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बिहार की धरती पर इतिहास रचा गया: पूर्वी चंपारण में स्थापित हुआ दुनिया का सबसे बड़ा अखंड शिवलिंग ‘सहस्त्रलिंगम’

पूर्वी चंपारण (बिहार)। बिहार ने एक बार फिर धार्मिक और सांस्कृतिक मानचित्र पर अपनी वैश्विक पहचान दर्ज कराई है। पूर्वी चंपारण जिले में निर्माणाधीन विराट रामायण मंदिर परिसर में 17 जनवरी को दुनिया का सबसे बड़ा 33 फीट ऊंचा अखंड शिवलिंग ‘सहस्त्रलिंगम’ विधि-विधान के साथ स्थापित किया गया। इस ऐतिहासिक स्थापना के साथ ही देश-विदेश के श्रद्धालुओं में खासा उत्साह देखने को मिल रहा है। इस विशेष रिपोर्ट में पढ़िए—यह शिवलिंग क्या है, इसे कहां और क्यों स्थापित किया गया, इसकी विशेषताएं क्या हैं और इससे जुड़े सभी अहम सवालों के जवाब।  क्या है ‘सहस्त्रलिंगम’? ‘सहस्त्रलिंगम’ का अर्थ है—हजारों शिवलिंगों से युक्त एक विशाल शिवलिंग। इस अखंड शिवलिंग की सतह पर भगवान शिव के हजारों सूक्ष्म स्वरूप अंकित हैं, जो इसे अद्वितीय बनाते हैं। यह शिवलिंग एक ही पत्थर से तराशा गया है, इसलिए इसे ‘अखंड’ कहा जा रहा है। कहां स्थापित हुआ है यह शिवलिंग? यह शिवलिंग बिहार के पूर्वी चंपारण जिले में स्थित विराट रामायण मंदिर परिसर में स्थापित किया गया है। यह वही स्थल है, जहां भविष्य में दुनिया का सबसे बड़ा रामायण मंदिर निर्माणाधीन है। शिवलिंग की ऊंचाई और विशेषताएं क्या हैं? * ऊंचाई: 33 फीट * स्वरूप: अखंड (एक ही पत्थर से निर्मित) * डिजाइन: शिवलिंग पर हजारों छोटे शिवलिंगों की नक्काशी * पहचान: दुनिया का सबसे ऊंचा अखंड शिवलिंग धार्मिक विशेषज्ञों के अनुसार, 33 फीट की ऊंचाई भगवान शिव के 33 कोटि देवताओं से जुड़े आध्यात्मिक प्रतीक को भी दर्शाती है। स्थापना कब और कैसे हुई? 17 जनवरी को वैदिक मंत्रोच्चार, रुद्राभिषेक और विशेष पूजा-अर्चना के बीच शिवलिंग की प्राण-प्रतिष्ठा की गई। इस अवसर पर बड़ी संख्या में साधु-संत, धार्मिक विद्वान और श्रद्धालु उपस्थित रहे। इसका धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व क्या है? यह शिवलिंग न केवल आस्था का केंद्र बनेगा, बल्कि— * बिहार को वैश्विक धार्मिक पर्यटन के नक्शे पर मजबूत स्थान दिलाएगा * विराट रामायण मंदिर परियोजना को नई पहचान देगा * रोजगार और स्थानीय विकास को बढ़ावा देगा धार्मिक मान्यता है कि सहस्त्रलिंगम के दर्शन से भक्तों को विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। क्या यह आम श्रद्धालुओं के लिए खुला है? जी हां, शिवलिंग स्थापना के बाद अब श्रद्धालु नियमित रूप से दर्शन कर सकते हैं। आने वाले समय में यहां विशेष पर्वों पर भव्य आयोजन और शिवरात्रि जैसे महापर्वों पर विशाल धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। बिहार के लिए क्यों है यह ऐतिहासिक? अब तक बिहार को बौद्ध और जैन तीर्थों के लिए जाना जाता था, लेकिन सहस्त्रलिंगम की स्थापना के बाद यह राज्य शैव परंपरा के प्रमुख केंद्र के रूप में भी उभर रहा है। यह उपलब्धि न केवल धार्मिक, बल्कि सांस्कृतिक गर्व का विषय भी है। पूर्वी चंपारण में स्थापित ‘सहस्त्रलिंगम’ न सिर्फ एक धार्मिक संरचना है, बल्कि यह बिहार की आध्यात्मिक विरासत, शिल्पकला और आस्था का भव्य प्रतीक बनकर उभरा है। आने वाले वर्षों में यह स्थल देश ही नहीं, बल्कि दुनिया भर के शिवभक्तों के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र बनने की पूरी संभावना रखता है।

