गाजा शांति पहल में भारत की भूमिका बढ़ी: ट्रंप ने पीएम मोदी को ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में शामिल होने का दिया न्योता

वॉशिंगटन/नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गाजा के लिए गठित अंतरराष्ट्रीय संगठन बोर्ड ऑफ पीस’ में शामिल होने का औपचारिक न्योता दिया है। यह कदम गाजा में जारी संघर्ष को समाप्त कर स्थायी शांति, मानवीय सहायता और पुनर्निर्माण की दिशा में एक अहम पहल के रूप में देखा जा रहा है। ट्रंप प्रशासन का मानना है कि भारत की वैश्विक साख, संतुलित विदेश नीति और मानवीय दृष्टिकोण इस बोर्ड को मजबूती प्रदान करेगा। क्या है ‘बोर्ड ऑफ पीस’? ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की घोषणा 15 जनवरी को राष्ट्रपति ट्रंप की 20 बिंदुओं वाली शांति योजना के दूसरे चरण के तहत की गई थी। इस अंतरराष्ट्रीय बोर्ड का मुख्य उद्देश्य गाजा में हथियारों के खात्मे की निगरानी, आम नागरिकों तक मानवीय सहायता की निर्बाध आपूर्ति, युद्ध से तबाह बुनियादी ढांचे के पुनर्निर्माण और एक नई, स्थिर शासन व्यवस्था की रूपरेखा तैयार करना है। भारत की भूमिका क्यों अहम? भारत लंबे समय से मध्य-पूर्व में शांति और संवाद का पक्षधर रहा है। गाजा संकट के दौरान भी भारत ने मानवीय सहायता भेजी है और संघर्षविराम की अपील की है। ऐसे में पीएम मोदी को बोर्ड में शामिल होने का न्योता भारत की बढ़ती वैश्विक कूटनीतिक भूमिका को दर्शाता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत की भागीदारी से बोर्ड को एक संतुलित और विश्वसनीय नेतृत्व मिल सकता है। शांति योजना का दूसरा चरण ट्रंप की 20 बिंदुओं वाली योजना के दूसरे चरण में संघर्षविराम के बाद दीर्घकालिक शांति पर जोर दिया गया है। इसमें हथियारों के पूर्ण निष्क्रियकरण, राहत एजेंसियों के लिए सुरक्षित गलियारे, स्कूल-अस्पतालों का पुनर्निर्माण और स्थानीय प्रशासन को सशक्त करने जैसे मुद्दे शामिल हैं। ‘बोर्ड ऑफ पीस’ इन्हीं लक्ष्यों की निगरानी करेगा। सूत्रों के अनुसार, भारत इस न्योते पर विचार कर रहा है और अंतिम फैसला कूटनीतिक स्तर पर विमर्श के बाद लिया जाएगा। यदि पीएम मोदी इस बोर्ड में शामिल होते हैं, तो यह न केवल गाजा में शांति प्रयासों को नई दिशा देगा, बल्कि भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी को भी और मजबूत करेगा। कुल मिलाकर, गाजा संकट के समाधान की दिशा में यह पहल अंतरराष्ट्रीय सहयोग का नया अध्याय खोल सकती है, जिसमें भारत की संभावित भागीदारी वैश्विक शांति प्रयासों के लिए निर्णायक साबित हो सकती है।

150 साल बाद स्पेन को मिलने जा रही है रानी, जानिए कौन हैं राजकुमारी लियोनोर जो इतिहास रचने को तैयार

