कुआलालंपुर। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मलेशिया यात्रा ने भारत–मलेशिया संबंधों को नई ऊंचाई दी है। प्रधानमंत्री मोदी और मलेशियाई प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम के बीच हुई अहम वार्ता के बाद दोनों देशों ने रक्षा, ऊर्जा, व्यापार, मैन्युफैक्चरिंग और सेमीकंडक्टर जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में सहयोग को और मजबूत करने पर सहमति जताई। इस दौरान कुल 11 द्विपक्षीय समझौतों (MoUs) पर हस्ताक्षर हुए, जिन्हें दोनों देशों के रिश्तों में “नए अध्याय की शुरुआत” माना जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत और मलेशिया की साझेदारी केवल वर्तमान की जरूरत नहीं, बल्कि भविष्य की वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और तकनीकी आत्मनिर्भरता की मजबूत नींव है। उन्होंने जोर देकर कहा कि दोनों देश मिलकर इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में स्थिरता, समृद्धि और सुरक्षा को बढ़ावा देंगे। रक्षा सहयोग में नई दिशा वार्ता के दौरान रक्षा क्षेत्र में सहयोग को गहरा करने पर विशेष जोर दिया गया। संयुक्त प्रशिक्षण, रक्षा उपकरणों के निर्माण और तकनीकी सहयोग को आगे बढ़ाने पर सहमति बनी। पीएम मोदी ने कहा कि **रक्षा साझेदारी आपसी विश्वास और साझा सुरक्षा हितों का प्रतीक है। ऊर्जा और ग्रीन ट्रांजिशन पर फोकस ऊर्जा क्षेत्र में स्वच्छ और नवीकरणीय ऊर्जा को लेकर दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ाने पर सहमति बनी। हरित हाइड्रोजन, सोलर और ऊर्जा भंडारण जैसे क्षेत्रों में संयुक्त प्रयासों से सतत विकास लक्ष्यों को गति मिलेगी। सेमीकंडक्टर और मैन्युफैक्चरिंग में बड़ा कदम सेमीकंडक्टर निर्माण को लेकर हुए समझौते को खास अहमियत दी जा रही है। पीएम मोदी ने कहा कि भारत की ‘मेक इन इंडिया’ और ‘डिजिटल इंडिया’ पहल को मलेशिया की तकनीकी विशेषज्ञता से नई मजबूती मिलेगी। इससे वैश्विक सप्लाई चेन में दोनों देशों की भूमिका और मजबूत होगी। व्यापार और निवेश को मिलेगी रफ्तार व्यापारिक संबंधों को बढ़ाने, निवेश को प्रोत्साहित करने और MSMEs के लिए नए अवसर खोलने पर भी सहमति बनी। दोनों नेताओं ने व्यापार बाधाओं को कम करने और द्विपक्षीय व्यापार को नए स्तर तक ले जाने का संकल्प दोहराया। पीएम मोदी का संदेश प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, “भारत और मलेशिया की दोस्ती विश्वास, सम्मान और साझा भविष्य पर आधारित है। आज किए गए समझौते आने वाले वर्षों में दोनों देशों के युवाओं, उद्योगों और अर्थव्यवस्था के लिए नए अवसर लेकर आएंगे।” मलेशियाई प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम ने भी भारत को विश्वसनीय रणनीतिक साझेदार बताते हुए कहा कि यह सहयोग दोनों देशों के लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाएगा। कुल मिलाकर, पीएम मोदी की मलेशिया यात्रा ने यह साफ कर दिया है कि रक्षा से ऊर्जा और सेमीकंडक्टर तक भारत–मलेशिया की दोस्ती अब सिर्फ कूटनीतिक नहीं, बल्कि भविष्य-केंद्रित रणनीतिक साझेदारी बन चुकी है।
मलेशिया में गूंजेगा भारत का डिजिटल दम: पीएम मोदी का ऐलान—जल्द मलेशिया पहुंचेगा UPI
