काराकस/वॉशिंगटन। वेनेजुएला की राजधानी काराकस में हुए सिलसिलेवार धमाकों के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के एक बयान ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल मचा दी है। ट्रंप ने दावा किया कि वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को पकड़ लिया गया है। इसके साथ ही उन्होंने वेनेजुएला पर बड़े पैमाने पर अमेरिकी हमले की भी पुष्टि करने का दावा किया। ट्रंप के इस बयान के तुरंत बाद वेनेजुएला सरकार ने कड़ा ऐतराज जताया और इसे “झूठा, भड़काऊ और असत्यापित” बताया। काराकस में जारी आधिकारिक बयान में सरकार ने अमेरिकी पक्ष से मादुरो के “प्रूफ ऑफ लाइफ” यानी उनके जीवित और सुरक्षित होने के प्रमाण सार्वजनिक करने की मांग की है। वेनेजुएला का कहना है कि इस तरह के दावे क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ाने और मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की कोशिश हैं। धमाकों के बाद बढ़ा तनाव काराकस में धमाकों की पुष्टि स्थानीय अधिकारियों ने की है, हालांकि हताहतों और नुकसान के सटीक आंकड़ों को लेकर स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है। सुरक्षा एजेंसियों ने शहर के कई इलाकों में अलर्ट बढ़ा दिया है और संवेदनशील ठिकानों की कड़ी निगरानी की जा रही है। वेनेजुएला का खंडन वेनेजुएला के उपराष्ट्रपति कार्यालय ने कहा कि राष्ट्रपति मादुरो देश में ही हैं और सरकार सामान्य रूप से काम कर रही है। अधिकारियों ने ट्रंप के दावे को “राजनीतिक प्रचार” बताते हुए अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की कि वे अफवाहों पर भरोसा न करें। अमेरिकी दावे पर सवाल अमेरिकी प्रशासन की ओर से अभी तक ट्रंप के दावे के समर्थन में कोई आधिकारिक दस्तावेज, तस्वीर या वीडियो जारी नहीं किया गया है। इसी कारण वेनेजुएला ने ‘प्रूफ ऑफ लाइफ’ की मांग को दोहराया है। कई अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का कहना है कि बिना ठोस सबूतों के ऐसे बयान वैश्विक तनाव को और बढ़ा सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया लैटिन अमेरिका के कई देशों और संयुक्त राष्ट्र से जुड़े सूत्रों ने संयम बरतने और तथ्यों की पुष्टि के बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचने की सलाह दी है। कुछ देशों ने काराकस में अपने नागरिकों के लिए यात्रा परामर्श भी जारी किए हैं। आगे क्या? स्थिति तेजी से बदल रही है। एक ओर अमेरिका के दावे हैं, तो दूसरी ओर वेनेजुएला का सख्त खंडन। आने वाले घंटों में अगर किसी पक्ष की ओर से ठोस सबूत या आधिकारिक घोषणा सामने आती है, तो क्षेत्रीय और वैश्विक राजनीति पर इसका गहरा असर पड़ सकता है। फिलहाल दुनिया की नजरें काराकस और वॉशिंगटन पर टिकी हुई हैं।
“बलूचिस्तान से भारत के समर्थन की खुली पुकार: मीर यार बलूच का जयशंकर को पत्र, पाकिस्तान-चीन गठजोड़ पर गंभीर आरोप”