दही-चूड़ा भोज में सियासी तंज: तेजस्वी की गैरमौजूदगी पर तेज प्रताप बोले—‘जयचंदों से घिरे हैं’

पटना। मकर संक्रांति के अवसर पर आयोजित पारंपरिक दही-चूड़ा भोज एक बार फिर राजनीतिक बयानबाज़ी का मंच बन गया। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) नेता तेज प्रताप यादव के भोज में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव की अनुपस्थिति को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई। इस मौके पर तेज प्रताप यादव ने तीखा तंज कसते हुए कहा कि तेजस्वी “जयचंदों से घिरे हुए हैं”, इसलिए कार्यक्रम में नहीं पहुंच पाए। तेज प्रताप यादव ने मीडिया से बातचीत में कहा कि उन्होंने तेजस्वी यादव का रात 9 बजे तक इंतजार किया, लेकिन वह नहीं आए। उन्होंने यह भी जोड़ा कि कुछ लोग हैं जो उन्हें घेरकर गलत सलाह दे रहे हैं और वही उनकी अनुपस्थिति का कारण हो सकते हैं। तेज प्रताप के इस बयान को पार्टी के अंदरूनी समीकरणों से जोड़कर देखा जा रहा है। भोज के दौरान तेज प्रताप यादव ने अपने पिता और राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि “हमारी पार्टी असली है, तभी मेरे पिताजी खुद मुझे आशीर्वाद देने आए।” लालू प्रसाद यादव की मौजूदगी को उन्होंने अपने पक्ष में एक मजबूत संकेत बताया और कहा कि परिवार और पार्टी के मूल सिद्धांत उनके साथ हैं। तेज प्रताप ने यह भी स्पष्ट किया कि उनका संघर्ष पार्टी और विचारधारा के लिए है, किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं। हालांकि, तेजस्वी यादव की गैरहाजिरी और उस पर आया यह बयान राजद की अंदरूनी राजनीति को एक बार फिर सुर्खियों में ले आया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मकर संक्रांति जैसे सामाजिक अवसर पर दिए गए इस तरह के बयान केवल पारिवारिक नहीं, बल्कि सियासी संदेश भी देते हैं। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि तेज प्रताप और तेजस्वी के बीच यह दूरी केवल बयानबाज़ी तक सीमित रहती है या पार्टी की राजनीति पर इसका असर और गहराता है।

दही-चूड़ा भोज से सियासी संदेश! विजय सिन्हा के घर पहुंचे तेज प्रताप यादव, एनडीए से मिला खुला ऑफर