कुआलालंपुर | विशेष रिपोर्ट: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शनिवार को दो दिवसीय आधिकारिक यात्रा पर मलेशिया पहुंचे, जहां उन्होंने भारत–मलेशिया संबंधों को नई डिजिटल ऊंचाइयों पर ले जाने का बड़ा संकेत दिया। कुआलालंपुर में आयोजित एक भव्य कार्यक्रम के दौरान भारतीय समुदाय को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने ऐलान किया कि भारत का विश्वप्रसिद्ध डिजिटल पेमेंट सिस्टम यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) जल्द ही मलेशिया में भी शुरू किया जाएगा। प्रधानमंत्री ने कहा कि यह कदम दोनों देशों के बीच आर्थिक और तकनीकी सहयोग को और मजबूत करेगा। उन्होंने इसे “डिजिटल कनेक्टिविटी के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक उपलब्धि” करार दिया। डिजिटल सहयोग को मिलेगा नया आयाम पीएम मोदी ने अपने संबोधन में बताया कि भारत और मलेशिया के बीच डिजिटल साझेदारी तेजी से आगे बढ़ रही है। उन्होंने कहा, “मलेशिया–भारत डिजिटल काउंसिल हमारे डिजिटल सहयोग के लिए नए मार्ग खोल रही है। मुझे यह साझा करते हुए खुशी हो रही है कि भारत की यूपीआई जल्द ही मलेशिया में भी आ जाएगी।” UPI के मलेशिया पहुंचने से वहां रहने वाले भारतीय समुदाय के साथ-साथ स्थानीय नागरिकों को भी तेज, सुरक्षित और आसान डिजिटल भुगतान की सुविधा मिलेगी। इससे व्यापार, पर्यटन और रोजमर्रा के लेनदेन में उल्लेखनीय तेजी आने की उम्मीद है। भारतीय आईटी कंपनियों की मजबूत मौजूदगी प्रधानमंत्री मोदी ने मलेशिया में भारतीय आईटी कंपनियों की अहम भूमिका पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि वर्तमान में 100 से अधिक भारतीय आईटी कंपनियां मलेशिया में सक्रिय हैं, जिनके जरिए हजारों लोगों को रोजगार मिला है। यह भारत की तकनीकी क्षमता और वैश्विक विश्वास का प्रमाण है। उन्होंने कहा कि भारतीय कंपनियां न केवल तकनीक ला रही हैं, बल्कि कौशल विकास, नवाचार और रोजगार सृजन में भी अहम योगदान दे रही हैं। भारतीय समुदाय को बताया ‘सेतु’ अपने संबोधन में पीएम मोदी ने मलेशिया में बसे भारतीय समुदाय की सराहना करते हुए उन्हें भारत और मलेशिया के बीच “सांस्कृतिक और आर्थिक सेतु” बताया। उन्होंने कहा कि भारतीय समुदाय ने मलेशिया की प्रगति में महत्वपूर्ण योगदान दिया है और भारत को उन पर गर्व है। भविष्य की ओर मजबूत कदम विशेषज्ञों के अनुसार, UPI का मलेशिया में विस्तार भारत के डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर की वैश्विक स्वीकार्यता को और मजबूत करेगा। यह कदम भारत को डिजिटल नवाचार के वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक और निर्णायक पहल माना जा रहा है। प्रधानमंत्री की यह यात्रा न केवल द्विपक्षीय संबंधों को नई ऊर्जा देगी, बल्कि डिजिटल युग में भारत की नेतृत्वकारी भूमिका को भी रेखांकित करेगी।
भारत-अमेरिका ट्रेड डील: जीरो टैरिफ से खुलेगा कारोबार का नया अध्याय, किसानों और MSMEs को बड़ी राहत
नई दिल्ली। भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से चली आ रही व्यापार वार्ताओं के बाद आखिरकार एक अहम अंतरिम ट्रेड डील (Interim Trade Deal) पर सहमति बन गई है। इस समझौते को दोनों देशों के आर्थिक रिश्तों में टर्निंग पॉइंट माना जा रहा है। डील के तहत अमेरिका कई भारतीय उत्पादों पर लगाए गए भारी टैरिफ में बड़ी कटौती करेगा, वहीं कुछ चुनिंदा सेक्टरों में जीरो टैरिफ की व्यवस्था भी की जाएगी। 