नई दिल्ली/क्वेटा: पाकिस्तान के अशांत प्रांत बलूचिस्तान से भारत के समर्थन में एक तीखा और भावनात्मक संदेश सामने आया है। बलूचिस्तान के प्रमुख नेता मीर यार बलूच ने भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर को एक ओपन लेटर लिखकर पाकिस्तान के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने और बलूच जनता की आवाज़ को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाने की अपील की है। पत्र में उन्होंने पाकिस्तान को “दमनकारी राज्य” बताते हुए उसके कथित अत्याचारों और पाकिस्तान-चीन के खतरनाक रणनीतिक गठजोड़ का विस्तार से जिक्र किया है। “हम भारत के साथ हैं” अपने पत्र में मीर यार बलूच ने स्पष्ट शब्दों में लिखा है कि बलूच जनता भारत को अपना स्वाभाविक मित्र मानती है। उन्होंने कहा कि बलूचिस्तान में दशकों से मानवाधिकारों का उल्लंघन हो रहा है—जबर्दस्ती गुमशुदगी, सैन्य कार्रवाई और संसाधनों की लूट आम बात बन चुकी है। पत्र में यह भी कहा गया कि “पाकिस्तान को उखाड़ फेंकने” की भावना बलूच समाज में इसलिए पनप रही है क्योंकि वहां लोकतांत्रिक अधिकारों और आत्मनिर्णय की मांग को लगातार दबाया जा रहा है। पाकिस्तान-चीन गठजोड़ पर आरोप मीर यार बलूच ने अपने पत्र में चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि इस परियोजना के नाम पर बलूचिस्तान की जमीन और संसाधनों का दोहन किया जा रहा है, जबकि स्थानीय लोगों को न तो पर्याप्त रोजगार मिला और न ही सुरक्षा। उन्होंने यह भी आशंका जताई कि चीन भविष्य में पाकिस्तान में अपनी सेना की तैनाती कर सकता है, जिससे क्षेत्रीय सुरक्षा संतुलन और अधिक बिगड़ सकता है। उनके मुताबिक, यह गठजोड़ न केवल बलूचिस्तान बल्कि पूरे दक्षिण एशिया की स्थिरता के लिए खतरा है। भारत से क्या अपेक्षा? पत्र में भारत से यह अपेक्षा जताई गई है कि वह: * बलूचिस्तान में मानवाधिकार उल्लंघनों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाए, * संयुक्त राष्ट्र सहित वैश्विक संस्थाओं में बलूच आवाज़ को समर्थन दे, * और क्षेत्र में शांति व स्थिरता के लिए पाकिस्तान पर दबाव बनाए। कूटनीतिक हलकों में हलचल इस ओपन लेटर के सामने आने के बाद कूटनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। हालांकि भारत सरकार की ओर से इस पत्र पर आधिकारिक प्रतिक्रिया फिलहाल सामने नहीं आई है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि बलूचिस्तान मुद्दा पहले से ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संवेदनशील है और ऐसे बयानों से भारत-पाकिस्तान संबंधों में नई बहस छिड़ सकती है। गौरतलब है कि बलूचिस्तान लंबे समय से अस्थिरता और विद्रोह का केंद्र रहा है। प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध होने के बावजूद यह क्षेत्र विकास और बुनियादी सुविधाओं में पीछे है। बलूच नेताओं का आरोप रहा है कि इस असंतोष की जड़ें राजनीतिक उपेक्षा और सैन्य दमन में हैं।
ईरान की सड़कों पर गुस्सा: आर्थिक तबाही से उठी सत्ता परिवर्तन की लहर