पटना। मकर संक्रांति के अवसर पर बिहार की राजनीति में उस समय नई चर्चाओं ने जोर पकड़ लिया, जब राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री तेज प्रताप यादव उपमुख्यमंत्री विजय सिन्हा के आवास पर आयोजित पारंपरिक दही-चूड़ा भोज में शामिल हुए। इस मुलाकात को केवल सामाजिक शिष्टाचार तक सीमित मानने के बजाय राजनीतिक गलियारों में इसे संभावित सियासी समीकरणों से जोड़कर देखा जा रहा है। उपमुख्यमंत्री विजय सिन्हा के यहां आयोजित इस भोज में एनडीए के कई दिग्गज नेता मौजूद थे। केंद्रीय मंत्री संतोष सुमन और भाजपा के वरिष्ठ नेता रामकृपाल यादव ने तेज प्रताप यादव का गर्मजोशी से स्वागत किया। इस दौरान दोनों नेताओं ने सार्वजनिक मंच से तेज प्रताप यादव को एनडीए में शामिल होने का खुला निमंत्रण भी दे दिया, जिससे सियासी हलचल और तेज हो गई। भोज के दौरान माहौल पूरी तरह सौहार्दपूर्ण नजर आया। नेताओं के बीच अनौपचारिक बातचीत हुई और पारंपरिक व्यंजनों के साथ राजनीतिक संकेत भी दिए गए। संतोष सुमन ने कहा कि “राजनीति में दरवाजे कभी बंद नहीं होते, जो विकास और बिहार के हित में सोचता है, उसका स्वागत है।” वहीं रामकृपाल यादव ने भी तेज प्रताप की मौजूदगी को “सकारात्मक संकेत” करार दिया। तेज प्रताप यादव ने हालांकि एनडीए में शामिल होने को लेकर कोई सीधा बयान नहीं दिया, लेकिन उन्होंने इतना जरूर कहा कि मकर संक्रांति जैसे पर्व पर सामाजिक सौहार्द और आपसी संवाद राजनीति से ऊपर होते हैं। उनके इस बयान को राजनीतिक संतुलन साधने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मुलाकात केवल संयोग नहीं हो सकती। हाल के दिनों में राजद के भीतर चल रही अंदरूनी चर्चाओं और नेतृत्व को लेकर उठते सवालों के बीच तेज प्रताप यादव की यह मौजूदगी कई अटकलों को जन्म दे रही है। हालांकि, फिलहाल किसी बड़े राजनीतिक फैसले की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। कुल मिलाकर, दही-चूड़ा की इस थाली ने बिहार की राजनीति में नए संकेत जरूर दे दिए हैं। आने वाले दिनों में यह साफ हो सकेगा कि यह मुलाकात केवल त्योहार की सौहार्दपूर्ण परंपरा थी या किसी बड़े सियासी बदलाव की भूमिका।

नीतीश सरकार का बड़ा फैसला: पहली कैबिनेट बैठक में 43 प्रस्ताव पास, रोजगार–निवेश को रफ्तार, मुंबई में बनेगा बिहार भवन

पटना। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अध्यक्षता में गठित नई बिहार सरकार की पहली मंत्रिपरिषद बैठक में कुल 43 महत्वपूर्ण प्रस्तावों को मंजूरी दी गई। बैठक में सरकार ने स्पष्ट संकेत दिया कि आने वाले समय में रोजगार सृजन, निवेश को बढ़ावा और समग्र विकास उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता होगी। कैबिनेट के फैसलों को राज्य के आर्थिक और प्रशासनिक ढांचे को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। रोजगार पर खास जोर कैबिनेट बैठक में सरकारी विभागों में लंबे समय से खाली पड़े पदों को शीघ्र भरने पर सहमति बनी। इससे एक ओर युवाओं को रोजगार के नए अवसर मिलेंगे, वहीं दूसरी ओर प्रशासनिक कामकाज में भी तेजी आएगी। सरकार ने विभिन्न विभागों में नियुक्ति प्रक्रिया को सरल और समयबद्ध बनाने के निर्देश दिए हैं। निवेश आकर्षित करने की रणनीति राज्य में औद्योगिक विकास को गति देने के लिए निजी क्षेत्र के निवेश को बढ़ावा देने पर भी विशेष फोकस किया गया है। उद्योग, आईटी, स्टार्टअप और इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े प्रस्तावों को मंजूरी देकर सरकार ने यह साफ कर दिया है कि बिहार को निवेश के अनुकूल राज्य बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएंगे। मुंबई में बनेगा बिहार भवन कैबिनेट की बैठक में एक अहम फैसला लेते हुए मुंबई में ‘बिहार भवन’ के निर्माण को भी मंजूरी दी गई। इससे महाराष्ट्र में रहने वाले बिहारवासियों को सुविधा मिलेगी और राज्य सरकार के प्रशासनिक व सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन में भी मदद मिलेगी। विकास को दी गई सर्वोच्च प्राथमिकता बैठक में शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, आवास और सामाजिक कल्याण से जुड़े कई प्रस्तावों को भी हरी झंडी दी गई। सरकार का उद्देश्य है कि विकास योजनाओं का लाभ अंतिम पंक्ति के व्यक्ति तक पहुंचे और बिहार की विकास दर को नई ऊंचाई पर ले जाया जाए। सरकार का संदेश कैबिनेट के फैसलों के जरिए नीतीश सरकार ने यह संदेश दिया है कि सुशासन, रोजगार और निवेश ही उसकी कार्ययोजना के केंद्र में रहेंगे। पहली ही बैठक में 43 प्रस्तावों की मंजूरी को नई सरकार की सक्रियता और तेज फैसलों का संकेत माना जा रहा है।