50% से घटकर 18% होगा अमेरिकी टैरिफ इस समझौते के अनुसार अमेरिका भारतीय उत्पादों पर लगने वाले टैरिफ को औसतन 50% से घटाकर 18% करेगा। इससे भारतीय निर्यातकों की प्रतिस्पर्धा क्षमता बढ़ेगी और अमेरिका के विशाल बाजार में भारतीय उत्पाद पहले से सस्ते और आकर्षक बनेंगे। किन सेक्टरों को मिलेगा सबसे ज्यादा फायदा इस ट्रेड डील का सीधा लाभ भारत के MSMEs, किसानों और मछुआरों को मिलने की उम्मीद है। खासतौर पर निम्न क्षेत्रों में राहत मिलेगी— कृषि उत्पाद: चावल, मसाले, दालें और ऑर्गेनिक उत्पाद मत्स्य उद्योग: झींगा, मछली और सी-फूड एक्सपोर्ट MSME सेक्टर: टेक्सटाइल, लेदर, हैंडीक्राफ्ट और इंजीनियरिंग गुड्स फूड प्रोसेसिंग और एग्री-बेस्ड प्रोडक्ट्स इन क्षेत्रों में कुछ उत्पादों पर जीरो टैरिफ लागू होने की संभावना है, जिससे निर्यात लागत में भारी कमी आएगी। रोजगार और विदेशी मुद्रा पर पड़ेगा सकारात्मक असर विशेषज्ञों का मानना है कि इस डील से भारत में नए रोजगार के अवसर पैदा होंगे निर्यात में बढ़ोतरी होगी विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत होगा खासतौर पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था और तटीय क्षेत्रों में इसका असर साफ दिख सकता है। भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी को मिलेगी मजबूती यह ट्रेड डील केवल आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक साझेदारी को भी मजबूत करेगी। वैश्विक सप्लाई चेन में भारत की भूमिका बढ़ेगी और अमेरिका के लिए भारत एक भरोसेमंद ट्रेड पार्टनर के रूप में उभरेगा। अंतिम समझौते की ओर बढ़ते कदम फिलहाल यह एक अंतरिम समझौता है, लेकिन दोनों देशों ने संकेत दिए हैं कि आने वाले महीनों में इसे पूर्ण व्यापार समझौते (Comprehensive Trade Agreement) में बदला जा सकता है। भारत-अमेरिका ट्रेड डील को भारत की अर्थव्यवस्था, खासकर छोटे उद्यमियों और किसानों के लिए गेम चेंजर माना जा रहा है।
भारत पर अमेरिकी टैरिफ में बड़ी कटौती, रूस से तेल खरीद पर भी बड़ा संकेत
नई दिल्ली/वॉशिंगटन। भारत और अमेरिका के रिश्तों में एक बार फिर बड़ा मोड़ आया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच हुए उच्चस्तरीय समझौते के बाद अमेरिका ने भारत पर लगाए गए टैरिफ में बड़ी राहत दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत पर लगने वाला टैरिफ 25 फीसदी से घटाकर सीधे 18 फीसदी करने का ऐलान किया है। इसके साथ ही दोनों देशों के बीच व्यापारिक टैरिफ अब केवल 18 फीसदी रह गया है, जिसे द्विपक्षीय व्यापार संबंधों के लिहाज से एक अहम कदम माना जा रहा है। भारतीय निर्यातकों को मिलेगी बड़ी राहत टैरिफ में इस कटौती से भारतीय निर्यातकों को सीधा फायदा मिलने की उम्मीद है। खासकर टेक्सटाइल, फार्मास्यूटिकल्स, ऑटो कंपोनेंट्स और आईटी से जुड़े उत्पादों के लिए अमेरिकी बाजार और ज्यादा अनुकूल हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भारत-अमेरिका व्यापार में तेजी आएगी और निवेश के नए रास्ते खुलेंगे। रूस से तेल खरीद पर ट्रंप का दावा इस समझौते के साथ ही राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक और बड़ा दावा किया है। ट्रंप के मुताबिक, भारत अब रूस से तेल नहीं खरीदेगा। यह बयान ऐसे समय आया है जब वैश्विक स्तर पर ऊर्जा आपूर्ति और भू-राजनीतिक तनाव लगातार चर्चा में हैं। अगर यह दावा जमीन पर उतरता है, तो इसका असर अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार और भारत की ऊर्जा नीति पर भी दिख सकता है। रणनीतिक साझेदारी को नई धार राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह समझौता केवल व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत-अमेरिका की रणनीतिक साझेदारी को भी मजबूत करता है। टैरिफ में कटौती और ऊर्जा नीति को लेकर दिए गए संकेत यह बताते हैं कि दोनों देश वैश्विक मंच पर एक-दूसरे के करीब आ रहे हैं। अब सबकी नजर इस बात पर है कि यह समझौता कब और कैसे पूरी तरह लागू होता है। टैरिफ में कमी और ऊर्जा खरीद से जुड़े फैसलों का असर आने वाले महीनों में व्यापार आंकड़ों और कूटनीतिक रिश्तों में साफ तौर पर दिख सकता है। फिलहाल, मोदी–ट्रंप बातचीत को भारत-अमेरिका संबंधों में एक बड़े ब्रेकथ्रू के तौर पर देखा जा रहा है।
