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विटामिन डी शरीर के लिए बेहद अहम है। धूप के साथ मुफ्त मिलने के बावजूद आज बड़ी संख्या में लोग इसकी कमी की वजह से कई तरह के रोगों का शिकार हो रहे हैं। विटामिन डी से जुड़ी परेशानी, जाड़े की प्यारी धूप के फायदे और कैल्शियम से इनके कनेक्शन के बारे में बता रहे है हम…

जोड़ों का दर्द इन दिनों कॉमन प्रॉब्लम बन गया है। हर उम्र के लोग इस दर्द का शिकार बन रहे हैं। अक्सर दर्द की वजह विटामिन डी की कमी होती है। हैरानी की बात है कि शहरों में रहनेवाले करीब 80-90 फीसदी लोग विटामिन डी की कमी से होने वाली समस्याओं से जूझ रहे हैं। वजह, अब लोग धूप में ज्यादा नहीं निकलते और न ही पौष्टिक खाना खाते हैं। दिक्कत यह है कि ज्यादातर लोगों को इसकी जानकारी ही नहीं होती या फिर वे जानकर भी इस बात को मानने को तैयार नहीं होते कि धूप न सेंकने की वजह से भी वे बीमार पड़ सकते हैं। बेशक शरीर को मजबूती देने वाली हड्डियों की मजबूती के लिए तो विटामिन डी बड़े काम की चीज है ही, कई दूसरी बीमारियों से भी यह बचाता है।

विटामिन डी की सबसे बड़ी खासियत है कि यह शरीर के लिए जरूरी पोषक तत्व भी है और हॉर्मोन भी। इतना ही नहीं यह सूर्य से मिलने वाला इकलौता विटामिन भी है। सूर्य के अलावा यह विटामिन बादाम, अंडा, मछली, आदि में मिलता है। शरीर के लिए जरूरी विटामिन डी का 80 प्रतिशत हिस्सा धूप से मिलता है, जबकि डायट से 20 प्रतिशत।

दो तरह के विटामिन डी

1. विटामिन डी-2: शरीर इसे जज्ब नहीं कर पाता।

2. विटामिन डी-3: यह हमारे शरीर में तब बनता है जब हम धूप में होते हैं। इसके अलावा यह एनिमल फैट मसलन, फिश ऑयल, लिवर, एग यॉक, दूध से बने प्रॉडक्ट्स आदि से भी मिलता है, लेकिन सबसे ज्यादा हमें यह विटामिन धूप से ही मिलती है।

बड़े काम का विटामिन डी

-यह शरीर की इम्युनिटी बढ़ाता है।

-नर्व्स और मसल्स के कोऑर्डिनेशन को कंट्रोल करता है।

-यह हड्डियों, मसल्स और लिगामेंट्स को मजबूत बनाता है।

-यह कैंसर को रोकने में मदद करता है।

-कमजोर हड्डी को मजबूत होने में अमूमन 150 दिन लगते हैं, खराब होने में मात्र 20 दिन

जवानी में कमाएं, बुढ़ापे में खाएं

हड्डियां एक खास उम्र तक ही मजबूत होती हैं। जिन लोगों ने बचपन से लेकर 30 साल की उम्र तक अपनी हड्डियों को बेहतर खान-पान दिया और विटामिन डी को सही रूप से शरीर में जज्ब कराया, अमूमन उम्र बढ़ने के साथ उनकी हड्डियां उतनी कमजोर नहीं होतीं। आप इसे जॉब और पेंशन से भी समझ सकते हैं। जॉब के दौरान सैलरी ज्यादा होगी तो रिटायरमेंट के बाद पेंशन भी उतना ही अच्छा मिलता है। इसलिए बेहतर होगा कि बचपन से लेकर युवा होने तक विटामिन डी ज्यादा से ज्यादा पाने की कोशिश की जाए।

नोट: एक कमजोर हड्डी को मजबूत बनने में अमूमन 150 दिन लगते हैं जबकि उसे खराब होने में मात्र 20 दिन। इसलिए हड्डी खराब होने की आशंका हमेशा ही रहती है। तो बेहतर यह होगा कि शरीर में विटामिन डी की कमी न होने दें।