लैंड फॉर जॉब मामले में लालू परिवार की मुश्किलें बढ़ीं, तेजस्वी–तेज प्रताप समेत 46 पर आरोप तय

नई दिल्ली/पटना। लैंड फॉर जॉब घोटाले में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) प्रमुख लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार को बड़ा झटका लगा है। अदालत ने इस बहुचर्चित मामले में बिहार के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव, पूर्व मंत्री तेज प्रताप यादव समेत कुल 46 आरोपियों पर आरोप तय कर दिए हैं। वहीं, सबूतों के अभाव में 52 आरोपियों को बरी कर दिया गया है। अदालत के इस फैसले से मामला एक बार फिर सियासी और कानूनी सुर्खियों में आ गया है। क्या है लैंड फॉर जॉब मामला? यह मामला उस समय का है जब लालू प्रसाद यादव केंद्र में रेल मंत्री थे। आरोप है कि रेलवे में ग्रुप-डी की नौकरियों के बदले उम्मीदवारों या उनके परिजनों से जमीन ली गई। जांच एजेंसियों का दावा है कि ये जमीनें बेहद कम कीमत पर या नाममात्र के सौदों में लालू परिवार से जुड़े लोगों के नाम कराई गईं। जांच के दौरान कई रजिस्ट्री दस्तावेज, बैंक लेन-देन और बयान अदालत के समक्ष पेश किए गए, जिनके आधार पर आरोप तय किए गए हैं। अदालत का फैसला अदालत ने लंबी सुनवाई के बाद कहा कि प्रथम दृष्टया उपलब्ध साक्ष्य आरोपियों के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त हैं। * 46 आरोपियों पर आरोप तय: इनमें तेजस्वी यादव, तेज प्रताप यादव सहित परिवार से जुड़े अन्य लोग और कथित लाभार्थी शामिल हैं। * 52 आरोपियों को बरी: अदालत ने माना कि इनके खिलाफ आरोप साबित करने के लिए ठोस साक्ष्य नहीं हैं, इसलिए उन्हें मुकदमे से मुक्त किया जाता है। राजनीतिक हलचल तेज फैसले के बाद बिहार की राजनीति में हलचल मच गई है। विपक्ष ने इसे “भ्रष्टाचार के खिलाफ न्याय की जीत” बताया, जबकि राजद नेताओं ने कहा कि वे अदालत में अपना पक्ष मजबूती से रखेंगे और सच सामने आएगा। तेजस्वी यादव के करीबी सूत्रों का कहना है कि यह मामला राजनीतिक बदले की भावना से प्रेरित है और अंतिम फैसले में उन्हें न्याय मिलेगा। आगे की प्रक्रिया अब आरोप तय होने के बाद मामले में नियमित सुनवाई शुरू होगी। अभियोजन पक्ष गवाहों और दस्तावेजों के जरिए अपने आरोप साबित करने की कोशिश करेगा, जबकि बचाव पक्ष आरोपों को निराधार बताकर चुनौती देगा। कानूनी जानकारों के अनुसार, यह मुकदमा लंबा चल सकता है और इसके राजनीतिक असर बिहार की आने वाली सियासी रणनीतियों पर भी दिख सकते हैं। नज़र आगे की सुनवाई पर लैंड फॉर जॉब केस अब निर्णायक दौर में प्रवेश कर चुका है। अदालत में पेश होने वाली गवाही और सबूत यह तय करेंगे कि यह मामला लालू परिवार के लिए कितना भारी पड़ता है या फिर उन्हें राहत मिलती है। फिलहाल, आरोप तय होने से उनकी कानूनी चुनौतियां और बढ़ गई हैं।