मैड्रिड। स्पेन के शाही इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ने जा रहा है। करीब 150 साल बाद पहली बार देश की गद्दी पर रानी का शासन देखने को मिलेगा। राजा फेलिप VI और रानी लेटिजिया की 20 वर्षीय बेटी राजकुमारी लियोनोर स्पेन की अगली शासक होंगी। वह वर्तमान में प्रिंसेस ऑफ ऑस्टुरियस (Crown Princess) हैं और संवैधानिक रूप से सिंहासन की उत्तराधिकारी हैं। 150 साल बाद महिला शासक स्पेन में आखिरी बार रानी इसाबेला द्वितीय का शासन 19वीं सदी में रहा था, जिनका राज 1868 में समाप्त हुआ। उसके बाद से स्पेन में केवल पुरुष राजाओं ने ही शासन संभाला। अब लियोनोर के उत्तराधिकारी बनने से यह लंबा अंतराल खत्म होने जा रहा है। कौन हैं राजकुमारी लियोनोर * पूरा नाम: लियोनोर दे बोर्बोन ई ऑर्टिज़ * जन्म: 31 अक्टूबर 2005 * पद: प्रिंसेस ऑफ ऑस्टुरियस (स्पेन की क्राउन प्रिंसेस) * माता-पिता: राजा फेलिप VI और रानी लेटिजिया लियोनोर को बचपन से ही भावी शासक के रूप में तैयार किया जा रहा है। उन्होंने स्पेन और विदेशों में उच्च स्तरीय शिक्षा प्राप्त की है और आधुनिक राजशाही की जिम्मेदारियों को समझने के लिए कूटनीति, इतिहास और राजनीति का अध्ययन किया है। संविधान के प्रति शपथ अक्टूबर 2023 में 18 वर्ष की उम्र पूरी करने पर लियोनोर ने स्पेन की संसद में संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ ली थी। यह कदम उन्हें औपचारिक रूप से सिंहासन की उत्तराधिकारी के रूप में स्थापित करता है। सैन्य प्रशिक्षण भी अनिवार्य स्पेन की परंपरा के अनुसार भावी शासक को तीनों सेनाओं—थलसेना, नौसेना और वायुसेना—का प्रशिक्षण लेना होता है। लियोनोर ने सैन्य प्रशिक्षण की शुरुआत कर दी है, जिससे वह देश की सशस्त्र सेनाओं की सर्वोच्च कमांडर की भूमिका निभाने के लिए तैयार होंगी। आधुनिक दौर की रानी राजकुमारी लियोनोर को एक आधुनिक, शिक्षित और संवेदनशील नेतृत्वकर्ता के रूप में देखा जा रहा है। वह सार्वजनिक कार्यक्रमों में सामाजिक मुद्दों, युवाओं, शिक्षा और लोकतांत्रिक मूल्यों पर खुलकर बोलती हैं। यही वजह है कि स्पेन की युवा पीढ़ी में उनकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ रही है। कब संभालेंगी शासन? फिलहाल राजा फेलिप VI गद्दी पर हैं। भविष्य में उनके पद छोड़ने या संवैधानिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद लियोनोर स्पेन की पहली आधुनिक रानी के रूप में शासन संभालेंगी। स्पेन ही नहीं, पूरी दुनिया की निगाहें अब इस युवा राजकुमारी पर टिकी हैं, जो आने वाले समय में इतिहास रचने के लिए तैयार हैं।

भारी क्रेन गिरने से थाईलैंड में भीषण रेल हादसा: 22 यात्रियों की मौत, 30 से अधिक घायल