बच्चों में विटामिन डी का मामला

-बच्चे के बेहतर विकास के लिए विटामिन डी की खूब जरूरत होती है। पर्याप्त विटामिन डी लेने पर ही उनकी हड्डियांम जबूत होंगी।

-बच्चे अब आउटडोर गेम्स बहुत ज्यादा नहीं खेलते। स्कूल से आते ही वे मोबाइल या टीवी में लग जाते हैं। इसलिए बच्चों में विटामिन डी की कमी की समस्या बहुत बढ़ गई है।

-चूंकि पसीना निकालने वाले गेम्स बच्चे खेल नहीं पाते, इसलिए मोटापा भी आ जाता है। एक बार मोटापे ने दस्तक दी तो शरीर की शिथिलता और बढ़ जाती है। फिर विटामिन डी की कमी की परेशानी भी शुरू हो जाती है।

-जहां तक दिल्ली, लखनऊ जैसे महानगरों की बात है तो यहां बच्चों की स्थिति इस मामले में और भी खराब है। महानगरों में बिल्डिंग्स इतनी नजदीक बनी होती हैं कि गलियों और घरों तक धूप का पहुंचना नामुमकिन-सा होता है। इसीलिए शहरों में रहने वाले बच्चों में विटामिन डी की कमी के मामले ज्यादा देखे गए हैं, जबकि छोटे शहरों और गांवों में कम।

-वैसे, बात नवजात बच्चे की हो या फिर किशोर की, अगर विटामिन डी का स्तर सही रखना है तो उन्हें कम से कम 1 घंटा रोज धूप में रहना होगा या खेलना चाहिए। ध्यान देने वाली बात यह है कि इस दौरान उनके शरीर का 20 प्रतिशत हिस्सा खुला होना चाहिए।

ये जानना भी जरूरी है...

-पुरुषों की तुलना में महिलाओं में विटामिन डी की कमी के मामले ज्यादा होते हैं। इसकी बड़ी वजह माहवारी और प्रेग्नेंसी है।

-एक अनुमान के मुताबिक 2050 तक दुनिया में जितने कूल्हे फ्रैक्चर होंगे, उनमें से आधे एशिया में होंगे।

कमी के लक्षण

-शरीर में लगातार दर्द रहना

-ज्यादा थकान रहना

-दिनभर सुस्ती रहना

-जोड़ों में दर्द होना

-खासकर कुल्हों और घुटनों में दर्द का लगातार होना

नोट: यहां इस बात का ध्यान रखना भी जरूरी है कि ऐसे लक्षण दूसरी बीमारियों के भी हो सकते हैं। टेस्ट के बाद ही पता चलता है कि विटामिन डी के बारे में।

कमी से होने वालीं दिक्कतें

अमूमन लोग यह सोचते हैं कि विटामिन डी की कमी है तो हड्डियां ही कमजोर होंगी और दर्द की समस्या रहेगी जबकि हकीकत यह है कि टीबी, डायबीटीज, हाइपरटेंशन, मंदबुद्धि, कैंसर, कमजोर इम्यूनिटी और कई संक्रामक बीमारियों की वजह भी विटामिन डी की कमी बनती है। रिसर्च में यह बात सामने आई है कि अगर विटामिन डी की कमी दूर कर दी जाए तो उन्हें काफी आराम मिलता है।

-हड्डियों का कमजोर और खोखला होना

-जोड़ों, मसल्स का कमजोर होना और दर्द रहना

-इम्युनिटी कम होना

-बाल झड़ना

-बेचैनी और मूड स्विंग्स

-इनफर्टिलिटी का बढ़ना

-पीरियड्स का अनियमित होना

-हड्डियों का खोखला होना और हड्डियों का कमजोर होना

-बार-बार फ्रेक्चर होना

हड्डियों से जुड़ीं 2 बड़ी समस्याएं

ऑस्टियोपोरोसिस: इसमें हड्डियों का घनत्व कम हो जाता है और ये आसानी से टूटने लगती हैं। हड्डियों में चाय की छलनी की तरह छिद्र बन जाते हैं क्योंकि हड्डियों में जमा हुआ कैल्शियम, मिनरल्स आदि धीमे-धीमे हड्डियों से निकलता चला जाता है। कलाई, स्पाइन और कूल्हे की हड्डियां ज्यादा प्राभावित होती हैं।