ईरान इस समय अपने सबसे गंभीर आंतरिक संकटों में से एक से गुजर रहा है। कभी सीमित आर्थिक असंतोष के रूप में शुरू हुए विरोध प्रदर्शन अब खुले तौर पर सरकार बदलने की मांग में तब्दील हो चुके हैं। सड़कों पर उतरते लोग सिर्फ महंगाई और बेरोजगारी का विरोध नहीं कर रहे, बल्कि पूरे शासन तंत्र पर सवाल उठा रहे हैं। आर्थिक संकट की जड़ में क्या है? ईरानी अर्थव्यवस्था लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों, युद्ध के दबाव और आंतरिक नीतिगत कमजोरियों से जूझ रही है। हालात तब और बिगड़ गए जब देश की मुद्रा रियाल ऐतिहासिक रूप से सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई। बताया जा रहा है कि हाल के दिनों में एक अमेरिकी डॉलर की कीमत करीब 14.2 लाख रियाल तक पहुंच गई, जिसने आम लोगों की क्रय शक्ति लगभग खत्म कर दी। रियाल की गिरावट का सीधा असर रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ा— ♦खाने-पीने की चीजें आम लोगों की पहुंच से बाहर होती चली गईं ♦आयात-निर्यात और व्यापार लगभग ठप पड़ गया ♦ छोटे दुकानदार और व्यापारी सबसे ज्यादा प्रभावित हुए बाजार बंद, सड़कों पर विरोध आर्थिक बदहाली के खिलाफ विरोध की शुरुआत कुछ हफ्ते पहले हुई, जब तेहरान के ग्रैंड बाजार और मोबाइल फोन बाजार के दुकानदारों ने हड़ताल का ऐलान कर दिया। दुकानों के शटर गिरते ही यह साफ हो गया कि असंतोष सिर्फ आम जनता तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यापारिक वर्ग भी सरकार से नाराज है। धीरे-धीरे यह आंदोलन बाजारों से निकलकर सड़कों तक पहुंच गया। कई शहरों में लोग नारे लगाते हुए दिखाई दिए, जिनमें अब महंगाई के साथ-साथ शासन परिवर्तन की मांग भी खुलकर सुनाई देने लगी। आर्थिक नाराजगी से राजनीतिक चुनौती तकविशेषज्ञों के मुताबिक, ईरान में यह कोई पहला विरोध प्रदर्शन नहीं है, लेकिन इस बार का फर्क साफ है। पहले जहां प्रदर्शनकारी वेतन, सब्सिडी और कीमतों में राहत की मांग कर रहे थे, अब नारे सीधे तौर पर सरकारी नीतियों और नेतृत्व को निशाना बना रहे हैं। युद्ध जैसी परिस्थितियां, अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का बोझ और सख्त सरकारी नियंत्रण—इन सबने मिलकर जनता के धैर्य की सीमा तोड़ दी है। सरकार की सख्ती और बढ़ता तनाव सरकार ने इन प्रदर्शनों को काबू में करने के लिए सख्त कदम उठाए हैं। कई इलाकों में सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ा दी गई है और प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई की खबरें भी सामने आ रही हैं। हालांकि, दमन की नीति ने हालात को शांत करने के बजाय कई जगह और भड़का दिया है। आगे क्या? ईरान के लिए यह सिर्फ आर्थिक संकट नहीं, बल्कि राजनीतिक स्थिरता की बड़ी परीक्षा बन चुका है। अगर महंगाई, बेरोजगारी और मुद्रा संकट पर जल्द काबू नहीं पाया गया, तो यह आंदोलन और व्यापक रूप ले सकता है। फिलहाल, ईरान की सड़कों पर गूंज रहा जनाक्रोश यह संकेत दे रहा है कि देश में हालात सामान्य नहीं हैं—और आने वाले दिन सरकार के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं।
स्विट्जरलैंड के लग्जरी स्की रिजॉर्ट में भीषण धमाका, नए साल के जश्न पर मातम