मनरेगा पर कांग्रेस का बड़ा आंदोलन: बिहार में 47 दिन तक ‘मनरेगा बचाओ संग्राम’, विधानसभा घेराव से केंद्र को घेरने की तैयारी

बिहार: केंद्र सरकार द्वारा मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम) में किए जा रहे कथित बदलावों के खिलाफ कांग्रेस ने बिहार में व्यापक आंदोलन का ऐलान किया है। पार्टी ने इसे ग्रामीण गरीबों, मजदूरों और किसानों के अधिकारों पर सीधा हमला बताते हुए 10 जनवरी से 25 फरवरी तक 47 दिनों के ‘मनरेगा बचाओ संग्राम’ की घोषणा की है। कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि केंद्र सरकार मनरेगा की मूल भावना को कमजोर कर रही है। बजट में कटौती, काम के दिनों में कमी, भुगतान में देरी और नियमों को जटिल बनाकर गरीबों को रोजगार से वंचित किया जा रहा है। पार्टी का कहना है कि इससे गांवों में बेरोजगारी और पलायन की समस्या और गंभीर होगी। आंदोलन की रूपरेखा कांग्रेस द्वारा घोषित कार्यक्रम के तहत आंदोलन को चरणबद्ध और व्यापक बनाया जाएगा। इसमें राज्य से लेकर पंचायत स्तर तक गतिविधियां होंगी। * जिला स्तर पर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सरकार की नीतियों को उजागर किया जाएगा। * उपवास और धरना-प्रदर्शन के जरिए विरोध दर्ज कराया जाएगा। * पंचायत स्तर पर जनसंपर्क अभियान, चौपालें और नुक्कड़ सभाएं आयोजित होंगी। * ग्रामीण इलाकों में कार्यकर्ताओं द्वारा घर-घर संपर्क कर मनरेगा के महत्व और सरकार की नीतियों से होने वाले नुकसान की जानकारी दी जाएगी। * आंदोलन के अंतिम चरण में विधानसभा घेराव और अखिल भारतीय रैलियों का आयोजन किया जाएगा। कांग्रेस का आरोप कांग्रेस नेताओं ने कहा कि मनरेगा करोड़ों ग्रामीण परिवारों के लिए जीवनरेखा है। यह न सिर्फ रोजगार देता है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूत करता है। पार्टी का दावा है कि केंद्र सरकार निजीकरण और खर्च में कटौती की नीति के चलते इस योजना को धीरे-धीरे खत्म करने की दिशा में बढ़ रही है। राजनीतिक संदेश इस आंदोलन के जरिए कांग्रेस बिहार में ग्रामीण मुद्दों को केंद्र में लाकर सरकार पर दबाव बनाने की रणनीति पर काम कर रही है। पार्टी का मानना है कि मनरेगा जैसे मुद्दे पर जनआंदोलन खड़ा कर वह ग्रामीण मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत कर सकती है। कुल मिलाकर, ‘मनरेगा बचाओ संग्राम’ के जरिए कांग्रेस ने केंद्र सरकार को सीधे चुनौती दी है। आने वाले 47 दिन बिहार की राजनीति में हलचल बढ़ाने वाले माने जा रहे हैं।