बैंकॉक/नखोन रत्चासिमा, 14 जनवरी 2026: आज सुबह थाईलैंड के उत्तर-पूर्वी नखोन रत्चासिमा प्रांत के सिखियो जिले में एक भयानक रेल दुर्घटना हुई। एक चलती पैसेंजर ट्रेन पर निर्माणाधीन क्रेन गिरने से ट्रेन पटरी से उतर गई और इसके कारण कम से कम 22 लोगों की मौत हो गई जबकि 30 से अधिक यात्रियों के गंभीर रूप से घायल होने की खबर है। स्थानीय पुलिस एवं अधिकारियों ने बताया कि यह हादसा बुधवार सुबह लगभग 9 बजे उस समय हुआ जब बैंकॉक से उबोन रत्चथानी की ओर जा रही ट्रेन हाई-स्पीड रेल प्रोजेक्ट के नीचे से गुजर रही थी। इसी दौरान ऊपर से काम कर रही भारी क्रेन अनियंत्रित होकर ट्रेन पर गिर पड़ी। क्रेन की टक्कर से ट्रेन के कई डिब्बे क्षतिग्रस्त हो गए और ट्रेन डिवर हो गई। रिपोर्टों के अनुसार क्रेन दुर्घटना की तेज़ टक्कर से तीन डिब्बों पर गंभीर प्रभाव पड़ा और कई यात्री मलबे में फँस गए। घटना के तुरंत बाद ट्रेन के कुछ हिस्सों में आग भी लगी, जिसे दमकल और बचाव कर्मियों ने नियंत्रित किया। बचाव दल ने घायल यात्रियों को नज़दीकी अस्पतालों में भर्ती कराया है और राहत कार्य जारी है। स्थानीय पुलिस प्रमुख थचापोन चिनावोंग ने पुष्टि की कि अब तक 22 लोगों के शव बरामद किए जा चुके हैं और घायलों की संख्या कम से कम 30 है, जिनमें कई की हालत गंभीर बताई जा रही है। अधिकारियों का कहना है कि मृतकों की संख्या और बढ़ सकती है क्योंकि कई यात्री ट्रेन के मलबे में दबे हो सकते हैं। इस रेल मार्ग पर भारी क्रेन के गिरने से पैसेंजर ट्रेन की विंध्यगति थम गई और राहत-बचाव कार्य में स्थानीय पुलिस, दमकल विभाग और चिकित्सा टीमें जुटी हुई हैं। दुर्घटना की वजहों की जांच अधिकारियों द्वारा शुरू कर दी गई है, जिसमें निर्माण साइट पर सुरक्षा मानकों का पालन किया गया था या नहीं, इसकी भी जांच शामिल है।

सीरिया में ISIS पर अमेरिका की बड़ी कार्रवाई: ‘ऑपरेशन हॉकआई स्ट्राइक’ से आतंकी ठिकानों पर करारा प्रहार

न्यूज डेस्क | अंतरराष्ट्रीय: अमेरिका ने सीरिया में सक्रिय आतंकी संगठन ISIS के खिलाफ एक बड़ा सैन्य अभियान चलाया है, जिसे ‘ऑपरेशन हॉकआई स्ट्राइक’ नाम दिया गया है। इस ऑपरेशन के तहत अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने सहयोगी बलों के साथ मिलकर ISIS के कई ठिकानों को निशाना बनाया। अमेरिकी रक्षा प्रतिष्ठान के अनुसार, इस कार्रवाई का उद्देश्य क्षेत्र में आतंकी नेटवर्क को कमजोर करना और भविष्य में होने वाले हमलों को रोकना है। क्या है ऑपरेशन हॉकआई स्ट्राइक? ‘ऑपरेशन हॉकआई स्ट्राइक’ एक उच्च-स्तरीय, सटीक सैन्य अभियान बताया जा रहा है, जिसमें आधुनिक निगरानी प्रणालियों, ड्रोन और लक्षित हवाई हमलों का इस्तेमाल किया गया। ‘हॉकआई’ नाम इस बात की ओर इशारा करता है कि ऑपरेशन में खुफिया निगरानी और रियल-टाइम इंटेलिजेंस की अहम भूमिका रही, ताकि केवल आतंकी ठिकानों को ही निशाना बनाया जा सके। सेंटकॉम की भूमिका अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने बताया कि यह अभियान सहयोगी बलों के समन्वय से अंजाम दिया गया। ऑपरेशन के दौरान ISIS के ठिकानों, हथियार डिपो और संभावित कमांड सेंटर्स को लक्ष्य बनाया गया। सेंटकॉम का कहना है कि इस तरह की कार्रवाइयां क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आवश्यक हैं। क्यों जरूरी थी यह कार्रवाई? हाल के महीनों में ISIS के बचे-खुचे नेटवर्क द्वारा फिर से संगठित होने की आशंका जताई जा रही थी। खुफिया एजेंसियों के मुताबिक, आतंकी संगठन सीमावर्ती इलाकों में अपनी गतिविधियां बढ़ाने की कोशिश कर रहा था। ‘ऑपरेशन हॉकआई स्ट्राइक’ के जरिए अमेरिका ने स्पष्ट संदेश दिया है कि आतंकवाद के खिलाफ उसकी नीति ‘जीरो टॉलरेंस’ की है। क्षेत्रीय असर और आगे की रणनीति विशेषज्ञों का मानना है कि इस ऑपरेशन से ISIS की operational क्षमता को झटका लगा है, हालांकि पूरी तरह खतरा खत्म होना अभी बाकी है। अमेरिका और उसके सहयोगी आने वाले समय में भी निगरानी और आवश्यक कार्रवाई जारी रखने के संकेत दे चुके हैं। ‘ऑपरेशन हॉकआई स्ट्राइक’ अमेरिका की आतंकवाद विरोधी रणनीति का एक अहम हिस्सा माना जा रहा है। सीरिया में ISIS के खिलाफ यह कार्रवाई न सिर्फ सैन्य दबाव बढ़ाती है, बल्कि वैश्विक मंच पर यह संदेश भी देती है कि आतंक के खिलाफ अभियान लगातार और निर्णायक रूप से जारी रहेगा।