40 लोगों की मौत की आशंका, कारण अज्ञात; पुलिस और एजेंसियों की जांच तेज नई दिल्ली,डिजिटल डेस्क : स्विट्जरलैंड के एक प्रसिद्ध और लग्जरी स्की रिजॉर्ट में नए साल के पहले दिन हुए जोरदार धमाके से पूरे इलाके में हड़कंप मच गया। इस भयावह घटना में अब तक करीब 40 लोगों के मारे जाने की आशंका जताई जा रही है, जबकि कई अन्य गंभीर रूप से घायल बताए जा रहे हैं। धमाके के बाद मौके पर अफरा-तफरी मच गई और पर्यटकों में दहशत फैल गई। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, यह धमाका उस समय हुआ जब बड़ी संख्या में स्थानीय लोग और विदेशी पर्यटक नए साल का जश्न मना रहे थे। धमाके की आवाज कई किलोमीटर दूर तक सुनी गई, जिससे आसपास के इलाकों में भी लोग सहम गए। घटना के तुरंत बाद आपातकालीन सेवाओं को अलर्ट किया गया और राहत व बचाव कार्य शुरू किया गया। स्थानीय प्रशासन और पुलिस के मुताबिक, धमाके के कारणों का अब तक पता नहीं चल पाया है। इसे लेकर किसी भी तरह की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है कि यह हादसा था या किसी अन्य वजह से हुआ। सुरक्षा एजेंसियां हर एंगल से मामले की जांच कर रही हैं। फोरेंसिक टीमें भी मौके पर पहुंचकर साक्ष्य जुटाने में लगी हुई हैं। घायलों को नजदीकी अस्पतालों में भर्ती कराया गया है, जहां कई की हालत नाजुक बनी हुई है। इसी वजह से मृतकों की संख्या बढ़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा रहा। प्रशासन ने एहतियात के तौर पर रिजॉर्ट और आसपास के क्षेत्रों में सुरक्षा कड़ी कर दी है और पर्यटकों की आवाजाही पर अस्थायी रोक लगाई गई है। स्विस सरकार ने घटना पर गहरा शोक जताते हुए कहा है कि सच्चाई सामने लाने के लिए पूरी पारदर्शिता के साथ जांच की जाएगी। वहीं, कई देशों ने अपने नागरिकों की सुरक्षा को लेकर जानकारी जुटानी शुरू कर दी है, क्योंकि इस रिजॉर्ट में बड़ी संख्या में विदेशी पर्यटक मौजूद रहते हैं। नए साल की खुशियों के बीच हुई इस दर्दनाक घटना ने पूरे यूरोप को झकझोर कर रख दिया है। पुलिस ने लोगों से अफवाहों पर ध्यान न देने और आधिकारिक जानकारी का इंतजार करने की अपील की है। जांच पूरी होने के बाद ही धमाके के पीछे की असली वजह साफ हो पाएगी।
पाकिस्तान के आर्मी चीफ आसिम मुनीर की बेटी की शादी, आर्मी हेडक्वार्टर में हुई निजी रस्म
रावलपिंडी।पाकिस्तान के सेना प्रमुख (COAS) जनरल आसिम मुनीर की बेटी महनूर की शादी 26 दिसंबर को उनके फर्स्ट कजिन अब्दुल रहमान के साथ संपन्न हुई। यह विवाह समारोह रावलपिंडी स्थित पाकिस्तान आर्मी के जनरल हेडक्वार्टर (GHQ) में बेहद निजी और सीमित मेहमानों की मौजूदगी में आयोजित किया गया। सूत्रों के मुताबिक, विवाह समारोह को पूरी तरह से प्राइवेट रखा गया, जिसमें परिवार के करीबी सदस्य और चुनिंदा लोग ही शामिल हुए। सुरक्षा के कड़े इंतजामों के बीच रस्में पूरी की गईं। सार्वजनिक या राजनीतिक हस्तियों की व्यापक मौजूदगी की कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है। बताया जा रहा है कि दूल्हा अब्दुल रहमान जनरल आसिम मुनीर के भाई के बेटे हैं, यानी यह शादी पारिवारिक रिश्तों के दायरे में हुई। पाकिस्तान में ऐसे विवाह सामाजिक रूप से स्वीकार्य माने जाते हैं और कई परिवारों में यह परंपरा रही है। हालांकि, इस विवाह को लेकर न तो इंटर-सर्विसेज पब्लिक रिलेशंस (ISPR) और न ही सेना की ओर से कोई औपचारिक बयान जारी किया गया है। इसके बावजूद, यह खबर सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बनी हुई है, जहां लोग सेना प्रमुख के पारिवारिक आयोजन को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं। गौरतलब है कि जनरल आसिम मुनीर मौजूदा समय में पाकिस्तान की सबसे प्रभावशाली शख्सियतों में गिने जाते हैं। ऐसे में उनके परिवार से जुड़ी किसी भी निजी घटना पर देश-विदेश की नजरें टिकी रहती हैं।
