होंने कहा कि यह उनके लिए सौभाग्य की बात है कि वे लगातार दूसरे वर्ष इस प्रतिष्ठित आयोजन का हिस्सा बने हैं। मंत्री ने बताया कि पिछले एक दशक में भारतीय वस्त्र एवं परिधान क्षेत्र ने अभूतपूर्व प्रगति की है। वर्ष 2013-14 में जहां इस क्षेत्र का बाजार आकार 8.4 लाख करोड़ रुपये था, वहीं आज यह बढ़कर लगभग 16 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। घरेलू बाजार भी 6 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2025 में 13 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। उन्होंने कहा कि महामारी के बाद भारत के वस्त्र निर्यात में 25 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है और यह क्षेत्र रोजगार सृजन का एक प्रमुख माध्यम बन गया है। श्री गिरिराज सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार ने वस्त्र उद्योग से जुड़े सभी प्रमुख अवरोधों को दूर किया है। QCO सुधार, RoDTEP और RoSCTL में वृद्धि, आयात शुल्क में अस्थायी कटौती, इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर का समाधान जैसे कदम उठाए गए हैं। उन्होंने बताया कि सरकार ने इन योजनाओं के माध्यम से उद्योग को अब तक 50,000 करोड़ रुपये से अधिक का समर्थन दिया है। मंत्री ने यह भी कहा कि वैश्विक चुनौतियों के बावजूद भारत का वस्त्र उद्योग मजबूती से आगे बढ़ रहा है। निर्यात विविधीकरण के तहत भारत ने 40 नए देशों में अपने उत्पादों की पहुंच बढ़ाई है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि अर्जेंटीना में 77%, मिस्र में 30%, पोलैंड और जापान में 20%, जबकि स्वीडन और फ्रांस में 10% की वृद्धि दर्ज की गई है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि भारत–यूरोपीय संघ (EU) मुक्त व्यापार समझौता शीघ्र ही संपन्न होने वाला है, जिससे भारतीय निर्यातकों को बड़ा लाभ मिलेगा। मंत्री ने आत्मनिर्भर भारत के दृष्टिकोण को रेखांकित करते हुए कहा कि भारत अब विदेशी मानकों पर निर्भर रहने के बजाय VisionNxt और IndiaSize जैसी स्वदेशी पहलों के माध्यम से अपने स्वयं के डिजाइन और साइज मानक विकसित कर रहा है। उन्होंने उद्योग से भारतीय मानकों को अपनाने की अपील की। इस अवसर पर AEPC (अपैरल एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल) के चेयरमैन डॉ. ए. शक्तिवेल ने कहा कि IIGF का 74वां संस्करण भारत के प्रति वैश्विक विश्वास का प्रमाण है। इस संस्करण में 233 प्रदर्शक, 5,073 वर्ग मीटर क्षेत्रफल में फैले हुए हैं और 1,120 से अधिक पंजीकृत अंतरराष्ट्रीय खरीदार भाग ले रहे हैं। देश के विभिन्न हिस्सों से आए प्रदर्शक भारत की मजबूत विनिर्माण क्षमता को दर्शाते हैं। डॉ. शक्तिवेल ने बताया कि चुनौतीपूर्ण वैश्विक परिस्थितियों के बावजूद भारतीय रेडीमेड गारमेंट (RMG) उद्योग ने उल्लेखनीय लचीलापन दिखाया है। अप्रैल से दिसंबर 2025-26 के दौरान भारत का परिधान निर्यात **11.58 अरब अमेरिकी डॉलर रहा, जो पिछले वर्ष की तुलना में 2.4 प्रतिशत अधिक है। उन्होंने सरकार के समक्ष उद्योग की कुछ प्रमुख मांगें भी रखीं, जिनमें अमेरिका के लिए फोकस मार्केट स्कीम, ब्याज समानीकरण योजना की सीमा बढ़ाना, 5% ब्याज सबवेंशन जैसी मांगें शामिल हैं। उन्होंने कहा कि इससे विशेष रूप से MSME निर्यातकों को बड़ी राहत मिलेगी। डॉ. शक्तिवेल ने यह भी बताया कि इस संस्करण में यूएई, जापान, फ्रांस, इटली, रूस, दक्षिण अफ्रीका, सऊदी अरब, कोरिया, स्पेन, मॉरीशस