अमेरिका-ईरान तनाव के बीच ट्रंप का बड़ा दावा, बोले– ‘समय सीमा दी है’
वॉशिंगटन / तेहरान: अमेरिका और ईरान के बीच जारी तीखी जुबानी जंग के बीच एक बार फिर कूटनीतिक हलचल तेज हो गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि ईरान सैन्य टकराव के बजाय समझौते का रास्ता अपनाना चाहता है। व्हाइट हाउस के ओवल ऑफिस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा, “मैं इतना कह सकता हूं कि वे समझौता करना चाहते हैं।” ट्रंप के इस बयान ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई बहस छेड़ दी है, खासकर ऐसे समय में जब दोनों देशों के बीच तनाव चरम पर है और खाड़ी क्षेत्र में सैन्य गतिविधियां बढ़ती जा रही हैं। परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम पर बातचीत को लेकर डेडलाइन जब ट्रंप से पूछा गया कि क्या उन्होंने ईरान को उसके परमाणु और मिसाइल कार्यक्रमों पर बातचीत शुरू करने के लिए कोई समय सीमा तय की है, तो उन्होंने सीधे जवाब दिया, “हां, मैंने दी है।” हालांकि, उन्होंने उस समय सीमा का खुलासा करने से इनकार कर दिया। विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान ईरान पर कूटनीतिक दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा हो सकता है। ईरान की चेतावनी और अमेरिका की ताकत का प्रदर्शन जहां एक ओर ईरान लगातार अमेरिका को हमले को लेकर चेतावनी दे रहा है, वहीं दूसरी ओर अमेरिका ने भी अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ा दी है। अमेरिकी नौसैनिक विमानवाहक पोत समूह का जिक्र करते हुए ट्रंप ने कहा,“हमारा एक विशाल नौसैनिक बेड़ा इस समय ईरान की ओर बढ़ रहा है।” इस बयान को अमेरिका की सख्त चेतावनी के तौर पर देखा जा रहा है कि यदि बातचीत विफल होती है, तो सभी विकल्प खुले हैं। ‘उम्मीद है समझौता हो जाएगा’ ट्रंप ने साथ ही सुलह की संभावना भी जताई। उन्होंने कहा, “उम्मीद है कि हम समझौता कर लेंगे। अगर समझौता हो जाता है तो यह अच्छी बात है। अगर नहीं होता है, तो हम देखेंगे कि आगे क्या होता है।” यह बयान ट्रंप प्रशासन की दोहरी रणनीति को दर्शाता है—एक तरफ बातचीत का प्रस्ताव, दूसरी ओर सैन्य दबाव। मानवाधिकार मुद्दे पर भी संकेत ट्रंप ने ईरान द्वारा प्रदर्शनकारियों को फांसी देने की प्रक्रिया को रोकने के फैसले का भी जिक्र किया और इसे इस बात का संकेत बताया कि ईरान बातचीत के लिए तैयार हो सकता है। मानवाधिकार संगठनों के अनुसार, हालिया कार्रवाई में ईरान में 6,000 से अधिक लोगों की मौत हुई थी, जिस पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कड़ी आलोचना हुई थी। फिलहाल दुनिया की नजर अमेरिका-ईरान संबंधों पर टिकी हुई है। क्या दोनों देश बातचीत की मेज पर बैठेंगे या टकराव और गहराएगा—इसका जवाब आने वाले दिनों में मिलेगा। एक बात तय है: ट्रंप के बयान ने इस वैश्विक संकट में एक नया मोड़ जरूर ला दिया है।
नरसिंगदी में हिंदू युवक की जिंदा जलाकर हत्या, सोते समय गैराज में लगाई गई आग