ऑस्टियोपेनिया: अमूमन इसमें हड्डियों में प्रोटीन की कमी हो जाती है। इसमें हड्डियों का घनत्व ऑस्टियोपोरोसिस जितना कम नहीं होता इसलिए हड्डियां आसानी से फ्रैक्चर नहीं होतीं, लेकिन कमजोर जरूर हो जाती हैं।

बुजुर्गों को ज्यादा परेशानी

बुजुर्गों में विटामिन डी की कमी होती है। दरअसल, बढ़ती उम्र के साथ उनमें त्वचा के नीचे कॉलेस्ट्रॉल की कमी हो जाती है। इससे पर्याप्त मात्रा में विटामिन डी का निर्माण नहीं हो पाता। इसका परिमणाम होता है हड्डियों और मांसपेशियों में कमजोरी। ऐसे में उनके लिए इसका सप्लिमेंट्स लेना जरूरी हो जाता है।

विटामिन डी की कमी की समस्या का समाधान

-विटामिन डी की कमी पूरी करने के लिए बच्चों को एक बार में 6 लाख आईयू (इंटरनैशनल यूनिट) दी जाती हैं।

-यह कई बार इंजेक्शन के जरिए भी दिया जाता है। फिर नॉर्मल रेंज आने तक एक महीने हर हफ्ते 60, 000 यूनिट और फिर हर महीने 60, 000 यूनिट दी जाती है, जोकि ओरली दी जाती है।

-बड़ों में पहले दो महीने हर हफ्ते 60, 000 यूनिट और फिर हर महीने 60, 000 यूनिट का सैशे दिया जाता है।

– धूप में नहीं निकलते हैं तो 25-30 साल की उम्र के बाद हर महीने एक सैशे लेना चाहिए।

-इंजेक्शन की बजाए ओरली सप्लीमेंट देने से ज्यादा फायदा होता है। शरीर में ज्यादा विटामिन डी पहुंचता है।

दूध के साथ धूप भी जरूरी

ज्यादातर लोग यह सोचते हैं कि वे दूध का सेवन हर दिन करते हैं तो शरीर में विटामिन डी की कमी नहीं होगी जबकि ऐसा बिलकुल भी नहीं है। उनके शरीर में भी विटामिन डी की कमी हो सकती है। दरअसल, दूध से उन्हें कैल्शियम मिलता है। अमूमन यह कैल्शियम आंत में जमा होता चला जाता है। दूसरे स्रोतों से मिलने वाले कैल्शियम भी यहीं जमा होते रहते हैं। ऐसे कैल्शियम को डॉर्मेंट कैल्शियम (पुराना जमा हुआ कैल्शियम जो ऐक्टिव नहीं है) कहते हैं। यह कैल्शियम तब तक किसी काम का नहीं होता है जब तक इन्हें विटामिन डी का डोज नहीं मिलता। विटामिन डी की मौजूदगी में ही यह ऐक्टिव होता है और शरीर के लिए उपयोगी बनता है। यानी कैल्शियम तभी शरीर में जज्ब होगा जब विटामिन डी उसे मिलेगा।

आयुर्वेद में इलाज

-आयुर्वेद में दवा, मालिश और लेप को मिलाकर विटामिन डी की कमी से होनेवाले दर्द का इलाज किया जाता है। इलाज का नतीजा सामने आने में 3 महीने लग जाते हैं।

-पूरे शरीर पर तेल की धारा डालते हैं। इसके लिए क्षीरबला तेल, धनवंतरम तेल आदि का इस्तेमाल किया जाता है। इसे 40 मिनट रोजाना और 5 दिन लगातार करते हैं।