और इजराइल सहित कई देशों के प्रमुख ब्रांड और रिटेल चेन के खरीदार शामिल हुए हैं, जो भारत की डिजाइन, गुणवत्ता, अनुपालन और समयबद्ध डिलीवरी पर बढ़ते भरोसे को दर्शाता है। भविष्य को लेकर आशावाद जताते हुए उन्होंने कहा कि भारत–EU FTA और प्रतिस्पर्धी देशों को मिलने वाली वरीयताओं में कमी से भारत को बड़ा लाभ मिलेगा। उन्होंने विश्वास जताया कि 2030 तक 40 अरब डॉलर के परिधान निर्यात लक्ष्य को भारत अवश्य हासिल करेगा। कार्यक्रम के अंत में IGFA के उपाध्यक्ष श्री राकेश वैद ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया और इस सफल आयोजन के लिए सभी सहभागियों की सराहना की।
खाद खरीद में बड़ा बदलाव: डिजिटल फार्मर आईडी से होगी बिक्री, सब्सिडी पर कसेगा शिकंजा
नई दिल्ली | केंद्र सरकार खाद बिक्री व्यवस्था को पारदर्शी, आसान और सुव्यवस्थित बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाने की तैयारी में है। इसके तहत सरकार डिजिटल फार्मर आईडी (Farmer ID) को खाद खरीद से जोड़ने पर गंभीरता से विचार कर रही है। यह वही डिजिटल पहचान है, जिसका उपयोग किसान पीएम किसान सम्मान निधि योजना में पंजीकरण के लिए करते हैं। सूत्रों के मुताबिक, आने वाले समय में खाद की खरीद के लिए किसान की डिजिटल आईडी अनिवार्य की जा सकती है, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि सरकारी सब्सिडी का लाभ वास्तविक और पात्र किसानों तक ही पहुंचे। क्या है डिजिटल फार्मर आईडी? डिजिटल फार्मर आईडी किसानों की एक यूनिक पहचान होगी, जिसमें उनकी जमीन, फसल, बोवाई पैटर्न और सरकारी योजनाओं से जुड़ी जानकारी दर्ज रहेगी। सरकार तेजी से देशभर में किसानों की यह आईडी बनाने पर काम कर रही है। कुछ राज्यों में पहले ही पीएम किसान योजना का लाभ लेने के लिए किसान आईडी जरूरी कर दी गई है। अब इसी आईडी को खाद बिक्री से जोड़ने की योजना है। पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर शुरुआत सरकारी सूत्रों के अनुसार, इस योजना को फिलहाल पायलट प्रोजेक्ट के रूप में लागू किया जाएगा। इसके जरिए यह परखा जाएगा कि डिजिटल आईडी के माध्यम से खाद वितरण कितना प्रभावी और पारदर्शी बन सकता है। सरकार का मानना है कि इस व्यवस्था से: फर्जी खरीद पर रोक लगेगी कालाबाजारी कम होगी जरूरत से ज्यादा खाद उठाव पर नियंत्रण होगा यूरिया सब्सिडी का बढ़ता बोझ खाद सुधार की इस कवायद के पीछे एक बड़ी वजह तेजी से बढ़ती फर्टिलाइजर सब्सिडी भी है। वित्त वर्ष 2026 (FY26) के लिए सरकार ने खाद सब्सिडी पर ₹1.68 ट्रिलियन खर्च का अनुमान लगाया है, लेकिन यह आंकड़ा बढ़कर ₹1.91 ट्रिलियन तक पहुंच सकता है। इसका मुख्य कारण है: यूरिया की रिकॉर्ड खपत बढ़ती अंतरराष्ट्रीय कीमतें घरेलू मांग में लगातार इजाफा यूरिया की रिकॉर्ड खपत आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल से दिसंबर 2025 के बीच यूरिया की खपत 31.15 मिलियन टन तक पहुंच चुकी है। यह 2024 की इसी अवधि की तुलना में करीब 4 प्रतिशत ज्यादा है। विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल फार्मर आईडी के जरिए सरकार यह ट्रैक कर सकेगी कि किस किसान को कितनी खाद की वास्तविक जरूरत है। यदि यह प्रयोग सफल रहा, तो आने वाले समय में: सभी खाद बिक्री केंद्रों पर Farmer ID अनिवार्य हो सकती है सब्सिडी सीधे किसान प्रोफाइल से जुड़ सकती है कृषि योजनाओं में पारदर्शिता और नियंत्रण बढ़ेगा सरकार का यह कदम न सिर्फ सब्सिडी के बोझ को संतुलित करने में मदद कर सकता है, बल्कि खेती को डेटा-आधारित और आधुनिक बनाने की दिशा में भी अहम साबित हो सकता है।