नरसिंगदी (बांग्लादेश): बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं। ताजा मामला नरसिंगदी ज़िले से सामने आया है, जहां 23 वर्षीय हिंदू युवक चंचल चंद्र भौमिक की सोते समय जिंदा जलाकर हत्या कर दी गई। यह घटना इलाके में भय और आक्रोश का माहौल पैदा कर रही है। मिली जानकारी के अनुसार, चंचल चंद्र भौमिक स्थानीय स्तर पर एक **गैराज कर्मचारी** के रूप में काम करता था। रोज़ की तरह काम खत्म करने के बाद वह उसी गैराज में सो गया था। देर रात अज्ञात हमलावरों ने गैराज में आग लगा दी, जिससे चंचल की मौके पर ही जलकर मौत हो गई। सोते समय बनाया गया निशाना स्थानीय लोगों का कहना है कि आग इतनी तेज़ थी कि चंचल को बाहर निकलने का कोई मौका नहीं मिला। सुबह जब आसपास के लोगों ने धुआं उठता देखा, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। दमकल विभाग और पुलिस को सूचना दी गई, लेकिन युवक की जान नहीं बचाई जा सकी। जांच में जुटी पुलिस पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है और मामले की जांच शुरू कर दी गई है। हालांकि अब तक हमलावरों की पहचान नहीं हो सकी है। प्रारंभिक जांच में इसे आपराधिक साजिश माना जा रहा है, लेकिन स्थानीय हिंदू समुदाय इसे सांप्रदायिक हिंसा से जोड़कर देख रहा है। हिंदू समुदाय में डर और आक्रोश घटना के बाद इलाके में हिंदू समुदाय में दहशत का माहौल है। स्थानीय लोगों का कहना है कि अल्पसंख्यकों पर हमले लगातार बढ़ रहे हैं, लेकिन दोषियों पर सख्त कार्रवाई नहीं हो पा रही। समुदाय के नेताओं ने सरकार से सुरक्षा बढ़ाने और निष्पक्ष जांच की मांग की है। अंतरराष्ट्रीय चिंता का विषय मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा गंभीर चिंता का विषय बन चुकी है। इस तरह की घटनाएं न केवल कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाती हैं, बल्कि देश की सामाजिक सौहार्द्र पर भी गहरा आघात करती हैं।
दावोस से भारत के लिए बड़ा संकेत: ट्रंप बोले— ‘प्रधानमंत्री मोदी शानदार नेता, भारत के साथ जल्द होगी बड़ी ट्रेड डील’
दावोस। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की खुलकर तारीफ की है। स्विट्ज़रलैंड के दावोस में आयोजित वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) के दौरान मनी कंट्रोल को दिए गए एक एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में ट्रंप ने कहा कि अमेरिका भारत के साथ व्यापारिक रिश्तों को और मज़बूत करने की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है और दोनों देशों के बीच जल्द ही एक “अच्छी डील” होने की पूरी संभावना है। ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अपने व्यक्तिगत संबंधों का ज़िक्र करते हुए कहा, “हम प्रधानमंत्री मोदी का बहुत सम्मान करते हैं। मोदी एक शानदार इंसान हैं और मेरे अच्छे दोस्त भी हैं।” उन्होंने यह भी कहा कि भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है और अमेरिका भारत को एक अहम रणनीतिक और आर्थिक साझेदार मानता है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने संकेत दिए कि भारत और अमेरिका के बीच व्यापार से जुड़े कुछ लंबित मुद्दों पर सकारात्मक बातचीत चल रही है। ट्रंप के अनुसार, दोनों देश ऐसे समझौते पर काम कर रहे हैं जिससे न सिर्फ़ द्विपक्षीय व्यापार बढ़ेगा, बल्कि निवेश, तकनीक और रोज़गार के नए अवसर भी पैदा होंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह ट्रेड डील होती है, तो इसका सीधा फायदा भारतीय निर्यातकों, आईटी सेक्टर, मैन्युफैक्चरिंग और स्टार्टअप इकोसिस्टम को मिल सकता है। वहीं अमेरिका