-महिलाएं शतावरी सुबह और शाम एक-एक टैब्लेट ले सकती हैं। वैसे तो यह किसी भी उम्र में ले सकती हैं, लेकिन मिनोपॉज के बाद जरूर लें।

-रोजाना एक चम्मच मेथी दाना भिगोकर खाएं। यह हड्डियों के लिए अच्छी है।

-गुनगुने दूध में एक चम्मच हल्दी डालकर पिएं।

-रोजाना एक चम्मच बादाम का तेल (बादाम रोगन) दूध में डालकर पिएं।

-विटामिन डी के सप्लिमेंट ले सकते हैं। इससे फायदा होगा।

एक्सरसाइज है जरूरी

रोजाना कम-से-कम 30 मिनट एक्सरसाइज जरूर करें। एक्सरसाइज शरीर को फिट रखने और उसके सही तरीके से काम करने के लिए बेहद जरूरी है। यहां तक एक्सरसाइज ब्लड में मौजूद विटामिन डी और कैल्शियम को जज्ब करने में भी मदद करती है। डॉ. सी. एस. यादव कहते हैं कि अगर आप रोजाना 1 घंटा एक्सरसाइज करते हैं तो बाकी 23 घंटे फिट और खुशहाल रह सकते हैं। अगर यह एक घंटा अपने लिए नहीं निकाल सकते तो फिर 24 घंटे हेल्थ को लेकर परेशान रहेंगे। एक्सरसाइज में कार्डियोवस्कुलर, स्ट्रेंथनिंग और स्ट्रेचिंग को मिलाकर करें। कार्डियो के लिए साइकलिंग, अरोबिक्स, स्ट्रेंथनिंग के लिए वेट लिफ्टिंग और स्ट्रेचिंग के लिए योग करें। अगर वॉक करना चाहते हैं तो कम-से-कम 45 मिनट ब्रिस्क वॉक यानी तेज-तेज चलें।

धूप और विटामिन डी की यारी

धूप विटामिन डी का नेचरल सोर्स है। बेशक यह मुफ्त है, लेकिन महानगरों में आज की तारीख में अधिकतर लोगों को धूप सही से नसीब नहीं होती। वजह, समय की कमी तो है ही, खुली जगहों का अभाव भी इसका एक बड़ा कारण है। अगर आप चाहते हैं कि आपके शरीर में विटामिन डी की कमी न हो तो इस ठंड को जाया न होने दें। जाड़े में धूप बड़ी प्यारी होती है तो बेहतर होगा कि इस मौसम का फायदा उठाएं। धूप से शरीर में उचित मात्रा में विटामिन डी बनेगा तो ही शरीर कैल्शियम जज्ब कर पाएगा।

धूप सेंकने का सही समय और तरीका

-इस बात पर बहुत विवाद है कि विटामिन डी के लिए धूप सेंकने का सही समय क्या है। इसके लिए अलग-अलग एक्सपर्ट्स अलग-अलग टाइम बताते हैं। लेकिन इसका सीधा फॉर्म्युला यह है कि जब धूप में आपकी परछाई, आपके कद से छोटी बने, तब धूप सेंकना बेहतर है।

-सुबह 10 बजे से दोपहर 3 बजे तक 45 मिनट के लिए धूप में रहने से फायदा होता है। यहां इस बात को ध्यान में रखना जरूरी है कि 45 मिनट बैठने से सिर्फ एक दिन की जरूरत पूरी होती है, इससे ज्यादा देर बैठने पर ही एक दिन की जरूरत से ज्यादा विटामिन डी का निर्माण होता है। इससे कम बैठने पर कुछ मात्रा में विटामिन डी का निर्माण जरूर होता है, लेकिन शरीर उसे जज्ब नहीं कर पाता और वह बेकार चला जाता है। इसलिए कम से कम 45 मिनट तो जरूर ही बैठना चाहिए और वह भी लगातार।

-जब भी धूप सेकनें जाएं तो खासकर चेहरा, गर्दन, कंधा, छाती और पीठ खुली रखें।

-धूप से त्वचा का सीधा संपर्क जरूरी है। शीशे से छनकर आनेवाली धूप से न के बराबर ही विटामिन डी का निर्माण हो पाता है।