नए साल से पहले थमेगा यूक्रेन युद्ध? ट्रंप–जेलेंस्की की अहम मुलाकात आज, 20 सूत्रीय शांति योजना पर मंथन
वॉशिंगटन/फ्लोरिडा। रूस-यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने की दिशा में आज एक अहम कूटनीतिक पहल देखने को मिल सकती है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की के बीच आज फ्लोरिडा में उच्चस्तरीय मुलाकात होने जा रही है। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य लगभग तीन साल से जारी युद्ध को खत्म करने के लिए ठोस रणनीति तैयार करना है। दोनों नेताओं के बीच 20 सूत्रीय शांति योजना पर विस्तार से चर्चा होने की संभावना है। क्या नए साल से पहले रुक पाएगा युद्ध? दुनियाभर की नजरें इस मुलाकात पर टिकी हैं। अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि अगर अमेरिका और यूक्रेन किसी साझा रोडमैप पर सहमत होते हैं, तो नए साल से पहले युद्धविराम की दिशा में ठोस कदम उठाए जा सकते हैं। हालांकि, रूस की सहमति और उसकी शर्तें इस पूरी प्रक्रिया में निर्णायक भूमिका निभाएंगी। 20 सूत्रीय शांति योजना में क्या हो सकता है शामिल? सूत्रों के मुताबिक, प्रस्तावित शांति योजना में कई अहम बिंदु शामिल हो सकते हैं, जिनमें— * तत्काल युद्धविराम और संघर्षविराम की समय-सीमा * विवादित क्षेत्रों में सैन्य गतिविधियों पर रोक * यूक्रेन की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता की गारंटी * रूस पर लगे प्रतिबंधों में चरणबद्ध ढील या समीक्षा * अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों की तैनाती * युद्ध से प्रभावित इलाकों के पुनर्निर्माण में आर्थिक सहायता किन मुद्दों पर होगी ट्रंप–जेलेंस्की में बात? बैठक में अमेरिका द्वारा यूक्रेन को दी जा रही सैन्य और आर्थिक मदद, नाटो की भूमिका, यूरोपीय देशों का समर्थन और रूस के साथ संभावित बातचीत के रास्तों पर भी चर्चा होने की उम्मीद है। इसके अलावा, ट्रंप की यह रणनीति भी अहम मानी जा रही है कि वह किस तरह रूस को बातचीत की मेज पर लाने की कोशिश करेंगे। वैश्विक राजनीति पर पड़ेगा असर यदि इस बैठक से कोई ठोस नतीजा निकलता है, तो इसका असर सिर्फ रूस और यूक्रेन तक सीमित नहीं रहेगा। यूरोप की सुरक्षा व्यवस्था, वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय राजनीति की दिशा भी इससे प्रभावित हो सकती है। उम्मीद और संशय दोनों बरकरार हालांकि शांति की कोशिशें तेज हुई हैं, लेकिन जमीनी हकीकत और रूस-यूक्रेन के बीच गहरे मतभेदों को देखते हुए रास्ता आसान नहीं माना जा रहा। फिर भी, ट्रंप और जेलेंस्की की यह मुलाकात युद्ध समाप्ति की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है। अब देखना यह होगा कि क्या यह कूटनीतिक पहल नए साल से पहले युद्ध पर विराम लगाने में सफल हो पाती है या नहीं।
बांग्लादेश में जेम्स के शो में हिंसा, पथराव के बाद फरीदपुर कॉन्सर्ट रद्द; कई दर्शक घायल