के लिए भारत एक बड़ा उपभोक्ता बाज़ार और भरोसेमंद रणनीतिक सहयोगी बनकर उभरेगा। दावोस जैसे वैश्विक मंच से भारत के पक्ष में दिया गया ट्रंप का यह बयान अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के लिए भी एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। यह संदेश साफ़ करता है कि अमेरिका भारत के साथ अपने रिश्तों को केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से भी नई ऊंचाइयों पर ले जाना चाहता है। ट्रंप के इस बयान के बाद यह उम्मीद और मज़बूत हुई है कि आने वाले समय में भारत-अमेरिका संबंध और प्रगाढ़ होंगे। चाहे वह रक्षा सहयोग हो, टेक्नोलॉजी पार्टनरशिप या फिर व्यापार—दोनों देश वैश्विक मंच पर एक-दूसरे के भरोसेमंद सहयोगी के रूप में आगे बढ़ते दिख रहे हैं। कुल मिलाकर, दावोस से ट्रंप का यह संदेश भारत के लिए राजनीतिक और आर्थिक—दोनों दृष्टि से बेहद अहम माना जा रहा है।
13 राज्यों से 50 स्टेट तक: अमेरिका का विस्तारवादी सफ़र और ‘ऑपरेशन ग्रीनलैंड’ की अंदरूनी कहानी
विशेष रिपोर्ट :डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड को लेकर दिए गए बयानों ने एक बार फिर अमेरिका के विस्तारवादी इतिहास को वैश्विक बहस के केंद्र में ला दिया है। यह कोई नई सोच नहीं है—अमेरिका का इतिहास ही विस्तार, खरीद, युद्ध और कूटनीति के ज़रिये सीमाएँ बढ़ाने की कहानी है। आज का अमेरिका, जो 50 राज्यों का संघ है, कभी केवल 13 उपनिवेशों तक सीमित था। सवाल यह है कि यह परिवर्तन कैसे और किन ऐतिहासिक मोड़ों से होकर गुज़रा? शुरुआत: 13 उपनिवेशों से एक राष्ट्र तक (1776) 1776 में ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता प्राप्त करने के समय अमेरिका केवल अटलांटिक तट के किनारे बसे 13 उपनिवेशों का समूह था। ये राज्य थे—न्यू हैम्पशायर, मैसाचुसेट्स, रोड आइलैंड, कनेक्टिकट, न्यूयॉर्क, न्यू जर्सी, पेनसिल्वेनिया, डेलावेयर, मैरीलैंड, वर्जीनिया, नॉर्थ कैरोलाइना, साउथ कैरोलाइना और जॉर्जिया। स्वतंत्रता के तुरंत बाद ही अमेरिका में यह धारणा मज़बूत होने लगी कि उसे पूरे महाद्वीप में फैलना चाहिए—इसे बाद में “मैनिफेस्ट डेस्टिनी” कहा गया। लुइसियाना खरीद: एक सौदे ने बदला नक्शा (1803) अमेरिकी विस्तार की सबसे निर्णायक घटना थी लुइसियाना परचेज़। 1803 में अमेरिका ने फ्रांस से लगभग 8 लाख वर्ग मील क्षेत्र मात्र 15 मिलियन डॉलर में खरीद लिया। * इससे अमेरिका का क्षेत्रफल लगभग दोगुना हो गया * मिसिसिपी नदी पर नियंत्रण मिला * पश्चिम की ओर विस्तार का रास्ता खुल गया यह सौदा आज भी इतिहास के सबसे सस्ते और प्रभावशाली भू-राजनीतिक सौदों में गिना जाता है। फ्लोरिडा से लेकर टेक्सास तक: दबाव और कूटनीति * 1819 में स्पेन से फ्लोरिडा हासिल किया गया * 1845 में टेक्सास को अमेरिका में शामिल किया गया, जो पहले मैक्सिको का हिस्सा था टेक्सास के विलय ने सीधे तौर पर अगले बड़े संघर्ष की नींव रखी। मेक्सिको-अमेरिका युद्ध: ताक़त से सीमाओं का विस्तार (1846–1848)इस युद्ध के बाद अमेरिका ने मैक्सिको से विशाल क्षेत्र हासिल किए: * कैलिफ़ोर्निया * नेवादा * यूटा * एरिज़ोना * न्यू मैक्सिको * कोलोराडो का बड़ा हिस्सा इसके बाद अमेरिका प्रशांत महासागर तक पहुँच गया और एक महाद्वीपीय शक्ति बन गया। 1867 में अमेरिका ने रूस से अलास्का को 7.2 मिलियन डॉलर में खरीदा। उस समय इसे “सीवर्ड्स फॉली” (सीवर्ड की मूर्खता) कहा गया, लेकिन बाद में: * सोना * तेल * प्राकृतिक गैस * सामरिक स्थिति ने इसे अमेरिका की रणनीतिक संपत्ति बना दिया। 