ईरान में उबाल: महंगाई और बदहाली के खिलाफ सड़कों पर जनता, 42 की मौत; सरकार ने इंटरनेट-फोन सेवाएं कीं ठप

ईरान एक बार फिर व्यापक जनाक्रोश की चपेट में है। देश के कई बड़े शहरों में सरकार विरोधी प्रदर्शन उग्र रूप ले चुके हैं। बढ़ती महंगाई, गिरती मुद्रा और लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था से त्रस्त लोग सड़कों पर उतर आए हैं। हालात इतने बिगड़ गए कि अब तक कम से कम 42 लोगों की मौत की खबर है, जबकि सैकड़ों घायल बताए जा रहे हैं। प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच कई इलाकों में हिंसक झड़पें हुईं। हालात को काबू में करने के लिए सरकार ने कड़ा कदम उठाते हुए इंटरनेट सेवाएं और अंतरराष्ट्रीय टेलीफोन कॉल पूरी तरह बंद कर दी हैं। इससे देश के भीतर और बाहर सूचना का प्रवाह लगभग थम गया है, और वैश्विक समुदाय को ज़मीनी हालात की सीमित जानकारी ही मिल पा रही है। क्यों भड़का गुस्सा? ईरान की जनता लंबे समय से आर्थिक संकट का सामना कर रही है। * महंगाई चरम पर: रोजमर्रा की जरूरतों की कीमतें आम लोगों की पहुंच से बाहर होती जा रही हैं। * कमजोर अर्थव्यवस्था: मुद्रा की गिरती कीमत और बेरोजगारी ने युवाओं में निराशा बढ़ाई है। * सरकारी नीतियों पर सवाल: प्रदर्शनकारी सरकार की आर्थिक नीतियों और भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर खुलकर नाराज़गी जता रहे हैं। कई शहरों में “रोटी, काम और आज़ादी” जैसे नारे गूंजते सुने गए, जो यह दर्शाते हैं कि विरोध सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि राजनीतिक असंतोष का भी प्रतीक बन चुका है। सुरक्षा बलों की सख्ती सरकार ने हालात बिगड़ने के बाद सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ा दी है। कई इलाकों में कर्फ्यू जैसे हालात हैं। चश्मदीदों के मुताबिक, भीड़ को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस और अन्य सख्त उपायों का इस्तेमाल किया गया। इंटरनेट और फोन सेवाएं बंद किए जाने से सोशल मीडिया पर वीडियो और तस्वीरें सामने आना लगभग बंद हो गया है। जानकारों का मानना है कि यह कदम विरोध प्रदर्शनों के समन्वय और अंतरराष्ट्रीय दबाव को कम करने के लिए उठाया गया है। अंतरराष्ट्रीय चिंता ईरान में हालात पर दुनिया की नजरें टिकी हैं। मानवाधिकार संगठनों ने मौतों और संचार बंदी पर चिंता जताई है। कई देशों ने संयम बरतने और शांतिपूर्ण समाधान की अपील की है। आगे क्या? विशेषज्ञों के अनुसार, अगर आर्थिक हालात में जल्द सुधार और संवाद की पहल नहीं हुई, तो यह आंदोलन और तेज हो सकता है। फिलहाल ईरान एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां सरकार और जनता के बीच टकराव का समाधान बातचीत से होगा या सख्ती से—यह आने वाले दिनों में तय होगा।

वेनेजुएला के बाद अब भारत-चीन पर सख्ती? 500% टैरिफ वाले बिल को ट्रंप की मंजूरी, वैश्विक व्यापार में हलचल