फरीदपुर (बांग्लादेश)। बांग्लादेश के मशहूर रॉक सिंगर जेम्स का फरीदपुर में प्रस्तावित कॉन्सर्ट उस समय रद्द करना पड़ा, जब कार्यक्रम स्थल पर अचानक हिंसा भड़क उठी। एक स्कूल की वर्षगांठ के मौके पर आयोजित इस कार्यक्रम में बेकाबू भीड़ ने ईंट-पत्थर फेंकने शुरू कर दिए, जिससे कई दर्शक और आयोजन से जुड़े लोग घायल हो गए। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, कार्यक्रम शुरू होने से पहले ही भीड़ का दबाव बढ़ता जा रहा था। किसी बात को लेकर हुई कहासुनी देखते ही देखते झड़प में बदल गई और माहौल तनावपूर्ण हो गया। पथराव के कारण मंच के आसपास मौजूद लोगों में अफरा-तफरी मच गई और लोग सुरक्षित स्थानों की ओर भागने लगे। हालात बिगड़ते देख आयोजकों ने तुरंत कॉन्सर्ट रद्द करने का फैसला लिया। सूचना मिलने पर पुलिस और प्रशासन की टीम मौके पर पहुंची और स्थिति को नियंत्रित किया। घायलों को इलाज के लिए नजदीकी अस्पतालों में भर्ती कराया गया है। पुलिस ने बताया कि घटना की जांच की जा रही है और उपद्रवियों की पहचान कर कानूनी कार्रवाई की जाएगी। कॉन्सर्ट रद्द होने से जेम्स के प्रशंसकों में निराशा का माहौल है। वहीं प्रशासन ने भविष्य में ऐसे बड़े कार्यक्रमों के दौरान सुरक्षा और भीड़ नियंत्रण को लेकर सख्त इंतजाम करने की बात कही है।
तारिक रहमान की घर वापसी से बदलेगा सियासी संतुलन? भारत-बांग्लादेश रिश्तों पर दिख सकता है नया असर
ढाका/नई दिल्ली: बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के वरिष्ठ नेता और पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के पुत्र तारिक रहमान की संभावित वतन वापसी को देश की राजनीति में एक बड़े सियासी घटनाक्रम के रूप में देखा जा रहा है। लंबे समय से विदेश में रह रहे तारिक रहमान की वापसी न केवल बांग्लादेश के आंतरिक राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित कर सकती है, बल्कि इसका सीधा असर भारत-बांग्लादेश के द्विपक्षीय संबंधों पर भी पड़ने की संभावना जताई जा रही है। विपक्ष को मिल सकती है नई धार राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, तारिक रहमान की सक्रिय राजनीति में वापसी से BNP को नई मजबूती मिल सकती है। वर्तमान राजनीतिक माहौल में विपक्ष बिखरा हुआ नजर आता है, ऐसे में तारिक रहमान की मौजूदगी पार्टी को संगठित कर सकती है और सरकार के खिलाफ आंदोलन को नई दिशा दे सकती है। इससे आने वाले चुनावों में सत्तारूढ़ अवामी लीग के लिए चुनौती बढ़ सकती है। भारत की चिंता और कूटनीतिक संतुलन भारत के लिए तारिक रहमान की वापसी अहम है, क्योंकि BNP के शासनकाल में दोनों देशों के रिश्तों में कई बार तनाव देखा गया था। सीमा सुरक्षा, आतंकवाद और उत्तर-पूर्व भारत में उग्रवादी गतिविधियों को लेकर नई दिल्ली की चिंताएं बढ़ी थीं। हालांकि मौजूदा अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में यह भी माना जा रहा है कि सत्ता में आने की स्थिति में BNP भारत के साथ व्यावहारिक और संतुलित संबंध बनाए रखने की कोशिश कर सकती है। क्षेत्रीय राजनीति पर भी नजर दक्षिण एशिया में चीन के बढ़ते प्रभाव और अमेरिका की सक्रियता के बीच