1898 में अमेरिका ने हवाई को अपने नियंत्रण में लिया। यही वह दौर था जब अमेरिका ने खुद को केवल महाद्वीपीय नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति के रूप में देखना शुरू किया। 50वां राज्य: विस्तार की अंतिम कड़ी (1959) * अलास्का – जनवरी 1959 * हवाई – अगस्त 1959 इनके साथ अमेरिका आधिकारिक रूप से 50 राज्यों का देश बना। ट्रंप और ‘ऑपरेशन ग्रीनलैंड’: इतिहास की गूंज डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड को “खरीदने” का विचार पहली बार 2019 में सामने आया। भले ही यह प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ा, लेकिन: * यह अमेरिका की ऐतिहासिक विस्तारवादी सोच की याद दिलाता है * आर्कटिक क्षेत्र में संसाधनों और रणनीतिक बढ़त की दौड़ को दर्शाता है * चीन और रूस की बढ़ती मौजूदगी के संदर्भ में इसे देखा गया ग्रीनलैंड आज भी डेनमार्क का हिस्सा है, लेकिन ट्रंप का बयान यह दिखाता है कि अमेरिकी राजनीति में भू-रणनीतिक विस्तार की सोच अब भी जीवित है। 13 राज्यों से 50 राज्यों तक का अमेरिका का सफ़र केवल नक्शे का विस्तार नहीं था—यह शक्ति, संसाधन, युद्ध और कूटनीति का मिश्रण रहा है। ट्रंप का ग्रीनलैंड बयान उसी लंबी ऐतिहासिक परंपरा की एक आधुनिक झलक है। अमेरिका का इतिहास बताता है—उसकी सीमाएँ हमेशा सिर्फ़ ज़मीन से नहीं, बल्कि महत्वाकांक्षाओं से तय हुई हैं।
डेढ़ घंटे की कूटनीति, 200 अरब डॉलर की छलांग
भारत–यूएई की मेगा डील ने दक्षिण एशियाई भू-राजनीति का संतुलन बदला नई दिल्ली / अबू धाबी :प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान के बीच हुई महज़ डेढ़ घंटे की मुलाकात ने वैश्विक आर्थिक और रणनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। दोनों देशों ने वर्ष 2032 तक द्विपक्षीय व्यापार को 200 अरब डॉलर तक पहुँचाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है। यह समझौता केवल आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि भारत की तेजी से बढ़ती वैश्विक आर्थिक हैसियत और खाड़ी देशों के साथ उसकी मजबूत होती रणनीतिक साझेदारी का स्पष्ट संकेत है। एक मुलाकात, कई संदेश भारत और यूएई के नेताओं की इस बैठक को कूटनीतिक जानकार “फास्ट-ट्रैक डिप्लोमेसी” का बेहतरीन उदाहरण मान रहे हैं। जिस समझौते को अंतिम रूप देने में कई देशों को वर्षों लग जाते हैं, उसे भारत और यूएई ने बेहद कम समय में ठोस दिशा दे दी। विशेषज्ञों के अनुसार, यह डील उस तथाकथित “ऐतिहासिक”सऊदी समझौते से दस गुना बड़ी है, जिसे लेकर पाकिस्तान लंबे समय से अपनी उपलब्धि के रूप में प्रचार करता रहा है। किन क्षेत्रों में होगा सबसे बड़ा असर इस 200 अरब डॉलर के लक्ष्य को पाने के लिए दोनों देश कई प्रमुख क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर सहमत हुए हैं: * ऊर्जा और नवीकरणीय संसाधन * डिजिटल ट्रेड और फिनटेक * रक्षा और एयरोस्पेस सहयोग * इंफ्रास्ट्रक्चर और लॉजिस्टिक्स * फूड सिक्योरिटी और एग्री-टेक यूएई पहले से ही भारत के शीर्ष व्यापारिक साझेदारों में शामिल है, और यह नया लक्ष्य इस रिश्ते को पूरी तरह रणनीतिक साझेदारी में बदल देता है। पाकिस्तान के लिए असहज संकेत क्षेत्रीय राजनीति पर नज़र रखने वालों का मानना है कि यह डील अप्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तान के लिए भी एक सख़्त संदेश है। जहां पाकिस्तान अभी भी निवेश के वादों और एमओयू के स्तर पर अटका हुआ है, वहीं भारत ठोस परिणामों और