धूप के फायदे हजार

-अग्नि (ऊष्मा) का मुख्य सोर्स होने के कारण सूर्य की रोशनी ठंड से सिकुड़े शरीर को गर्माहट देती है, जिससे शरीर के भीतर की ठंडक और पित्त की कमी दूर होती है। आयुर्वेद में सनबाथ को ‘आतप सेवन’ नाम से जाना जाता है।

-सूरज की रोशनी में ऐसे चमत्कारी गुण होते हैं, जिनके कारण शरीर पर विभिन्न प्रकार के इन्फेक्शंस के असर की आशंका कम हो जाती है। इससे शरीर की इम्यूनिटी मजबूत होती है। धूप के सेवन से शरीर में सफेद कणिकाएं ज्यादा बनती हैं जो बीमारी पैदा करने वाले कारकों से लड़ती हैं।

-सूरज की किरणों से शरीर को कैंसर से लड़ने वाले तत्व मिलते हैं। इससे कैंसर का खतरा टलता है, जिन्हें कैंसर है, उन्हें भी लाभ होता है।

-आयुर्वेद के अनुसार, शरीर में पाचन का कार्य जठराग्नि द्वारा किया जाता है, जिसका मुख्य स्रोत सूर्य है। दोपहर (12 बजे के आसपास) में सूर्य अपने चरम पर होता है और उस समय तुलनात्मक रूप से जठराग्नि भी ज्यादा सक्रिय होती है। कहा जाता है कि इस समय का भोजन अच्छी तरह से पचता है।

-आपको अच्छा महसूस कराने वाले हॉर्मोन सेरेटॉनिन और एंडोर्फिन का धूप के असर से शरीर में पर्याप्त स्राव होता है, जोकि डिप्रेशन, सीजनल अफेक्टिव डिसऑर्डर, साइकॉलजिकल-इमोशनल हेल्थ और बॉडी क्लॉक रिद्म के संतुलन में फायदेमंद है।

-धूप सेंकने से नींद न आने की समस्या दूर होती है क्योंकि धूप का सीधा असर हमारे पीनियल ग्लैंड पर होता है। यह ग्लैंड शरीर में मेलाटोनिन है जो नामक हॉर्मोन बनाता है। एक ऐसा पावरफुल एंटी-ऑक्सिडेंट मेलाटोनिन हमारी नींद की क्वॉलिटी तय करता है और डिप्रेशन को भी दूर रखता है।

-सुबह की धूप सेंकने से त्वचा संबंधी कई लाभ भी होते हैं। धूप सेंकने से खून साफ होता है और फंगल प्रॉब्लम, एग्जिमा, सोरायसिस और स्किन संबंधी दूसरी कई बीमारियां दूर होती हैं। यह बीपी को कम करने में भी मदद करती है।

ज्यादा से परेशानी भी

-ओजोन परत आज काफी क्षतिग्रस्त होने की वजह से हानिकारक अल्ट्रावॉयलेट किरणों से बचना मुश्किल हो गया है। लंबे समय (1 घंटा या इससे ज्यादा समय) तक सीधी धूप में बैठने से स्किन एलर्जी, स्किन कैंसर, डिहाइड्रेशन आदि समस्या हो सकती है।

-ज्यादा धूप में लगातार रहने से कुछ लोगों में अल्ट्रावॉयलेट किरणों के प्रभाव से शरीर में त्वचा का रंग तय करने वाले मैलेनिन, हीमोग्लोबिन का उत्पादन गड़बड़ाने लगता है। इससे कुछ समय बाद स्किन के टैन होने का खतरा बढ़ जाता है।