बिहार के बुजुर्गों को बड़ी राहत: अब घर बैठे मिलेगी इलाज की सुविधा, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने की नई योजना की घोषणा

पटना। बिहार सरकार ने राज्य के बुजुर्ग नागरिकों को बड़ी राहत देते हुए उनके लिए घर पर ही स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने की नई योजना की घोषणा की है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस महत्वाकांक्षी योजना का ऐलान करते हुए कहा कि अब बुजुर्गों को इलाज के लिए बार-बार अस्पतालों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे। यह योजना सरकार के ‘सात निश्चय-3’ कार्यक्रम का अहम हिस्सा होगी। मुख्यमंत्री ने स्वास्थ्य विभाग को निर्देश दिया है कि इस योजना को प्राथमिकता के आधार पर जल्द से जल्द लागू किया जाए। योजना के तहत 60 वर्ष से अधिक आयु के बुजुर्गों को उनके घर पर ही बुनियादी और आवश्यक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराई जाएंगी, ताकि समय पर इलाज संभव हो सके और उनकी जीवन गुणवत्ता में सुधार आए। घर पर मिलेंगी ये स्वास्थ्य सेवाएं सरकार की इस योजना के तहत बुजुर्गों को निम्नलिखित सुविधाएं घर पर ही प्रदान की जाएंगी— * प्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ की सेवा * पैथोलॉजी जांच (खून, शुगर, अन्य जरूरी टेस्ट) * ब्लड प्रेशर (BP) और ईसीजी जांच * फिजियोथेरेपी की सुविधा * अचानक तबीयत बिगड़ने की स्थिति में आपातकालीन सहायता * ग्रामीण इलाकों पर विशेष फोकस सरकार का विशेष जोर ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों पर रहेगा, जहां बुजुर्गों को स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंचने में सबसे ज्यादा परेशानी होती है। इसके लिए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को इस योजना से जोड़ा जाएगा, ताकि सेवाएं समय पर और प्रभावी ढंग से मिल सकें। मुख्यमंत्री का बयान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा,“बुजुर्ग हमारे समाज की धरोहर हैं। उनकी देखभाल सरकार की जिम्मेदारी है। यह योजना बुजुर्गों को सम्मानजनक और सुरक्षित जीवन देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।” स्वास्थ्य विभाग करेगा निगरानी स्वास्थ्य विभाग को योजना की निगरानी और क्रियान्वयन की जिम्मेदारी सौंपी गई है। साथ ही सेवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए नियमित समीक्षा भी की जाएगी। सरकार की इस पहल से बिहार के लाखों बुजुर्गों को सीधा लाभ मिलने की उम्मीद है और यह योजना राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था को और मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाएगी।

RJD के सभी 25 विधायक BJP में होंगे शामिल! बिहार के मंत्री रामकृपाल यादव का बड़ा दावा, तेजस्वी यादव पर साधा निशाना