रिपोर्ट (डेस्क): वेनेजुएला पर सैन्य कार्रवाई के बाद अमेरिका की विदेश और व्यापार नीति एक बार फिर आक्रामक रुख में दिखाई दे रही है। ताजा घटनाक्रम में दावा किया जा रहा है कि पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व वाले प्रशासन ने भारत और चीन पर 500 प्रतिशत टैरिफ लगाने से जुड़े एक अहम बिल को मंजूरी दे दी है। इस फैसले के बाद वैश्विक व्यापार जगत में चिंता और अनिश्चितता का माहौल बन गया है। क्या है 500% टैरिफ वाला बिल? रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस प्रस्तावित कानून के तहत भारत और चीन से अमेरिका को होने वाले निर्यात पर बेहद भारी आयात शुल्क लगाया जाएगा। 500 प्रतिशत तक का टैरिफ किसी भी देश के लिए असाधारण माना जाता है और इसका सीधा असर व्यापार, कीमतों और आपूर्ति श्रृंखला पर पड़ सकता है। इस बिल का उद्देश्य अमेरिका के घरेलू उद्योगों को संरक्षण देना और उन देशों पर दबाव बनाना बताया जा रहा है, जिन पर अमेरिका लंबे समय से “अनुचित व्यापार व्यवहार” के आरोप लगाता रहा है। भारत और चीन क्यों निशाने पर? चीन के साथ अमेरिका का व्यापार युद्ध कोई नया मुद्दा नहीं है। टेक्नोलॉजी, सेमीकंडक्टर, स्टील और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में दोनों देशों के बीच लंबे समय से तनातनी चल रही है। वहीं भारत के मामले में, फार्मा, आईटी सर्विसेज, स्टील और टेक्सटाइल जैसे क्षेत्रों में बढ़ते निर्यात को लेकर अमेरिका में असंतोष की बात कही जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम रणनीतिक और राजनीतिक दबाव बनाने की नीति का हिस्सा भी हो सकता है। वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर की आशंका अगर 500 प्रतिशत टैरिफ वास्तव में लागू होता है, तो इसका असर सिर्फ भारत और चीन तक सीमित नहीं रहेगा। * अमेरिकी बाजार में महंगाई बढ़ सकती है * वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती है * निवेशकों का भरोसा कमजोर पड़ सकता है अंतरराष्ट्रीय व्यापार विशेषज्ञ इसे “अत्यधिक कठोर कदम” बता रहे हैं। भारत की संभावित प्रतिक्रिया फिलहाल भारत सरकार की ओर से इस मुद्दे पर कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। हालांकि, कूटनीतिक हलकों में चर्चा है कि अगर ऐसा कोई कदम लागू किया गया, तो भारत विश्व व्यापार संगठन (WTO) समेत अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इसका विरोध कर सकता है। राजनीतिक संकेत भी अहम विश्लेषकों के अनुसार, ट्रंप का यह रुख आगामी अमेरिकी राजनीतिक परिदृश्य और “अमेरिका फर्स्ट” नीति को दोबारा धार देने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है। वेनेजुएला के बाद भारत और चीन को लेकर सामने आ रही यह खबर वैश्विक राजनीति और व्यापार संतुलन के लिए अहम मानी जा रही है। हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि बिल को व्यावहारिक रूप से कब और किस रूप में लागू किया जाएगा, लेकिन इतना तय है कि इस कदम ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हलचल जरूर पैदा कर दी है।

भारत पर आतंकी साजिश का संकेत? पाकिस्तान में हमास–लश्कर कमांडरों की सीक्रेट मीटिंग से बढ़ी चिंता