बांग्लादेश की राजनीति में कोई भी बड़ा बदलाव क्षेत्रीय संतुलन को प्रभावित करता है। तारिक रहमान की वापसी से बांग्लादेश की विदेश नीति की प्राथमिकताओं में बदलाव संभव है, जिसका असर भारत सहित पूरे क्षेत्र पर पड़ सकता है। आगे क्या? कुल मिलाकर, तारिक रहमान की वतन वापसी बांग्लादेश की राजनीति में नया मोड़ ला सकती है। यह देखना दिलचस्प होगा कि उनकी वापसी राजनीतिक स्थिरता को मजबूत करती है या फिर भारत-बांग्लादेश संबंधों समेत क्षेत्रीय राजनीति में नई चुनौतियां खड़ी करती है।
बांग्लादेश में सियासी भूचाल: युवा नेता शरीफ उस्मान हादी की हत्या पर अंतरिम सरकार पर गंभीर आरोप
बांग्लादेश, 24 दिसंबर: बांग्लादेश की राजनीति एक बार फिर गहरे संकट में फंसती नजर आ रही है। युवा नेता और इंकलाब मंच के प्रवक्ता शरीफ उस्मान हादी की हत्या के बाद देशभर में विरोध प्रदर्शनों का सिलसिला तेज हो गया है। इस बीच हादी के परिवार ने अंतरिम सरकार पर सीधे और गंभीर आरोप लगाए हैं। हादी के बड़े भाई अबू बकर ने बयान जारी कर कहा कि उनके भाई की हत्या एक सोची-समझी साजिश का हिस्सा है, जिसका मकसद आगामी आम चुनावों को रद्द कराना है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस पूरी घटना के लिए मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार जिम्मेदार है। अबू बकर के आरोपों के बाद देश की सियासत में हलचल और तेज हो गई है। विपक्षी दलों ने मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है, वहीं राजधानी समेत कई शहरों में प्रदर्शन जारी हैं। इस घटनाक्रम ने बांग्लादेश में राजनीतिक अस्थिरता को और गहरा कर दिया है।
भारत में विरोध प्रदर्शनों के बाद कूटनीतिक हलचल, बांग्लादेश ने भारतीय उच्चायुक्त को किया तलब
नई दिल्ली, 23 दिसंबर: भारत में बांग्लादेशी राजनयिक मिशनों के बाहर हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद भारत-बांग्लादेश संबंधों में हलचल तेज हो गई है। बांग्लादेश सरकार ने राजनयिक सुरक्षा को लेकर चिंता जताते हुए ढाका में भारतीय उच्चायुक्त प्रणय वर्मा को तलब किया। इस घटनाक्रम को अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक हलकों में अहम माना जा रहा है। विदेश मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक, बांग्लादेश के विदेश सचिव असद आलम सियाम ने भारतीय उच्चायुक्त से मुलाकात कर नई दिल्ली, कोलकाता और अगरतला स्थित बांग्लादेशी उच्चायोगों की सुरक्षा स्थिति पर विस्तृत चर्चा की। बैठक के दौरान उन्होंने राजनयिक मिशनों, अधिकारियों और कर्मचारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने पर जोर दिया। सूत्रों का कहना है कि भारत में हुए हालिया विरोध प्रदर्शनों के बाद यूनुस सरकार सतर्क हो गई है और किसी भी तरह के कूटनीतिक तनाव को बढ़ने से रोकने की कोशिश कर रही है। वहीं, दोनों देशों के बीच संवाद बनाए रखने और हालात को नियंत्रण में रखने के लिए राजनयिक स्तर पर संपर्क जारी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम क्षेत्रीय स्थिरता और द्विपक्षीय संबंधों को संतुलित रखने की दिशा में उठाया गया है, ताकि किसी भी तरह की अप्रिय स्थिति से बचा जा सके।