रिलायंस का बड़ा माइलस्टोन: क्विक कॉमर्स और FMCG बिजनेस पहली बार मुनाफे में, अंबानी के रिटेल साम्राज्य को नई रफ्तार
नई दिल्ली : देश की सबसे बड़ी निजी कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (RIL) ने अपने कंज्यूमर बिजनेस में एक अहम उपलब्धि हासिल कर ली है। कंपनी ने बताया है कि उसके दो सबसे बड़े उपभोक्ता कारोबार—क्विक कॉमर्स और फास्ट-मूविंग कंज्यूमर गुड्स (FMCG) अब कमाई करने लगे हैं। यह उपलब्धि बड़े पैमाने पर सोर्सिंग, ऑपरेशनल एफिशिएंसी और हाई-मार्जिन प्रोडक्ट कैटेगरी पर फोकस का नतीजा मानी जा रही है। क्विक कॉमर्स: लॉन्च के एक साल के भीतर ब्रेक-ईवन अक्टूबर 2024 में लॉन्च किया गया रिलायंस का क्विक कॉमर्स बिजनेस अब लगभग हर ऑर्डर पर मुनाफा कमा रहा है। कंपनी के अनुसार, इस सेगमेंट का कंट्रीब्यूशन मार्जिन पॉजिटिव हो चुका है, जो किसी भी नए डिजिटल रिटेल मॉडल के लिए बड़ी उपलब्धि मानी जाती है। विशेषज्ञों के मुताबिक, रिलायंस ने इस सेगमेंट में: * अपने विशाल सप्लाई चेन नेटवर्क * लोकल स्टोर इंटीग्रेशन * डेटा-ड्रिवन इन्वेंट्री मैनेजमेंट का बेहतर इस्तेमाल किया, जिससे डिलीवरी लागत घटी और प्रति ऑर्डर मार्जिन सुधरा। FMCG बिजनेस: EBITDA से पहले कमाई में पॉजिटिव रिलायंस ने करीब तीन साल पहले FMCG सेक्टर में कदम रखा था, जहां शुरुआत में भारी निवेश और ब्रांड बिल्डिंग पर जोर रहा। अब कंपनी ने बताया है कि यह कारोबार EBITDA (ब्याज, टैक्स, डेप्रिसिएशन और अमॉर्टाइजेशन से पहले) स्तर पर पॉजिटिव हो गया है। इस सफलता के पीछे प्रमुख कारण बताए जा रहे हैं: * बड़े पैमाने पर कच्चे माल की सोर्सिंग * अपने रिटेल नेटवर्क के जरिए सीधे उपभोक्ताओं तक पहुंच * प्राइवेट लेबल और हाई-मार्जिन प्रोडक्ट्स पर फोकस रिटेल सेक्टर में रिलायंस की मजबूत पकड़ चेयरमैन मुकेश अंबानी, जो एशिया के सबसे अमीर व्यक्ति हैं, लंबे समय से रिटेल और कंज्यूमर बिजनेस को रिलायंस के भविष्य का अहम स्तंभ बताते रहे हैं। क्विक कॉमर्स और FMCG में मुनाफे की शुरुआत इस रणनीति की सफलता का संकेत है।
Fastag New Rule: 1 अप्रैल से टोल टैक्स में बड़ा बदलाव, कैश पूरी तरह बंद; MLFF सिस्टम से होगी बिना रुके वसूली
नई दिल्ली। देशभर में हाईवे पर सफर करने वालों के लिए 1 अप्रैल 2026 से टोल टैक्स व्यवस्था पूरी तरह बदलने जा रही है। केंद्र सरकार मल्टी लेन फ्री फ्लो (MLFF) टोल सिस्टम लागू करने की तैयारी में है, जिसके तहत अब टोल प्लाजा पर कैश से भुगतान पूरी तरह बंद कर दिया जाएगा। यानी वाहन चालकों को हर हाल में FASTag या डिजिटल माध्यम से ही टोल देना होगा। सरकार का दावा है कि इस बदलाव से टोल प्लाजा पर लगने वाली लंबी कतारों, समय की बर्बादी और ईंधन की खपत में बड़ी कमी आएगी। साथ ही टोल कलेक्शन और ज्यादा पारदर्शी और तकनीक आधारित हो जाएगा। क्या है MLFF टोल सिस्टम? MLFF यानी Multi Lane Free Flow एक एडवांस्ड टोल वसूली प्रणाली है। इसमें टोल प्लाजा पर वाहन को रुकने की जरूरत नहीं होगी। * हाईवे पर लगे ANPR कैमरे (Automatic Number Plate Recognition) * और FASTag रीडर वाहन की पहचान कर सीधे बैंक अकाउंट या FASTag वॉलेट से टोल काट लेंगे। कैश लेन-देन क्यों हो रहा है बंद? सरकार के मुताबिक— * कैश लेन-देन से टोल प्लाजा पर जाम लगता है * मानव त्रुटि और टैक्स चोरी की