पटना: बिहार की राजनीति में एक बार फिर बयानबाजी तेज हो गई है। राज्य के मंत्री रामकृपाल यादव ने राष्ट्रीय जनता दल (RJD) को लेकर बड़ा दावा करते हुए कहा है कि पार्टी के सभी 25 विधायक जल्द ही भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल होंगे। उनके इस बयान के बाद सियासी गलियारों में हलचल मच गई है और विपक्ष ने इसे राजनीतिक दबाव की रणनीति करार दिया है। रामकृपाल यादव ने मीडिया से बातचीत में कहा कि RJD के विधायक पार्टी की आंतरिक कलह और नेतृत्व से असंतुष्ट हैं। उन्होंने दावा किया कि आने वाले समय में RJD में टूट देखने को मिलेगी और उसके सभी विधायक BJP का दामन थामेंगे। मंत्री के इस बयान को आगामी राजनीतिक समीकरणों से जोड़कर देखा जा रहा है। तेजस्वी यादव पर तंज मंत्री रामकृपाल यादव ने RJD नेता तेजस्वी यादव पर भी तीखा तंज कसा। उन्होंने कहा कि तेजस्वी सिर्फ बयानबाजी की राजनीति करते हैं, जबकि जमीनी स्तर पर उनका संगठन कमजोर हो चुका है। रामकृपाल यादव के मुताबिक, तेजस्वी यादव अपने विधायकों को साथ रखने में नाकाम रहे हैं और यही वजह है कि पार्टी में असंतोष बढ़ता जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि RJD अब सिर्फ परिवारवाद और खोखले वादों की पार्टी बनकर रह गई है, जिससे विधायक और कार्यकर्ता दोनों ही निराश हैं। राजनीतिक हलकों में तेज प्रतिक्रिया रामकृपाल यादव के इस बयान के बाद RJD की ओर से कड़ी प्रतिक्रिया आने की संभावना है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान बिहार की राजनीति में दबाव बनाने और विपक्ष को घेरने की रणनीति का हिस्सा हो सकता है। वहीं RJD समर्थकों का कहना है कि यह दावा पूरी तरह बेबुनियाद और भ्रामक है। फिलहाल रामकृपाल यादव के इस बड़े दावे ने बिहार की सियासत को गरमा दिया है और अब सबकी निगाहें RJD की आधिकारिक प्रतिक्रिया और आने वाले राजनीतिक घटनाक्रम पर टिकी हुई हैं।

‘आदमी से जीत सकता हूं, मशीन से नहीं’—चुनाव हारने के बाद खेसारी लाल यादव का बड़ा बयान, फिर गरमाई सियासत

बिहार/ सारण: छपरा विधानसभा सीट से चुनाव हारने के बाद भोजपुरी सुपरस्टार और प्रत्याशी खेसारी लाल यादव का एक बयान एक बार फिर राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है। हार के बाद मीडिया से बातचीत में खेसारी ने कहा, “मैं आदमी से जीत सकता हूं, लेकिन मशीन से नहीं।” उनके इस बयान को लेकर सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक मंचों तक बहस तेज हो गई है। खेसारी लाल यादव ने स्पष्ट किया कि उनका राजनीति में आने का कोई पूर्व नियोजित इरादा नहीं था। उन्होंने कहा कि परिस्थितियां ऐसी बनीं कि उन्हें चुनावी मैदान में उतरना पड़ा। इस दौरान उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि चुनाव ने उन्हें बहुत कुछ सिखाया—खासकर यह कि कौन अपना है और कौन पराया। ‘चुनाव ने पहचान करा दी’ खेसारी ने कहा कि चुनाव के दौरान उन्हें कई तरह के अनुभव हुए। कुछ लोग जो शुरुआत में साथ नजर आ रहे थे, वे वक्त आने पर पीछे हट गए, जबकि कुछ ऐसे लोग भी सामने आए जिन्होंने बिना किसी स्वार्थ के उनका साथ दिया। उन्होंने कहा, “यह चुनाव मेरे लिए सिर्फ हार-जीत का सवाल नहीं था, बल्कि रिश्तों और भरोसे की परीक्षा भी थी।” ईवीएम पर इशारों में सवाल अपने बयान में खेसारी ने भले ही सीधे तौर पर ईवीएम पर आरोप न लगाया हो, लेकिन ‘मशीन से नहीं जीत सकता’ कहकर उन्होंने चुनावी प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए। उनके समर्थकों का कहना है कि खेसारी को जनता का समर्थन मिला, लेकिन परिणाम उनके पक्ष में नहीं गया। वहीं, विपक्षी दल इस बयान को हार की हताशा बता रहे हैं। राजनीति को लेकर आगे क्या? भविष्य की राजनीति को लेकर पूछे गए सवाल पर खेसारी लाल यादव ने फिलहाल कोई ठोस ऐलान नहीं किया। उन्होंने कहा कि वह जनता के बीच रहेंगे और अपने काम के जरिए लोगों से जुड़े रहेंगे। “राजनीति में रहना है या नहीं, यह वक्त बताएगा। अभी मैं अपनी जनता और अपने काम पर ध्यान दूंगा,” उन्होंने कहा। सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं खेसारी का यह बयान सामने आते ही सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। समर्थक जहां इसे सिस्टम पर सवाल उठाने वाला साहसिक बयान बता रहे हैं, वहीं आलोचक इसे चुनावी हार का बहाना करार दे रहे हैं। कुल मिलाकर, चुनाव हारने के बाद खेसारी लाल यादव का यह बयान न सिर्फ चर्चा में है, बल्कि आने वाले दिनों में बिहार की राजनीति में नई बहस को भी जन्म दे सकता है।