रिपोर्ट (डेस्क): पाकिस्तान की धरती से भारत की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। हालिया सामने आए एक वीडियो और खुफिया संकेतों ने आशंका बढ़ा दी है कि पाकिस्तान में सक्रिय आतंकी संगठनों के बीच नए सिरे से तालमेल बन रहा है। बताया जा रहा है कि हमास और लश्कर-ए-तैयबा के शीर्ष कमांडरों के बीच एक गुप्त मुलाकात हुई है, जिसे सुरक्षा एजेंसियां बेहद संवेदनशील मान रही हैं। सूत्रों के अनुसार, वायरल हो रहे एक वीडियो में हमास का एक कमांडर और लश्कर-ए-तैयबा का कुख्यात कमांडर राशिद अली संधू पाकिस्तान के गुजरांवाला में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान साथ दिखाई दे रहे हैं। यह वीडियो सामने आने के बाद सुरक्षा एजेंसियों की चिंता और सतर्कता दोनों बढ़ गई हैं। क्या है पूरा मामला? वीडियो फुटेज में दोनों कमांडरों की मौजूदगी को केवल औपचारिक मुलाकात मानने से इनकार किया जा रहा है। खुफिया एजेंसियों का आकलन है कि यह मुलाकात आतंकी नेटवर्क के विस्तार, संसाधनों की साझेदारी और संभावित ऑपरेशनल सहयोग से जुड़ी हो सकती है। खास तौर पर भारत के खिलाफ किसी बड़ी साजिश की आशंका से इनकार नहीं किया जा रहा। पाकिस्तान की भूमिका पर सवाल भारत लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह मुद्दा उठाता रहा है कि पाकिस्तान आतंकवाद को संरक्षण देता है। गुजरांवाला जैसे शहर में खुले तौर पर ऐसे तत्वों का एक मंच पर दिखना, पाकिस्तान की आतंकी ढांचे पर कार्रवाई को लेकर उसकी नीयत पर सवाल खड़े करता है। भारत की सुरक्षा एजेंसियां अलर्ट सूत्रों का कहना है कि इस घटनाक्रम के बाद भारत की खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों ने हाई अलर्ट जारी कर दिया है। सीमा क्षेत्रों के साथ-साथ संवेदनशील शहरों में निगरानी बढ़ाई गई है। एजेंसियां वीडियो की प्रामाणिकता, समय-सीमा और मीटिंग के वास्तविक उद्देश्य की गहन जांच कर रही हैं। अंतरराष्ट्रीय चिंता भी बढ़ी हमास और लश्कर-ए-तैयबा—दोनों ही संगठन कई देशों द्वारा प्रतिबंधित आतंकी संगठनों की सूची में शामिल हैं। ऐसे में इनके बीच कथित संपर्क की खबरें न केवल भारत, बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए भी गंभीर चिंता का विषय मानी जा रही हैं। हालांकि अभी तक किसी ठोस आतंकी हमले की पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन सामने आए संकेतों ने खतरे की घंटी जरूर बजा दी है। आने वाले दिनों में जांच के निष्कर्ष और आधिकारिक प्रतिक्रियाएं यह तय करेंगी कि यह मुलाकात महज एक कार्यक्रम तक सीमित थी या इसके पीछे भारत विरोधी किसी बड़ी साजिश की नींव रखी जा चुकी है।

ट्रंप की सख्ती से मचा भूचाल: उत्तरी सागर में अमेरिकी सेना ने रूसी तेल टैंकर किया जब्त, बढ़ा वैश्विक तनाव

न्यूज रिपोर्ट (डेस्क): अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की आक्रामक विदेश नीति एक बार फिर दुनिया के सामने है। वेनेजुएला पर सैन्य और आर्थिक दबाव बढ़ाने के बाद अब अमेरिका ने रूस को सीधे तौर पर निशाने पर लेते हुए उत्तरी सागर में रूसी ध्वज वाले एक तेल टैंकर को जब्त कर लिया है। इस जोखिम भरे अभियान को अमेरिकी सेना ने अंजाम दिया, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तनाव और गहराने की आशंका जताई जा रही है। सूत्रों के मुताबिक, जिस तेल टैंकर को जब्त किया गया है, वह रूस से जुड़ा हुआ बताया जा रहा है और उस पर रूसी झंडा लगा हुआ था। जैसे ही इस कार्रवाई की जानकारी मॉस्को को मिली, रूस ने टैंकर की सुरक्षा के लिए नौसेना तैनात करने की कोशिश की। हालांकि, तमाम कूटनीतिक और सैन्य प्रयासों के बावजूद अमेरिका ने अपने अभियान को पूरा करते हुए टैंकर को अपने कब्जे में ले लिया। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कार्रवाई केवल एक तेल टैंकर की जब्ती तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे अमेरिका का व्यापक रणनीतिक संदेश छिपा है। ट्रंप प्रशासन पहले ही रूस पर कई तरह के आर्थिक प्रतिबंध लगा चुका है और अब इस तरह की सैन्य कार्रवाई से दोनों देशों के रिश्तों में और कड़वाहट आने की आशंका है। रूस की ओर से इस घटना को अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन बताया जा सकता है, वहीं अमेरिका इसे अपनी सुरक्षा और वैश्विक हितों से जोड़कर सही ठहराने की कोशिश करेगा। जानकारों के अनुसार, अगर इस मामले पर दोनों देशों के बीच टकराव और बढ़ा तो इसका असर वैश्विक तेल बाजार, समुद्री व्यापार और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ सकता है। फिलहाल पूरी दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि रूस इस कार्रवाई का जवाब किस तरह देता है और क्या यह घटना अमेरिका-रूस संबंधों को एक नए टकराव की ओर ले जाएगी।