कैल्शियम और विटामिन डी

कैल्शियम हड्डियों का एक मुख्य तत्व है। इसकी कमी से हड्डियां कमजोर हो जाती हैं। इसके अलावा, यह न्यूरो सिस्टम को दुरुस्त रखता है। शरीर के कई अंगों के काम करने में मदद करता है। खास बात यह है कि कैल्शियम तभी शरीर में जज्ब हो पाता है जब विटामिन डी का लेवल ठीक हो। यानी अगर विटामिन डी कम है तो कैल्शियम शरीर में नहीं जा पाता और हड्डियां कमजोर हो जाती हैं। ऐसे में कैल्शियम अगर पूरा ले भी रहे हैं तो भी उसका फायदा नहीं मिलता। शरीर को कैल्शियम अगर पूरा नहीं मिलता तो वह हड्डियों में मौजूद कैल्शियम को इस्तेमाल करना शुरू करता है क्योंकि कैल्शियम ब्लड के जरिए शरीर के अलग-अलग हिस्सों में जाकर काम करता है।

कितना हो कैल्शियम

शरीर में कैल्शियम का लेवल 8.8 से 10.6 एमजी/डीएल होना चाहिए। इसके लिए रोजाना 1000 एमजी यानी 1 ग्राम कैल्शियम लेने की जरूरत होती है। कैल्शियम से भरपूर डाइट (दूध और दूध से बनी चीजें, हरी पत्तेदार सब्जियां और ड्राई-फ्रूट्स) लेने से यह जरूरत काफी हद तक पूरी हो जाती है। प्रेग्नेंट महिलाओं, दूध पिलाने वाली मांओं और बढ़ते बच्चों को भी ज्यादा मात्रा में कैल्शियम की जरूरत होती है। ऐसी मांओं को दोगुनी यानी करीब 2 ग्राम कैल्शियम रोजाना की जरूरत होती है। इसी तरह 1-4 साल के बच्चों को रोजाना 700 एमजी, 4-8 साल के बच्चों को 1000 एमजी और 9-18 साल के बच्चों को 1300 एमजी कैल्शियम चाहिए।

ज्यादा हो तो भी खतरनाक

शरीर में अगर विटामिन डी बहुत ज्यादा हो तो भी वह खतरनाक हो सकता है। इसकी अधिकता तब मानी जाती है जब शरीर में इसका लेवल 800-900 नैनोग्राम/मिली तक पहुंच जाए। ऐसा होने पर किडनी फंक्शन से लेकर मेटाबॉलिजम तक पर असर पड़ता है। हालांकि विटामिन डी बहुत ही कम मामलों में इस लेवल तक जा पाता है। कई बार लोगों को लगता है कि दवा के रूप में विटामिन डी ज्यादा लेने से नुकसान हो सकता है। मुंह से लिए जानेवाले विटामिन डी का कोई नुकसान नहीं है। यह एक्स्ट्रा विटामिन डी शरीर से पॉटी या यूरीन के रास्ते निकल जाता है। लेकिन इंजेक्शन से लिया जानेवाला सारा विटामिन डी शरीर में ही रह जाता है इसीलिए विटामिन डी के सैशे, टैब्लेट या कैप्लूस ही लेने की सलाह दी जाती है।

कौन-सी दवा लें

हमें रोजाना 1 ग्राम (1000 एमजी) कैल्शियम की जरूरत पड़ती है। 50 साल से ज्यादा उम्र की महिलाओं और 70 साल के ज्यादा उम्र के पुरुषों को रोजानना 1200 एमजी कैल्शियम लेना चाहिए। डॉक्टर की सलाह से हर दिन 500 एमजी की 1 टैब्लेट ले सकते हैं। 30 साल की उम्र के बाद महिलाओं को और 40 साल के बाद पुरुषों को कैल्शियम टैब्लेट लेनी चाहिए। लेने पर कई बार गैस आदि की शिकायत हो सकती है। खाने के बाद खूब सारा पानी पिएं।

कैल्शियम के लिए टेस्ट

अक्सर गली-मोहल्ले में फ्री में बोन डेंसिटी टेस्ट के कैंप लगते हैं। इनमें एड़ी के जरिए हड्डियों में कैल्शियम की मात्रा की जांच की जाती है। लेकिन यह तरीका सही नहीं है। इस टेस्ट पर भरोसा नहीं किया जा सकता।

Rajnish Pandey
A media professional with experience in print and digital journalism, handling news editing and content management with a focus on accuracy and responsible reporting.

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