आशंका रहती है * डिजिटल भुगतान से कलेक्शन तेज और रिकॉर्ड साफ रहता है इसी वजह से 1 अप्रैल 2026 से कैश लेन पूरी तरह खत्म की जा रही है। FASTag न होने पर क्या होगा? अगर किसी वाहन में FASTag नहीं है या वह काम नहीं कर रहा— * तो उस वाहन पर भारी जुर्माना लगाया जा सकता है * भविष्य में सीधे ई-चालान या वाहन मालिक के रजिस्टर्ड अकाउंट से टोल वसूली की व्यवस्था भी लागू हो सकती है आम लोगों को क्या फायदा? * टोल प्लाजा पर रुकना नहीं पड़ेगा * सफर होगा तेज और स्मूथ * ईंधन की बचत और प्रदूषण में कमी * टोल भुगतान में पारदर्शिता सरकार की तैयारी केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के अनुसार— * पहले चरण में चुनिंदा नेशनल हाईवे पर MLFF लागू होगा * इसके बाद पूरे देश में इसे चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाएगा क्या करना चाहिए वाहन चालकों को? * समय रहते FASTag जरूर लगवाएं * FASTag को बैंक अकाउंट से लिंक रखें * वॉलेट में पर्याप्त बैलेंस बनाए रखें 1 अप्रैल 2026 से टोल टैक्स सिस्टम पूरी तरह डिजिटल और हाईटेक होने जा रहा है। कैश भुगतान का दौर खत्म होगा और FASTag/MLFF देश के हाईवे सफर को नया रूप देगा। ऐसे में वाहन चालकों के लिए अभी से तैयारी करना जरूरी है।
टैरिफ टकराव की आग: अमेरिकी दालों पर भारत का 30% शुल्क, ट्रंप के फैसले पर कड़ा जवाब
अमेरिका और भारत के बीच व्यापारिक रिश्तों में एक बार फिर तनाव की लकीरें गहरी हो गई हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारतीय उत्पादों पर 50 फीसदी टैरिफ लगाए जाने के बाद भारत ने भी जवाबी कदम उठाते हुए अमेरिकी दालों के आयात पर 30 फीसदी शुल्क लागू कर दिया है। यह फैसला पिछले साल अक्टूबर से प्रभावी है, लेकिन अब इसके राजनीतिक और आर्थिक असर खुलकर सामने आने लगे हैं। भारत का यह कदम सिर्फ एक आर्थिक निर्णय नहीं, बल्कि रणनीतिक संदेश भी माना जा रहा है। लंबे समय से भारत और अमेरिका के बीच एक व्यापक व्यापार समझौते को लेकर बातचीत चल रही थी, लेकिन इस टैरिफ वॉर ने उन वार्ताओं को और जटिल बना दिया है। नई दिल्ली का साफ संकेत है कि वह एकतरफा दबाव की नीति को स्वीकार नहीं करेगा। अमेरिकी राजनीति में हलचल भारत के इस फैसले से अमेरिकी राजनीति में भी बेचैनी देखी जा रही है। कई अमेरिकी सांसदों ने ट्रंप प्रशासन से भारत के साथ बातचीत का रास्ता अपनाने की अपील की है। उनका कहना है कि भारतीय बाजार अमेरिकी कृषि उत्पादों, खासकर दालों के लिए बेहद अहम है और ऊंचे टैरिफ से अमेरिकी किसानों को सीधा नुकसान होगा। भारतीय किसानों को संदेश दूसरी ओर, भारत में इस निर्णय को घरेलू किसानों के हित में उठाया गया कदम बताया जा रहा है। अमेरिकी दालों पर शुल्क बढ़ने से आयात महंगा होगा, जिससे देश के दाल उत्पादक किसानों को राहत मिल सकती है। सरकार इसे “हितों की रक्षा” और “संतुलित व्यापार” की दिशा में जरूरी कदम बता रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर दोनों देश जल्द किसी समझौते पर नहीं पहुंचे, तो यह टैरिफ टकराव और गहरा सकता है। इसका असर सिर्फ दालों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आईटी, फार्मा और ऑटो सेक्टर जैसे अन्य क्षेत्रों में भी तनाव बढ़ सकता है। फिलहाल, भारत ने साफ कर दिया है कि वह बराबरी के आधार पर व्यापार चाहता है। अब नजर इस बात पर है कि वॉशिंगटन इस कड़े संदेश को कैसे पढ़ता है—टकराव के तौर पर या बातचीत के न्योते के रूप में।