कौन हैं डेल्सी रोड्रिग्ज? सत्ता के केंद्र में पहुंचीं मादुरो की करीबी, वेनेजुएला में सियासी भूचाल

काराकस।अमेरिका की ओर से वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी की गिरफ्तारी के दावे के बाद देश में अभूतपूर्व राजनीतिक उथल-पुथल मच गई है। हालात की गंभीरता को देखते हुए शीर्ष अदालत ने उपराष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिग्ज को अंतरिम राष्ट्रपति नियुक्त करने का फैसला किया है। इस घटनाक्रम के साथ ही वेनेजुएला की सत्ता का केंद्र अचानक बदल गया है और पूरी दुनिया की निगाहें अब डेल्सी रोड्रिग्ज पर टिक गई हैं। कौन हैं डेल्सी रोड्रिग्ज डेल्सी एलोइना रोड्रिग्ज गोमेज वेनेजुएला की सबसे प्रभावशाली और अनुभवी राजनेताओं में शुमार की जाती हैं। वे लंबे समय से राष्ट्रपति मादुरो की भरोसेमंद सहयोगी रही हैं और सरकार के कई अहम फैसलों में उनकी निर्णायक भूमिका रही है। * डेल्सी रोड्रिग्ज इससे पहले विदेश मंत्री और बाद में उपराष्ट्रपति के पद पर रह चुकी हैं। * अंतरराष्ट्रीय मंचों पर वे वेनेजुएला का मुखर पक्ष रखने के लिए जानी जाती हैं, खासकर अमेरिका और पश्चिमी देशों की नीतियों के खिलाफ उनके सख्त बयानों ने उन्हें पहचान दिलाई। * वे देश के दिवंगत नेता जॉर्ज रोड्रिग्ज की बेटी और नेशनल असेंबली के अध्यक्ष जॉर्ज रोड्रिग्ज की बहन हैं, जिससे उनका राजनीतिक प्रभाव और भी मजबूत माना जाता है। अंतरिम राष्ट्रपति बनने का रास्ता मादुरो की गिरफ्तारी के दावे के बाद शासन व्यवस्था में उत्पन्न संवैधानिक शून्य को भरने के लिए शीर्ष अदालत ने आपात बैठक बुलाई। इसके बाद डेल्सी रोड्रिग्ज को अंतरिम राष्ट्रपति नियुक्त करने की घोषणा की गई। अदालत का तर्क है कि मौजूदा हालात में प्रशासनिक स्थिरता बनाए रखना जरूरी है। ट्रंप का समर्थन और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया इस पूरे घटनाक्रम में पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का नाम भी सामने आ रहा है। ट्रंप खेमे से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, डेल्सी रोड्रिग्ज के नेतृत्व में सत्ता परिवर्तन को अमेरिका का “सशर्त समर्थन” बताया जा रहा है। हालांकि, वेनेजुएला के विपक्षी दल और कुछ लैटिन अमेरिकी देश इस फैसले पर सवाल उठा रहे हैं और इसे बाहरी हस्तक्षेप से जोड़कर देख रहे हैं। देश में हालात तनावपूर्ण काराकस समेत कई बड़े शहरों में सुरक्षा बढ़ा दी गई है। समर्थक और विरोधी गुटों के बीच टकराव की आशंका को देखते हुए सेना और पुलिस को अलर्ट पर रखा गया है। आर्थिक संकट, महंगाई और प्रतिबंधों से पहले ही जूझ रहे वेनेजुएला के लिए यह सत्ता परिवर्तन एक नया मोड़ साबित हो सकता है। आगे क्या? डेल्सी रोड्रिग्ज ने अंतरिम राष्ट्रपति के तौर पर पहला संदेश जारी करते हुए “संवैधानिक व्यवस्था, शांति और राष्ट्रीय संप्रभुता” बनाए रखने की बात कही है। अब सबकी नजर इस पर है कि वे अंतरिम दौर में चुनाव की घोषणा करती हैं या मौजूदा सत्ता संरचना को आगे बढ़ाती हैं। वेनेजुएला के इतिहास में यह अध्याय कितना लंबा और निर्णायक होगा, इसका जवाब आने वाले दिनों में सामने आएगा।