दीर्घकालिक लक्ष्यों के साथ आगे बढ़ रहा है। भारत की बदलती वैश्विक छवि यह समझौता इस बात का प्रमाण है कि भारत अब केवल एक उभरती अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में प्रभावशाली भूमिका निभाने वाला देश बन चुका है। मोदी सरकार की आर्थिक कूटनीति—ट्रेड + टेक्नोलॉजी + ट्रस्ट—का यह सबसे मजबूत उदाहरण माना जा रहा है। डेढ़ घंटे की इस मुलाकात ने साफ कर दिया है कि आज की वैश्विक राजनीति में गंभीर नेतृत्व, स्पष्ट दृष्टि और भरोसेमंद साझेदारी ही असली पूंजी है। भारत–यूएई की यह 200 अरब डॉलर की छलांग न सिर्फ आर्थिक इतिहास रचेगी, बल्कि आने वाले दशक में एशिया और खाड़ी क्षेत्र की शक्ति-संतुलन को भी नए सिरे से परिभाषित करेगी।
सिलीगुड़ी कॉरिडोर के साए में कूटनीति: भारत के लिए नई चुनौती खड़ी कर रहा बांग्लादेश–चीन समीकरण
विशेष रिपोर्ट | भारत–बांग्लादेश संबंधों में चल रहे तनाव के बीच ढाका से एक ऐसा घटनाक्रम सामने आया है, जिसने नई दिल्ली की रणनीतिक चिंताओं को और गहरा कर दिया है। बांग्लादेश में यूनुस सरकार के कार्यकाल के दौरान चीनी राजदूत याओ वेन को तीस्ता नदी परियोजना क्षेत्र का दौरा कराया गया—एक ऐसा इलाका जो भारत के अत्यंत संवेदनशील सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) के बेहद करीब स्थित है। यह दौरा केवल एक तकनीकी या विकासात्मक पहल नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे दक्षिण एशिया की बदलती भू-राजनीति के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। तीस्ता परियोजना: विकास या रणनीतिक दांव? तीस्ता नदी लंबे समय से भारत और बांग्लादेश के बीच जल-विवाद का विषय रही है। अब चीन द्वारा प्रस्तावित तीस्ता मास्टर प्लान को बांग्लादेश में तेजी से आगे बढ़ाने की बात सामने आ रही है। इस परियोजना के तहत नदी प्रबंधन, सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण और इंफ्रास्ट्रक्चर विकास जैसे पहलुओं पर काम होना है, लेकिन इसके पीछे चीन की रणनीतिक मौजूदगी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह परियोजना चीनी तकनीक, फंडिंग और निगरानी में आगे बढ़ती है, तो इससे भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र की सुरक्षा और कनेक्टिविटी पर अप्रत्यक्ष असर पड़ सकता है। सिलीगुड़ी कॉरिडोर: भारत की जीवनरेखा सिलीगुड़ी कॉरिडोर भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को शेष भारत से जोड़ने वाला एकमात्र संकरा भू-भाग है। इसकी चौड़ाई कुछ स्थानों पर मात्र 20–25 किलोमीटर रह जाती है। इसी कारण इस क्षेत्र के आसपास होने वाली हर अंतरराष्ट्रीय गतिविधि भारत के लिए रणनीतिक चेतावनी मानी जाती है। चीनी राजदूत का इस क्षेत्र के नजदीक दौरा और बांग्लादेश सरकार की सक्रिय भूमिका यह संकेत देती है कि ढाका अब केवल संतुलन की नीति तक सीमित नहीं रहना चाहता। यूनुस सरकार का संदेश क्या है? यूनुस सरकार द्वारा चीनी राजदूत को इस संवेदनशील क्षेत्र में ले जाना कई सवाल खड़े करता है: * क्या बांग्लादेश भारत पर दबाव बनाने की रणनीति अपना रहा है? * क्या चीन को क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में बड़ी भूमिका देने की तैयारी है? * या फिर यह भारत को यह संदेश है कि ढाका के पास विकल्प मौजूद हैं? राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह कदम भारत के साथ चल रही बातचीत—चाहे वह जल बंटवारा हो, व्यापार या सीमा प्रबंधन—में बांग्लादेश की सौदेबाजी की ताकत बढ़ाने का प्रयास भी हो सकता है।