बिहार की सियासत में उथल-पुथल: नितिन नबीन को दिल्ली की राह, कुशवाहा बाहर! चिराग की निर्णायक भूमिका

पटना, 22 दिसंबर: बिहार में राज्यसभा चुनाव को लेकर सियासी पारा चरम पर है। राजधानी पटना से लेकर दिल्ली तक राजनीतिक गलियारों में जोड़-घटाव का खेल तेज हो चुका है। इस सियासी बिसात पर जहां भाजपा के वरिष्ठ नेता नितिन नबीन की राज्यसभा में एंट्री लगभग तय मानी जा रही है, वहीं उपेंद्र कुशवाहा की विदाई की अटकलें भी जोर पकड़ चुकी हैं। इसी बीच, चिराग पासवान के लिए यह चुनाव महज औपचारिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि उनकी राजनीतिक ताकत और भविष्य की दिशा तय करने वाली अग्निपरीक्षा बनता जा रहा है। नितिन नबीन को दिल्ली भेजने की तैयारी सूत्रों के अनुसार, भारतीय जनता पार्टी बिहार कोटे से राज्यसभा की एक सीट पर नितिन नबीन को भेजने की रणनीति पर अंतिम चरण में है। संगठन और सरकार दोनों स्तरों पर उनकी मजबूत पकड़ और लंबे अनुभव को देखते हुए पार्टी उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका सौंपना चाहती है। माना जा रहा है कि यह फैसला बिहार भाजपा के भीतर संतुलन साधने और संगठन को नई धार देने के उद्देश्य से लिया जा रहा है।  कुशवाहा के लिए सियासी संकट दूसरी ओर, राष्ट्रीय लोक मोर्चा के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी राज्यसभा सीट बचाने की है। बदले हुए राजनीतिक समीकरणों में उनके पक्ष में आवश्यक संख्या बल जुटा पाना मुश्किल नजर आ रहा है। ऐसे में राजनीतिक जानकार मानते हैं कि इस बार कुशवाहा का राज्यसभा से बाहर होना लगभग तय है। यह उनकी सक्रिय राजनीति के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है। चिराग पासवान की होगी असली परीक्षा राज्यसभा चुनाव चिराग पासवान के लिए बेहद अहम है। लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के नेता के रूप में यह चुनाव उनके राजनीतिक वजन को परखने का मौका है। सवाल यह है कि चिराग किस खेमे के साथ खड़े होते हैं और उनके समर्थन से सत्ता समीकरण कितना प्रभावित होता है। इस चुनाव के जरिए चिराग यह दिखाने की कोशिश करेंगे कि वे सिर्फ विरासत के नेता नहीं, बल्कि निर्णायक भूमिका निभाने वाले सियासी खिलाड़ी हैं।