‘कई दिनों की गुप्त योजना के बाद कार्रवाई’, ट्रंप का दावा—अमेरिकी सेना ने मादुरो को पकड़ा; तेल समझौतों पर भी बड़ा बयान

वॉशिंगटन/काराकस।अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक बयान ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल मचा दी है। शनिवार को मीडिया से बातचीत के दौरान ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिकी सेना ने एक सुनियोजित और गुप्त अभियान के तहत वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को “दबोच” लिया है। ट्रंप ने इस कथित कार्रवाई की पूरी टाइमलाइन साझा करते हुए इसे अमेरिका की रणनीतिक और सैन्य क्षमता का उदाहरण बताया। हालांकि, वेनेजुएला सरकार की ओर से इस दावे को लेकर तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है और आधिकारिक पुष्टि अब तक नहीं हुई है। कई दिनों से चल रही थी तैयारी ट्रंप के अनुसार, इस ऑपरेशन की योजना कई दिनों पहले बनाई गई थी। पहला चरण: अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने वेनेजुएला की राजनीतिक और सुरक्षा स्थिति पर बारीकी से निगरानी शुरू की। दूसरा चरण: क्षेत्र में मौजूद सहयोगी देशों और एजेंसियों के साथ समन्वय स्थापित किया गया। तीसरा चरण: सीमित और सटीक सैन्य कार्रवाई के जरिए ऑपरेशन को अंजाम दिया गया, ताकि किसी तरह का व्यापक टकराव न हो। ट्रंप ने कहा कि यह पूरी कार्रवाई “बिना शोर-शराबे के” की गई और इसका उद्देश्य क्षेत्र में अमेरिकी हितों की सुरक्षा था। तेल उद्योग पर ट्रंप का बड़ा बयान मीडिया बातचीत के दौरान ट्रंप ने वेनेजुएला के तेल उद्योग को लेकर भी बड़ा दावा किया। उन्होंने कहा कि भविष्य में अमेरिकी ऊर्जा कंपनियां वेनेजुएला के तेल क्षेत्रों में अहम भूमिका निभाएंगी। ट्रंप के शब्दों में, “अमेरिका की तेल कंपनियां दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे बेहतरीन हैं। अगर उन्हें मौका मिलता है, तो वेनेजुएला के तेल उद्योग को नई दिशा दे सकती हैं।” वेनेजुएला की प्रतिक्रिया ट्रंप के इस बयान के बाद वेनेजुएला में राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। सरकार समर्थक नेताओं ने इसे “झूठा और भड़काऊ दावा” बताया है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से तथ्यों की पुष्टि करने की अपील की है। वहीं विपक्षी खेमे में इस बयान को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हलचल ट्रंप के दावे के बाद अमेरिका–वेनेजुएला संबंधों में और तनाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान कूटनीतिक दबाव बनाने की रणनीति भी हो सकता है, खासकर तेल और ऊर्जा संसाधनों को लेकर। फिलहाल, ट्रंप के दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो पाई है। लेकिन इतना तय है कि इस बयान ने वैश्विक राजनीति और ऊर्जा बाजारों में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है।